<rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" xmlns:dcterms="http://purl.org/dc/terms/" xmlns:geo="http://www.w3.org/2003/01/geo/wgs84_pos#" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/" xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/" xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/" version="2.0"><channel xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/"><title><![CDATA[ आधी आबादी]]></title><link>https://ravivarvichar.in/aadhi-aabadi</link><description><![CDATA[ ]]></description><atom:link href="https://ravivarvichar.in/rss/categories/aadhi-aabadi" rel="self"/><language>en-us</language><lastBuildDate>Sat, 18 Nov 2023 11:12:57 +0530</lastBuildDate><item><title><![CDATA[Banashree App के साथ डिजिटली सशक्त हो रहीं आदिवासी महिलाएं ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/aadhi-aabadi/banashree-app-helping-adivasi-women-from-odisha-sell-their-ntfp-products-1687978</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/ApAmfxPJwWmcNSKyDZEd.jpg"><p style="text-align: justify;"><a href="https://ravivarvichar.in/nazariya/rural-women-moving-towards-financial-inclusion-with-shg-fintech-1513793" rel="dofollow">Digital india</a> मिशन गांवों और दूरदराज के इलाकों में अपनी क्रान्ति की लहर फैलाते हुए <strong>ओडिशा</strong> (Odisha) के घने जंगलों में रह रहीं <strong>आदिवासी महिलाओं</strong> (<a href="https://ravivarvichar.in/aadhi-aabadi/un-women-lauded-tribal-women-forest-products-shg-processing-units">adivasi women</a>) तक पहुंच चुका है. डिजिटल पहल की बदौलत, कोरापुट जिले में आदिवासी महिलाओं का जीवन बदल रहा है. ये महिलाएं, जो लंबे समय से अपनी आजीविका के लिए <strong>गैर-लकड़ी वन उपज</strong> (NTFP) के संग्रह और बिक्री पर निर्भर थीं, अब <strong>डिजिटल युग </strong>का लाभ उठा रही हैं (adivasi women selling through app).</p>
<h2 style="text-align: justify;">Center for Youth and Social Development ने लॉन्च किया Banashree App</h2>
<p style="text-align: justify;">मुख्य रूप से आदिवासी आबादी वाला कोरापुट भारत के सबसे गरीब जिलों में से एक है. <strong>राष्ट्रीय बहुआयामी गरीबी सूचकांक</strong> (The National Multidimensional Poverty Index) बताता है कि इसके एक तिहाई से ज़्यादा निवासी अति गरीबी में रहते हैं. इस क्षेत्र की महिलाओं के लिए, आमदनी का मुख्य आधार वन उपज इकट्ठा करना और इसे व्यापारियों को बेचना है. सही जानकारी न होने और बाजार तक पहुंचने में चुनौतियों की वजह से उन्हें सही दाम नहीं मिल पाता.</p>
<p><img alt="banashree app" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/500x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/VEPkqwaY8UYaha4lRKjL.jpg" style="width: 500px;" class="center"></p>
<p class="center"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: <span class="BK5CCe cS4Vcb-pGL6qe-lfQAOe">Mongabay-India</span></em></span></p>
<p style="text-align: justify;">दिसंबर 2022 में <strong>बनश्री मोबाइल एप्लिकेशन</strong> की शुरुआत के साथ बदलाव आना शुरू हुआ. <strong>सेंटर फॉर यूथ एंड सोशल &nbsp;डेवलपमेंट</strong> (Center for Youth and Social Development) द्वारा लॉन्च किये गए बनश्री ऐप ने आदिवासी महिलाओं को NTFP मूल्य श्रृंखला, मार्केट लिंकेज, फाइनेंशियल इन्क्लूशन के बारे में अहम जानकारी देकर सशक्त बनाया है.</p>
<p style="text-align: justify;">यह भी पढ़ें:&nbsp;<a href="https://ravivarvichar.in/aadhi-aabadi/tribal-development-digital-atlas-to-boost-jharkhand-development-1678949">ट्राइबल डेवलपमेंट डिजिटल एटलस से झारखण्ड विकास को मिलेगी नई राह<span>&nbsp;</span></a></p>
<h2 style="text-align: justify;">Banashree mobile application के ज़रिये मार्केटिंग कर रहीं महिलाएं &nbsp;</h2>
<blockquote>
<p>"<em>कोरापुट जिले के छह 'ब्लॉकों' के अंतर्गत 22-ग्राम पंचायतों में दो स्वयं सहायता समूहों (SHG) की 20 महिला संग्राहकों ने इस साल अच्छा मुनाफा कमाया. उन्होंने अपनी फसल सरकारी संस्था, जनजातीय विकास सहकारी निगम लिमिटेड (TDCC) को सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) 3,600 रुपये ($43) प्रति क्विंटल पर बेची - डिजिटलीकरण की शक्ति के लिए धन्यवाद.</em>'' पुष्पलता बिसोयी ने &nbsp;बताया.</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;"><strong>Banashree mobile application</strong> की मदद से महिलाओं ने अपने उत्पादों की मार्केटिंग के लिए डिजिटलीकरण की शक्ति का इस्तेमाल किया. यह डिजिटल पहल न सिर्फ इन महिलाओं के लिए उचित आय सुनिश्चित करती है, बल्कि व्यापारियों की शोषणकारी प्रथाओं को भी खत्म करती है जो उनकी जानकारी की कमी का फायदा उठाते थे.</p>
<h3 style="text-align: justify;">डिजिटल साक्षरता के ज़रिये हो रहा महिलाओं का सशक्तिकरण&nbsp;</h3>
<p style="text-align: justify;">इस पहल की विशेषताओं में से एक डिजिटल साक्षरता के ज़रिये<strong> महिलाओं का सशक्तिकरण</strong> (women empowerment) है. डिजिटल चैंपियंस, समुदाय के लीडर्स, महिलाओं को ऐप का इस्तेमाल &nbsp;करने के बारे में शिक्षित करने और मार्केटिंग गतिविधियों को सुविधाजनक बनाने के लिए अथक प्रयास करते हैं.&nbsp;</p>
<p><img alt="adivasi women using banashree app" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/500x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/fdNtp5JHLn38Q4wPG6MU.jpg" style="width: 500px;" class="center"></p>
<p class="center"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: People's Archive of Rural India</em></span></p>
<p style="text-align: justify;">हालांकि <strong>डिजिटल सशक्तिकरण</strong> (digital empowerment) की राह चुनौतियों से रहित नहीं है. इंटरनेट और स्मार्टफोन का अभाव ख़त्म करने और इसके इस्तेमाल के बारे में जागरूकता बढ़ाने की ज़रुरत है.&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>बनश्री</strong> की सफलता दर्शाती है कि कैसे डिजिटल पहल हाशिए पर रहने वाले समुदायों, ख़ासकर महिलाओं के जीवन को बदल सकती है और बिचौलियों पर निर्भरता को कम करके आर्थिक समृद्धि का सफर आसान बनाती है. यह <strong>डिजिटल क्रांति </strong>ओडिशा की <strong>आदिवासी महिलाओं </strong>के लिए उज्जवल भविष्य का वादा करती है.</p>
<p style="text-align: justify;">यह भी पढ़ें:&nbsp;<a href="https://ravivarvichar.in/kahaniyan/tribal-women-of-shg-saving-the-ancient-adivasi-dhokra-art">प्राचीन आर्ट को सहेज रही समूह की आदिवासी महिलाएं</a></p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मिस्बाह</dc:creator><pubDate>Sat, 18 Nov 2023 11:12:57 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/aadhi-aabadi/banashree-app-helping-adivasi-women-from-odisha-sell-their-ntfp-products-1687978]]></guid><category><![CDATA[आधी आबादी]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/ApAmfxPJwWmcNSKyDZEd.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/ApAmfxPJwWmcNSKyDZEd.jpg"/></item><item><title><![CDATA[ट्राइबल डेवलपमेंट डिजिटल एटलस से झारखण्ड विकास को मिलेगी नई राह ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/aadhi-aabadi/tribal-development-digital-atlas-to-boost-jharkhand-development-1678949</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/g6Z6Q1Dh86KrWmjqtDfY.jpg"><p style="text-align: justify;">किसी भी समुदाय के समग्र विकास के विकास लिए उसकी पूरी जानकारी होना ज़रूरी है. झारखंड में आदिवासी समूहों के विकास (<a href="https://ravivarvichar.in/photovideo/tribal-rural-women-who-are-making-rural-india-economic-self-reliant-1677501">development of tribal groups</a>) को सुनिश्चित करने के लिए ट्राइबल डेवलपमेंट डिजिटल एटलस (Tribal Development Digital Atlas) तैयार करने का फैसला लिया गया. पहले चरण में अति कमजोर आदिवासी समुदाय (PVTG) का बेसलाइन सर्वे होगा.&nbsp;</p>
<h2 style="text-align: justify;">जानकारी के ज़रिये आदिवासी समुदाय के लिए बनाई जाएंगी योजनायें&nbsp;</h2>
<p style="text-align: justify;">यह काम आदिवासी कल्याण आयुक्त के मार्गदर्शन में झारखंड (Jharkhand) के कल्याण विभाग द्वारा किया जायेगा. आदिवासी गांवों में बुनियादी सुविधाओं की स्थिति को मापने के लिए क्रिटिकल गैप सर्वे के साथ हर गांव और टोला में शिक्षा, कौशल, रोजगार, जीवनस्तर आदि का डेटा भी जुटाया जाएगा.</p>
<p style="text-align: justify;">जुटाई गई जानकारी का इस्तेमाल राज्य सरकार द्वारा आदिवासी समुदाय के विकास के लिए योजनाएं बनाने और लागू करने में किया जायेगा. जनजातीय समूहों को पक्के घर, स्वच्छता, शुद्ध पेयजल, बिजली, पेंशन, आयुष्मान कार्ड, और ई - श्रम का लाभ मिल सकेगा.</p>
<p><img alt="Tribal Development Digital Atlas " src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/500x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/rTCUTBBqwVRObtQPLvKz.jpg" style="width: 500px;" class="center"></p>
<div class="NxQ4vb">
<div class="Gey3qe w9N6q indIKd center" jsname="lN6iy"><span class="lhwhwf cS4Vcb-pGL6qe-lfQAOe"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: Swadesh</em></span></span></div>
</div>
<p style="text-align: justify;">साथ ही स्वास्थ्य केंद्र, आंगनबाड़ी तक पहुंच, शिक्षा, सिंचाई के लिए पानी, सड़क कनेक्टिविटी, मोटर बाइक एंबुलेंस, स्वास्थ्य केंद्र की सुविधा, मोबाइल और इंटरनेट कनेक्टिविटी, वनोत्पाद आधारित आजीविका, राज्य आजीविका मिशन के तहत स्वयं सहायता समूहों और संघों को संगठित करके आजीविका में सुधार समेत कई सुविधाओं तक पहुंच दी जाएगी.</p>
<h2 style="text-align: justify;">सामाजिक बुनियादी ढांचे तक मिलेगी पहुंच&nbsp;</h2>
<p style="text-align: justify;">सरकार का लक्ष्य है कि अगस्त 2024 तक राज्य में कुल 67,501 PVTG परिवारों और 3,705 गांवों में करीब 2,92,359 आबादी के विकास का लक्ष्य पूरा किया जा सकेगा.</p>
<p><img alt="Tribal Development Digital Atlas " src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/500x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/H3PRfvvuJxFer39RbiVt.webp" style="width: 500px;" class="center"></p>
<p class="center"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: </em><em><span class="lhwhwf cS4Vcb-pGL6qe-lfQAOe">The Guardian</span></em></span></p>
