<rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" xmlns:dcterms="http://purl.org/dc/terms/" xmlns:geo="http://www.w3.org/2003/01/geo/wgs84_pos#" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/" xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/" xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/" version="2.0"><channel xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/"><title><![CDATA[ editorial guest posts]]></title><link>https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial</link><description><![CDATA[ ]]></description><atom:link href="https://ravivarvichar.in/rss/categories/experts-thoughts-editorial" rel="self"/><language>en-us</language><lastBuildDate>Thu, 23 May 2024 16:10:19 +0530</lastBuildDate><item><title><![CDATA[2024 की 'X' फैक्टर Women Voter ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/the-x-factor-of-this-lok-sabha-elections-in-india-will-be-female-or-women-voters-4598102</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/5BK5WsajC8d5Ag7VfoEE.png"><p style="text-align: justify;">चुनाव अब आधे से ज़्यादा हो चुका है. सात में से चार चरणों में वोटिंग हो चुकी है. लगभग दो हफ्तों में नतीजे भी सामने आ जायेंगे. ये चुनाव एक से ज़्यादा मायनों में निर्णायक और अभूतपूर्व साबित होंगे इसमें कोई शक नहीं. ये चुनाव कैसे निर्णायक होंगे ये चार जून को साबित हो जायेगा.</p>
<h2 style="text-align: justify;">Women voters बनेंगी king makers</h2>
<p style="text-align: justify;">लेकिन एक वोट वर्ग जो कि इन राजनीतिक दलों की हार जीत में बड़ा रोल तय करेगा, वो है <a href="https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/women-pay-the-price-of-any-riot-or-issue-created-during-elections-4580203">महिला वोटर</a>. महिला वोटर इस चुनाव का सबसे अहम 'डिसाइडिंग फैक्टर' होंगी. ये महिला वोटर हर इलाके के नतीजों को अलग अलग तरीके से प्रभावित करेंगी लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि इस बार की 'किंग मेकर' महिला वोटर बनेंगी.</p>
<p style="text-align: justify;">हर वर्ग की महिलाओं के मुद्दे एक दूसरे से अलग हो सकते हैं, लेकिन प्रभाव एक जैसा रहेगा. यह बात राजनीतिक दल अच्छे से समझते हैं. इसलिए महिला वोटरों को लुभाने की ख़ास कोशिश भी की जा रही है. चुनाव कवर करने के लिए मेरा कई राज्यों में जाना हो चुका है. सफ़र अभी भी जारी है.</p>
<p style="text-align: justify;">2014, 2019 और 2024 में एक फ़र्क ये है कि इस बार महिला वोटर ज़्यादा आत्मविश्वास से भरी हुई हैं. अपने वोट का प्रभाव वो हाल ही के राज्यों के चुनाव में देख चुकी हैं. तो ऐसे में लोकसभा के लिए वो ज़्यादा आत्मविश्वास से लबरेज़ हैं. महाराष्ट्र और बिहार की महिला वोटरों में एक बात जो मुझे समान दिखी वो ये कि वोटिंग वाले दिन वो चुप्पी साध रही हैं. वोटिंग वाले दिन बहुत सी महिला वोटर ये तक नहीं बताना चाह रहीं कि वो किन मुद्दों पे वोट डाल रहीं हैं.</p>
<h2 style="text-align: justify;">Women Voters है silent voters</h2>
<p style="text-align: justify;">वो समझती हैं कि जैसे ही मुद्दों की गिनती करवाएंगी, कोई भी समझ जायेगा कि वो किस को स्वीकार रहीं और किसको नकार रहीं हैं. 'साइलेंट वोटर' चुनावी गेम को कैसे पलट देते हैं वो तो कई बार साबित हो चुका है. इस बार <a href="https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/women-got-their-voting-rights-after-lots-of-struggle-and-movements-they-must-use-it-with-full-responsibility-4003682">साइलेंट वोटर्स</a> की सबसे ज़्यादा संख्या महिला वोटरों की है. ये साइलेंट महिला वोटर्स इस बार कई चुनावी विशेषज्ञों को गलत साबित करेंगी. इस बार के चुनाव में महिला वोटर 'ट्रेंड सेटर' होंगी और जिस तरह का अनुमान है अगर उस तरह का असर महिला वोटरों का चुनाव पर पड़ा तो ये आगे आने वाले चुनावों के लिए बहुत कुछ बदल देगा.&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;">लेकिन इन सबके बावजूद, इन महिला वोटरों के जो मुद्दे हैं, जिनके आधार पर वो वोट डाल रहीं हैं, ख़ुद उनके लिए भी महिला सुरक्षा बड़ा मुद्दा नहीं रहेगा. चुनावी मुद्दों की वो फेहरिस्त जिसके लिए ये महिलाएं वोट डालेंगी, उसमें चौथे पांचवें नंबर तक भी महिला सुरक्षा इन महिला वोटरों के लिए मुद्दा नहीं रहेगा.</p>
<p style="text-align: justify;">ये दुर्भाग्यपूर्ण है. आशा बस इस बात कि की जा सकती हैं कि अपने वोट की ताकत को पूरी तरह से समझ कर, आज़मा कर और उसका नतीजा देखने के बाद महिला वोटर अपने वोट की अहमियत को समझेंगी. उम्मीद है कि जब उन्हें अपने वोट की ताकत का और ज़्यादा आभास होगा, तब वो शायद महिला सुरक्षा को एक बड़े मुद्दे के तौर पर देखेंगी और वोट डालने के फ़ैसले के पीछे के मंथन में महिला सुरक्षा के मुद्दे को शामिल करेंगी. हो सकता है मैं कुछ ज़्यादा ही आशावादी हो रही हूं. हो सकता है ये मेरी बस 'विशफुल थिंकिंग' हो. पर मुझे लगता है कि होगा. इसमें थोड़ा वक्त लगेगा, लेकिन होगा ज़रूर.</p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मैत्री </dc:creator><pubDate>Thu, 23 May 2024 16:10:19 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/the-x-factor-of-this-lok-sabha-elections-in-india-will-be-female-or-women-voters-4598102]]></guid><category><![CDATA[एक्सपर्ट विचार]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/5BK5WsajC8d5Ag7VfoEE.png" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/5BK5WsajC8d5Ag7VfoEE.png"/></item><item><title><![CDATA[चुनाव, Women Safety, Prajwal Revanna और वोट ! ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/women-safety-is-still-a-thing-for-name-sake-in-india-which-comes-to-politicians-mind-during-the-railies-of-elections-and-to-include-in-manifesto-4594935</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/rBSpfOiQCbL1H3jNBuMd.png"><p style="text-align: justify;">भारत में लोकसभा चुनाव जारी हैं. दो चरणों में वोटिंग हो चुकी है. देश भर में हर छोटे बड़े नेता की रैलियां हैं, भाषण हैं. सभी नेता वोट मांगने के लिए हाथ जोड़ आपके सामने नतमस्तक हैं. यह नेता अलग-अलग मुद्दों की बात कर रहे हैं, अलग-अलग सुविधा देने की बात कर रहे हैं, और चुने जाने पर आपके और आपके प्रियजनों के लिए एक बेहतर भविष्य देने का वादा कर रहे हैं. चुनावी मुद्दे लगभग वही हैं, हर बार वाले, सड़क, बिजली, पानी, महंगाई, रोज़गार और महिला सुरक्षा.</p>
<h2 style="text-align: justify;">Women Safety सिर्फ नाम का मुद्दा</h2>
<p style="text-align: justify;">अब देखिए बाकी मुद्दों पर तो नेताओं को वोट मिलते रहे हैं और वह सरकारें बनाते रहे हैं. लेकिन महिला सुरक्षा के नाम पर क्या सचमुच वोट पड़ते हैं? क्या सिर्फ़ और सिर्फ़ महिला सुरक्षा अपने आप में किसी भी चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा, सबसे बड़ा एजेंडा बना पाता है? 2012 के निर्भया कांड के बाद दिल्ली सरकार गिर गई थी. उस वक्त भी महिला सुरक्षा और निर्भया कांड एक मुद्दा था, सबसे बड़ा मुद्दा नहीं.</p>
<p style="text-align: justify;">कांग्रेस की सरकार गिरने के पीछे भ्रष्टाचार से लेकर महंगाई से लेकर विकास बड़े मुद्दे रहे. अब 2024 के लोकसभा चुनाव में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा के पोते प्रज्वल रेवन्ना पर कई महिलाओं का यौन शोषण करने के आरोप लगे हैं. प्रज्वल रेवन्ना पर आरोप है कि वह कई सालों तक अलग-अलग महिलाओं का यौन उत्पीड़न करता रहा. सोशल मीडिया पर इसके वीडियो भी सामने आए. इस घिनौने अपराध को लेकर पुलिस में मामला भी दर्ज हो गया.</p>
<p style="text-align: justify;">यह भी पढ़े- <a href="https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/politicians-have-been-using-bad-language-against-women-politicians-from-a-long-time-irrespective-of-their-political-inclination-4591306"><span>Politics की female politicians को लेकर ओछी भाषा... </span></a></p>
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<h2 class="PZPZlf ssJ7i B5dxMb" aria-level="2" data-attrid="title" role="heading">Prajwal Revanna के केस का क्या ?</h2>
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<p style="text-align: justify;">प्रज्वल रेवन्ना देश छोड़कर चला भी गया. तो अब कार्यवाही अपनी गति से चलती रहेगी. लेकिन सवाल यह है कि चुनाव के ठीक बीचो-बीच, संदेशखाली के ठीक बाद, महिला सुरक्षा से जुड़ी इतनी बड़ी खबर सामने आने पर चुनाव पर उसका क्या असर पड़ेगा. कर्नाटक में जेडीएस जिन सीटों पर चुनाव लड़ रही थी वहां पर वोटिंग हो चुकी है तो ज़ाहिर सी बात है कि उन सीटों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा.</p>
<p style="text-align: justify;">लेकिन कर्नाटक में JDS BJP के साथ गठबंधन में है और उन बची हुई सीटों पर अभी वोटिंग होनी बाकी है. प्रज्वल रेवन्ना पर लगे आरोप को आज़ाद भारत का सबसे ज़्यादा भयंकर यौन अपराध कहा जा रहा है. मामले ने राजनीतिक तूल तो पकड़ ही लिया है. कांग्रेस और बाकी विपक्षी पार्टियाँ भाजपा को इस बात पर घेरे हुए हैं कि किस तरह से उन्होंने प्रज्वल रेवन्ना जैसे शख्स को टिकट दिया और किस तरह से वह अभी भी जेडीएस के साथ गठबंधन में है. और भाजपा कांग्रेस पर यह आरोप लगा रही है कि राज्य में कांग्रेस की सरकार होते हुए अब तक प्रज्वल रेवन्ना वाले मामले में कोई भी कार्रवाई क्यों नहीं की गई.</p>
<p style="text-align: justify;">अब इस पूरे मामले की सीधी सीधी तुलना संदेशखाली से भी की जा रही है. केंद्र सरकार का जो रवैया संदेशखाली को लेकर था वह बिल्कुल भी प्रज्वल रेवन्ना वाले मामले को लेकर के नहीं है. संदेशखाली के मामले में जिस तरह से आनन फानन केंद्रीय एजेंसी जांच में लग गई थी वैसा कुछ भी कहीं से कहीं तक प्रज्वल के मामले में नहीं दिखाई दे रहा है. और जो विपक्षी पार्टियों संदेशखाली पर ज़्यादा सवाल जवाब नहीं कर रही थीं वह खुलकर प्रज्वल रेवन्ना मामले में सामने आई हैं, जो कि उन्हें करना भी चाहिए. लेकिन संदेशखाली और प्रज्वल रेवन्ना वाले मामलों के बीच हो रहे हैं इस चुनाव में, इतना सब होने के बाद भी, महिला सुरक्षा एक अहम मुद्दा बनेगा या नहीं या अब भी नहीं कहा जा सकता.</p>
<p style="text-align: justify;">अगर महिला सुरक्षा बड़ा मुद्दा बनता है तो यह एक चौंकाने वाला पर एक सही बदलाव होगा. हालांकि अब तक का इतिहास देखते हुए इसकी उम्मीद बहुत कम है. भारत अब भी अपनी बेटी की सुरक्षा के लिए वोट नहीं डालता. उम्मीद है कि इस बार ऐसा ना हो.</p>
<p style="text-align: justify;">यह भी पढ़े- <a href="https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/women-pay-the-price-of-any-riot-or-issue-created-during-elections-4580203">चुनावों की मारा मारी महिलाओं पर भारी</a></p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मैत्री </dc:creator><pubDate>Wed, 22 May 2024 12:48:33 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/women-safety-is-still-a-thing-for-name-sake-in-india-which-comes-to-politicians-mind-during-the-railies-of-elections-and-to-include-in-manifesto-4594935]]></guid><category><![CDATA[एक्सपर्ट विचार]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/rBSpfOiQCbL1H3jNBuMd.png" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/rBSpfOiQCbL1H3jNBuMd.png"/></item><item><title><![CDATA[गर्मी की मारा मारी, सबसे ज़्यादा बहू-बेटी पर भारी ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/heat-waves-are-increasing-day-by-day-but-womens-duties-are-not-changing-at-all-4593090</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/HR2K91w1IyGLc9pm7ZsS.png"><p style="text-align: justify;">अप्रैल-मई की भीषण गर्मी ने पूरे देश को अपनी चपेट में ले लिया है. कहीं पर उमस से भरी गर्मी है तो कहीं लू के थपेड़ों ने जीना मुहाल किया हुआ है. और कई जगहों पर पानी का संघर्ष है. और अगर आप को लग रहा हो कि गर्मी ने किस तरह आपका हाल बेहाल किया हुआ है तो एक बार अपने आस पास की महिलाओं के बारे में ज़रूर सोच लीजिएगा. क्योंकि मौसम तक की सबसे ज़्यादा मार महिलाओं पर ही पड़ती है. शुरुआत अपने घर से करके देख लीजिए. गर्मी चाहे कितनी भी हो, आपकी मां, पत्नी या बेटी, रसोई में उतना ही वक्त देती हैं जितना किसी भी मौसम में देती हों.</p>
<h2 style="text-align: justify;">घर की महिला के लिए कोई गर्मी नहीं !&nbsp;</h2>
<p style="text-align: justify;">आपकी थाली में परोसे जाने वाले व्यंजन गर्मी के चलते कम नही होते. भरी गर्मी में आपके घर में साफ़ सफ़ाई करने के लिए आने वाली महिला को भी उसी तरह अपना काम करना पड़ता है. कभी पंखा बंद करके झाड़ू तो कभी घर में जमी हुई धूल हटाने के लिए ज़्यादा मेहनत.</p>
<p style="text-align: justify;">यह भी पढ़े- <a href="https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/women-of-nashik-maharashtra-are-closely-related-to-onion-farming-2393423">नाशिक, प्याज और महिलाएं</a></p>
<p style="text-align: justify;">ये तो बात हुई एक आम परिवार की जहां पर हर तरह की मूलभूत सुविधा उपलब्ध है. भारत के गांव खेड़ों की तरफ़ रूख करेंगे तो देखेंगे कि अब भी कई घरों में लकड़ी के चूल्हे जलते हैं. और इस आग उगलने वाली गर्मी में चूल्हे की आग के सामने भी एक महिला ही बैठी मिलेगी.</p>
<h2 style="text-align: justify;">गांव में अलग समस्याएं</h2>
<p style="text-align: justify;">इसके बाद बारी आती है उन इलाकों की जहां पर पानी की उपलब्धता एक चुनौती है. देश के कई इलाकों से आती हुई ख़बरें आपने अक्सर देखी होंगी जहां आपने सर पर पानी का बर्तन रखे महिलाओं को पानी लाने के लिए लंबी दूरी पैदल ही तय करते हुए देखा होगा.</p>
<p style="text-align: justify;">यह भी पढ़े- <a href="https://ravivarvichar.in/kahaniyan/shg-women-are-keeping-track-of-hundred-of-quintals-of-wheat-at-the-purchasing-centers-in-sehore-4583511">केन्द्रों पर महिलाएं रख रहीं सैकड़ों क्विंटल गेंहू का हिसाब</a></p>
<p style="text-align: justify;">हाल ही में महाराष्ट्र के मेलगाट के इलाके का एक वीडियो देखा जहां महिलाएं बता रहीं थी कि एक मटके पानी के लिए उन्हें दिन में कई कई बार पैदल ही दूर तक जाना पड़ता है. अपने दस साल से ज़्यादा के पत्रकारिता के करियर में मैंने भी कितनी बार ऐसी घटनाएं कवर की हैं. राज्य चाहे जो भी हो, एक बात जो ऐसी स्थिति में समान होती है वो यह है कि भरी गर्मी में, सर पर पानी का बर्तन रखे पैदल पैदल लंबी दूरी तय करते हुए महिलाएं ही दिखेंगी.</p>
<p style="text-align: justify;">कई बार छोटे बच्चे बच्चियां भी दिखते हैं. लेकिन पुरुष नहीं. आप लोग सोच सकते हैं कि पुरुष नौकरी कर रहे होंगे इसलिए पानी लाने का वक्त नहीं मिलता होगा. ऐसा नहीं हैं. इन इलाकों में अक्सर लोग खेती पर निर्भर करते हैं. गर्मी और पानी की कमी के चलते खेती में करने को कुछ विशेष होता नही. आप जब भी ऐसे गांव में जायेंगे तो आपको पुरुष घर पर ही मिलेंगे. लेकिन महिलाएं पानी के जुगाड में संघर्षरत होंगी. ऐसा इसलिए की समाज का ढांचा ही ऐसा बना है जी कि जीवन का चाहे जो भी हिस्सा हो, महिलाओं के हिस्से में अधिकार नहीं सिर्फ़ जिम्मेदारी ही आती है.&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;">किसी भी तरह की समानता के लिए, सही परिवर्तन के लिए, समाज के इस ढांचे को बदलना बहुत ज़रूरी है. ज़रूरी है कि महिलाओं को उनके अधिकार मिलें और उनकी जिम्मेदारियों का बोझ सांझा किया जाए. तो चलिए इस बार कोशिश करें कि ये गर्मियां हमारे आस पास महिलाओं पर कुछ तो आसान हों.</p>
<p style="text-align: justify;">यह भी पढ़े- <a href="https://ravivarvichar.in/kahaniyan/shg-women-are-making-pots-and-cow-dung-cake-in-cowsheds-of-dewas-4583843">Cow Dung से महिलाएं बना रही कंडे और गमले</a></p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मैत्री </dc:creator><pubDate>Tue, 21 May 2024 16:00:22 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/heat-waves-are-increasing-day-by-day-but-womens-duties-are-not-changing-at-all-4593090]]></guid><category><![CDATA[एक्सपर्ट विचार]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/HR2K91w1IyGLc9pm7ZsS.png" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/HR2K91w1IyGLc9pm7ZsS.png"/></item><item><title><![CDATA[Politics की female politicians को लेकर ओछी भाषा... ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/politicians-have-been-using-bad-language-against-women-politicians-from-a-long-time-irrespective-of-their-political-inclination-4591306</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/oCyLspbZEreIaxtHZrYe.png"><p style="text-align: justify;">चुनावी बिगुल बजते ही जैसे राजनेताओं की ज़बान और भी ज़्यादा खराब हो जाती है. एक तरह से जैसे होड़ सी लग जाती है कि कौन सबसे ज़्यादा घटिया बातें कर सकता है. और हमेशा की तरह इसका भी सबसे ज़्यादा नुकसान महिलाओं को उठाना पड़ता है- इस प्रसंग में राजनेत्रियों को यानी कि female politicians को.</p>
<h2 style="text-align: justify;">Politics में हर वक़्त होता है अभद्र भाषा का प्रयोग</h2>
<p style="text-align: justify;">इस बार की शुरुआत उस प्रसंग से हुई जब कांग्रेस की सुप्रिया श्रीनेत के सोशल मीडिया अकाउंट से बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत को मंडी से बीजेपी टिकट मिलने पर एक भद्दी टिप्पणी की गई. सुप्रिया श्रीनेत ने कहा कि वो पोस्ट उनके द्वारा नहीं &nbsp;बल्कि उनकी टीम के किसी सदस्य द्वारा लिखा गया है. उन्होंने माफी मांगी. लेकिन यह अंग्रेजी की कहावत 'टू लिटिल टू लेट' वाला मामला हो गया.</p>
<p style="text-align: justify;">वैसे खुद कंगना की भी बात करें तो महिलाओं के बारे में आपत्तिजनक बातें करना, अभद्र भाषा का इस्तेमाल करना, जो भी महिला उनकी बात से सहमत ना हो उसे गाली देना, और उनकी राजनीतिक विचारधारा के विपरीत वाली विचारधारा की महिलाओं के चरित्र पर टीका टिप्पणी करना, कंगना इन सभी बातों में माहिर है. चाहे सोशल मीडिया हो या इंटरव्यू, कंगना अक्सर महिलाओं के लिए आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करती दिखती हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">यह भी पढ़े- <a href="https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/women-pay-the-price-of-any-riot-or-issue-created-during-elections-4580203">चुनाव की मारा मारी, महिलाओं पर भारी</a></p>
<p style="text-align: justify;">लेकिन मेरा यह मानना है कि ऐसी महिला के खिलाफ़ भी किसी दूसरे को अभद्र भाषा का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. कंगना ने जो आज तक किया वह उनकी करनी है. लेकिन उन्हें भी इस बात पर गाली नहीं पडनी चाहिए कि वह एक महिला हैं. सिलसिला यहां रुका नहीं. एक के बाद एक इस तरह के बयान आते रहे. हाल ही में महाराष्ट्र के संजय राऊत ने बीजेपी की नवनीत राणा को नचनिया कहा.</p>
<p style="text-align: justify;">नवनीत राणा को इस बार अमरावती से भाजपा का टिकट मिला है और अपने करियर के शुरुआती दिनों में वह एक अभिनेत्री रह चुकी हैं. यह हिंदुस्तान की राजनीति में कोई नई बात नहीं है. वर्तमान समय की अगर बात कर लें तो छोटे-बड़े नेताओं की तो बात ही क्या कहें, प्रधानमंत्री की तरफ से भी कई बार अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया जाता है.</p>
<h2 style="text-align: justify;">अपना नेता आखें खोल कर चुने</h2>
<p style="text-align: justify;">चाहे वह 2014 की रेस में सोनिया गांधी के खिलाफ़ हो या फिर 2021 के बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी के खिलाफ़. वैसे सोनिया गांधी की अगर बात करें तो वर्तमान में शायद ही किसी महिला के खिलाफ़ <a href="https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/women-got-their-voting-rights-after-lots-of-struggle-and-movements-they-must-use-it-with-full-responsibility-4003682">Indian Politics</a> में इतनी बार अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया गया हो जितनी बार सोनिया गांधी के लिए किया गया है. चाहे उनकी इटली की जड़ों को लेकर बात हो, चाहे उनकी शादी को लेकर बात हो, इस मामले में भाजपा के कई सारे नेताओं ने, कई बार बेहद अश्लील भाषा का इस्तेमाल किया है.</p>
<p style="text-align: justify;">और जैसा कि हमने कहा कि महिलाओं के लिए इस तरह की अभद्र भाषा का इस्तेमाल किसी राजनेता के लिए कोई नई बात नहीं है. एक आधी बार कहने को चुनाव आयोग ज़रूर कुछ कार्रवाई कर देता है लेकिन उस कार्रवाई का कोई असर नहीं पड़ता, क्योंकि महिला नेताओं को पड़ने वाली गालियों में कहीं से कहीं तक कोई कमी नहीं आती. अब ऐसे में एक वोटर क्या कर सकता है.</p>
<p style="text-align: justify;">एक वोटर इस बात को एक पैमाने की तरह रख कर देख सकता है कि जो नेता महिला नेताओं यानी की राजनेत्रियों तक के बारे में शालीनता से बात नहीं कर सकते, उनका सम्मान नहीं कर सकते, वह आम जनता की बच्चियों की, महिलाओं की इज़्ज़त क्या ही करेंगे. तो इस बार चुनावी बूथ में अगले 5 साल के लिए अपने नेता को चुनते वक्त इस बात का ज़रूर ध्यान रखिएगा कि क्या वो शख्स महिलाओं की इज़्ज़त सिर्फ़ और सिर्फ़ भाषणों में ही करता है या उसकी भाषा में और व्यवहार में भी यह दिखाई देता है कि वह सचमुच महिलाओं का सम्मान करता है और उनका हितैषी है.</p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मैत्री </dc:creator><pubDate>Mon, 20 May 2024 13:38:35 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/politicians-have-been-using-bad-language-against-women-politicians-from-a-long-time-irrespective-of-their-political-inclination-4591306]]></guid><category><![CDATA[एक्सपर्ट विचार]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/oCyLspbZEreIaxtHZrYe.png" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/oCyLspbZEreIaxtHZrYe.png"/></item><item><title><![CDATA[चुनावों की मारा मारी, महिलाओं पे भारी… ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/women-pay-the-price-of-any-riot-or-issue-created-during-elections-4580203</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/8cKHOLf7eXmehgWcUaaN.png"><p style="text-align: justify;">चुनावी बिगुल कब का बज चुका है. माहौल पूरी तरह से चुनावी रंग में रंग चुका है. लोकसभा चुनाव (LokSabha Elections 2024) हैं फ़िर भी भारत जैसे विनिन्नताओं से परिपूर्ण देश में हर राज्य, हर शहर और हर गांव-कस्बे का माहौल एक दूसरे से अलग होता है.</p>
<h2 style="text-align: justify;">महिलाएं चुकाते है कीमत</h2>
<p style="text-align: justify;">लेकिन आज हम चुनावों के रोमांचक पहलुओं के बारे में बात नहीं करेंगे. आज हम बात करेंगे चुनावों के वीभत्सपने की. और कैसे निर्दोष लोगों को इस महायुद्ध की कीमत चुकानी पड़ती है. सत्ता की इस लड़ाई में सबसे ज़्यादा नुकसान होता है देश की महिलाओं का.</p>
<p style="text-align: justify;">कहीं पर कम, कहीं पर ज़्यादा, पर होता ज़रूर है. 2021 के बंगाल के विधानसभा चुनाव के बाद हिंसा, यौन शौषण और हत्या के जो मामले सामने आए थे वो अब तक सबके जहन में होंगे. बात वैसे सिर्फ़ बंगाल की नहीं हैं. लेकिन क्योंकि बंगाल की घटनाएं हाल ही की हैं और वहां पर चुनावी हिंसा जिस तरह से आम बात सी है, इसलिए चुनावी हिंसा की बात करते वक्त सबसे पहले बंगाल का नाम सामने आता है.</p>
<p style="text-align: justify;">यह भी पढ़ें - <a href="https://ravivarvichar.in/nazariya/women-voters-are-so-important-in-the-2024-lok-sabha-elections-that-ignoring-them-can-cause-huge-loss-to-any-political-party-despite-all-this-like-in-past-years-women-politicians-are-still-facing-derogatory-comments-and-gender-discrimination-4485943">ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोय, औरन को शीतल करे आपहुं शीतल होए</a></p>
<h2 style="text-align: justify;">बंगाल हिंसा में सबसे आगे</h2>
<p style="text-align: justify;">विधानसभा चुनावों के नतीजे के बाद जो बंगाल में हुआ, उसी के वापस होने की आशंका जताई जा रही है. लेकिन अगर बंगाल के वोटरों की माने तो सिर्फ़ आशंका नहीं, उन्हे पूरा भरोसा है कि जिस भी इलाके में वो रहते हैं, वहां जिस पार्टी का दबदबा है, अगर उसे वोट नही दिया तो उन्हे इसका अंजाम भुगतना होगा. क्या भाजपा, क्या तृणमूल और क्या वामपंथी. बंगाल के लोगों का कहना है कि पार्टियों के सिर्फ़ नाम अलग हैं, तरीका नहीं.&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;">बंगाल के लोगों को पहले वामपंथ के चुनावी बाहुबल का सामना करना पड़ता था. अब क्योंकि पूरी लड़ाई तृणमूल और भाजपा के बीच की है और लोगों को इन दोनो पार्टियों के बाहुबल का सामना करना पड़ता है. चुनावी हिंसा का डर सिर्फ़ वोटरों को ही नहीं होता. ये डर राजनीतिक कार्यकर्ताओं को भी होता है.</p>