<p style="text-align: justify;">अति कमजोर जनजातीय समूहों को सामाजिक बुनियादी ढांचे तक पहुंच देने के साथ उनकी पारंपरिक आजीविका स्त्रोतों को भी सशक्त बनाया जाएगा. चने की खेती, SHG और क्लस्टर आधारित FPC और महिला समूहों के ज़रिये JSLPS इसके लिए काम करेगा. सिदो-कान्हू वनोपज फेडरेशन के ज़रिये इन उत्पादों को बाजारों तक पहुंचने में मदद मिलेगी. समूह में पाए जाने वाले एनीमिया, विशेष रूप से सिकल सेल एनीमिया और कुपोषण को दूर करने के लिए खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं भी सुनिश्चित की जाएंगी.&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;">यह भी पढ़े : <a href="https://ravivarvichar.in/aadhi-aabadi/un-women-lauded-tribal-women-forest-products-shg-processing-units">उद्यमिता के सफ़र पर आदिवासी महिलाएं</a></p>
<h3 style="text-align: justify;">शिक्षा को बनाया विकास का ज़रिया&nbsp;</h3>
<p style="text-align: justify;">मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन (<a href="https://ravivarvichar.in/khabar/being-a-woman-or-a-tribal-not-a-disadvantage-says-president-murmu-while-adressing-shg-conference">CM Hemant Soren</a>) की पहल पर असुर, कोरबा, माल पहाड़िया, बिरहोर, सबर, बिरजिया, सौर पहाड़िया जैसे आठ अति संवेदनशील जनजातीय समुदाय (PVTG) के युवक-युवतियों के लिए निःशुल्क कोचिंग की शुरुआत भी की गई है. 150 युवाओं को अलग-अलग परीक्षाओं के लिए तैयार किया जाएगा. इसमें 60 से ज़्यादा युवतियां शामिल हैं.&nbsp;</p>
<p><img alt="Tribal Development Digital Atlas " src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/500x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/hK4WuZ2wX09s9xV6Yc2c.jpg" style="width: 500px;" class="center"></p>
<p class="center"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: Pradan</em></span></p>
<p style="text-align: justify;">आदिवासी विकास की दिशा में उठाया गया ये कदम समुदाय के लोगों को सशक्तिकरण के पथ पर ले जायेगा और राज्य की प्रगति में योगदान देगा.&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;">यह भी पढ़े : <a href="https://ravivarvichar.in/kahaniyan/tribal-women-of-shg-saving-the-ancient-adivasi-dhokra-art">प्राचीन आर्ट को सहेज रही समूह की आदिवासी महिलाएं</a></p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मिस्बाह</dc:creator><pubDate>Mon, 06 Nov 2023 11:46:30 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/aadhi-aabadi/tribal-development-digital-atlas-to-boost-jharkhand-development-1678949]]></guid><category><![CDATA[आधी आबादी]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/g6Z6Q1Dh86KrWmjqtDfY.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/g6Z6Q1Dh86KrWmjqtDfY.jpg"/></item><item><title><![CDATA[इप्पा फूल बन रहा आदिवासी महिलाओं की आमदनी का ज़रिया ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/aadhi-aabadi/ippa-flower-is-becoming-a-source-of-income-for-tribal-women-1557442</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/Ii4elimqapZi5s2frwra.jpg"><p style="text-align: justify;"><strong>कल्पतरू या इप्पा </strong>(Kalpataruu Ippa tree), प्रसिद्ध और प्राचीन पेड़, जिसे <strong>आदिलाबाद जिले</strong> के <strong>आदिवासी जनजाति </strong>पवित्र मानती है और अलग-अलग त्योहारों पर इसकी पूजा भी की जाती है. गर्मियों के समय में आदिवासी इप्पा फूलों को इकठ्ठा कर बाज़ारों में बेचते है. <strong><a href="https://ravivarvichar.in/khabar/shg-women-of-nirmal-district-producing-mahua-oil-1434078">आदिवासी महिलाएं</a></strong> भी इस व्यापार के ज़रिये अच्छी आमदनी करती है.</p>
<h2 style="text-align: justify;">एनीमिया को ठीक करता है इप्पा फूल&nbsp;</h2>
<p style="text-align: justify;"><strong>ट्राइबल कोऑपरेशन कारपोरेशन</strong> (GCC) को आदिवासी इप्पाफूल और दूसरे वन्य उत्पादों को बेचकर आय अर्जित करते है. इप्पाफूल में कई <strong>पोषण गुण </strong>होते है, आदिवासी अलग-अलग तरह के पकवान जैसे लड्डू आदि बनाते है.</p>
<p style="text-align: justify;"><img alt="mahua oil" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/505x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/Uu6dvNEigUnirmrCkaZw.jpg" style="width: 505px;" class="center"></p>
<p class="center"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits : X.com</em></span></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>एनीमिया जैसी बीमारियां</strong> इससे ठीक होती है. पोषण संबंधी समस्यायों को हल करने के लिए जोइंट जिला क्षेत्र फूलों से बने लड्डू को की शोरों और की शोरीयों को बांट रहा हैं. हाल में इसी कैम्फर से तेल भी बनाया जा रहा है.&nbsp;</p>
<h3 style="text-align: justify;">ट्राइबल सेल्फ हेल्प सोसाइटी ने Ippavvu ऑइल मैन्युफैक्चरिंग सेंटर की या स्थापित&nbsp;</h3>
<p style="text-align: justify;">निर्मल जिले के कदम मंडल के ट्राइबल सेल्फ हेल्प सोसाइटी के सदस्यों ने साथ मिलकर <strong>ट्राइबल डेवलपमेंट इंस्टीटूशन, उतनूर</strong> (ITD,Utnur) और <strong>जिला ग्रामीण विकास विभाग</strong> के समर्थन से, <strong>Ippavvu ऑइल मैन्युफैक्चरिंग सेंटर</strong> स्थापित की या है.</p>
<p style="text-align: justify;">सीजन के दौरान, आदिवासी लोग अपने कुछ फूल व्यक्तिगत उपयोग के लिए रखकर बाकी <strong>आदिवासी सहकारी समिति</strong> को बेचते हैं. <a href="https://ravivarvichar.in/khabar/balcos-initiative-promoting-menstrual-health-and-hygiene-education-1515721">स्वयं सहायता समूह</a>&nbsp;के सदस्य आदिवासियों से तीस रूपए प्रति की लोग्राम बीज खरीदते है.</p>
<h2 style="text-align: justify;">इप्पा तेल का इस्तेमाल खाने में भी</h2>
<p style="text-align: justify;">इप्पा के <strong>एक की लो बीज से दो और आधा लीटर तेल </strong>बनाया जाता है. तेल को छलने के लिए कपड़े का इस्तेमाल की या जाता है. आगे चलकर छलने की मशीन खरीदने का विचार की या जा रहा है. इस <strong>तेल बाजार में 800 रूपए &nbsp;प्रति लीटर </strong>बेचा जायेगा. इस तेल का इस्तेमाल खाने में भी की या जा सकता है.&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;"><img alt="madhuca" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/542x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/vTVGYqkayCJsiGuHuthZ.jpg" style="width: 542px;" class="center"></p>
<p class="center"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits : Pipanews.com</em></span></p>
<p style="text-align: justify;">राष्टीय स्तर पर विपणन करने के लिए योजना बनाई जा रही है. इप्पा यूनिट की स्थापना <strong>10 लाख रुपये</strong> लगें है, जिसमें<strong> <a href="https://ravivarvichar.in/khabar/telangana-ahead-in-millet-use">ITDA</a> ने 80 % और और बाकी बचे 20 % जिला ग्रामीण विकास </strong>द्वारा समर्थन दिया गया है.</p>
<p style="text-align: justify;">कुछ <strong>आदिवासी महिला स्वयं सहायता समूह</strong> (<a href="https://ravivarvichar.in/kahaniyan/telangana-tribal-women-are-getting-empowered-by-mahua-oil-production-1515693">Tribal women self help groups</a>) फूलों की ब्राउनिज बनाकर रोजगार अर्जित कर रही हैं. आलीदाबाद बहुत अधिक मात्रा में पाया जाने वाला यह इप्पा फूल आदिवासी&nbsp;<strong>महिलाओं को रोजगार </strong>देने के साथ उन्हें <strong>आर्थिक रूप से सशक्त </strong>की या है, जिससे वह महिला सशक्तिकरण की राह पर अग्रसर हो रही है.</p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">हेमा वाजपेयी</dc:creator><pubDate>Tue, 24 Oct 2023 12:30:38 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/aadhi-aabadi/ippa-flower-is-becoming-a-source-of-income-for-tribal-women-1557442]]></guid><category><![CDATA[आधी आबादी]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/Ii4elimqapZi5s2frwra.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/Ii4elimqapZi5s2frwra.jpg"/></item><item><title><![CDATA[उद्यमिता के सफ़र पर आदिवासी महिलाएं ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/aadhi-aabadi/un-women-lauded-tribal-women-forest-products-shg-processing-units</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/B5oVBiLbwlKvNYIKZ6zz.jpg"><p style="text-align: justify;">देशभर में कई जगहों पर <strong>वन उत्पाद</strong> (<span>forest products</span>)<strong> महिला स्वयं सहायता समूहों</strong> (women self-help groups) के लिए आमदनी का जरिया बन रहे हैं. <strong>महाराष्ट्र</strong> (<span>Maharashtra</span>) के <strong>गढ़चिरौली</strong> (<span>Gadchiroli</span>) में स्थित <strong>रामगढ़ गांव </strong>(<span>Ramgarh village</span>) की <a href="https://ravivarvichar.in/kahaniyan/tribal-women-of-shg-saving-the-ancient-adivasi-dhokra-art">आदिवासी महिलाओं</a>&nbsp;(Adivasi women) ने भी <strong>वन उत्पादों से रोज़गार शुरू किया</strong>. वन अधिकार हासिल कर, <strong>स्वयं सहायता समूहों</strong> (SHG) के ज़रिए <strong>वन उत्पादों की इकाइयां</strong> (<span>processing unit</span>) शुरू की. ये इकाइयां क्षेत्र की <strong>आर्थिक उन्नति</strong> के साथ-साथ, <strong>महिला <a href="https://ravivarvichar.in/kahaniyan/manju-shah-paving-a-new-path-from-pine-forests-to-empowerment">सशक्तिकरण</a></strong>&nbsp;(women empowerment) का लक्ष्य भी पूरा कर रही हैं.&nbsp;</p>
<p><img alt="UN Women lauded tribal women forest products" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/501x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/NvcorYHDc5AZX6oGLl15.jpg" style="width: 501px;" class="center"></p>
<div class="field__item center"><span style="font-size: 8pt;"><em>UN Women India/Ruhani Kaur</em></span></div>
<h2 style="text-align: justify;">UN वीमेन ने सराहा 'संगिनी' को&nbsp;</h2>
<p style="text-align: justify;"><a href="https://news.un.org/hi/story/2023/08/1070617">यूएन वीमेन</a> (UN Women) के एक प्रकाशन में, इन <a href="https://ravivarvichar.in/khabar/adivasi-woman-from-mp-became-millet-brand-ambassador">आदिवासी</a><strong>&nbsp;महिलाओं</strong> (Adivasi women) <strong>की सराहना की</strong> गई है. <strong>संगिनी</strong> (Sangini) नाम के<strong> ग्राम स्तरीय महिला स्वयं सहायता समूहों </strong>के संघ (<span>village level organization</span>) द्वारा एक <strong>प्रसंस्करण इकाई</strong> (<span>processing unit</span>) शुरू हुआ. <strong>महाराष्ट्र राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन</strong> (MSRLM) के तहत<strong> रामगढ़ </strong>में लगभग <strong>32 स्वयं सहायता समूहों</strong> को इकट्ठा कर<strong> 'संगिनी' कार्यक्रम</strong> की शुरुआत की गई.</p>
<p style="text-align: justify;">यह <strong>स्वयं सहायता समूह</strong> अपने <strong>आधिकृत सामुदायिक जंगलों</strong> (CFRs) से <strong>जंगली जामुन</strong> (<span>wild berries</span>) और <strong>शरीफ़ा</strong> (<span>custard apple</span>) इकट्ठा करते हैं. 'संगिनी' उनके गूदे को <strong>डीप फ्रीज़</strong> (deep freeze) में रख बड़े खरीदारों को बेचते हैं.</p>
<p><img alt="UN Women lauded tribal women forest products" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/502x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/izraJyzd0R0ow9jkhxyD.jpg" style="width: 502px;" class="center"></p>
<p class="center"><span style="font-size: 8pt;"><em>UN Women India/Ruhani Kaur</em></span></p>
<p style="text-align: justify;">आर्थशास्त्र में एमए डिग्री प्राप्त&nbsp;<strong>प्रतिज्ञा</strong>, संगिनी महिला ग्राम संघ की <strong>एकमात्र पोस्ट ग्रेजुएट</strong> हैं, जो यहां <strong>सचिव और अकाउंटेंट</strong> की जिम्मेदारी भी संभालती हैं.</p>
<h3 style="text-align: justify;">वन उपज का लाभ उठा रहीं आदिवासी महिलाएं&nbsp;</h3>
<p style="text-align: justify;"><strong>संगिनी</strong> की इकाई में पूरी तरह से&nbsp;<a href="https://ravivarvichar.in/kahaniyan/tribal-connect-ngo-of-ananya-dodmani-helps-adivasi-people"> महिला-नेतृत्व वाले समूहों </a>(women led SHG) द्वारा संचालन होता है, जो सामूहिक रूप से वन उपज का लाभ उठा रहे हैं. यह गांव से <strong>जामुन और सीताफल इकट्ठा</strong> करते हैं. दूसरे ब्लॉक में <strong>जम्भुलखेड़ा </strong>में <strong>शहद और चिरौंजी </strong>से <strong>आजीविका</strong> कमाई जा रही है. <strong>तेंदू-बांस</strong> का प्रसंस्करण करने वाली इकाइयां भी हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">महिलाएं <strong>कैपेसिटी बिल्डिंग ट्रेनिंग</strong> (capacity building training) में हिस्सा लेती हैं. <strong>आजीविका मिशन</strong> (Ajeevika Mission) उन्हें इकाई शुरू करने के लिए धनराशि (funding) भी देता है. ये महिलाएं गरीबी के चंगुल से निकल आत्मनिर्भरता का लक्ष्य हासिल कर रही हैं.&nbsp;</p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मिस्बाह</dc:creator><pubDate>Thu, 31 Aug 2023 18:29:25 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/aadhi-aabadi/un-women-lauded-tribal-women-forest-products-shg-processing-units]]></guid><category><![CDATA[आधी आबादी]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/B5oVBiLbwlKvNYIKZ6zz.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/B5oVBiLbwlKvNYIKZ6zz.jpg"/></item><item><title><![CDATA[थर्ड जेंडर को आगे लाती त्रिनेत्रा ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/aadhi-aabadi/the-inspiring-story-of-trans-rights-activist-trinetra-haldar-gummaraju</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/cOGJZPmgygaPsl48G5Og.jpg"><p>किसी भी बच्चे का अपनी माँ की साड़ियों से एक अलग ही रिश्ता होता है. दुनिया अपनी मुट्ठी में रखने के सपनों के साथ हर बच्चे ने अपनी मां का का पल्लू मुट्ठी में थामा होगा. उसी साड़ी का आंचल कभी कड़ी धुप से बचा लेता या कभी चुपके से मुँह पोछने के काम आता. ममता , लाड &nbsp;, दुलार , डांट और नाराज़गी , यह सब इमोशंस को साड़ी में ही तो देखा है .न जाने कितने ही बच्चों ने खुद को साड़ी में सजने संवरने की कोशिशें करी होगी. कुछ ऐसा ही <strong>त्रिनेत्रा हलदर गुम्मराजू</strong> &nbsp;(Trinetra Haldar Gummaraju) ने भी किया. 3-4 &nbsp;साल के त्रिनेत्रा को उस वक़्त न समाज के रीति रिवाजों की फ़िक्र थी न ही उनसे कोई शिकायत. लेकिन उस बच्चे को साड़ी पहने देख, &nbsp;चंद मिनटों में ही समाज ने उस पर बंदिशें लगा दी. इन बंदिशों पाबंदियों की असली वजह थी त्रिनेत्रा का जेंडर.&nbsp;</p>
<h2>संघर्ष से सेल्फ -एक्सेप्टेन्स की कहानी&nbsp;</h2>
<p>त्रिनेत्रा को साड़ी पहनने की इच्छा को इसलिए कुचलना पड़ा अपने जन्म से असाइंद (assigned) जेंडर के कारण. दोस्त और &nbsp;रिश्तेदार उसे जानते थे तो बस '<strong>अंगद</strong> ' के नाम से . लेकिन त्रिनेत्रा के लिए &nbsp;उस आइडेंटिटी में ढलना मुश्किल था. &nbsp;सही गाइडेंस न मिल पाने के कारण , त्रिनेत्रा ने अपने घरवालों और टीचर्स के कहने पर कई '<strong>मेनली' एक्टिविटीज</strong> ट्राय करी. &nbsp;लेकिन यह सब कर के वो खुद को खुद से अनजान महसूस करती. हाई स्कूल आते - आते&nbsp;<strong>जेंडर आइडेंटिटी इश्यूज </strong>से एक जंग लड़ रही त्रिनेत्रा का बच्चों से लेकर टीचर्स तक , सबने मज़ाक उड़ाया. &nbsp;न किसी ने हालत को समझा और न ही साथ दिया. लेकिन बदलते वक़्त के साथ तस्वीर भी बदली जब बचपन से लेकर कॉलेज तक की जर्नी &nbsp;ने &nbsp;उन्हें अपने <strong>ट्रांसवूमन &nbsp;आइडेंटिटी</strong> से रूबरू करवाया. छोटे-छोटे पलों से साझा हुई इस बात ने त्रिनेत्रा को हिम्मत दी, खुद को एक्सेप्ट करने की. लड़के से&nbsp;<a href="https://ravivarvichar.in/aadhi-aabadi/only-trans-woman-from-kashmir-shoaib-working-in-a-corporate-giant"> ट्रांसवुमन </a>बनने की फिजिकल जर्नी के दौरान ऑफलाइन और ऑनलाइन &nbsp;दुनिया ने कई &nbsp;ताने मारे , लेकिन असल मायने में <strong>सेल्फ एक्सेप्टेन्स</strong> और सेल्फ लव &nbsp;की राह पर चल पड़ी त्रिनेत्रा को अब रोकना मुश्किल था</p>
<p><img alt="Trinetra Gummaraju Made in heaven 2 " src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/189x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/hNcwK3m1yhsy6bnVfv9v.webp" class="left" style="width: 189px;"></p>
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<p>आगे बढ़ने के लिए हर कोई 'आउट ऑफ़ दी बॉक्स ' सोचने को कहता है. लेकिन फिर भी इस दुनिया को हम ब्लैक एंड वाइट , पिंक एंड ब्लूव , मेल एंड फीमेल की बाइनरी में बांटकर रखता है. फीमेल और मेल बॉक्सेस के परे ट्रांसजेंडर का बॉक्स क्यों नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है ? यह सवाल त्रिनेत्रा के मन में भी उठे जब उन्होंने हेल्थकेयर सर्विसेज में ट्रांसजेंडर्स के साथ होते भेदभाव को देखा. इस डिवाइड को कम करने के लिए वो बन गई डॉक्टर. <strong>कर्णाटक</strong> की &nbsp;पहली <strong>'ट्रांसवूमन डॉक्टर'</strong>. खुद से दूरियां कम ज़रूर हुई &nbsp;,लेकिन समाज और उनके बीच के फासले तो बढ़ ही रहे थे . एक क्लास में नोज़रिंग पहना देख, &nbsp;प्रोफेसर ने क्लास से बहार निकल दिया . तब उन्हें हक़ीक़त समझ आई की सशक्तिकरण की बातें तो किसी कागज़ पर लिखकर , अक्षरों में घुम हो चुकी है. &nbsp;इसी दुरी को कम करने के लिए त्रिनेत्रा ने ऑनलाइन कंटेंट बनाना शुरू किया. उन्ही रंग बिरंगी साड़ियों में अपनी जर्नी , अपना संघर्ष बयां किया. इसके दौरान <a href="https://ravivarvichar.in/aadhi-aabadi/transgenders-to-be-considered-as-obc">LGBTQIA</a>&nbsp;प्रोटेस्ट्स में आवाज़ उठाई और &nbsp;आइडेंटिटी से जुझते मुसाफिरों के लिए एक सुकून भरा पड़ाव बन गई.&nbsp;</p>
<p><a href="https://ravivarvichar.in/aadhi-aabadi/aravani-art-project-utilises-art-at-public-places-to-build-safe-spaces-for-lgbtqia-community">ट्रांसजेंडर समुदाय</a> की आवाज़, कहानी और नज़रिये &nbsp;को आज <strong>ज़ोया अख़्तर</strong> (Zoya Akhtar) और&nbsp;<strong>रीमा कागती (Reema Kagti) </strong>डायरेक्टेड <a href="https://ravivarvichar.in/photovideo/the-daring-sobhita-dhulipala">Made In heaven 2</a>&nbsp;वेब सीरीज के ज़रिये ला रही है दुनिया के सामने . अमेजॉन प्राइम <strong>(Amazon prime)</strong> पर आ चुकी इस सीरीज में त्रिनेत्रा ने ट्रांस विमेन के अपने किरदार के जरिए अपने संघर्ष को दिखाया है.किसी समय पर, जिस 'अंगद' को साडी पहना देख समाज ने सिरे से नकार दिया था आज उसी रंग बिरंगी साडी का पल्लू बड़ी शान से लहराते हुए घुमाती है .सेल्फ एक्सेप्टेंस और सेल्फ लव की सटीक परिभाषा सिखाती है त्रिनेत्रा.</p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"> त्रिशा निंबालकर </dc:creator><pubDate>Fri, 11 Aug 2023 18:38:53 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/aadhi-aabadi/the-inspiring-story-of-trans-rights-activist-trinetra-haldar-gummaraju]]></guid><category><![CDATA[आधी आबादी]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/cOGJZPmgygaPsl48G5Og.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/cOGJZPmgygaPsl48G5Og.jpg"/></item><item><title><![CDATA[ब्राज़ील वीमेन फुटबॉल टीम का मैसेज ऑफ़ सपोर्ट ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/aadhi-aabadi/brazil-women-football-team-landed-in-australia-with-a-message-of-support-for-iranian-protestors</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/pcM0qXp9FdIDJW7ANzwj.jpg"><p><strong>13 सितंबर, 2022</strong> के दिन ईरान की एक लड़की को गिरफ्तार कर लिया गया था, क्योंकि उसने ढंग से अपना हिजाब (Head Cover) नहीं पहना था. गिरफ्तारी के बाद उसे इतना मारा गया कि 3 दिन बाद पुलिस कस्टडी में ही उसकी मौत हो गयी थी. 16 सितंबर को<strong>&nbsp;माशा अमीनी </strong>की मौत के बाद <strong>ईरान में क्रांति</strong> शुरू हुई. 'लड़की क्या पहनेगी', 'कैसे पहनेगी', यह तय करने का अधिकार एक लड़की के अलावा किसी और का नहीं होना चाहिए. प्रोटेस्ट शुरू हो गए, लड़कियों ने रैली में उतर कर भीड़ के सामने अपने हिजाब फाड़े, बाले काटे और अपने हक़ की मांग की. मिलकर &ldquo;<strong>वीमेन, लाइफ, फ्रीडम</strong>&rdquo; के नारे लगा रही थी हर लड़की!</p>
<h2>ब्राज़ील की महिला टीम ने किया ईरान के प्रोटेस्टर्स को सपोर्ट</h2>
<p>पूरी दुनिया थी ईरान की हर लड़की के साथ! आग हर व्यक्ति के मन में लगी थी, लेकिन इस आग को हद से ज़्यादा भड़का दिया एक ऐसे फैसले ने. <strong>आमिर नस्र अज़दानी</strong> जिसने उस बेक़सूर <a href="https://ravivarvichar.in/nazariya/wishing-a-very-happy-birthday-to-smriti-mandhana-one-of-the-best-batsman-in-of-indian-cricket-team" rel="dofollow">लड़की </a>के लिए आवाज़ उठाई. वह एक<strong> इरानियन फुटबॉलर</strong> था. सिर्फ ये कहने के लिए कि, '<em>एक लड़की को हर हक़ मिलने चाहिए और उसे हर तरीके की आज़ादी होनी चाहिए</em>,' ईरान की सरकार ने उसे 26 साल की जेल की सज़ा सुना दी. हर इंसान हैरान था, भड़का हुआ था.</p>