<p style="text-align: justify;">एक बार जब चुनाव के नतीजे आ जाए तब उन लोगों के खिलाफ़ दमन की प्रक्रिया शुरू होती है जिन्हे कोई भी पार्टी उनके राजनीतिक नुकसान के लिए ज़िम्मेदार मानती है. और इन सबमें सबसे बड़ी भुगतभोगी होती हैं महिलाएं.</p>
<p style="text-align: justify;">चाहे महिला कार्यकर्ता (Female Karyakarta) हों या महिला वोटर (Female Voters), उन्हे राजनीतिक दलों की हिंसा को झेलना पड़ता है. पिछले विधानसभा चुनाव में जो हुआ वो हम सबके सामने है ही. आपको शायद लगे कि ये चुनावी हिंसा बंगाल के दूर दराज के इलाकों में होती होगी. पर ऐसा नहीं है.</p>
<p style="text-align: justify;">कोलकाता से महज तीस किलोमीटर दूर के गांवों में अगर आप जाकर देखेंगे तो यही हालात हैं. वहां की महिलाएं आपको बताएंगी कि किस तरह से चुनावी दमन का सबसे ज़्यादा शिकार वो होती हैं. जिस तरह से वो इन सबके बारे में बताती हैं, ये देख कर सबसे ज़्यादा दुख होता है कि किस तरह से इसे उन्होंने अपनी नियति मान लिया है.</p>
<p style="text-align: justify;">यह भी पढ़ें - <a href="https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/kangana-ranaut-recently-got-ticket-from-mandi-himachal-pradesh-from-bjp-it-will-be-interesting-to-see-her-reign-in-politics-4418090">लाइट्स, कैमरा और इलेक्शन !</a></p>
<h2>और भी जगह हाल सामान</h2>
<p style="text-align: justify;">बंगाल अकेली ऐसी जगह नही है. 1970-90 के दशक में भारत के उत्तर पूर्वी राज्यों में चुनावी हिंसा की घटनाएं आम बात हो गई थीं. 1990 से 2004 के बीच में बिहार में चुनावी हिंसा अपने चरम पर थी. उत्तर प्रदेश में भी स्थिति कुछ अलग नहीं थी. लोकसभा (Lok Sabha), विधानसभा (Vidhan Sabha) की तो बात ही क्या, ग्राम पंचायत के चुनाव भी हिंसक घटनाओं से पटे होते थे. और बंगाल की ही तरह बाकी सभी राज्यों में भी सबसे ज्यादा अत्याचार महिलाओं पर ही हुआ है. वर्तमान में स्थिति में काफ़ी बदलाव आया है ये सच है, लेकिन अब भी ऐसे राज्य हैं जहां पर चुनाव अपने साथ राजनीतिक दमन लेकर आते हैं और आधी आबादी को अपने ज़ुल्म के का शिकार बनाते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">यह भी पढ़ें - <a href="https://ravivarvichar.in/khabar/accepting-the-challenge-by-shg-women-and-join-the-filed-of-voting-awareness-in-indore-4553098">Challenge मान कर महिलाएं मतदान जागरूकता के मैदान में</a></p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मैत्री </dc:creator><pubDate>Thu, 16 May 2024 16:31:11 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/women-pay-the-price-of-any-riot-or-issue-created-during-elections-4580203]]></guid><category><![CDATA[एक्सपर्ट विचार]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/8cKHOLf7eXmehgWcUaaN.png" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/8cKHOLf7eXmehgWcUaaN.png"/></item><item><title><![CDATA[फ़िर आया मदर्स डे ! ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/this-mothers-day-think-of-mother-as-a-human-not-a-superhuman-4561195</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/Nzcyc10z4v07Jg3N8h3a.png"><p style="text-align: justify;">मई का महीना है, चुनावों की भागदौड़ में Mother's day भी आ गया. फ्लाइट पकड़नी थी तो सवेरे ही मां को फोन करके मदर्स डे विश किया. पहले उन्हें मदर्स डे पर केक भेजती थी. फ़िर उन्होंने कहा कि केक से बेहतर है पिज़्ज़ा तो इस साल उनके पिज़्ज़ा का प्रबंध कर</p>
<p style="text-align: justify;">आप लोग भी अपने अपने तरीके से इस दिन को मनाते होंगे. नई पीढ़ी के बच्चों को ज़्यादा उत्साह होता है इन सब उत्सवों का. अच्छा है, होना भी चाहिए.</p>
<h2 style="text-align: justify;">आज की पीढ़ी समझती है इमोशंस</h2>
<p style="text-align: justify;">पहले की पीढ़ियां अपनी भावनाएं खुल कर ज़ाहिर नहीं करती थीं. आजकल के बच्चों को ऐसा करने में कोई परहेज़ नहीं. कुछ लोग मदर्स डे जैसी चीज़ को विदेशी रिवाज़ मानकर ख़ारिज कर देते हैं. मुझे ये तर्क बड़ा बेतुका लगता है.</p>
<p style="text-align: justify;">अपने लोगों को, ख़ासकर कि अपनी मां को एक दिन के लिए ज़्यादा ख़ास महसूस करवाने में काहे का ऐतराज़. छोटे बच्चे अपनी मां के लिए ग्रीटिंग कार्ड बनाते हैं, अपनी पॉकेट मनी से बचाकर कुछ तोहफ़ा लाते हैं. बड़े भी अपनी मां के लिए कुछ ख़ास करने की कोशिश करते हैं. हर वो दिन जिसमें कुछ सकारात्मक करने का मौका मिले, उसे ज़रूर मनाना चाहिए.</p>
<p style="text-align: justify;">हम सभी को मदर्स डे, फादर्स डे और जो भी इस तरह के ख़ास मौके होते हैं उन्हें ज़रूर मनाना चाहिए. कुछ और नहीं तो इन दिनों के बहाने कुछ यादें ही बन जाती हैं. मां हमेशा तो साथ रहने वाली नहीं. इस मदर्स डे के बहाने उनके जाने के बाद आपके पास उनकी कुछ और यादें हो जाएंगी.</p>
<h2 style="text-align: justify;">मनाओ मगर पूरे दिल से</h2>
<p style="text-align: justify;">हां लेकिन मदर्स डे के नाम पर सिर्फ़ सोशल मीडिया पर तस्वीर, पोस्ट या स्टोरी डालने की नीयत से कुछ ना करें तो बेहतर होगा. पता चला कि सोशल मीडिया की खातिर मां के लिए एक पकवान तो बना दिया लेकिन उसके बाद रसोई को इतना गन्दा छोड़ दिया कि मां का बचा हुआ दिन सफ़ाई में गुज़रा.</p>
<p style="text-align: justify;">ऐसा ना हो कि मां के लिए रिटर्न रिसिप्ट के साथ गिफ्ट लाओ और बाद में ना जचने पर उसको बदलवाने की मशक्कत मां को उठानी पड़े. या उनके लिए गिफ्ट के नाम पर ऐसा कुछ ले आओ जिसकी ज़रूरत उनसे ज़्यादा आपको हो. ये सब करना हो तो इससे बेहतर है कि मदर्स डे ना ही मनाओ.&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;">वैसे इन गिने चुने तरीकों के अलावा भी मदर्स डे कई प्रकार से मनाया जा सकता है. सबका अपना अलग तरीका, अपनी लव लैंग्वेज हो सकती है. ये लव लैंग्वेज, ये तरीका बदल भी सकता है.</p>
<p style="text-align: justify;">मेरे लिए तो अब तक केक और पिज़्ज़ा काफ़ी असरदार तरीका रहा है. मिलेनियल हैं तो आज की पीढ़ी की वो कला ज़्यादा नही आती जिसमें खुल कर मां बाप के प्रति अपने भाव को व्यक्त कर सकें. ऐसे में हम जैसे लोगों के लिए केक, गुलदस्ता और पिज़्ज़ा बड़ा काम आता है.</p>
<h2 style="text-align: justify;">मां को सुपरवुमेन नहीं, इंसान है</h2>
<p style="text-align: justify;">अब सवाल ये कि कैसे इस मदर्स डे को इस एक दिन के उत्सव से आगे ले जाया जाए. मेरे हिसाब से शुरुवात सबसे पहले अपनी मां को देवी मानना बंद करने से करें. मत मानिए मां को देवी. और सुपरवुमन तो बिलकुल ना माने. मां को इंसान माने.</p>
<p style="text-align: justify;">इंसानों को मिलने वाली हर छूट दें उन्हें. उन पर परफेक्ट होने का दबाव जो इस दुनिया ने बनाया है, उसे खत्म करने की कोशिश करें. मां को उनके मां होने के परे देखें. उन्हें एक इंसान की तरह देखें. उनके जीवन के उतार चढ़ाव को एक इंसान की तरह देखें, ना कि सिर्फ़ उनकी औलाद की तरह.</p>
<p style="text-align: justify;">आप सोचेंगे कि उससे क्या हो जायेगा. उससे होगा ये कि शायद मां अपनी ज़िंदगी ज़रा खुल कर जी पाए. हर वक्त सुपरवुमन, परफेक्ट बने रहने का जो दबाव है मां पर वो कम हो जाए और मां अपनी औलाद से परे अपने बारे में सोच पाए. इससे बढ़िया मदर्स डे सेलिब्रेशन और क्या होगा.</p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मैत्री </dc:creator><pubDate>Sun, 12 May 2024 20:01:09 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/this-mothers-day-think-of-mother-as-a-human-not-a-superhuman-4561195]]></guid><category><![CDATA[एक्सपर्ट विचार]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/Nzcyc10z4v07Jg3N8h3a.png" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/Nzcyc10z4v07Jg3N8h3a.png"/></item><item><title><![CDATA[लाइट्स, कैमरा और इलेक्शन ! ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/kangana-ranaut-recently-got-ticket-from-mandi-himachal-pradesh-from-bjp-it-will-be-interesting-to-see-her-reign-in-politics-4418090</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/GG5WJ5oKFjGwcSWQNbFm.png"><p style="text-align: justify;">दुनिया भर की नजरें इस वक्त भारत पर हैं. और हों भी क्यों ना! भारत में होने वाले लोकसभा चुनाव विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के चुनाव हैं. इसलिए इन चुनावों से जुड़ी हर बात ध्यान खींचने वाली है.</p>
<p><img alt="kangana ranaut mandi himachal pradesh" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/600x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/g45K2JwrnzJQPuhaSrrd.jpg" style="width: 600px;" class="center"></p>
<p class="center"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image credits: Jagran</em></span></p>
<h2 style="text-align: justify;">Kangana Ranaut को मंडी से मिला टिकिट</h2>
<p style="text-align: justify;">हाल ही में जो एक और ध्यान खींचने वाली बात सामने आई है वो है फिल्म अदाकारा Kangana Ranaut को भाजपा की तरफ़ से टिकट मिलना. भाजपा ने कंगना को उनके शहर मंडी, हिमाचल प्रदेश से टिकट दिया है. काफ़ी वक्त से Kangana Ranaut को टिकट मिलने की कयास लगाए जा रहे थे. Kangana Ranaut का नाम भी अब उन अभिनेत्रियों की श्रेणी में आ गया है जिन्होंने कई बार सिनेमा के साथ या सिनेमा के बाद राजनीति में अपना हाथ आजमाया है.</p>
<p style="text-align: justify;">यह भी पढ़े- <a href="https://ravivarvichar.in/nazariya/anandi-working-towards-political-empowerment-of-women-1989870">Rural Politics में Gender Equality ला रहा ANANDI</a>&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;">अब Kangana Ranaut को ये टिकट क्यों मिला, Kangana ने इतने सालों से भाजपा के एजेंडे को सोशल मीडिया के ज़रिए कैसे आगे बढ़ाया, उनके कुछ बेहद आपत्तिजनक बयान, सामाजिक सौहार्द को खराब करने वाले उनके सोशल मीडिया के पोस्ट, हिंदी फिल्म सिनेमा में उन्होंने परिवारवाद के खिलाफ़ जो लड़ाई शुरू की उसे किस तरह से उन्होंने खुद ही अपने प्रतिद्वंदियों पर निजी आक्रमण करने का हथियार बनाया, किस तरह से उन पर सुशांत सिंह राजपूत की मौत को भुनाने के आरोप हैं, इन सब बातों पर बहुत चर्चाएं हो चुकी हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">हम आज बात करते हैं अभिनेत्रियों के राजनीतिक करियर की और जीतने के बाद उनके अपने सभा क्षेत्र में किए गए कामों की. आप कहेंगे कि जी सिर्फ़ अभिनेत्रियों की ही बता क्यों, कितने अभिनेताओं ने भी राजनीति में अपना हाथ आजमाया है. तो देखिए अब रविवार के ज़रिए बात कर रहे हैं तो फोकस महिलाएं ज़्यादा रहेंगी.</p>
<p><img alt="jayalaithaa politician image hd" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/600x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/mZS0Lcw1GLsgkLruO7wM.jpg" style="width: 600px;" class="center"></p>
<p class="center"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image credits: BBC</em></span></p>
<h2 style="text-align: justify;">सबसे ताकतवर मुख्यमंत्री थी <span>J. Jayalalithaa</span></h2>
<p style="text-align: justify;">अभिनेत्रियों का राजनीति में परफॉर्मेंस अमूमन अच्छा रहा है. बहुत ज्यादा पीछे ना जाते हुए शुरुआत करते हैं देश की सबसे मशहूर और ताकतवर मुख्यमंत्रियों में से एक, <span>J. Jayalalithaa</span> की. <span>Jayalalithaa</span> ने राजनीति में आने से पहले सिनेमा जगत में अपना लोहा मनवाया था.</p>
<p style="text-align: justify;">यह भी पढ़े- <a href="https://ravivarvichar.in/nazariya/first-full-time-female-fm-nirmala-sitharaman-striving-for-women-empowerment">फेमिनिज्म की राह चलती FM निर्मला सीतारमण</a></p>
<p style="text-align: justify;"><span>Jayalalithaa</span> का राजनीतिक करियर भले ही बहुत ज़्यादा उतार चढ़ाव और कंट्रोवर्सी से भरा हुआ हो लेकिन इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता की उनका राजनीतिक करियर बेहद सफ़ल था. और दक्षिण भारत ही नहीं, देश भर के सबसे बड़े राजनेताओं में से एक रहीं हैं <span>Jayalalithaa</span>.</p>
<p><img alt="jaya bachchan" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/600x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/PNELVgKmG4dUbbz4N0GD.webp" style="width: 600px;" class="center"></p>
<p class="center"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image credits: NDTV</em></span></p>
<h2 style="text-align: justify;"><span>Jaya Bachchan भी एक है strong politician</span></h2>
<p style="text-align: justify;">Jaya bachchan का उदहारण हम सबके सामने में. जया जी सिर्फ़ नाम के लिए राजनीति में नहीं हैं. वे पूरी शिद्दत और प्रभाव के साथ राज्यसभा में अपनी बात रखतीं हैं. अपना राजनीनिक धर्म निभाते हुए सरकार की आलोचना करती हैं और समाज में देश में चल रहे मुद्दे उठाती हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">यह भी पढ़े- <a href="https://ravivarvichar.in/nazariya/vijaya-lakshmi-pandit-first-women-president-of-un-general-council-and-architect-of-the-constitution">संविधान को आकार देने वाली विजय लक्ष्मी पंडित</a></p>
<h2><img alt="smriti irani hd images" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/600x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/4k6dKHtKtJ0Pob6ovSw5.jpg" style="width: 600px;" class="center"></h2>
<p class="center"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image credits: Hindustan times</em></span></p>
<h2 style="text-align: justify;">Smriti Irani एक और उदहारण</h2>
<p>Smriti Irani&nbsp;की राजनीतिक कामयाबी किसी से छिपी नहीं है. हालांकि Smriti Irani का कार्यकर्ता से मंत्री तक का सफ़र कंगना को मिले टिकट के मुकाबले बहुत ज़्यादा कठिन रहा है. लेकिन राजनीति उनके लिए कोई फॉल बैक ऑप्शन या साइड हसल नहीं है वो स्मृति ईरानी साबित कर चुकी हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">जया प्रदा से लेकर नगमा से लेकर उर्मिला मातोंडकर तक कई सारी अभिनेत्रियों ने राजनीति का रुख़ किया है. अब सभी अभिनेत्रियां राजनीति में आने के बाद सफ़ल रहीं ये भी सच नहीं. और ऐसा भी नहीं कि राजनीतिक जीत हासिल करने के बाद सभी अभिनेत्रियों ने अपना राजनीतिक धर्म और जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाई है.</p>
<p style="text-align: justify;">हेमा मालिनी इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण हैं. हेमा मालिनी को आपने अक्सर उनके राजनीतिक सभा क्षेत्र से जुड़े सवालों का जवाब देते हुए घबराते हुए या कुछ भी अनाप शनाप कहते हुए सुना होगा. हेमा जी अपने कार्य क्षेत्र में अपने द्वारा किए काम तक बता पाने में अक्सर असफ़ल रहीं है. हाल ही में बंगाल से सांसद मिमी चक्रवर्ती ने राजनीति से सन्यास लेने की घोषणा की है.</p>
<p style="text-align: justify;">ऐसे में Kangana Ranaut का राजनीतिक पड़ाव क्या मोड़ लेगा ये देखना दिलचस्प रहेगा. कंगना परदे पर <span>J. Jayalalithaa</span> का क़िरदार निभा चुकी हैं. अब ये देखना दिलचस्प रहेगा कि क्या Kangana Ranaut असल जिंदगी में, अपने राजनीतिक करियर में,<span>&nbsp;Jayalalithaa</span> की तरह कामयाबी हासिल करके लंबे वक्त के लिए राजनीति में सक्रिय रहेंगी या नहीं.</p>
<p style="text-align: justify;">यह भी पढ़े- <a href="https://ravivarvichar.in/nazariya/political-women-potrayal-in-bolloywood-is-not-strong-and-dependent-on-the-male-dominated">स्क्रीन पर महिला राजनेता&hellip;कल आज और कल</a></p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मैत्री </dc:creator><pubDate>Tue, 26 Mar 2024 16:04:51 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/kangana-ranaut-recently-got-ticket-from-mandi-himachal-pradesh-from-bjp-it-will-be-interesting-to-see-her-reign-in-politics-4418090]]></guid><category><![CDATA[एक्सपर्ट विचार]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/GG5WJ5oKFjGwcSWQNbFm.png" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/GG5WJ5oKFjGwcSWQNbFm.png"/></item><item><title><![CDATA[अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस... ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/we-need-to-change-the-thoughts-towards-females-round-the-world-then-only-womens-day-will-mean-something-celebrating-it-for-one-day-and-forgetting-it-for-other-364-days-is-not-enough-4401758</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/SwGbft5cROJflJYAHqcU.jpg"><p style="text-align: justify;"><span>साल 2024 का मार्च महीना भी ख़त्म होने वाला है, और इस महीने में एक ख़ास चीज़ हम सब मानते है जो है, International Women's Day. 8 मार्च को दुनियाभर में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस यानि कि International Women's Day मनाया जाता है. इस दिन हम समाज के हर क्षेत्र में महिलाओं के योगदान की बात करते हैं, महिलाओं की जीवन यात्रा के बारे में, उनके संघर्षों के बारे में, और कैसे उन्हें सही मायने में समाज में बराबरी का अधिकार मिले, इस बारे में बात करते हैं.</span></p>
<h2 style="text-align: justify;"><span>कैसे हुई Women's Day की शुरुआत?</span></h2>
<p style="text-align: justify;"><span>वर्तमान का जो </span><span>Women's Day </span>है उसका रूप उत्सव से परिपूर्ण है. लेकिन <span>Women's Day</span> की शुरुआत ऐसे नहीं हुई थी. सबसे पहले 1909 में अमेरिका में महिलाओं के एक समूह ने <span>Women's Day</span> की नींव रखी थी. यह महिलाएं फैक्ट्री और बाकी जगहों पर काम करने के लिए बेहतर परिस्थितियों की मांग कर रही थीं. उसके बाद अगले ही साल 1910 में यूरोप में भी इसी तरीके से एक दिन को महिलाओं के लिए समर्पित करने की बात की गई. और उसे वक्त <span>Women's Day</span> का मतलब होता था अपने हक की लड़ाई लड़ना, रैलियां निकालना, विरोध प्रदर्शन करना और महिला विरोधी ताकतों का सामना करना.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>यह भी पढ़े-</strong> <a href="https://ravivarvichar.in/khabar/india-has-one-of-the-highest-proportion-of-women-in-stem-that-is-science-technology-engineering-and-mathematics-subjects-globally-at-43-per-cent-in-addition-self-help-groups-provide-training-to-approximately-100-million-women-4383120">'भारत में चमकती है नारी शक्ति' UN में बोली राजदूत रुचिरा कांबोज</a></p>
<h2 style="text-align: justify;"><span>International Women's Day बना आज का नारा</span></h2>
<p style="text-align: justify;">इसके बाद 1913 में रूस में भी एक <span>International Women's Day</span> की बात उठने लगी. उस वक्त रूस की महिलाएं प्रथम विश्व युद्ध के मंडरा रहे खतरे के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रही थीं. तब से हर साल दुनिया भर में एक दिन<span>&nbsp;Women's Day</span> माना जाने लगा. 1975 में इसे एक औपचारिक रूप दिया गया और यूनाइटेड नेशंस ने औपचारिक घोषणा की कि हर साल 8 मार्च को <span>International Women's Day</span> के तौर पर मनाया जाए.</p>
<p style="text-align: justify;">इस साल भी आपने सोशल मीडिया को अलग-अलग तरह के <span>International Women's Day</span> कैंपेन से भरा हुआ देखा होगा, अखबारों के पन्नों पर, आपकी फोन की स्क्रीन पर, आपके टीवी की स्क्रीन पर कई सारे इश्तेहार देखे होंगे. जैसा कि मैंने कहा कि दुनिया के कई हिस्सों में इसे उत्सव के तौर पर ही मनाया जाता है. और सही भी है. कम से कम इस बहाने ही सही हम पूरे एक दिन महिलाओं पर फोकस तो करते हैं.</p>
<h2 style="text-align: justify;">सिर्फ एक दिन का <span>Women's Day काफी नहीं</span></h2>
<p style="text-align: justify;">लेकिन सवाल यह है क्या यह काफ़ी है? सिर्फ एक दिन के लिए महिलाओं के संघर्ष के बारे में बात करना, समाज की उन्नति में उन्होंने जो योगदान दिया है उसके लिए उन्हें धन्यवाद देना, और आगे आने वाली पीढ़ी के लिए एक बेहतर दुनिया बनाना, यह सब बातें करना बहुत अच्छी बात है. और कोई हर्ज नहीं है कि अगर हम साल के एक दिन इन चीजों पर ज़्यादा ध्यान दें, उनके बारे में ज़्यादा बात करें. बस ध्यान हमें एक बात का रखना है कि ये बातें बस औपचारिकता बन कर ना रह जाएं, किसी एक दिन की मोहताज बनकर ना रह जाएं.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>यह भी पढ़े- </strong><a href="https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/according-to-inheritance-law-of-different-religions-women-are-given-equal-rights-to-own-their-family-land-3624723">अधिकार सिर्फ़ कागज़ पर?</a></p>
<p style="text-align: justify;">बल्कि हो ये कि उस दिन जो बातें आप सुनते हैं, समझते हैं, देखते हैं, लिखते हैं, पढ़ते हैं, उसे साल के बाकी दिन ना भूल जाएं. हम आपसे यह नहीं कह रहे हैं कि साल के हर दिन ही आपको उत्सव के मोड में ही रहना है. नहीं ! उसकी ज़रूरत नहीं है. लेकिन जितना आप महिलाओं के बारे में&nbsp;<span>International Women's Day</span> के दिन सोचते हैं, जितना आप उनके संघर्षों के बारे में 8 मार्च को सोचते हैं, जितना कृतार्थ आप इस एक दिन महसूस करते हैं, उसका अगर महज़ एक प्रतिशत भी साल भर सोचें और उसके अनुरूप काम करें, तभी असली मायने में <span>International Women's Day</span> का औचित्य पूरा होगा.</p>
<p style="text-align: justify;">तो बस कोशिश करें कि <span>Women's Day</span> को बस अपने घर की महिलाओं के लिए कुछ चॉक्लेट ला देने, या केक ला देने, या फूल देने तक सीमित न रखें. <span>Women's Day</span> को अपनी ऑफिस की कलीग्स को सिर्फ़ विश कर देने तक सीमित न रखें. <span>Women's Day</span> को सिर्फ़ सोशल मीडिया पर एक अच्छी सी पोस्ट डाल देने तक सीमित न रखें. साल के हर दिन इस बात का ध्यान रखें कि महिलाएं दुनिया की आबादी का आधा हिस्सा हैं और हर चीज़ पर उनका उतना ही अधिकार है जितना पुरुषों का. बस हो गया आपका <span>International Women's Day</span> सेलिब्रेट.</p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मैत्री </dc:creator><pubDate>Fri, 22 Mar 2024 12:12:12 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/we-need-to-change-the-thoughts-towards-females-round-the-world-then-only-womens-day-will-mean-something-celebrating-it-for-one-day-and-forgetting-it-for-other-364-days-is-not-enough-4401758]]></guid><category><![CDATA[एक्सपर्ट विचार]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/SwGbft5cROJflJYAHqcU.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/SwGbft5cROJflJYAHqcU.jpg"/></item><item><title><![CDATA[वोट का अधिकार सबसे ज़रूरी अधिकार ! ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/women-got-their-voting-rights-after-lots-of-struggle-and-movements-they-must-use-it-with-full-responsibility-4003682</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/dOILO7BtkgOYOYdu8ZDF.jpg"><div dir="auto" style="text-align: justify;">महिलाओं की सामाजिक स्थिति और आर्थिक स्थिति कैसे सुधरे, उन्हें बराबर के अधिकार कैसे मिले और उन पर हो रहे अत्याचार कैसे कम हों, इस बारे में हम कई सारी बातें कर चुके हैं. महिलाओं के मूल अधिकारों के बारे में भी बहुत बात कर चुके हैं. तो चलिए आज बात करते हैं सबसे ज़रूरी अधिकारों में से एक अधिकार की, जो है <a href="https://ravivarvichar.in/ladli-behna-yojna-became-a-major-player-in-mp-election-win-1757009">voting rights</a>.</div>
<h2 dir="auto" style="text-align: justify;">महिलाओं के लिए voting rights सबसे ज़रुरी</h2>
<div dir="auto" style="text-align: justify;">वोट का अधिकार अपने आप ही एक नागरिक को बराबरी के स्तर पर ले आता है. भारत में जब से चुनाव होने शुरू हुए, महिलाएं तभी से वोट (<a href="https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/mp-election-voting-female-voters-and-shgs-influencing-results-1756828">female voters</a>) कर रही थीं. और न सिर्फ महिलाएं, बल्कि हर एक तबके और हर एक वर्ग को हमेशा से ही वोट करने का अधिकार था. इसलिए हिंदुस्तान में हमने '<strong>सफरेज मूवमेंट</strong>' या आंदोलन नहीं देखा.</div>
<h2 dir="auto" style="text-align: justify;">क्या है S<span>uffrage movement</span> ?</h2>
<div dir="auto" style="text-align: justify;">तो चलिए पहले बात कर लेते हैं कि क्या है यह <a href="https://ravivarvichar.in/khabar/shg-women-to-encourage-voters-for-increase-voting-percentage-1675253">Suffrage movement</a>. वोट करने के अधिकार को सफरेज कहा जाता है और इस अधिकार के लिए चलाए गए आंदोलन सफरेज मूवमेंट कहलाते हैं. भारत की आज़ादी अभी नई है. हम हाल ही में 20वीं शताब्दी में आज़ाद हुए. 1952 में पहला चुनाव लड़ा गया और हर एक तबके को वोट करने का अधिकार रहा. लेकिन यह अधिकार हर एक वर्ग को हर जगह पर हर देश में हमेशा नहीं था. कई सारे लोगों को, कई सारे वर्गों को इसके लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी और महिलाएं उनमें से एक बड़ा तबका रहीं.</div>