<p><img alt="Brazil Soccer team " src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/563x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/2hx5qy5r5He03LNnGWNy.jpg" style="width: 563px;" class="center"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: Fox News</em></span></p>
<p>2022 में क़तार में पुरुष विश्व कप के दौरान, ईरान के हर मैच में प्रदर्शन किये गए. ईरान को जुलाई और अगस्त में <strong>ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में होने वाले <a href="https://ravivarvichar.in/kahaniyan/gold-medal-winner-deepika-kumari-inspiring-story-of-becoming-the-best-archer-in-the-world">महिला विश्व कप</a></strong>&nbsp;में भी शामिल नहीं किया जा रहा. हाल ही में ऑस्ट्रेलिया में महिला विश्वकप में <strong>ब्राज़ील से आई टीम के प्लेन पर माशा और आमिर की तस्वीर</strong> लगी थी और लिखा था- '<em>किसी भी महिला को अपना सिर ढकने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए' और 'ऐसा कहने के लिए किसी भी पुरुष को फांसी नहीं दी जानी चाहिए.</em>'</p>
<p><img alt="Brazil team supporting iranian protestors" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/499x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/6uhKlsfpNkkn2RtgV6TP.jpg" style="width: 499px;" class="center"></p>
<p><em><span style="font-size: 8pt;">Image Credits: Geo Super TV</span></em></p>
<p>यह चार्टर प्लेन, <strong>ड्रीमलाइनर 787</strong>, की बैकस्टोरी ह्यूमैनिटेरिअन है. यह <strong>अर्जेंटीना के फिल्म निर्माता एनरिक पिनेरो</strong> का है, और इसका उपयोग रेफ्यूजीज़ को निकालने के लिए किया गया है. ब्राज़ील का यह कदम एक बहुत बड़ी पहल की ओर ले जाएगा.&nbsp;<a href="https://ravivarvichar.in/khabar/maharashtra-government-decided-to-double-the-revolving-fund-for-shg-women"> महिला सशक्तिकरण </a>सिर्फ<a href="https://ravivarvichar.in/khabar/germany-environmental-minister-came-to-india-for-g20-meet-in-chennai-with-delegates"> भारत</a>&nbsp;ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में एक लहर की तरह फ़ैल चूका है और अब हर महिला तब तक नही रुकेगी जक तक उसे हर वो चीज़ नहीं मिल जाता, जिसकी वे हक़दार है.</p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">रिसिका जोशी</dc:creator><pubDate>Mon, 31 Jul 2023 13:43:57 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/aadhi-aabadi/brazil-women-football-team-landed-in-australia-with-a-message-of-support-for-iranian-protestors]]></guid><category><![CDATA[आधी आबादी]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/pcM0qXp9FdIDJW7ANzwj.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/pcM0qXp9FdIDJW7ANzwj.jpg"/></item><item><title><![CDATA['एक्स्ट्रा' प्यार और इन्क्लूशन की कहानी ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/aadhi-aabadi/book-on-down-syndrome-to-raise-awareness-for-neurodivergent-kids</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/CU9GbaqBFJYBPj1UAozo.jpg"><p>कहानियां पढ़ते समय बच्चे किरदारों में अक्सर अपने आप को ढूंढते हैं. जब स्टोरी में कोई अपने जैसा मिलता तो वही कैरेक्टर उनका पसंदीदा बन जाता. लेकिन, खुद से मेल खाने वाले कैरेक्टर नहीं मिलते तो वे अकेला महसूस करते. अवॉर्ड विनिंग चिल्ड्रंस ऑथर अर्चना मोहन ने न्यूरोडायवर्जेंट बच्चों के लिए ऐसी किताब लिखने का सोचा जिसमें उनके जैसे किरदार हों. इस किताब के ज़रिये वे न्यूरोडायवर्जेंट बच्चों के नज़रिये को दुनिया के साथ साझा करना चाहती थी, ताकि लोग इन बच्चों को समझ सके और उनके साथ बेहतर व्यवहार करें. अर्चना अपनी किताब 'एक्स्ट्रा: एक्स्ट्रा क्रोमोसोम, एक्स्ट्रा लव' के ज़रिये ऐसा करने में सफल रहीं. बेंगलुरु (Bengaluru) के प्रमुख प्रकाशक बुकोस्मिया (Bookosmia) ने उनकी किताब को प्रकाशित किया. </p>
<p><img alt="Extra: Extra chromosome, extra love" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/2C0rL6rzh886FjJ5y2IA.jpg"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: Bookosmia</em></span></p>
<p>साहित्यिक कला का ये काम अपनी सरल लेकिन प्रभावशाली कहानी के लिए पाठकों की पसंद बन रहा है. 'एक्स्ट्रा: एक्स्ट्रा क्रोमोसोम, एक्स्ट्रा लव' (Extra: Extra chromosome, extra love) की कहानी सामाजिक उद्यमी शिवानी ढिल्लों (Shivani Dhillon), उनके पति अजय, और उनके बच्चों श्रेया, नूर और अवि के वास्तविक जीवन के इर्द-गिर्द घूमती है, जिन्होंने अर्चना को ये किताब लिखने के लिए प्रेरित किया. शिवानी की बेटी श्रेया (shreya) को डाउन सिंड्रोम (Down Syndrome) है, जो इस कहानी की मुख्य थीम है. इसके वैज्ञानिक कारण से लेकर ज़िन्दगी में पड़ने वाले असर तक, ये कहानी डाउन सिंड्रोम के सभी पहलुओं को कवर करती है . </p>
<p>शिवानी ने एक मां के रूप में देखा कि समाज ऐसे बच्चों को कैसे देखता है. वह बताती हैं, "<em>सबसे बड़ी चुनौती डाउन सिंड्रोम के प्रति धारणा और कलंक है. हम हमेशा समाज को यह समझाने की कोशिश करते हैं कि कम से कम हमारे बच्चों को एक मौका दिया जाए. हम चाहते हैं कि समाज यह समझे कि मूल रूप से डाउन सिंड्रोम जैसी स्थितियों वाले लोग भी हमारी तरह ही होते हैं, जिनमें प्यार और सराहना पाने की समान इच्छा होती है." </em></p>
<p>शिवानी बताती है कि श्रेया के साथ ने उन्हें "दृढ़, मजबूत और ज़िद्दी" होना सिखाया, साथ ही छोटी-छोटी खुशियों को बांटना भी. लेखिका अर्चना कहती है, "हम सभी के दिमाग अलग हैं, काम करने के तरीके अलग हैं और क्षमताएं भी अलग हैं. हम सब अपना बेस्ट देने की कोशिश करते हैं." वह बताती है कि इस किताब का जन्म इसी विचार से हुआ है. पुस्तक के ज़रिये, अर्चना कहना चाहती है - "<em>एक बच्चे पर लेबल क्यों लगाएं, उन्हें एक कोने में क्यों धकेलें और कहें 'वह विशेष या अलग है', जबकि वास्तव में ये ऐसी चीजें हैं जिनसे हर बच्चा गुजरता है?"</em></p>
<p>शिवानी की कहानी पर लिखी अर्चना की ये किताब विकलांगता को लेकर समाज के नज़रिये को बदलने की कोशिश है. इस तरह की किताबों से रीडर को अपनी धारणाओं पर सवाल उठाने का और नए नज़रिये को समझने का मौका मिलता है. </p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मिस्बाह</dc:creator><pubDate>Sun, 02 Jul 2023 11:00:37 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/aadhi-aabadi/book-on-down-syndrome-to-raise-awareness-for-neurodivergent-kids]]></guid><category><![CDATA[आधी आबादी]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/CU9GbaqBFJYBPj1UAozo.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/CU9GbaqBFJYBPj1UAozo.jpg"/></item><item><title><![CDATA[सामाजिक बदलाव को मिले LGBTQIA+ के रंग ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/aadhi-aabadi/aravani-art-project-utilises-art-at-public-places-to-build-safe-spaces-for-lgbtqia-community</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/keiRoGpxmyaqsNhJ35Fp.jpg"><p>अलग-अलग भावनाओं, संस्कृतियों, और अनुभवों को साथ जोड़ने का काम कला की मदद से किया जा सकता है. रंग और कला के इस्तेमाल से वह संदेश भी दिया जा सकता है जिसे भाषा की व्याकरण में बांधना मुश्किल होता है. अरावनी आर्ट प्रोजेक्ट (Aravani Art Project) भी ऐसी ही एक शुरुआत है जो ट्रांस और सिस महिलाओं (Trans and Cis women) को कला के ज़रिये अपनी बात कहने का मौका दे रहा है. समाज में LGBTQIA + समुदाय के लोगों को भेदभाव (descrimination) और असमानताओं (inequality) का सामना करना पड़ता है. समाज में इसे कम करने के मिशन के साथ, अरावनी आर्ट प्रोजेक्ट LGBTQIA+ समुदाय को देखने के समाज के नज़रिये में बदलाव ला रहा है.</p>
<p><img alt="Aravani art project LGBTQI" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/iWDIdGg4kEDqMQrszx90.jpg"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: aravaniartproject</em></span></p>
<p>LGBTQIA + समुदाय के लोगों की आवाज़ बन, अरावनी आर्ट प्रोजेक्ट हर इंसान के लिए सेफ स्पेस की वकालत कर रहा है. LGBTQIA + लोगों को सार्वजनिक स्थानों पर आत्मविश्वास, सुरक्षित और अपनापन महसूस करवाने के लिए कला का इस्तेमाल किया जा रहा है. सार्वजनिक स्थानों पर लोगों के साथ उत्पीड़न के मामले सबसे ज़्यादा होते हैं, इसलिए आर्ट प्रोजेक्ट ने पब्लिक प्लेसेस (public places) को अपना कैनवास बनाया. <img alt="Aravani art project LGBTQI" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/6TRT6abPGVWKjMozhBIv.jpeg" style="width: 580px; height: 263px;"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: aravaniartproject</em></span></p>
<p>इस प्रोजेक्ट के ज़रिये महिलाएं और नॉन बाइनरी लोग (non-binary people) एक साथ काम कर एक दूसरे को पहचानते हैं और अपने बायस (bias) को दूर करते हैं. फ्रीलांस कला (freelance art) और डिजाइन परियोजनाओं (design projects) के ज़रिये ट्रांसजेंडर समुदाय (transgender community) को आय (income) का ज़रिया मिल पाता है. इस दौरान, संगठनात्मक कौशल विकसित होता है और जागरूकता (awareness) बढ़ाकर सामाजिक परिवर्तन (social change) लाने का अवसर भी मिलता है. </p>
<p><img alt="Aravani art project LGBTQI" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/woO6ApWq6ly3TggPwOgq.jpg"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: aravaniartproject</em></span></p>