<div dir="auto" style="text-align: justify;"></div>
<div dir="auto" style="text-align: justify;">महिलाओं ने वोट करने के अपने अधिकार को पाने के लिए लंबा संघर्ष किया. लगभग पूरी <strong>18वीं और 19वीं शताब्दी</strong> इसी संघर्ष के नाम हो गई. चाहे वह यूरोप के देश हों, चाहे अमेरिका, महिलाओं को वोट करने के अधिकार पाने के लिए सरकारों के साथ संघर्ष करने पड़े, कई आंदोलन करने पड़े, सरकारों की ज्यादतियां सहनी पड़ीं और कोर्ट के दरवाज़े खटखटाने पड़े. सालों से चल रहे इस संघर्ष को धीरे-धीरे सफलता मिलने लगी.&nbsp;</div>
<div dir="auto" style="text-align: justify;"></div>
<div dir="auto" style="text-align: justify;">1838 में जब पैट्रिकन आइलैंड ने महिलाओं को वोट करने का अधिकार दिया तब महिलाओं के इस संघर्ष को पहली जीत मिली. इसके बाद धीरे-धीरे एक-एक करके कई सारे देश इस फेहरिस्त में जुड़ते गए. कुछ सालों बाद अमेरिका में भी सभी राज्य एक के बाद एक महिलाओं को वोट करने का अधिकार देने को मजबूर हुए. सबसे पहला राज्य व्योमिंग रहा जिसने 1869 में महिलाओं को वोट करने का अधिकार दिया.</div>
<h2 dir="auto" style="text-align: justify;">मेहनत मशक्कत से बाद मिला अधिकार</h2>
<div dir="auto" style="text-align: justify;">तो जैसा कि हमने कहा था कि संघर्ष लंबा रहा और बहुत मुश्किल भी. वोट करने के अधिकार को पाने का सफ़र बिल्कुल भी आसान नहीं था. एक वक्त था जब महिलाओं के लिए वोट के अधिकार को मांगना कई सारे देशों में गैरकानूनी था. ऐसे में इन आंदोलनों की तैयारी छुपा के करनी होती थी. आंदोलन करने पर गिरफ्तारियां होती थीं और इन आंदोलनों का अक्सर बर्बरता से दमन होता था. उसके बावजूद भी महिलाएं अपने अधिकारों के लिए लड़ती रही और उन्हें साथ मिला कई सारे उन पुरुषों का भी, जिन्होंने इस लड़ाई में एक अहम भूमिका निभाई.</div>
<div dir="auto" style="text-align: justify;"></div>
<div dir="auto" style="text-align: justify;">अब वर्तमान की तरफ़ आ जाते हैं. भारत में लोकसभा चुनाव अब बस कुछ ही हफ्तों दूर हैं. हाल ही में हुए राज्यों के चुनाव में हमने देखा कि किस तरह से महिलाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे चुनाव में तो चुनाव के नतीजों को भी एक तरह से पलट कर रख दिया.</div>
<div dir="auto" style="text-align: justify;"></div>
<div dir="auto" style="text-align: justify;">तो यह बात मैं खासकर महिलाओं से कहना चाहूंगी कि अपने वोट करने के अधिकार को पूरी तरह से इस्तेमाल करें, सोच समझकर इस्तेमाल करें. क्योंकि यह अधिकार महिलाओं को एक लोकतंत्र में सच्चे मायने में बराबरी का (<a href="https://ravivarvichar.in/nazariya/vote-percentage-of-women-voters-is-continuously-increasing-due-to-awareness-1702102">voting rights for women</a>) अधिकार देता है. और इस अधिकार को पाने के लिए कई महिलाओं ने बड़े त्याग किए, बड़े संघर्ष किए, खून बहाया, तब जाकर महिलाओं को उनका यह मूल अधिकार मिला है. तो अगली बार जब चुनाव हो तो इस संघर्ष को दिमाग में रखें और अपने अधिकार का पूरा और उचित इस्तेमाल करें.</div>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मैत्री </dc:creator><pubDate>Mon, 26 Feb 2024 11:45:38 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/women-got-their-voting-rights-after-lots-of-struggle-and-movements-they-must-use-it-with-full-responsibility-4003682]]></guid><category><![CDATA[एक्सपर्ट विचार]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/dOILO7BtkgOYOYdu8ZDF.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/dOILO7BtkgOYOYdu8ZDF.jpg"/></item><item><title><![CDATA[अधिकार सिर्फ़ कागज़ पर? ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/according-to-inheritance-law-of-different-religions-women-are-given-equal-rights-to-own-their-family-land-3624723</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/0rOnZ7bBVslMLH8YUyZl.png"><div dir="auto" style="text-align: justify;">हम इससे पहले कई बार कह चुके हैं कि <strong>असली आज़ादी आर्थिक आज़ादी</strong> होती है. किसी भी इंसान या वर्ग को उसका अधिकार तभी मिलता है, या बराबरी तभी मिलती है जब उसे आर्थिक आज़ादी मिलती है.&nbsp;<strong>फेमिनिज्म</strong> यानी कि <strong>नारीवाद</strong> का सबसे ठोस आधार आर्थिक स्वतंत्रता ही है.</div>
<h2 dir="auto" style="text-align: justify;">पुश्तैनी जायदाद में महिलाओं का हिस्सा?</h2>
<div dir="auto" style="text-align: justify;">आर्थिक स्वतंत्रता का मतलब आपको हर महीने मिलने वाली तनख्वाह भी है, व्यापार में होने वाला नफा भी है और पुश्तैनी जायदाद भी. तो चलिए आज बात करते हैं कि यह जो पुश्तैनी जायदाद है वो महिलाओं तक पहुंचती भी है या नहीं. हाल ही में आई <a href="https://ravivarvichar.in/nazariya/over-15-crore-women-to-be-affected-by-climate-change-by-2050-warns-un-women-1566025">UN report</a> के मुताबिक दुनियाभर में जितनी ज़मीन है उसमें से सिर्फ 20% ही महिलाओं के नाम पर है. इसमें हर तरह की ज़मीन शामिल है, पुश्तैनी या नई खरीदी हुई. अब समझ ही सकते हैं कि हम बराबरी से कितने ज़्यादा दूर हैं.</div>
<div dir="auto" style="text-align: justify;"></div>
<div dir="auto" style="text-align: justify;">हिंदुस्तान की बात करते हैं. क्योंकि भारत विभिन्न धर्मों का देश है तो यहां पर Inheritance Law अलग-अलग धर्म के हिसाब से तय हुआ है. भारत के संविधान में महिला और पुरुष को समान अधिकार प्राप्त है लेकिन इन्हेरिटेंस यानी की विरासत और उससे जुड़े नियम का आधार धर्म है.</div>
<div dir="auto"><img alt="Hindu succession act" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/500x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/WzylyX6SAVwbrKMqKENJ.webp" style="width: 500px;" class="center"></div>
<div dir="auto" class="center"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image credits: Open naukri</em></span></div>
<div dir="auto" style="text-align: justify;"></div>
<div dir="auto" style="text-align: justify;">अगर हम <strong>Hindu Inheritance Law</strong> की बात करें तो 1956 में बनाए गए कानून में हुए 2005 के संशोधन ने इस कानून को मज़बूत बनाया. 2005 के संशोधन के मुताबिक एक महिला को चाहे वह विवाहित हो या अविवाहित अपनी पुश्तैनी जायदाद में बराबर का अधिकार है. हिंदुस्तान की दूसरी बड़ी आबादी वाले धर्म की बात करें तो इस्लाम के मुताबिक क्योंकि एक महिला को शादी में हक़ मेहर की रकम मिलती है तो इसलिए पुश्तैनी जायदाद में उसे सिर्फ आधा हिस्सा मिलता है.</div>
<div dir="auto" style="text-align: justify;"></div>
<div dir="auto" style="text-align: justify;"><strong>यह भी पढ़े-</strong> <a href="https://ravivarvichar.in/kahaniyan/shg-women-doing-terracotta-art">वो मिट्टी है, कभी मिट नहीं सकती !</a></div>
<h2 dir="auto" style="text-align: justify;">Inheritance Law का हक है लेकिन सिर्फ कागज़ पर !</h2>
<div dir="auto" style="text-align: justify;">यह है मोटे-मोटे दो Inheritance Law यानी विरासती कानून की बात. अब देखिए यह कानून कागज़ पर तो है, इसका मतलब कि भारत का कानून भारत का संविधान महिलाओं को पुश्तैनी जायदाद में अधिकार देता है. लेकिन समाज की अगर बात करें तो क्या ज़मीन पर महिलाओं को उनका यह अधिकार मिल रहा है?</div>
<div dir="auto" style="text-align: justify;"></div>
<div dir="auto" style="text-align: justify;">अपने आसपास नज़र घुमा कर देखिएगा, अपने परिवार में, अपने मोहल्ले में, अपने गांव/शहर में. समाज में चलन है कि "जी हमने अपनी बेटी की परवरिश में खर्च कर दिया, उसकी शादी में खर्च कर दिया तो ऐसे में जायदाद बेटे के नाम पर होनी चाहिए." गावों में एक बड़ा चलन यह है कि पुरुष अपनी विवाहित बहनों से एक कागज़ पर उनकी मर्ज़ी से दस्तख़त करवाते हैं जिसमें महिलाएं अपनी इच्छा से अपनी पुश्तैनी ज़मीन छोड़ देती हैं.&nbsp;इस प्रथा का आधार यह है कि क्योंकि महिला की परवरिश और शादी में खर्च हो गया है इसलिए ज़मीन का अधिकार बेटे को मिलना चाहिए.</div>
<div dir="auto"><img alt="hindu succession act for daughters" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/600x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/SpTCMw5LjFbzzeAuUpo6.PNG" style="width: 600px;" class="center"></div>
<div dir="auto" class="center"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image credits: Legalogy</em></span></div>
<div dir="auto" style="text-align: justify;"></div>
<div dir="auto" style="text-align: justify;">अब आप यह सोचिए कि औसतन शादी का खर्चा ज़मीन की कीमत से बहुत कम होता है. ज़मीन कीमत में बढ़ती जाती है और साथ ही अगर ज़मीन खेती की हो तो उससे कुछ ना कुछ आय भी लगातार निकलती रहती है. तो जितना सीधा इस मामले को समाज मान के चलता है उतना यह है नहीं. और यह जो चलन है वह किसी भी तरीके से महिलाओं को बराबरी का अधिकार नहीं देता, ज़मीन जायदाद में सही हिस्सा नहीं देता. और इसका सीधा-सीधा असर उनकी आर्थिक स्वतंत्रता पर पड़ता है.</div>
<div dir="auto" style="text-align: justify;"></div>
<div dir="auto" style="text-align: justify;">यह भी पढ़े- <a href="https://ravivarvichar.in/khabar/finance-minister-nirmala-sitharaman-announced-this-years-budget-today-and-said-we-aim-to-make-3-crore-lakhpati-didis-this-year-2469813">"अब 3 करोड़ महिलाएं बनेंगी लखपति"- Finance minster Nirmala Sitharaman</a></div>
<h2 dir="auto" style="text-align: justify;">मां और पत्नी के अधिकार कहां ?</h2>
<div dir="auto" style="text-align: justify;">अब यह तो हो गई समाज में एक बेटी के अधिकारों की बात. हम अगर एक पत्नी के अधिकार की, एक मां के अधिकार की बात करें तो स्थिति वहां पर और भी ज़्यादा डावांडोल है. इसलिए यह मामले अक्सर कोर्ट पहुंच जाते हैं. पिछले साल की ही बात है, <strong>मद्रास हाई कोर्ट</strong> ने एक बहुत महत्वपूर्ण फैसला दिया था. एक पुरुष ने मद्रास हाई कोर्ट में अर्ज़ी लगाई थी कि जो भी उसने अपनी शादी के बाद कमाया कमाया है उस पर पूरा का पूरा अधिकार उसका है, उसकी पत्नी का उस पूंजी पर कोई हक नहीं बनता.</div>
<div dir="auto"><img alt="The Hindu Succession Act" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/600x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/15aSUF0mLeQ4gI7i4S0y.webp" style="width: 600px;" class="center"></div>
<div dir="auto" class="center"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image credits: The Jaipur Dialouges</em></span></div>
<div dir="auto" style="text-align: justify;"></div>
<div dir="auto" style="text-align: justify;">कोर्ट ने फैसला दिया कि क्योंकि उसकी पत्नी घर पर रहकर घर संभाल रही थी इसी वजह से वह पूरी तरह से हर फ़िक्र से आज़ाद होकर काम कर पाया और उस पूंजी को कमा पाया. तो ऐसे में उस पूंजी पर उसकी पत्नी का भी अधिकार है. यह एक महत्वपूर्ण फैसला था क्योंकि जैसा कि हमने कहा कि जब बात पत्नी या मां की आती है तब समाज में प्रचलित चलन के चलते महिलाओं को और ज़्यादा नुकसान उठाना पड़ता है.</div>
<div dir="auto" style="text-align: justify;"></div>
<div dir="auto" style="text-align: justify;">अब ज़रूरी यह है कि कागज़ पर जो अधिकार औरतों को है, कानून उन्हें जो समानता दे रहा है वह ज़मीनी हकीकत भी बने. औरतों को Inheritance Law के मुताबिक अपनी पुश्तैनी जायदाद में हिस्सा मिले, अपने पति की पूंजी में हिस्सा मिले और समाज में प्रचलित अलग-अलग चलन उन्हें उनके अधिकारों से वंचित न करें.</div>
<div dir="auto" style="text-align: justify;"></div>
<div dir="auto" style="text-align: justify;">इसका इलाज सिर्फ़ और सिर्फ़ जागरूकता ही है. महिलाओं को सबसे पहले यह समझना होगा कि अपने हक की ज़मीन जायदाद उनके लिए कितनी मददगार साबित होगी और उनकी शादी में हुआ खर्च अक्सर उस ज़मीन की कीमत का एक बहुत छोटा हिस्सा होता है. शादी के बाद भी अलग-अलग रस्मो रिवाज के मुताबिक मायके वाले एक महिला के ससुराल वालों पर जो खर्चा करते हैं, वह सभी खर्च मिलकर भी एक ज़मीन की कीमत और उससे होने वाली आय की बराबरी नहीं करते. इस वक्त सिर्फ़ और सिर्फ़ जागरूकता ही ज़मीन जायदाद से जुड़े मुद्दों में महिलाओं को बराबरी का स्थान दिला सकती है.</div>