<p>इन प्रोजेक्ट्स के ज़रिये अलग-अलग जगहों पर कंपनियों, समुदायों, और सरकारी संस्थानों के साथ साझेदारी की जाती है. इससे सामाजिक भागीदारी का मौका मिलता है और बातचीत करने और सवालों का सही जवाब ढूंढ़ने के लिए सुरक्षित जगह मिल पाती है. इस तरह के प्रोजेक्ट्स की संख्या देशभर में बढ़ानी होगी ताकि जागरूकता कार्यक्रमों (awareness campaigns) को कला का नया रंग मिल सके और साथ ही LGBTQIA + लोगों को आर्थिक आज़ादी (financial freedom) हासिल करने के अवसर भी. </p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मिस्बाह</dc:creator><pubDate>Mon, 26 Jun 2023 15:53:45 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/aadhi-aabadi/aravani-art-project-utilises-art-at-public-places-to-build-safe-spaces-for-lgbtqia-community]]></guid><category><![CDATA[आधी आबादी]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/keiRoGpxmyaqsNhJ35Fp.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/keiRoGpxmyaqsNhJ35Fp.jpg"/></item><item><title><![CDATA[मोहम्मद शोएब ने ढूंढी नाम में अपनी पहचान ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/aadhi-aabadi/only-trans-woman-from-kashmir-shoaib-working-in-a-corporate-giant</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/mtTbz4LmQ6roPYJ8G838.jpg"><p>लगभग 4000 लोगों के एक समुदाय से, मोहम्मद शोएब खान (Mohammad Shoaib Khan), कॉरपोरेट क्षेत्र में काम करते हैं. शोएब ने मानो अपना पूरा जीवन एक पिंजरे में गुजारा, और खुदको स्वीकारने के बाद ही वे गरिमा के साथ चल सकी. ट्रांसफ़ोबिया (transphobia) और होमोफ़ोबिया (homophobia) से कश्मीर के श्रीनगर (Srinagar) का ये समुदाय भी अछूता नहीं रहा. अक्सर ट्रांसजेंडर समुदाय को मौखिक, मानसिक, और शारीरिक शोषण का शिकार होना पड़ता है. यह लैंगिक अल्पसंख्यक है जो समाज में रूढ़िवादिता और असमानता से जूझते हैं. उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति शादियों में मनोरंजन करने, वेश्यावृत्ति और भिक्षावृत्ति तक सीमित है. लेकिन शोएब को ये मंज़ूर न था, उन्होंने पाबंदी लगाने वाली हर बेड़ी को तोड़कर अपनी पहचान खुद बनाने की सोचा. </p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/ZZcbql6XOlLlqMQ33eS9.jpg" alt="Kashmir’s Only Trans Woman Working In A Corporate Giant"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: Shoaib Khan</em></span></p>
<p>लिंग-परिवर्तन प्रक्रिया से गुजरने के बाद, उन्होंने बेहतर महसूस किया, बिलकुल वैसा जैसे हमेशा से खुद की कल्पना की थी. वह अब एक बड़े कॉर्पोरेशन के साथ काम कर रही है और महसूस करती है कि इस पद पर उन्हें सफलता उनके संघर्ष, कठिनाई और शिक्षा की वजह से मिली है. वह वर्तमान में कश्मीर में LGBTQI व्यक्तियों का समर्थन करने वाले गैर सरकारी संगठनों के साथ कई प्रोजेक्ट्स संभाल रही हैं.</p>
<p>वे कश्मीर (Kashmir) में पली बढ़ी. वे अपने बचपन को फिर से जीना चाहती हैं क्योंकि उन्हें अपने बचपन की कोई अच्छी बात याद नहीं है. वे उस प्यार, दोस्ती और साथ से वंचित थी जो आम तौर पर परिवार से मिलता है. वे कमरे में छुपकर करीना कपूर या आलिया भट्ट को देखती तो उन्हें लगता कि वह करीना कपूर या आलिया भट्ट नहीं हो सकती. इसलिए उन्होंने ट्रांस वुमन के लिए एक उदाहरण बनने का सोचा. 'अगर हम पढ़ेंगे तो हम भी उसके जैसे बन सकते हैं' और गरिमा के साथ ज़िन्दगी जी सकते हैं.</p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/V6N1pOLIjpvYytgvFp4S.jpg" alt="Shoaib"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: Shoaib Khan</em></span></p>
<p>उनका कहना है कि LGBTQIA समुदाय को दिन-ब-दिन निराश होने की बजाय अपने भीतर ध्यान देने की ज़रुरत है. समाज से स्वीकृति की मांग करते हैं, लेकिन हम कभी भी ट्रांसजेंडर लोगों या LGBTQI समुदाय के पालन-पोषण पर ध्यान नहीं देते. जब हम अपने ही परिवार द्वारा स्वीकार नहीं किए जाते हैं तो हम समाज से स्वीकृति की मांग कैसे कर सकते हैं? और यह भी कि जब हम स्वयं को स्वीकार नहीं कर सकते तो हम समाज से स्वीकृति की मांग कैसे कर सकते हैं? यह सवाल उठाया शोएब ने. </p>
<p>जब वे सातवीं कक्षा में थी, तो उन्हें सीनियर काफी परेशान किया करते. जब वे अपनी मां के पास गई तो मां ने उन्हें कोई सहारा या प्यार नहीं दिया. और वह कैलेंडर हाथ में लेकर गिनने लगी कि 7वीं से 12वीं कक्षा तक कितने दिन बचे हैं.  </p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/Zaw860k05X4eLOnK0ya6.jpg" alt="Shoaib"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: Shoaib Khan</em></span></p>
<p>शोएब कहती है, "जहां तक मेरे नाम का सवाल है, जब आप मुझे देखते हैं, तो आप मेरे पूरे व्यक्तित्व को देखते हैं और फिर आप मेरा नाम सुनते हैं, यह उन लोगों के लिए बेमेल है जो मेरे समुदाय के साथ भेदभाव और उसका बहिष्कार करते हैं. इसलिए अपने पेशेवर जीवन में, मैं इंटरव्यूज और मीटिंग में, मैं अपना परिचय मोहम्मद शोएब खान के रूप में देती हूं. मैंने यही हासिल किया. और मैं नहीं चाहती कि मैं कोई स्त्री वाला नाम अपनाऊ. मैं शोएब हूं और मेरा नाम मेरी यात्रा, मेरी पहचान है.</p>
<p>मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने जब उनसे पूछा, "आपको कब लगा कि आप एक महिला हैं?" तो उन्होंने जवाब दिया, "क्या आप किसी महिला से पूछेंगे कि वह महिला की तरह कब महसूस करने लगी? मैं आपको बताना चाहूंगी कि मैं मेरे बचपन से ऐसा था. मेरा झुकाव महिला लिंग की ओर बहुत था. " </p>
<p>उनका मानना है कि सुधार तो हो रहा है, पर उसकी गति धीमी है. हमें उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए. यह एक लंबी लड़ाई है, यह केवल फैसला नहीं है जो पारित किया जाएगा, और फिर हम आज़ाद होकर जीने लगेंगे. हर दिन हमें लड़ने की जरूरत है और इसकी शुरुआत हमारे अपनों से, समाज से होती है. </p>
<p>वे कहती है कि वे कॉरपोरेट नौकरी हासिल करने वाली पहली ट्रांसजेंडर व्यक्ति कहलाने के बजाय, अपने ट्रांसजेंडर समुदाय और अपने पूरे समाज में बदलाव लाने वाली पहली व्यक्ति बनना पसंद करेंगी. वे उस शोएब के नाम से ही पहचान बनाना चाहती है जिसने उनकी जिंदगी बदल दी.</p>
<p><em>(साभार: <a href="https://feminisminindia.com/2023/05/22/i-am-shoaib-and-my-name-is-my-journey-meet-kashmirs-only-transwoman-working-in-corporate-giant/">Feminism in India</a>)</em></p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मिस्बाह</dc:creator><pubDate>Sat, 03 Jun 2023 17:46:13 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/aadhi-aabadi/only-trans-woman-from-kashmir-shoaib-working-in-a-corporate-giant]]></guid><category><![CDATA[आधी आबादी]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/mtTbz4LmQ6roPYJ8G838.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/mtTbz4LmQ6roPYJ8G838.jpg"/></item><item><title><![CDATA[केट विंसलेट ने कहा 'NO' टू सोशल मीडिया हेट ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/atram-shatram/kate-winslet-raises-awareness-on-social-media-hate-through-her-bafta-acceptance-speech</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/D0sRUzEJvHigQAEONRfR.jpg"><p>लंदन (London) में 'बाफ्टा अवॉर्ड 2023' (BAFTA Awards 2023) का पूरी दुनिया इंतज़ार कर रही थी. लंदन के रॉयल फेस्‍ट‍िवल हॉल (Royal Festival hall) में इस साल के ब्रिटिश एकेडमी टेलीविजन अवॉर्ड्स का आयोजन हुआ. 'टाइटैनिक' फेम दिग्‍गज एक्‍ट्रेस केट विंसलेट (Kate winslet) को पॉपुलर ड्रामा सीरीज 'आई एम रुथ' में अपनी परफॉरमेंस के लिए बेस्‍ट एक्‍ट्रेस का बाफ्टा अवॉर्ड मिला. यह केट का पहला बाफ्टा अवॉर्ड है. अवॉर्ड सेरेमनी को कॉमेडियन रॉब बेकेट और रोमेश रंगनाथन ने होस्ट किया.&nbsp;</p><p>केट चैनल 4 के शो 'आई एम रुथ' (I am ruth) में एक ऐसी मां का रोल प्‍ले कर रही हैं, जो अपनी बेटी फ्रेया की मदद करने के लिए स्‍ट्रगल कर रही हैं. विंसलेट की बेटी मिया थ्रीप्लेटन ने शो में बेटी की भूमिका निभाई है. फ्रेया को सोशल मीडिया की लत लग जाती है, जिस वजह से उसे मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ता है.&nbsp;</p><p>केट की BAFTA 2023 एक्सेप्टेन्स स्पीच (acceptance speech) ने हर किसी का दिल जीत लिया.एक्‍ट्रेस ने सोशल मीडिआ पर हेट का सामना कर रहे युवाओं को मदद मांगने के लिए प्रेरित किया. हानिकारक कंटेंट को हटाने की मांग करते हुए कहा,"हम &nbsp;अपने बच्चों को वापस पाना चाहते हैं. हम अपने बच्चों की बिगड़ती मेंटल हेल्‍थ से हर दिन डर के साथ नहीं जागना चाहते हैं. कोई भी युवा जो यह सुन रहा है, अगर आपको मदद की जरूर है तो जरूर मांगे. इसमें शर्म की कोई बात नहीं है.' केट विंसलेट ने भावुक होते हुए यह भी कहा कि अगर इस अवॉर्ड को दो भाग में काटा जा सकता है, तो वह एक हिस्सा अपनी बेटी के साथ शेयर करना चाहेंगी.&nbsp;</p><p><img style="width: 522px; height: 348px;" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/6zSS3SNwBGhJPPF6WXks.jpg" alt="kate winslet" data-mce-src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/6zSS3SNwBGhJPPF6WXks.jpg" data-mce-style="width: 522px; height: 348px;"></p><p><span style="font-size: 8pt;" data-mce-style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: Italy24 Press</em></span></p><p>सोशल मीडिया (social media) के इस्तेमाल ने दूरियों को कम किया है और सरहद पार लोगों से जुड़ने के अवसरों को बढ़ाया है. लेकिन, इसके साथ ही, कई तरह की समस्याओं को भी जन्म दिया. ऑनलाइन ट्रॉल्लिंग (online trolling) के मामले बढ़ने लगे, सायबर क्राइम (cyber crime) हुए, और कई स्कैम और कंप्यूटर वायरस (computer virus) तेज़ी से फैलने लगे. सोशल मीडिया पर कई बार युवाओं, ख़ासकर किशोरियों को बॉडी शेमिंग (body shaming) का सामना करना पड़ता है. भद्दे कमेंट और प्रिवेसी (privacy) की हदों को पार करने वाले कंटेंट ने सोशल मीडिया को असुरक्षित जगह बना दिया. कई युवाओं को सोशल मीडिया की लत लग चुकी है. इसकी वजह से मेन्टल हेल्थ परेशानियां बढ़ने लगी.&nbsp;</p><p>इस पर खुलकर बात न होने और समय रहते मदद न मिलने की वजह से डिप्रेशन, एंग्जायटी जैसी समस्याओं में बढ़ोतरी हुई. इंटरनेट और सोशल मीडिया ने ज़िंदगी को आसान बनाया है, पर इसी के साथ कई तरह की समस्याओं को पैदा किया है. बच्चों और युवाओं को इसके सेफ इस्तेमाल के बारे में जागरूक करना बहुत ज़रूरी है. केट विंसलेट ने बाफ्टा जैसे बड़े मंच पर मौका देख इस मुद्दे को उठाया और इसकी गंभीरता पर बात की. प्रभावशाली लोग यदि इस तरह के मुद्दों पर बात करेंगे तो जागरूकता फ़ैलाने में और समस्या को दूर करने में मदद मिल सकेगी.&nbsp;</p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मिस्बाह</dc:creator><pubDate>Wed, 17 May 2023 17:31:44 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/atram-shatram/kate-winslet-raises-awareness-on-social-media-hate-through-her-bafta-acceptance-speech]]></guid><category><![CDATA[आधी आबादी]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/D0sRUzEJvHigQAEONRfR.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/D0sRUzEJvHigQAEONRfR.jpg"/></item><item><title><![CDATA['वन धन' से जनजाति मज़बूत ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/aadhi-aabadi/government-started-csc-trifed-van-dhan-scheme-for-the-tribal-people-to-give-better-life-to-adivasis</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/6Di2MCmdBEjtM1fCFe1n.jpg"><p>देश की सरकार द्वारा हर तबके तक विकास पहुंचाने के लिए कई तरह की योजनाएं चलाई जाती हैँ. ऐसे ही सरकार द्वारा जनजाति लोगों के लिए एक स्कीम चलाई जा रही है. इस स्कीम का नाम सीएससी वन धन स्कीम (CSC Van Dhan Scheme) है. यह स्कीम भारत सरकार, TRIFED और CSC ने मिलकर शुरू की है. सीएससी वन धन योजना आदिवासी समुदायों की आजीविका को बढ़ाने का प्रयास करती है. इसका पहला लक्ष्य वनों से मिले या आदिवासियों द्वारा बनाये उत्पादों की बिक्री को बढ़ाना है. इससे उनके उत्पादों को सही दाम मिल सकेगा.  यह योजना इन समुदायों को ज़रूरी वित्तीय सहायता देगी, जिससे वे समृद्धि और सशक्त होंगे.</p>