<div dir="auto" style="text-align: justify;"></div>
<div dir="auto" style="text-align: justify;">यह भी पढ़े- <a href="https://ravivarvichar.in/nazariya/the-union-interim-budget-2024-is-likely-to-support-and-promote-women-entrepreneurship-in-india-the-budget-will-be-presented-by-the-current-finance-minister-nirmala-sitharaman-the-budget-will-likely-discuss-about-women-oriented-schemes-and-programs-2409309">Women entrepreneurship को बढ़ावा देगा Budget 2024</a></div>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मैत्री </dc:creator><pubDate>Wed, 07 Feb 2024 13:08:21 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/according-to-inheritance-law-of-different-religions-women-are-given-equal-rights-to-own-their-family-land-3624723]]></guid><category><![CDATA[एक्सपर्ट विचार]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/0rOnZ7bBVslMLH8YUyZl.png" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/0rOnZ7bBVslMLH8YUyZl.png"/></item><item><title><![CDATA[पीरियड लीव, क्यों नहीं! ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/women-should-be-allowed-to-take-period-leave-2402847</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/xXWstzsoCy0sJVUbxmWd.jpg"><p style="text-align: justify;"><span>आज का जो विषय है उसमें आपको लग सकता है कि अब तक जितनी बातें हमने की हैं उसे कहीं ना कहीं काटा जा रहा है. लेकिन पढ़ते रहिएगा, क्योंकि ऐसा है नहीं. आज हम बात करेंगे 'Period leave' यानी कि माहवारी की छुट्टी की. पिछले कुछ वक्त से इस मुद्दे पर बातचीत शुरू है कि दफ़्तर और बाकी काम करने की जगहों पर महिलाओं को Period leave मिलनी चाहिए या नहीं. और इसका जवाब हां होना चाहिए. </span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>अब आप यह कहेंगे कि जी अब तक आप नारीवाद की बातें कर रही थीं, महिला पुरुष की बराबरी की बात कर रही थीं, तो अब महिलाओं को यह स्पेशल ट्रीटमेंट देने की दलील क्यों? यह बात कई लोगों के मन में होती है, कई लोग कहते-पूछते भी हैं. देखिए इसके लिए सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि बराबरी और समानता यानि कि 'इक्वॉलिटी' और 'सिमीलेरिटी' में फ़र्क होता है.</span></p>
<h2 style="text-align: justify;"><span>Period leave शारीरिक आराम की ज़रूरत है!</span></h2>
<p style="text-align: justify;"><span>महिलाएं पुरुष के बराबर हैं, यह एक तथ्य है, यह एक सच है. और इसी बराबरी के होने, बराबरी बनी रहने और जिन क्षेत्रों में बराबरी नहीं मिलती, वहां इस बराबरी के पीछे संघर्ष करने को ही नारीवाद कहा जाता है. लेकिन जब समानता की बात करें तो, क्योंकि एक महिला और एक पुरुष के शरीर की बनावट अलग-अलग होती है, तो एक महिला और एक पुरुष एक जैसे नहीं होते. अब इसमें कई जगहों पर कुछ आसानियां पुरुषों के लिए बनाई जाती हैं, जो कि दरअसल सदियों से बनाई जाती आ रही हैं.</span></p>
<p><span><img alt="period leave importance" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/600x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/6PlK8y7T3w8WDb9qF7R4.webp" style="width: 600px;" class="center"></span></p>
<p class="center"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image credits: The washigton post</em></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>दुनियाभर में पूरा का पूरा सिस्टम पुरुषों को आरामदायक रखने के लिए ही है. हमेशा से था. तो ऐसे में अगर महिलाओं को थोड़ा सा शारीरिक आराम देने के लिए अगर एक या दो दिन की छुट्टी मिल जाए तो वह किसी पर कोई अत्याचार नहीं होगा. अब चलते हैं बाकी तर्कों की तरफ़. आपने कई महिलाओं से भी सुना होगा, ख़ासकर उन महिलाओं से जो उम्र में थोड़ी सी ज़्यादा हैं. वह कहती हैं कि जी हमारे वक्त पर तो हमें कोई माहवारी की छुट्टी, <a href="https://ravivarvichar.in/smriti-irani-says-menstruation-is-not-handicap-no-need-for-paid-leaves-for-a-natural-process">Period leave</a> नहीं मिली, हमने तो सही तरीके से अपना काम कर लिया, आज की महिलाओं को क्यों इसकी ज़रूरत है. </span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>अब इसमें भी एक बात ध्यान रखिए. आप किसी भी गाइनेकोलॉजिस्ट से बात करेंगे तो वह आपको समझाएंगे कि आज के वक्त में ज़्यादातर महिलाओं के <a href="https://ravivarvichar.in/web-story/period-leave-yes-or-no">menstrual cycle</a> की जो स्थिति है, या जो समस्याएं उन्हें झेलनी पड़ती हैं, वह आज से कुछ साल पहले महिलाओं को उस स्तर पर नहीं झेलनी पड़ती थी. अब उसकी वजह कुछ भी हो सकती है, दिनचर्या में आए हुए परिवर्तन समझ लीजिए या रोज़मर्रा का बढ़ता हुआ स्ट्रेस समझ लीजिए. </span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>अभी तक विशेषज्ञ इसकी वजह साफ़ नहीं बता पाए हैं. लेकिन सच यह है कि महिलाओं के menstrual cycle से जुड़ी हुई बीमारियां या फिर समस्याएं पहले के मुकाबले बहुत ज़्यादा बढ़ गई हैं. पीसीओएस और पीसीओडी जैसी समस्याएं तो 50% से ज्यादा महिलाओं को हैं. और जो इन समस्याओं से ग्रसित हैं, वह जानते हैं कि इनकी वजह से माहवारी के दिन बेहद तकलीफ से भरे हुए होते हैं. तो ऐसे में एक दिन की छुट्टी या जहां जरूरत हो 2 दिन की छुट्टी देने से किसी का नुकसान नहीं हो जाएगा.</span></p>
<p><span><img alt="period leave in india" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/600x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/76mxYmLrv52LCKqEkZ8w.jpg" style="width: 600px;" class="center"></span></p>
<p class="center"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image credits: Onmanorama</em></span></p>
<h2 style="text-align: justify;"><span>Period leave देने से नहीं होगा आर्थिक नुक्सान!&nbsp;</span></h2>
<p style="text-align: justify;"><span>दुनिया भर में कई सारी रिसर्च, कई सारे अध्ययन इस बात को साबित कर चुके हैं कि महिलाएं अपने काम के प्रति पूरी तरह से समर्पित होती हैं और ईमानदारी से अपना काम करती हैं. तो जो लोग इस बात से डरे हुए हैं कि इस तरह की छुट्टियां देने से दफ़्तरों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ जाएगा, तो ऐसा भी नहीं है. और इसके अलावा आप इस बात को ऐसे भी समझ सकते हैं, आप यह देखिए की कोई एक शख्स है जो दफ़्तर जाता है और कभी चाय पीने के नाम पर, कभी सिगरेट पीने के नाम पर, कभी फोन कॉल करने के नाम पर, एक दिन में कितने ऐसे घंटे दफ़्तर में बिताता है जब वह प्रोडक्टिव नहीं होता. </span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>तो ऐसे में अगर एक महिला उन दिनों में, जब वह तकलीफ से गुज़र रही हो, अगर एक छुट्टी ले ले तो वह कोई बुरी बात नहीं है. अब इसमें हो सकता है कि कुछ महिलाएं आपसे कहें कि जी हमें तो एकदम ठीक लगता है, हमें तो ज़रूरत नहीं है. तो उस बात को भी सुनिए, क्योंकि जैसा कि हमने शुरुआत में कहा, हर किसी के शरीर की बनावट अलग-अलग है, तो हर किसी का तजुर्बा माहवारी के दिनों में अलग-अलग होता है. किसी को दर्द होता है, किसी को नहीं होता.</span></p>
<p><span><img alt="period leave yes or no" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/600x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/f2CWbVFP68eVGJ3vIomV.jpg" style="width: 600px;" class="center"></span></p>
<p class="center"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image credits: The telegraph india</em></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>तो जिन्हें नहीं होता और जिन्हें छुट्टी की ज़रूरत नहीं है, तो उन्हें यह विकल्प दिया जाए कि वह चाहें तो छुट्टी के लिए मना कर सकती हैं. और अपने काम को सुचारू रूप से जारी रख सकती हैं. लेकिन जो तकलीफ में है, उन्हें छुट्टी देना कहीं से कहीं तक ना तो नुकसानदायक है और ना ही गलत. और अगर कोई ऐसा सोच रहा हो कि इससे हम यह संदेश देंगें कि महिलाएं उन दिनों में कमज़ोर हैं, तो सच मानिए कि यह एक कुतर्क से ज़्यादा और कुछ नहीं. क्योंकि जब एक पुरुष बीमार होता है, बुखार हो, पेट खराब हो, शरीर में दर्द हो या कोई भी और बीमारी हो, तो हम उसे यह नहीं कहेंगे कि चाहे जो हो जाए तुम्हें हर हालत में दफ़्तर जाकर काम करना ही होगा. </span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>एक दर्द झेल रहे इंसान को यह कहना सही नहीं. तो हम महिलाओं से क्यों यह अपेक्षा रखते हैं कि चाहे वह कितने भी दर्द में हों, उन्हें अपना काम बस करते रहना चाहिए. इस बारे में सोचिएगा. अपनी आधी आबादी को महीने में एक दिन का आराम देना इतनी बड़ी बात भी नहीं होनी चाहिए. मैं नारीवादी लोगों को भी आश्वस्त करना चाहूंगी कि इससे समाज में महिलाओं की स्थिति कमज़ोर नहीं होगी. एक स्वस्थ समाज वही है जो सहानुभूति के आधार पर खड़ा हो. तो लेने दीजिए महिलाओं को वह एक दिन की छुट्टी और यकीन मानिए कि उस एक दिन की छुट्टी का बदला वह बाकी के दिनों में काम करके पूरी तरह से चुका देंगी.</span></p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मैत्री </dc:creator><pubDate>Sat, 27 Jan 2024 12:13:37 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/women-should-be-allowed-to-take-period-leave-2402847]]></guid><category><![CDATA[एक्सपर्ट विचार]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/xXWstzsoCy0sJVUbxmWd.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/xXWstzsoCy0sJVUbxmWd.jpg"/></item><item><title><![CDATA[नाशिक, प्याज और महिलाएं... ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/women-of-nashik-maharashtra-are-closely-related-to-onion-farming-2393423</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/DymlFTKriUJQqU2rZPkJ.jpg"><p style="text-align: justify;"><span>Nashik का नाम सुनते ही सबसे पहले मन में ख्याल आता है किसानों का और प्याज का. Nashik भारत के सबसे बड़े प्याज उत्पादक इलाकों में से है. वैसे तो यहां पर अंगूर की खेती भी बहुत होती है लेकिन अक्सर Nashik प्यास की वजह से सुर्खियों में रहता है. पिछले दो साल Nashik के प्याज किसानों के लिए मुश्किल भरे रहे. खासकर की 2023.</span></p>
<h2 style="text-align: justify;"><span>पिछले साल की शुरूआत प्याज किसानों के लिए अशुभ</span></h2>
<p style="text-align: justify;"><span>पिछले साल की शुरुआत किसानों के लिए बहुत शुभ साबित नहीं हुई. फरवरी में ही तापमान अमूमन से ज्यादा बढ़ने लगा. प्याज किसानों (Nashik women onion farming) को लगा कि उनकी तैयार फसल बढे हुए तापमान के चलते खराब हो जाएगी तो ऐसे में उन्होंने उस फसल को बाज़ार में ठीक उसी वक्त उतार दिया जब लाल प्याज और खरीफ की फसल बाजार में आई थी. बंपर सप्लाई के चलते दाम बुरी तरह से गिर गए. इसके बाद मार्च के महीने में बरसात हुई और ओले पड़े. यह सिलसिला अप्रैल में भी जारी रहा. इससे प्याज की अगली फसल भी खराब हो गई. बची हुई कसर एक पूरी तरह से सूखे अगस्त ने निकाल दी.</span></p>
<p><span><img alt="women in nashik onion farming" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/600x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/QxGgVmd80JoWyu3GindK.webp" style="width: 600px;" class="center"></span></p>
<p class="center"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image credits: News click</em></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>प्याज किसान अभी पहले के नुकसान से संभले भी नहीं थे कि नवंबर और दिसंबर में फिर से हुई बारिश और ओलावृष्टि ने एक बार फिर उनकी प्याज की अगली फसल को खराब कर दिया. इन उतार-चढ़ाव के चलते एक बार अगस्त और एक बार दिसंबर में प्याज के दाम ज़रा से ऊपर हुए. टमाटर के ऊंचे दामों की वजह से आलोचना झेल रही सरकार ने प्याज के दाम ज़रा से बढ़ते ही <strong>अगस्त में प्याज पर 40% निर्यात ड्यूटी</strong> लगा दी.</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>यह भी पढ़े- <a href="https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/women-get-less-pay-for-the-same-work-as-men-in-jobs-2383572" rel="dofollow">मेहनत वाही मेहनताना नहीं !</a></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>बाद में दिसंबर में निर्यात को 31 मार्च 2024 तक के लिए प्रतिबंधित कर दिया. ऐसे में प्याज के दाम एक बार फ़िर से गिर गए. और किसानों के साथ-साथ व्यापारियों को भी नुकसान झेलना पड़ा. नुकसान का सिलसिला अब भी जारी है. विशेषज्ञों का कहना है कि निर्यात में लगे इन प्रतिबंधों के कारण प्याज की खेती और निर्यात से जुड़े लोगों को 10,000 करोड रुपए तक का नुकसान उठाना पड़ जाएगा.</span></p>
<h2 style="text-align: justify;"><span>Nashik की महिलाओं का प्याज से गहरा connection</span></h2>
<p style="text-align: justify;"><span>अब आप सोच रहे होंगे कि Nashik और प्याज का महिलाओं से क्या कनेक्शन. देखिए जब भी अपने Nashik या प्याज से जुड़ी हुई खबरें टीवी पर देखी होंगी, अखबारों में पढ़ी होंगी, आपने खेतों में, मंडी में, दुखी और पीड़ित किसान देखे होंगे. लेकिन एक बहुत बड़ा तबका जो कि प्याज की खेती को इस बड़े स्तर पर अंजाम देता है, वह हैं Nashik की महिलाएं, जिनका ज़िक्र अक्सर नहीं होता. </span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>Nashik के खेतों में आपको महिलाएं साल भर काम करती हुईं दिखाई देंगी. कुछ अपने खेतों में काम करती हैं तो कुछ दूसरों के खेतों में मज़दूरी करती हैं. प्याज की रोपाई से लेकर कटाई तक साल भर काम जारी ही रहता है और महिलाओं का काम सिर्फ खेती तक ही सीमित नहीं रहता. निर्यात के लिए जो माल महाराष्ट्र और देश से बाहर जाता है उसको भी तैयार करने में महिला मज़दूरों का बड़ा हाथ रहता है.</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>यह भी पढ़े- <a href="https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/the-resolution-of-new-year-should-be-redefining-the-definition-of-chivalry-2320262">नए साल की नहीं शुरुआत Chivalry के साथ</a></span></p>
<p><span><img alt="women in nashik onion farming" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/600x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/NfOxm7HU3jx3mjMDLyI2.webp" style="width: 600px;" class="center"></span></p>
<p class="center"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image credits: The economic times</em></span></p>
<h2 style="text-align: justify;"><span>Nashik से प्याज export में 50 % महिलाएं</span></h2>
<p style="text-align: justify;"><span>Nashik के व्यापारियों के मुताबिक एक्सपोर्ट का माल तैयार करने के लिए हर सीज़न में <strong>20 से 25 लाख</strong> मज़दूरों की जरूरत पड़ती है. इनमें से <strong>50% से ज़्यादा महिलाएं</strong> होती हैं. ये महिलाएं Nashik के ही गांवों से होती हैं. प्याज के व्यापार में महिला किसानों और महिला मज़दूरों का योगदान बहुत बड़ा रहता है लेकिन अक्सर उनके इस योगदान की चर्चा नहीं होती. प्याज की स्थिति या फ़सल जब भी ख़राब होती है, या दाम गिरते हैं, तो इन महिलाओं का क्या होता है, उन पर किस तरह का प्रभाव पड़ता है, उनका कितना आर्थिक नुकसान होता है, इस बात की भी चर्चा कहीं नहीं होती. </span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>Nashik के <strong>निफाड़ इलाके</strong> की 25 साल की कल्याणी सुनीलवाकर बताती हैं कि <em>वह मंडी में आए प्याज को सॉर्ट करती हैं, उस प्याज को पैकेजिंग बॉक्स में डालती हैं, और लेबलिंग करती हैं</em>. अब इस निर्यात बंदी के बाद जो प्याज Nashik से बाहर जाना था, महाराष्ट्र से बाहर जाना था, उसका काम तो है लेकिन क्योंकि देश से बाहर जाने वाले प्याज पर प्रतिबंध लगा दिया गया है तो निर्यात का काम नहीं है. </span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>ऐसे में इसका प्रभाव कल्याणी को मिलने वाली मज़दूरी पर पड़ रहा है. मज़दूरी के दिन कम हो गए हैं. कल्याणी की तरह और बहुत सारी महिलाएं हैं जिनकी मज़दूरी पर प्रभाव पड़ा है और सिर्फ़ निर्यात के काम पर ही नहीं, खेतों की मज़दूरी के काम पर भी प्रभाव पड़ा है. पिछले कुछ वक्त से प्याज ने जिस तरह से Nashik के किसानों को रुलाया है, हर मौसम के साथ प्याज लगाने वाले किसान और उनके द्वारा प्याज उगाने की मात्रा कम होती जा रही है.</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>यह भी पढ़े- <a href="https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/self-help-groups-promoting-women-empowerment-and-feminism-in-rural-india-2036313">भरतीय नारीवाद और ग्रामीण भारत</a></span></p>
<p><span><img alt="women nashik onion farming" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/600x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/RFQCRMC2XnwyA29Fdfgn.jpg" style="width: 600px;" class="center"></span></p>
<p class="center"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image credits: Hindustan times</em></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>इसका मतलब कि उन्हें अब पहले की तरह मज़दूरों की ज़रूरत नहीं पड़ती. तो पहले के मुकाबले अब महिला मज़दूरों को कम काम मिलता है. इस इलाके में बाकी की फ़सलें इस कमी को पूरा इसलिए नहीं कर सकती क्योंकि जिस तरह की मज़दूरी की ज़रूरत प्याज की खेती में पड़ती है, उतनी बाकी फसलों के लिए नहीं पड़ती. </span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>हां, अंगूर की फ़सल से थोड़ा बहुत सहारा ज़रूर मिलता है, लेकिन मौसम की मार से पिछले दो-तीन साल से अंगूर भी अछूते नहीं रहे हैं. तो ऐसे में खराब अंगूरों का निर्यात भी ठीक तरह से नहीं हो पाता और उस निर्यात से जुड़ा हुआ काम भी महिला मजदूरों को कम मिलता है. </span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>यह थोड़ा चिंताजनक इसलिए भी है क्योंकि पहले इन महिलाओं को अपने घर के आसपास ही जो काम मिल जाता था अब उसकी तलाश में कुछ महिलाओं को बाहर जाना पड़ता है, दूर जाना पड़ता है और यह बात शहरों की ओर हो रहे ग्रामीण निकास को और ज़्यादा बढ़ाती है. यह तो थी समस्या. समाधान की बात करें तो इसका समाधान सरकारी नीतियों में है और वक्त के तकाज़े को समझ कर मौसम में हो रहे परिवर्तन को ध्यान में रखकर खेती करने में है. क्योंकि अगर प्याज की खेती संभालेगी तो उस पर निर्भर महिलाओं की आय का स्रोत भी संभला हुआ रहेगा.</span></p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मैत्री </dc:creator><pubDate>Sat, 20 Jan 2024 13:33:35 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/women-of-nashik-maharashtra-are-closely-related-to-onion-farming-2393423]]></guid><category><![CDATA[एक्सपर्ट विचार]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/DymlFTKriUJQqU2rZPkJ.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/DymlFTKriUJQqU2rZPkJ.jpg"/></item><item><title><![CDATA[मेहनत वही, मेहनताना नहीं... ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/women-get-less-pay-for-the-same-work-as-men-in-jobs-2383572</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/HonRCSji9LCIltHWUju7.jpg"><div dir="auto" style="text-align: justify;">चलिए आज आपको एक काल्पनिक दुनिया में ले जाया जाए. आप एक दफ़्तर में काम करते हैं. आपकी टीम में एक और शख्स भी है. आप दोनों की जिम्मेदारियां, दफ़्तर से आने जाने का वक्त, आप दोनों का पद, आप दोनों की मेहनत और आप दोनों के काम के नतीजे, सब एकदम समान है. लेकिन फिर भी आपको उससे कम पैसे मिलते हैं. आपको पता नहीं क्यों, बस कम मिलते हैं. कैसा लगेगा आपको? गुस्सा आएगा, बुरा लगेगा, कमतर महसूस होगा, काम करने की प्रेरणा कम होती जाएगी. ऐसा ही कुछ होगा ना!</div>
<h2 dir="auto" style="text-align: justify;">दुनिया में Gender Pay Gap है बड़ी समस्या!</h2>
<div dir="auto" style="text-align: justify;">अब यह तो थी काल्पनिक दुनिया. चलिए आते हैं असल जिंदगी पर क्योंकि असल जिंदगी में ऐसा हो रहा है. पूरी दुनिया में एक काम को उतने ही समय में, उतने ही अच्छे से करने पर भी महिलाओं को पुरुषों से कम मेहनताना दिया जाता है. इस 'Gender Pay Gap' यानि कि <strong>मेहनताने में होने वाला भेदभाव</strong> कहा जाता है और लगभग पूरी दुनिया में यह बीमारी फैली हुई है. एक बार फिर से समझते हैं क्या होता है यह जेंडर पे गैप. एक ही काम को करने के लिए महिलाओं को पुरुषों से कम पैसे देना, इसे <a href="https://ravivarvichar.in/nazariya/gender-pay-gap-in-india">Gender Pay Gap</a> कहा जाता है. और हर तरह के काम में मेहनताने का यह भेदभाव देखा जा सकता है.</div>
<div dir="auto"><img alt="gender pay gap" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/600x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/ybthgQLGVzWNzqFF7U7D.webp" style="width: 600px;" class="center"></div>
<div dir="auto" class="center"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: Forbes</em></span></div>
<div dir="auto" style="text-align: justify;"></div>
<div dir="auto" style="text-align: justify;"><strong>2018 में इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन</strong> के एक अध्ययन में यह बात सामने आई थी कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं को वही काम करने के लिए, उसी तरीके से करने के लिए, और उसी नतीजे के साथ करने के लिए जो कि पुरुष करते हैं, पुरुषों के मुकाबले <strong>20% कम पैसे</strong> मिलते हैं. यानी कि अगर एक पुरुष को एक काम करने के ₹100 मिल रहे हैं तो उसी काम को, उतने ही वक्त में, उतने ही अच्छे तरीके से करने के बावजूद भी एक महिला को सिर्फ ₹80 ही मिलेंगे.</div>
<h2 dir="auto" style="text-align: justify;">मजदूरी में भी शारीरिक बनावट पर किये जाते है भेदभाव</h2>
<div dir="auto" style="text-align: justify;">यह फ़र्क सिर्फ एक दफ़्तर में नहीं होता है. अगर भारत की बात करें तो खेती से लेकर बाकी मज़दूरी के कामों में एक पुरुष मज़दूर और एक महिला मज़दूर की कमाई अलग-अलग होती है. अब इसमें कई लोग यह तर्क देते हैं कि क्योंकि पुरुष और महिला के शरीर की बनावट अलग-अलग होती है, शारीरिक मेहनत का काम पुरुष महिलाओं के मुकाबले ज़्यादा कर पाते हैं. लेकिन यह तथ्य पूरी तरह सही नहीं है क्योंकि मज़दूरी से 8 जुड़े उन कामों में भी एक लक्ष्य तय कर दिया जाता है और दिन भर में वह काम चाहे वह महिला कारीगर हो चाहे पुरुष कारीगर हो, उन्हें करना पड़ता है. तो ऐसे में कहीं से कहीं तक यह बात सामने नहीं आती कि पुरुष अपने शरीर की बनावट की वजह से मज़दूरी का यानी कि शारीरिक मेहनत का काम महिलाओं से ज़्यादा बेहतर करते हैं.</div>
<div dir="auto" style="text-align: justify;"></div>
<div dir="auto" style="text-align: justify;">अब बात करते हैं कि दफ़्तरों में क्या हो रहा है. भारत की ही बात करते हैं. <strong>2022 में IIM अहमदाबाद की एक स्टडी</strong> में यह बात सामने आई थी कि दफ़्तरों में हर एक स्तर पर, हर एक पद में, महिलाएं पुरुषों के मुकाबले कम पैसे कमा रहीं हैं. यानी कि उन्हें पुरुषों के बराबर और पुरुषों के जैसा और कई बार पुरुषों से बेहतर काम करने के बावजूद भी पुरुषों के मुकाबले कम पैसा दिया जा रहा है.</div>
<div dir="auto" style="text-align: justify;"><img alt="pay parity" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/681x382/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/uyClSWvdplwMIhOZe1dI.png" style="width: 681px;"></div>
<div dir="auto" class="center"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: Vantage circle blog</em></span></div>
<div dir="auto" style="text-align: justify;"></div>
<div dir="auto" style="text-align: justify;">यही है Gender Pay Gap, <strong>मेहनताने में होने वाला भेदभाव</strong>. यहां तक की बड़ी-बड़ी कंपनियों के बोर्ड पर बैठने वाली महिलाओं को भी अपने पुरुष काउंटरपार्ट के मुकाबले बहुत कम पैसे दिए जाते हैं. और दफ़्तरों में क्यों यह भेदभाव होता है जहां पर तो शारीरिक मेहनत की भी कोई भूमिका नहीं है, उसका जवाब किसी के पास नहीं है. उसकी वजह है, लेकिन जवाब नहीं.</div>
<div dir="auto" style="text-align: justify;"></div>
<div dir="auto" style="text-align: justify;">जिस तरह का समाज का ढांचा है, और जिस तरह से धीरे-धीरे वर्कफोर्स में से महिलाएं कभी शादी की वजह से, कभी बच्चों की वजह से, कभी अपने पति की पोस्टिंग दूसरे शहरों में हो जाने की वजह से, धीरे-धीरे कम होती जाती हैं. तो ऊपर के स्तर तक आते-आते केवल मुट्ठी भर महिलाएं रह जाती हैं. ऐसे में महिलाओं को कितने पैसे दिए जाएंगे यह फैसला पुरुष ही करते हैं. और दिखाई दे भी रहा है कि यह फैसला जहां पर महिलाओं को कम पैसे दिए जा रहें हैं, यह पुरुष ही कर रहे हैं.</div>