<p>TRIFED का पूरा नाम The Tribal Cooperative Marketing Development Federation Of India है. TRIFED का काम जनजातियों द्वारा बनाये या जंगल से इकठ्ठा किए गए प्रोडक्ट को बाजार में सही दाम पर बिकवाने के लिए अवसर तैयार करना और नुकसान होने पर आर्थिक मदद करना है. आज भी जनजाति लोगों के जीवन में सामाजिक, राजनीतिक, और आर्थिक चुनौतियां हैँ . इनका हल करने के लिए सरकार ने यह स्कीम शुरू की. इस काम में CSC को शामिल किया गया. CSC की पहुंच ग्रामीण इलाकों में है और ऐसे ही इलाकों में CSC आवास करते हैं. इस तरह सीएससी वन धन स्कीम (CSC Van Dhan Scheme) का फायदा सीधा पहुंचाया जा सकेगा.</p>
<p>उन्हें बिजनेस कैसे करना है और बाजार में प्रॉफिट कैसे कमाना है जैसे विषयों पर भी बताया जाएगा. साथ ही जंगल से निकाले गए उत्पादों को बाजार में कैसे भेजेंगे और उनके बदले सही कीमत कैसे पानी है आदि चीजों के बारे में मदद की जाएगी. ये पहल जनजाति समुदायों के विकास में अहम भूमिका निभाएगी जिससे  उनके आर्थिक सशक्तिकरण का सपना सच हो सकेगा. </p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">रविवार ब्यूरो </dc:creator><pubDate>Sun, 14 May 2023 14:00:37 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/aadhi-aabadi/government-started-csc-trifed-van-dhan-scheme-for-the-tribal-people-to-give-better-life-to-adivasis]]></guid><category><![CDATA[आधी आबादी]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/6Di2MCmdBEjtM1fCFe1n.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/6Di2MCmdBEjtM1fCFe1n.jpg"/></item><item><title><![CDATA[चप्पल की जगह सिर पर नही, पैरों में है ! ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/aadhi-aabadi/women-in-lalitpur-up-fought-against-chappal-pratha</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/1i2ZhJsPDMtnHtmD8uE6.jpg"><p>आज़ादी के 75 वर्षों और संविधान के 448 अनुच्छेदों के बाद भी कई जगहों पर जाति को आधार मान भेदभाव किया जा रहा है. भेदभाव को ख़त्म करने की शुरुआत डॉ भीमराव अंबेडकर ने की थी. ये लड़ाई आज भी जारी है. उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके के ललितपुर जिले के अधिकतर गांवों में चप्पल प्रथा का चलन है. आप और हम घर की साफ़ फर्श पर भी चप्पल पहनकर चलते हैं. लेकिन बुंदेलखंड के कई गांवों में महिलाएं ऊंची जातियों के लोगों को देखकर चप्पल हाथ में ले लेती हैं. कई जगहों पर तो आज भी सर पर चप्पल रखकर जाना पड़ता हैं. चप्पल प्रथा एक ऐसी कुरीति है जिसकी वजह से दलित समुदाय की महिलाएं चप्पल पहनकर घर से बाहर नहीं निकल सकतीं. ऊंची जाती के माने जाने वाले लोग अगर बाहर बैठे भी हैं तो चप्पल हाथ में लेकर चलना पड़ता है. ऐसा न किया तो समझेंगे कि उच्च जाति के लोगों का अपमान हुआ, जिसके बाद इन महिलाओं को दांत और कभी तो हिंसा का सामना भी करना पड़ता है.&nbsp;</p><p>इस कुप्रथा को ख़त्म करने के लिए कोई राजनेता, समाज सेवक, या अधिकारी नहीं पर गांव की महिलाएं आगे आईं. भगवती ने जब आज से 7 साल पहले चप्पल प्रथा के खिआफ़ आवाज़ उठाई तो उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा. इस आंदोलन को शुरू करने के बाद उन्हें उच्च जाति के लोगों से कई बार धमकियां मिलीं. भगवती और उनके पति के साथ मार पिटाई की गई. एससी, एसटी का मुकदमा दर्ज हुआ और अपने अधिकारों के लिए आज भी वे लड़ रहे हैं. भगवती को ये लड़ाई लड़ने की हिम्मत सहजनी से मिली. सहजनी शिक्षा केंद्र की दीदी ने महिलाओं को उनके अधिकार बताये और उन्हें ग़लत के ख़िलाफ़ जागरूक किया. शिक्षा केंद्र की दीदी ने बताया चप्पल हाथ में लेकर चलने की चीज़ नहीं है, पैर में पहनी जाती है. बड़े-बड़े आंदोलन और रैलियां भी निकाली. दलित महिलाओं को जागरूक किया. धीरे-धीरे जागरूकता बढ़ने लगी और सभी महिलाएं उच्च जाति के दरवाज़े से चप्पल पहन कर जाने लगीं.&nbsp;</p><p>भगवती ने अपने गांव में चप्पल प्रथा को पूरी तरह से ख़त्म करवाया, पर आस-पास के गांवों में आज भी इस प्रथा का चलन है. भगवती जैसी हिम्मत अगर हर उस गांव की महिला करले जहां चप्पल प्रथा है, तो इस कुप्रथा को जड़ से ख़त्म करना कोई बड़ी बात नही. अभी भी दलित समुदाय के कई लोग हिंसा, भेदभाव, बंधुआ मज़दूरी से जूझ रहे हैं. अधिक्कारों का पता न होना और जागरूकता, शिक्षा, रोज़गार की कमी होने की वजह से न चाहते हुए भी दलित समुदाय के लोगों के कुप्रथाएं माननी पड़ती हैं. अंबेडकर जयंती पर ऐसी प्रथाएं ख़त्म होने की ख़बरें बेहतर दिनों की और इशारा करती हैं. पर, बदलाव की इस लहर को देश की हर कोने में लेकर जाना होगा. आज जब महिलाएं पुरुषों के साथ मिलकर देश के विकास में भागिदार बन रही हैं, वही दूसरी ओर कुछ महिलाएं ग़लत के ख़िलाफ़ एकजुट आकर कुप्रथाओं को ख़त्म कर रही हैं.&nbsp;</p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मिस्बाह</dc:creator><pubDate>Fri, 14 Apr 2023 16:22:47 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/aadhi-aabadi/women-in-lalitpur-up-fought-against-chappal-pratha]]></guid><category><![CDATA[आधी आबादी]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/1i2ZhJsPDMtnHtmD8uE6.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/1i2ZhJsPDMtnHtmD8uE6.jpg"/></item><item><title><![CDATA[टंट्या भील 90.8 FM का माइक संभालती आदिवासी महिलाएं ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/aadhi-aabadi/adivasi-women-give-message-of-social-change-from-radio-tantya-bhil-908-fm</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/tFOU1iKWcxzEVLxJrzWX.jpg"><p>रेडियो हमेशा से ही न केवल मनोरंजन का, पर अपने विचारों को साझा कर समाज में बदलाव की पहल करने का साधन रहा है. वैसे तो रेडियो की जगह अब इंटरनेट ने ली है, पर कुछ जगहों पर आज भी ये अपने विचारों और भावों को व्यक्त करने का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाला साधन बना हुआ है. झाबुआ की महिलाओं ने भी रेडियो को अपनी बात समाज तक पहुंचाने का साधन बनाया. रेडियो स्टेशन टंट्या भील 90.8 एफएम ने झाबुआ में सामाजिक मुद्दों और सामुदायिक विकास के मुद्दों पर बात करने की लिए महिलाओं को विशेष अवसर दिया.</p><p>हाल ही में, जिले के विभिन्न हिस्सों से महिलाएं आदिवासी समाज में दहेज प्रथा, शराब और डीजे प्रथाओं सहित विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर बोलने के लिए एक साथ आईं. इन प्रथाओं को उन्होने आदिवासी समाज के पिछड़ेपन और क़र्ज़ में डूबने की बहुत बड़ी वजह बताई. परिवार अक्सर कर्ज में डूबे रहते हैं और इसकी वजह से उन्हें पलायन करना पड़ता है. इससे स्वास्थ्य समस्याओं, शिक्षा की कमी और स्थानीय नौकरियों की कमी सहित कई समस्याएं पैदा हुई और कई प्रकार की घटनाएं, उत्पीड़न और अपराधों में भी बढ़ोतरी दिखी.</p><p>नवापाड़ा, झरनिया, हत्यादेली और मुंदत गांव की में संगठन की महिलाएं अपने गांवों में इन बुराइयों को खत्म करने के लिए जागरूकता पैदा करने का काम कर रही हैं. वे अपने गांव में इन मुद्दों पर जिला प्रशासन का सहयोग करने के लिए तैयार हैं. जत्थे से सेवली परमार का कहना है कि जिला कलेक्टर, सरपंच, पटेल और गांवों के सभी मुखियाओं के साथ मिलकर नियम तय करना होगा. रेडियो स्टेशन के ज़रिये महिलाओं ने प्रशासन से सहयोग मांगा.</p><p>महिलाओं ने समुदाय और प्रशासन के लिए संदेश भी रिकॉर्ड किये जो रेडियो टंट्या भील 90.8 एफएम पर प्रसारित किये जायेंगे. ये इसीलिए संभव हो सका क्योंकि इन महिलाओं ने संगठित होकर ग़लत के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने की और स्थिति को ख़ुद बदलने की हिम्मत की.&nbsp;</p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मिस्बाह</dc:creator><pubDate>Fri, 14 Apr 2023 15:43:28 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/aadhi-aabadi/adivasi-women-give-message-of-social-change-from-radio-tantya-bhil-908-fm]]></guid><category><![CDATA[आधी आबादी]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/tFOU1iKWcxzEVLxJrzWX.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/tFOU1iKWcxzEVLxJrzWX.jpg"/></item><item><title><![CDATA[ये लड़की धाकड़ है! ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/aadhi-aabadi/stunt-women-in-india</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/SuF1rYt4TqDJL6LFiVxD.jpg"><p>बड़े परदे पर चलती हुई फिल्म में जब कोई 5 माले बिल्डिंग से कूदता है या दहकते हुए घर में घुसना या कोई और स्टंट, आज भी जब ये देखते  है तो दिमाग में सीधे एक आदमी का ख्याल आता है. ज़ाहिर है की स्टंट प्रोफेशन आज भी मेल डोमिनेटेड कामों में से एक है. हां ये बात बिल्कुल सच है की एक महिला के दिमाग में पहला ख्याल स्टंट वुमन बनने का नहीं आता, लेकिन इसका ये मतलब बिलकुल नहीं है कि महिलाएं यह कर नहीं सकती. एक महिला जो चाहे वो कर सकती है, चाहे घर संभालना हो ,या एक अभिनेत्री के लिए स्टंट करना. </p>
<p>भारत की पहली स्टंट वुमन थी, रेशमा पठान जिन्होंने शोले फिल्म में हेमा मालिनी के लिए स्टंट किये.  वो पहली महिला थी जिन्होंने ऐसा कर दिखाया जिसे सिर्फ आदमियों का काम समझा जाता था. बस फिर क्या था, एक लहर सी शुरू हुई और महिलाएं भी स्टंट परफॉर्म करने के लिए आगे आने लगी. रेशमा पठान को पूरी इंडस्ट्री आज 'शोले गर्ल' के नाम से जानी जाती है. एक और नाम सनोबर परदीवाला जिन्होंने ऐश्वर्या राय के लिए स्टंट्स करके अपने करिअर की शुरुआत की और आज एक जानी मानी स्टंट परफ़ॉर्मर है. ऐसा ही एक और नाम है गीता टंडन जो बहुत सी बड़ी फिल्मो का हिस्सा रह चुकी है. गीता के कदम इस इंडस्ट्री में कदम एक स्टंट ऑडिशन से रखा और उसके बाद कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. जब से फिल्मों में अभिनेत्रियों के स्टंट्स दिखाए जाने लगे है तब से लड़कियों ने इस काम में दिलचस्पी दिखाना शुरू कर दिया. ऐसे ना जाने कितनी महिलाओं के नाम आपको मिला जाएंगे जो आज एक स्टंट विमन है. </p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/aobxKPhnUYUU2h2zNf3F.jpg" alt="stuntwomen"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>रेशमा पठान (Image Credits: Filmfare India)</em></span></p>
<p>ज़ाहिर सी बात है इन सभी महिलाओं के लिए यह काम शुरू करना आसान नहीं होगा. परिवार और समाज की ना जाने कितनी बातें सुनने को मिली होंगी. यही के समय में तो फिर भी लोग स्वीकार कर लेते है, लेकिन ज़रा सोचिए वो दौर जब रेशमा ने पहली बार इस काम को किया.  वो बताती है- "सिर्फ समाज ही नहीं बल्कि इंडस्ट्री में भी मुझे जगह बनाने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ी." उन्हें एक मेल स्टंट मैन से कम पेमेंट मिला करता था. उन्होंने इसके खिलाफ आवाज उठाई और वो आज पूरे देश में जानी जाती है. सनोबर ने ही खुद को पूरी इंडस्ट्री के सामने साबित किया और आज उनके काम की सरहाना हो रही है.  रेशमा ने अपना घर छोड़ा और अपने दोनों बच्चो के साथ बस निकल पड़ी.  हारना और डरना सीखा नहीं था क्योंकि अपने बच्चों को एक अच्छी ज़िन्दगी देने का जुनून सिर पर सवार था.  </p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/ZV33ddwkIQyaH5KifW1N.JPG" alt="geeta tandon stuntwomen"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>गीता टंडन (Image Credits: Film Companion)</em></span></p>
<p>फिल्मों में किसी अभिनेत्री को कोई स्टंट करते हुए देखते है तो तालियां बजाने का मन करता है. क्या कभी उन स्टंट परफॉर्मर्स के बारे में सोचते है जो अपनी ज़िन्दगी दांव पर लगाकर असलियत में यह स्टंट कर रही है. तालियां उन महिलाओं के लिए बजाना चाहिए जो, परिवार, समाज, इंडस्ट्री, और इस खतरे के सामने भी डटकर खड़ी है.</p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">रिसिका जोशी</dc:creator><pubDate>Thu, 13 Apr 2023 16:04:50 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/aadhi-aabadi/stunt-women-in-india]]></guid><category><![CDATA[आधी आबादी]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/SuF1rYt4TqDJL6LFiVxD.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/SuF1rYt4TqDJL6LFiVxD.jpg"/></item><item><title><![CDATA[ट्रांसजेंडर भी अब ओबीसी ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/aadhi-aabadi/transgenders-to-be-considered-as-obc</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/GBsjajazoNJiXO9ydXuH.jpg"><p>थर्ड जेंडर मतलब घरों में शगुन हो ,शादी हो या कोई नई रस्म... घर के दरवाज़े पर ताली बजाते और नेग मांगते अलग अंदाज़ में गीत गाते हुए डांस करने वालों के लिए यही सोच है तो बदल लीजिए. अब समाज के साथ सरकारें भी इस ख़ास समाज के लिए ख़ास संजीदा है. समाज में बराबरी के अवसर देने के लिए चुनाव में हिस्सेदारी का जहां मौका दे रही वहीं मप्र सरकार ने कैबिनेट की मुहर लगाकर इस थर्ड जेंडर / ट्रांसजेंडर सदस्यों के लिए रोजगार के नए रस्ते खोल दिए. </p>
<p>थर्ड जेंडर या ट्रांसजेंडर को लेकर एक बड़ा तबका अब भी घरों में उनकी उपस्थिति को शगुन और अपशगुन में उलझा हुआ है. जबकि बायोलॉजिकल और हार्मोनल परेशानियों की वजह सबसे बड़ा कारण ये समाज है. मुख्य धारा में जोड़ने के लिए समाजसेवी और सरकारें नई पहल कर रही है. प्रदेश सरकार ने ट्रांसजेंडर को और अवसर देने के लिए पिछड़े वर्ग में दर्जा देने का निर्णय लिया है. सामान्य गणना में इस समय 30 हजार से ज्यादा ट्रांसजेडर प्रदेश में रहते हैं. </p>
<p>ट्रांस जेंडर के निजी जीवन और उनकी परेशानियों को लेकर कई एंगल पर रिसर्च किए गए. कुछ ऐसे उदाहरण भी सामने जाए हैं जहां समाज की पुरानी धारणाओं को ख़ारिज कर दिया. इसमें सागर की पूर्व महापौर गौर हो या देश की पहली ट्रांसजेंडर जज जोयोता मंडल, नाज़ जोशी हो या लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी हो,ये मिसाल हैं. इन्होंने सरकारों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि यदि अवसर और सम्मान मिले तो ट्रांसजेंडर हर क्षेत्र में ख़ास मुकाम हासिल कर सकते हैं.</p>
<p>सरकार ने ट्रांसजेंडर को पिछड़े वर्ग में शामिल कर दिया लेकिन इस समाज को इसका लाभ दिलाने के लिए समाजसेवी और अन्य वर्ग को आगे आना पड़ेगा. सरकार सरकारी नौकरियों में अवसर तो देगी लेकिन उनकी पढाई के लिए भी उनको प्रोत्साहित करना पड़ेगा. अभी भी एक बड़ा तबका ट्रांसजेंडर में गुरु परंपरा और सम्मेलनों के आयोजनों में ही अपना जीवन समेटे हुए है. सरकार की आरक्षण मुहर ट्रांसजेंडर को आरक्षण से कितना फायदा मिलता है. कितने आत्मनिर्भर बन पाते है. यह आने वाला वक़्त बताएगा.फ़िलहाल सरकार ने एक पहल जरूर की है. </p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">विवेक वर्द्धन श्रीवास्तव </dc:creator><pubDate>Tue, 11 Apr 2023 17:20:22 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/aadhi-aabadi/transgenders-to-be-considered-as-obc]]></guid><category><![CDATA[आधी आबादी]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/GBsjajazoNJiXO9ydXuH.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/GBsjajazoNJiXO9ydXuH.jpg"/></item><item><title><![CDATA['सीड मदर' : देसी बीजों के संरक्षण ने दिलाया पद्मश्री ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/aadhi-aabadi/seed-mother-rahibai-soma-popere-awarded-padma-shri</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/ew7O1ywCAeZV59UHeZUF.jpg"><p>आप बीमार होते है, तो ज़ाहिर है अस्पताल की ओर रुख करते होंगे. पर, राहीबाई सोमा पोपेरे ने जब अपने पोते और आस पास के बच्चों को बीमार और कुपोषण का शिकार होते देखा, तो उन्होंने खेतों की ओर ध्यान दिया. राहीबाई ने पाया कि खेतों में बहुत अधिक कीटनाशकों और रासायनिक उर्वरकों (फर्टिलाइज़र्स) का इस्तेमाल किया जा रहा है. इससे उपज बढ़ाकर ज़्यादा पैसे तो कमाए जा रहे हैं, पर इसके ज़हर से शरीर में पोषण की कमी और बीमारियां होने का खतरा बढ़ रहा है, खासकर बच्चों के लिए. </p>
<p>उन्होंने 154 बीजों के देशी किस्मों के संरक्षण के साथ किसानों को पारंपरिक तरीकों से फसल उगाने के लिए प्रोत्साहित और जागरूक किया. यह काम उन्होंने करीब 25 साल पहले शुरू किया. सोमा पोपेरे बताती है कि स्वदेशी फसलों को उगाने के लिए सिर्फ पानी और हवा की जरूरत है. हाइब्रिड फसलों को उगाने में ज़्यादा पानी और कीटनाशक इस्तेमाल करना पड़ते हैं. उन्हें लोग 'बीज अम्मा', 'सीड मदर', या 'सीड वुमेन' के नाम से भी जानते हैं. 52 साल की सोमा पोपेरे महादेव कोली आदिवासी समुदाय से है. वे महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के अकोले आदिवासी ब्लॉक के कोम्बले गांव में रहती है. </p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/eAclzgxzRdWeeiLAfSJZ.jpg" alt="seed mother"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: Google Images</em></span></p>
<p>उन्होंने खेती के ज़रिये अपने आस-पास की महिलाओं को आर्थिक रूप से मज़बूत बनने में मदद करने के लिए स्वयं सहायता समूह बनाया. 'सीड मदर' ने जैविक खेती को एक नया मुकाम देने के लिए स्वयं सहायता समूहों के ज़रिये किसानों को जोड़ा. समूहों ने मिलकर 50 एकड़ ज़मीन पर 17 से ज़्यादा देसी फसलें उगाईं. वह कभी स्कूल नहीं गई और न ही उनके पास कृषि क्षेत्र में कोई डिग्री है. बचपन में उनके पिता की बातों को ध्यान में रखते हुए उन्होंने बीज संरक्षण का काम शुरू किया. जो पुराने बीज अब बाज़ार में भी नहीं मिलते, वे राहीबाई सोमा पोपेरे के पास सुरक्षित हैं. शुरू में उनके गांव की महिलाएं उन पर हंसती थी. पर पोपेरे ने अपना काम नहीं रोका. धीरे-धीरे लोग उनके काम की एहमियत समझने लगे. उनसे आस-पास के गांवों से लोग सलाह लेने आने लगे. फिर अधिकारियों का ध्यान उन पर गया. </p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/7V9MurGGINOIUSVRjLi4.jpg" alt="seed mother"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: CGTN</em></span></p>
<p>उन्होंने अकोले प्रखंड के 7 गांवों के 210 किसानों के साथ जलकुंभी की पौध, चावल, सब्जियां, फलियां की एक नर्सरी की शुरुआत की.  इन-सीटू जर्मप्लाज्म संरक्षण केंद्र की स्थापना की. इसके ज़रिये धान, जलकुंभी, बाजरा, दलहन, तिलहन समेत 17 अलग-अलग फसलों की खेती की. 5 स्वयं सहायता समूहों की ये लीडर गांव की स्वच्छता, साफ़ रसोई, बीज संरक्षण और जंगली खाद्य के बारे में लोगों को जागरूक कर रही है. एक छोटे से आदिवासी गांव में रहने वाली राहीबाई पोपरे को कृषि में उनके योगदान के लिए देश का चौथा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्मश्री  से सम्मानित किया गया. उन्होंने अपने गांव कोम्भलने की मिट्टी और सभी किसानों को पद्मश्री पुरस्कार समर्पित किया. 'बीज अम्मा' ने आने वाले पीढ़ियों तक के लिए मिसाल क़ायम की है जिनके प्रयासों को कृषि वैज्ञानिकों ने भी सराहा.  </p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मिस्बाह</dc:creator><pubDate>Mon, 10 Apr 2023 16:14:48 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/aadhi-aabadi/seed-mother-rahibai-soma-popere-awarded-padma-shri]]></guid><category><![CDATA[आधी आबादी]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/ew7O1ywCAeZV59UHeZUF.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/ew7O1ywCAeZV59UHeZUF.jpg"/></item><item><title><![CDATA[हॉट व्हील्ज़: ऑटो शो बना ट्रोल शो ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/aadhi-aabadi/niharica-raizada-trolled-for-hsting-an-auto-show</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/3eikufgrCUxEQvovxgOB.jpg"><p dir="ltr">दुनिया में एक महिला को खुद की पहचान बना पाना कोई आसान बात नहीं.  अगर बात ऐसी फील्ड में काम करने की हो जिसे पारम्परिक तौर पर पुरुषों का क्षेत्र माना जाए तो मुश्किलें दोगुनी हो जाती हैं. फिर भी, कई महिलाओं ने दुनिया भर में पुरुष-प्रधान उद्योगों से लड़ने और अपना रास्ता खोजने में कामयाबी हासिल की हैं.  लेकिन समाज, व्यापार, खेल, फिल्म और भी कई उद्योगों में आज भी पुरुषों का वर्चस्व बना हुआ है. ऐसा ही एक उद्योग हैं ऑटोमोबाइल . पुरुष, महिलाओं से कार या बाइक के बारे में सलाह लेना पसंद नहीं करते. महिलाओं की रास्तों की समझ और ड्राइविंग का तो मज़ाक उड़ाया ही जाता है. ऐसे में अगर कोई महिला ऑटो रिवियु करे या कार शो होस्ट करे तो सोच भी नहीं सकते क्या होगा. ऐसा ही कुछ, निहारिका रायज़ादा के साथ हुआ जिन्होंने 'हॉट व्हील्ज़' नाम के ऑटो शो को होस्ट किया.  </p>
<p dir="ltr">निहारिका ने लंदन में मेडिकल की पढ़ाई की और वे इंग्लैंड की एक जानी-मानी हृदय रोग विशेषज्ञ बनीं. निहारिका रायज़ादा ‘मिस इंडिया यूके’ और ‘मिस इंडिया वर्ल्डवाइड’ की रनअप भी रह चुकी हैं. वे मॉडलिंग और एक्टिंग की दुनिया को आज़माने मुंबई आ गई. निहारिका अब तक टोटल धमाल, सुर्यवंशी, मसान सहित 16 फिल्मों में काम भी कर चुकी है. हॉट व्हील्ज़ शो में वे लक्ज़री कार्स को रिव्यु करती है. शो का पहला एपिसोड यूट्यूब पर प्रीमियर हुआ. इस एपिसोड में उन्होंने लक्ज़री कार मर्सिडीज-मेबैक एस-क्लास का रिव्यु किया. एपिसोड रिलीस होते ही सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने उन्हें उनके पहनावे, बोल्डनेस और एक्सेंट के लिए कॉमेंट कर ट्रोल किया. देखते ही देखते उनका इंस्टाग्राम और यूट्यूब नेगेटिव कॉमेंट्स से भर गया. </p>
<p dir="ltr"><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/83VIlDhrPhpo6Br0ULQZ.jpg" alt="Niharica Raizada Hotwheelz Mashable India trolled auto show"></p>
<p dir="ltr"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: Mashable India</em></span></p>
<p dir="ltr">इंडिया में सिर्फ 23. 6 % महिलाएं ही ऑटोमोटिव इंडस्ट्री में काम करती हैं. अगर ऑटोमोबाइल रिव्यु की बात करें तो टॉप 10 रिव्यु यूट्यूब चैनल्स पुरुषों के हैं. ये नंबर सिर्फ लैंगिक असमानता ही नहीं पर, पुरुषों के कहे जाने वाले प्रोफेशन में महिलाओं की अस्वीकृति को भी दिखाते हैं. सही ज्ञान और समझ होने के बाद भी एक महिला अगर ऐसे व्यवसायों में अपनी पहचान बनाना चाहे तो उसकी विश्वसनीयता को उसकी काबिलियत से न नापकर, कपड़ों से तोला जाता है. इस मानसिकता की वजह से कई महिलाएं जॉब छोड़ने पर मजबूर हैं. समाज एक बेहतर जगह तब बन पायेगा जब उसमे सभी के लिए समानता और आदर हो. </p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मिस्बाह</dc:creator><pubDate>Thu, 06 Apr 2023 14:36:11 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/aadhi-aabadi/niharica-raizada-trolled-for-hsting-an-auto-show]]></guid><category><![CDATA[आधी आबादी]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/3eikufgrCUxEQvovxgOB.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/3eikufgrCUxEQvovxgOB.jpg"/></item><item><title><![CDATA[ट्रांसजेंडर्स को मिली SHG से नई राह ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/nazariya/transgenders-form-shg-to-get-dignified-livelihood</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/o9l1RFiJbYahAFDotrot.jpg"><p dir="ltr">अपनी रोज़मर्रा कि ज़िन्दगी और काम करने कि जगह महिलाओं के संघर्ष को कौन नहीं जानता.&nbsp; महिलाओं की मुश्किलें और संघर्षों के बारे में तो फिर भी हमें पता चलता रहता है.&nbsp; लेकिन समाज का एक ऐसा हिस्सा जिसकी चुनौतियां सबसे ज़्यादा हैं लेकिन उनके बारें में कहीं ज़िक्र नहीं होता. यह हैं थर्ड जेंडर, समाज में अपने अधिकारों और समान अवसर की लड़ाई के साथ रोज़गार तलाशना लगभग नामुमकिन सा काम हैं. अगर रोज़गार मिल भी जाए तो शोषण और उत्पीड़न की नई कहानी शुरू होती है. इन मुश्किलों के बीच स्वयं सहायता समूह, ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए आशा की किरण बन के उभरे हैं. अपनों के बीच स्वाभिमान और प्रतिष्ठा के साथ काम करने का अवसर, हज़ारों स्वयं सहायता समूह (SHG) आज भारत में ट्रांसजेंडर समुदाय को दे रहे हैं.&nbsp;&nbsp;</p><p dir="ltr">तेलंगाना के करीमनगर में नगरपालिका क्षेत्रों में गरीबी उन्मूलन मिशन (MEPMA) के तहत छह सदस्यों के साथ एक ट्रांसजेंडर स्वयं सहायता समूह बनाया. उनके पहचान पत्रों के अलावा बैंक खाते खुलवाकर पासबुक भी बनाये गए.&nbsp; ग्रुप बनने के बाद 32 और ट्रांसजेंडर्स ने अधिकारियों के पास अपना नाम दर्ज कराया. व्यावसायिक प्रशिक्षण के अलावा स्वरोजगार के लिए 50 हज़ार रुपयों का लोन भी दिया गया. आज बिहार में 10 लाख से भी ज़्यादा स्वयं सहायता समूह हैं. राज्य में SHG की सफलता को देखते हुए बिहार में रह रहे 40,000 से ज़्यादा ट्रांसजेंडर लोगों के लिए कौशल प्रशिक्षण केंद्र की शुरुआत की. ये कदम उन्हें रोज़गार के अवसर देने और मुख्यधारा से जोड़ने के लिए लिया गया.&nbsp;</p><p dir="ltr">हाल ही में ओडिशा सरकार ने भुवनेश्वर में 20 हज़ार महिला और ट्रांसजेंडर स्वयं सहायता समूहों को साइकिल दी. ये महिलाएं और ट्रांसजेंडर्स आहार किचन संभाल रहे हैं, जल साथी बन वाटर मैनेजमेंट कर रहे हैं, और वेस्ट ट्रीटमेंट प्लांट की देख रेख भी कर रहे हैं. इस मदद से इन्हें काम की आसानी होगी और कार्यबल में हिस्सेदारी बढ़ेगी.&nbsp;</p><p dir="ltr">ओडिशा के कटक में बाढ़, खुले में शौच, पर्याप्त जगह की कमी और कम सीवर कवरेज जैसी कई चुनौतियां थी, जिन्होंने सुरक्षित स्वच्छता समाधानों की उपलब्धि को बाधित किया. कटक नगर निगम (सीएमसी) ने कचरे के उपचार के लिए एक सेप्टेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसईटीपी) की शुरुआत की. ट्रांसजेंडरों को स्वयं सहायता समूह बनाकर इन्हे एसईटीपी की देखभाल का काम दिया गया जिसे वे बखूबी संभाल रहे हैं.&nbsp;&nbsp;&nbsp;</p><p dir="ltr">पॉन्डिचरी में शीतल ने अपने जैसे ट्रांसजेंडर्स के लिए सहोदरन कम्युनिटी ओरिएंटेड हेल्थ डेवलपमेंट की शुरुआत की. उन्होंने LGBTQ (एल जी बी टी क्यू ) समूहों के लिए काम किया और आगे चलकर राज्य में ट्रांसजेंडर फेडरेशन शुरू किया. आज, ट्रांसजेंडर फेडरेशन में 15 स्वयं सहायता समूह हैं, जो समुदाय में ट्रांसजेंडरों के अधिकारों और सुरक्षा के लिए काम करते हैं. इन कमजोर समूहों को स्वास्थ्य और शिक्षा सम्बंधित मदद और परामर्श भी दिया जाता है.&nbsp;</p><p dir="ltr">ट्रांसजेंडर SHG सदस्यों के लिए अपने कौशल विकसित करने और रोज़गार के अवसरों तक पहुंचने के अवसर पैदा करने में सफल रहे हैं. कई समूहों ने सिलाई, ब्यूटी पार्लर और क्राफ्ट इकाइयां स्थापित की. SHG ने सदस्यों को आर्थिक आज़ादी हासिल करने में मदद की, जिससे उनके प्रति हो रहे भेदभाव और दुर्व्यवहार को कम करने में मदद मिली. SHG की जागरूकता फैलाकर कई और ट्रांसजेंडरों को स्वयं सहायता समूहों में संगठित करने की ज़रुरत है क्योकि आर्थिक आज़ादी उन्हें समाज में सामान दर्जा और बेहतर ज़िन्दगी पा लेने में मदद कर सकते हैं.&nbsp;</p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मिस्बाह</dc:creator><pubDate>Fri, 31 Mar 2023 12:46:45 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/nazariya/transgenders-form-shg-to-get-dignified-livelihood]]></guid><category><![CDATA[आधी आबादी]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/o9l1RFiJbYahAFDotrot.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/o9l1RFiJbYahAFDotrot.jpg"/></item><item><title><![CDATA[अर्थसंगिनी के संग फायनेंशिअल लिट्रेसी के रंग ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/aadhi-aabadi/shanu-mehta-working-towards-financial-literacy-of-rural-women</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/gqNPdtlAPmtsW41lbr9p.PNG"><p dir="ltr">डावोस की वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में दुनिआ के बड़े लीडर्स से मिलना हो या लिटरेचर फेस्ट के मंच पर बोलना, वो हर जगह मौजूद है. महिलाओं की लीडरशिप और आर्थिक आज़ादी पर आर्टिकल लिखना हो या टीवी स्टूडियो में डिबेट करना, वो वहां भी मौजूद है. लेकिन सबसे पहले वो मौजूद है जहां सबसे ज़्यादा ज़रुरत है यानि ज़मीन पर. वो है शानू मेहता, जो बातों से एक कदम आगे बढ़कर ज़मीनी स्तर पर बदलाव लाई. </p>
<p dir="ltr">सोचना और अपनी सोच को अमल में लाना दो अलग अलग बातें है. अर्थसंगिनी के ज़रिये शानू ने  के कौशल विकास ( स्किल डेवेलपमेंट ) और वित्तीय साक्षरता ( फायनेंशिअल लिट्रेसी ) को ग्रामीण महिलाओं तक पहुंचाया. अर्थसंगिनी यानि आर्थिक सहेली , एक ऐसी संस्था जो सालों से गाँव की महिलाओं के लिए उनके बीच रहकर काम कर रही है.  शानू बताती हैं - "जब भी गांवों में महिलाओं से बात होती तो उनकी काबिलियत महसूस होती लेकिन वह छुपी हुई रहती." महिलाओं में पैसे कमाने का और अपने पैरों पर खड़े होने का जज़्बा तो था लेकिन कहीं दबा कुचला था. शानू ने इसको पहचाना और इन महिलाओं का साथ देने का सोचा. उन्होंने महसूस किया कि ये महिलाएं अपने साथ परिवार को भी बेहतर ज़िन्दगी दे सकती हैं. धीरे-धीरे महिलाओं की रूचि समझकर उन्हें अगरबत्ती, कपड़े, सैनेटरी पेड, खिलौने बनाने की ट्रेनिंग दी जो उनका स्किल डेवेलपमेंट प्रोग्राम बना.  इसको एक कदम आगे ले जाते हुए रुपये-पैसों की बचत के बारे में भी बताया जो कि फायनेंशिअल लिट्रेसी केम्प के ज़रिये हुआ. आज, सालों की कोशिशों के बाद पांच हज़ार से ज्यादा महिलाओं को प्रशिक्षण मिल चुका है और वो अपने पैरों पर खड़ी है. कुछ महिलाओं के बनाये हुए उत्पाद विदेश में भी बिक रहे हैं.</p>
<p dir="ltr"><img src="https://d2vbj8g7upsspg.cloudfront.net/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/IGLzYKum0mQvaxdeApFX.PNG" alt="shanu mehta"></p>
<p dir="ltr"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: Ravivar vichar</em></span></p>
<p dir="ltr">शानू ने ना केवल अर्थसंगिनी के ज़रिये काम किये बल्कि अपनी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में भी अपने जुनून को सम्मिलित किया. आज उनकी खुद की आइटी कंपनी में करीब 200 कर्मचारियों में से 90 % महिलाएं हैं. इसी के साथ शानू ने सांस्कृतिक आयामों में भी दखलंदाज़ी रखी और इंदौर में नाइट कल्चर का आइडिया मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को दिया. अर्थसंगिनी ने ग्रामीण क्षेत्र से बाहर भी कई काम किये जैसे महिला कांस्टेबलों को फाइनेंशियल मैनेजमेंट की ट्रेनिंग.  </p>
<p dir="ltr"><img src="https://d2vbj8g7upsspg.cloudfront.net/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/I4Cl5U69MuQTGLWoa83U.jpg" alt="shanu mehta"></p>
<p dir="ltr"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: Ravivar vichar</em></span></p>
<p dir="ltr">शानू, आईआईएम इंदौर के इंस्टीट्यूशनल सोशल रेस्पॉनसिबिलिटी के साथ मिलकर गांवों की महिलाओं को स्वास्थ्य संबंधित जानकारी दे रही हैं. अर्थसंगिनी की महिलाओं द्वारा तैयार किए जाने वाले सैनेटरी पैड पिछ़डे गांवों और कस्बों की ज़रूरतमंद महिलाओं और छात्राओं को दिए जा रहे हैं. अर्थसंगिनी संस्थान ने कुछ जगहों पर सैनेटरी पैड बनाने की मशीन, सिलाई मशीन, बॉल पैन बनाने का सामान और अन्य मशीनरी उपलब्ध कराई.</p>
<p dir="ltr">शानू मेहता की इस पहल ने साबित किया कि महिलाओं में मेहनत और योग्यता की कमी नहीं, बस थोड़ा सा साथ देकर उनकी आर्थिक आज़ादी की चुनौती को दूर किया जा सकता है. अब हमें बातों से ऊपर उठकर, ज़मीनी स्तर पर काम कर बदलाव लाने की ज़रुरत है ताकि महिलाओं की आर्थिक आज़ादी की क्रांति को बढ़ावा मिल सके.</p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मिस्बाह</dc:creator><pubDate>Mon, 13 Mar 2023 14:04:16 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/aadhi-aabadi/shanu-mehta-working-towards-financial-literacy-of-rural-women]]></guid><category><![CDATA[आधी आबादी]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/gqNPdtlAPmtsW41lbr9p.PNG" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/gqNPdtlAPmtsW41lbr9p.PNG"/></item></channel></rss>