<h2 dir="auto" style="text-align: justify;">Bollywood में Pay Disparity है सबसे बड़ी समस्या</h2>
<div dir="auto" style="text-align: justify;">भारत की बात हो और बॉलीवुड की बात ना हो यह कैसे हो सकता है. यह <a href="https://ravivarvichar.in/nazariya/gender-should-not-be-the-deciding-factor-of-the-pay-scales-in-bollywood-industry">pay gap bollywood</a> में भी उतनी ही बुरी तरीके से फैला हुआ है, शायद उससे भी ज़्यादा ख़राब तरीके से. हाल ही में एक राउंड टेबल बातचीत में बॉलीवुड अदाकार <strong>भूमि पेडणेकर, <a href="https://ravivarvichar.in/photovideo/huma-qureshi-silencing-the-bodyshamers-with-success">हुमा कुरैशी</a>, रकुल प्रीत</strong> और बाकी कलाकारों ने एक बातचीत में यह बताया कि उन्हें अक्सर एक फिल्म में एक हीरो को जो पैसे मिलते हैं उसके <strong>सिर्फ एक प्रतिशत पैसे मिलते हैं</strong>. सोचिए महज़ एक प्रतिशत!</div>
<div dir="auto" style="text-align: justify;"></div>
<div dir="auto" style="text-align: justify;">इसके अलावा चाहे प्रियंका चोपड़ा हो चाहे कंगना रणावत हो सोनम कपूर हो अनुष्का शर्मा यहां तक की दीपिका पादुकोण ने भी बॉलीवुड फिल्म इंडस्ट्री, हिंदी सिनेमा में किस तरह से महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले बहुत कम पैसे दिए जाते हैं इस पर अपनी बात रखी है.</div>
<div dir="auto" style="text-align: justify;"></div>
<div dir="auto" style="text-align: justify;">अब सवाल यह है कि कैसे इस भेदभाव को खत्म किया जाए. देखिए सबसे पहले तो इस बात को स्वीकार किया जाए, इस बात को माना जाए कि मेहनताने को लेकर महिलाओं के साथ बहुत भेदभाव होता है. सबसे पहले इस बात को स्वीकार किया जाए कि समस्या है. समाधान उसके बाद ही ढूंढे जा पाएंगे. और जब एक बार इस बात को स्वीकार कर लिया जाए कि यह समस्या है, तब मेहनताने यानी कि सैलरी स्ट्रक्चर्स में पारदर्शिता लाई जाए, ट्रांसपेरेंसी लाई जाए.</div>
<div dir="auto" style="text-align: justify;"></div>
<div dir="auto" style="text-align: justify;">कंपनियों को कहा जाए कि वह अपने सैलरी स्ट्रक्चर को पारदर्शी रखें और हर कर्मचारी को यह जानने का हक़ होना चाहिए, यह जानने कि सुविधा होनी चाहिए कि बाकी लोग एक काम के कितने पैसे बाकी लोग कमा रहे हैं. इसके अलावा ज़रूरत है कि ज़्यादा से ज़्यादा महिलाएं लैडर में ऊपर तक पहुंचे, ऊंचे पदों पर पहुंचें, उसे स्थिति में आएं कि फैसला ले सकें कि एक ही काम को, एक ही तरीके से करने के और समान नतीजे देने के लिए सबको बराबर पैसे मिले. यह सब करने के बाद इस बात की उम्मीद है कि दुनिया भर में महिलाओं के खिलाफ़ हो रहे इस आर्थिक अत्याचार पर कुछ तो लगाम कसी जा सकेगी.</div>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मैत्री </dc:creator><pubDate>Mon, 15 Jan 2024 14:47:54 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/women-get-less-pay-for-the-same-work-as-men-in-jobs-2383572]]></guid><category><![CDATA[एक्सपर्ट विचार]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/HonRCSji9LCIltHWUju7.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/HonRCSji9LCIltHWUju7.jpg"/></item><item><title><![CDATA[नए साल की नई शुरुआत 'Chivalry' के साथ ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/the-resolution-of-new-year-should-be-redefining-the-definition-of-chivalry-2320262</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/zIf6K9fnd8E8hL5Q4BcI.jpg"><p style="text-align: justify;"><span>चलिए 2023 भी निकल गया और 2024 आ गया. एक बार फ़िर एक साल ऐसा लगा जैसे पलक झपकते ही निकल गया. इस वक्त के रुकने ठहरने की इस प्रक्रिया में जैसे कोविड़ का बड़ा हाथ रहा हो. जितना धीमे जितना सरक सरक कर 2020 और 2021 निकला था, 2022 और 2023 उतने ही फराटे से मानो दौड़ सा गया. और अब आया है 2024. </span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>अब क्योंकि नया साल आ गया है तो एक नई शुरुआत तो बनती है. कई सारे लोग ख़ुद से वादे करते हैं जिसे अंग्रेजी में 'resolution' कहा जाता है. कई लोग सोचते हैं कि इस साल सुबह जल्दी उठेंगे, व्यायाम करेंगे, घूमने फिरने ज्यादा जाएंगे, अपनी सेहत पर ध्यान देंगे और भी कई चीज़ें. अब इनमें से लगभग 99% वादे तो जनवरी के पहले या दूसरे हफ़्ते में ही दम तोड़ देते हैं. लेकिन कुछ लोग हैं जो इन बातों को अंत तक निभा ले जाते हैं.</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>यह भी पढ़े- <a href="https://ravivarvichar.in/khabar/all-girls-sainik-school-has-been-inaugurated-be-defense-minister-rajnath-singh-in-mathura-up-2222555">भारत का पहला All girls sainik school शुरू हुआ UP में</a></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>&nbsp;शायद आपने भी अपने आप से कोई वादा किया होगा. कैसा रहेगा कि रविवार के पाठक भी नए साल के उपलक्ष पर एक सामूहिक वादा करें! बहुत सोचा कि क्या हो सकता है यह एक सामूहिक वादा? तो सोचा कि कुछ बहुत ज़्यादा मुश्किल नहीं होना चाहिए. ना तो इसे याद रखना मुश्किल होना चाहिए ना ही कर पाना ज़रा सा बदलाव यहां वहां और नतीजा भरपूर आना चाहिए.</span><span></span></p>
<h2 style="text-align: justify;"><span>नए साल का नया resolution है chivalry को redefine करने का</span></h2>
<p><span><img alt="what is chivalry" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/600x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/LsgqOI5HNnvWIUyKbabG.webp" style="width: 600px;" class="center"></span></p>
<p class="center"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image credits: The Michigan Daily</em></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>चलिए अपने इस साल के 'resolution' के नाम पर हम लोग 'chivalry', यानी कि पुरुषों का महिलाओं के प्रति जो शिष्टाचार है उसे फ़िर से लिखें. पुरानी पड़ चुकी है यह chivalry. बहुत पुराने ज़माने से चली आई है. उस वक्त शायद ठीक रही भी हो लेकिन आज बड़ी अटपटी सी लगती है. अब कैसी दिखती है यह chivalry.</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>यह भी पढ़े- <a href="https://ravivarvichar.in/nazariya/more-women-entrepreneurs-progressing-in-indian-start-up-landscape-2037805">भारत के startup landscape में लगातार आगे बढ़ रहीं women entrepreneurs</a></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>कभी किसी पुरुष ने किसी महिला के लिए गाड़ी का या किसी कमरे का दरवाजा खोल दिया, साथ में खाना खाने गए तो कुर्सी खींच कर महिला को पहले बैठने का आग्रह किया, कहीं साथ में गए तो हर खर्चा खुद ही किया. यह कुछ नमूने हैं, कुछ उदाहरण हैं chivalry के. अब देखिए हो सकता है कि 15वीं और 16वीं शताब्दी में दुनिया के कुछ हिस्सों में कम से कम यह फिट बैठते हों, लेकिन 21वीं सदी में कुछ जंचते नहीं हैं ये तरीके.</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>तो पुरुष ऐसा क्या करें कि वह महिलाओं के प्रति अपने मन में जो आदर है वह दिखा सकें, शिष्टाचार को बनाए रख सकें. इसका भी जवाब है हमारे पास. Chivalry सिर्फ दरवाज़ा खोलने या कुर्सी खींचने का नाम नहीं. शिष्टाचार बिल भर देने से बहुत आगे की चीज़ है. यकीन मानिए महिलाएं अपने लिए ख़ुद दरवाज़ा खोल सकती हैं, कुर्सी खींच कर ख़ुद बैठ सकती हैं और अपना खर्चा ख़ुद उठा सकती हैं. तो ऐसे में कौन से वह तरीके हैं जो इस रूढ़िवादी शिवल्री को रिप्लेस कर सकें.</span></p>
<h2 style="text-align: justify;"><span>ये तरीके करेंगे रुढ़िवादी सोच को रिप्लेस</span></h2>
<p><span><img alt="new year resolution" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/600x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/U7zVwxkCFgHa1lyH8oHH.jpg" style="width: 600px;" class="center"></span></p>
<p class="center"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: The Boston Globe</em></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>बहुत लंबी चौड़ी फहरिस्त नहीं है. जैसा कि मैंने कहा था इरादा है इस रिजॉल्यूशन को बड़ा ही सरल रखने का ताकि किसी को भी निभाने में दिक्कत ना हो. तो अगली बार जब आपको कोई ऐसी बात सुनाई दे जो किसी महिला के आचरण के खिलाफ कहीं जा रही हो तो उसे रोकें. वो chivalry होगी. कहीं किसी महिला का चरित्र हनन होते हुए देखें या सुनें तो आंख बंद कर उस बात पर भरोसा ना करें वह chivalry होगी.</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>यह भी पढ़े- <a href="https://ravivarvichar.in/nazariya/national-rural-livelihood-missions-has-started-women-entrepreneur-financial-empowerment-program-for-empowering-rural-women-in-india-2053727">NRLM का woman entrepreneur financial empowerment program</a></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>कहीं कोई मज़ाक के नाम पर कोई हल्की-फुल्की या ओछी सी बात कहता हुआ सुनाई दे, जिसे 'casual sexism' भी कहा जाता है, वहां अपनी आवाज़ उठाएं, सामने वाले को हो सके तो रोकें, उसे मना करें और समझाएं कि वह क्यों गलत है. और अगर कोई आपकी बात ना समझे तो कम से कम आप उस भद्दे मज़ाक का हिस्सा ना बनें, वह chivalry होगी. अगली बार किसी पीड़िता की कहानी पढ़े या सुनें तो उसे पर अविश्वास ना करें. इसका मतलब यह नहीं है कि हर किसी पर आंख बंद कर भरोसा करना या हर किसी कहानी को सच ही मानना है आपको. </span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>लेकिन पहली ही बार में किसी पीड़िता को बिना किसी सुबूत के झूठा न समझें. बस या ट्रेन में महिलाओं के लिए बैठने के लिए निर्धारित सीट को, बैंक या बाकि जगह महिलाओं की अलग लाइन को पुरुष समाज पर प्रहार न मानें. अगली बार कोई '</span>Feminazi<span>' शब्द इस्तेमाल करता हुआ दिखाई दे तो याद रखें कि 'Feminazi' जैसा कुछ नहीं होता. </span><span>यह शब्द कुछ और नहीं, कुछ कुंठित लोग जो किसी वजह से महिलाओं से कोई बैर रखते हैं या उन्हें बराबरी नहीं देना चाहते, उनके द्वारा फेमिनिज्म यानी कि नारीवाद जैसे एक बहुत ज्यादा ज़रूरी आंदोलन पर एक बहुत ही ओछा प्रहार है. </span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>बस इतना ही करना है. इससे ज़्यादा नहीं! कहा था ना कि इसे सरल रखेंगे. लेकिन इसका परिणाम जो है वह बहुत ज़्यादा गहरा और ठोस होगा. अगर मुट्ठी भर लोग भी इन आदतों में से एक दो आदतों को अपना लेंगे और जनवरी के सिर्फ़ पहले हफ्ते तक ही नहीं, जीवन भर के लिए अपना लेंगे, तो यह एक बहुत बड़ा कदम होगा एक ऐसे समाज के निर्माण की तरफ़ जहां पर आधी आबादी को रोज़मर्रा के जीवन में इन नाइंसाफियों को बर्दाश्त नहीं करना होगा. और यह आपके सहयोग के बिना मुमकिन नहीं. तो चलिए कोशिश करें कि पुरुषों को chivalry की नई परिभाषा बताने में, समझने-समझाने में और पूरा करने में हम सब अपना अपना योगदान देंगे.</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>यह भी पढ़े- <a href="https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/self-help-groups-promoting-women-empowerment-and-feminism-in-rural-india-2036313">भारतीय नारीवाद और ग्रामीण भारत</a></span></p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मैत्री </dc:creator><pubDate>Sat, 06 Jan 2024 13:55:56 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/the-resolution-of-new-year-should-be-redefining-the-definition-of-chivalry-2320262]]></guid><category><![CDATA[एक्सपर्ट विचार]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/zIf6K9fnd8E8hL5Q4BcI.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/zIf6K9fnd8E8hL5Q4BcI.jpg"/></item><item><title><![CDATA[दबदबा था! दबदबा रहा नहीं। ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/the-win-of-brij-bhushan-singh-sounds-like-the-loss-of-every-single-heart-who-felt-female-wrestlers-pain-2056518</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/2cOuDaYVTVYfecD4CGuw.jpg"><p style="text-align: justify;"><span>पिछले कुछ दिनों में आपने कई सारी तस्वीरें देखी होंगी, कई सारे वीडियो देखे होंगे. आपको दिखाई दिए होंगे एक झुंड में खड़े हुए लोग जो एक शख्स को फूल मालाओं से लाद रहे थे, उसकी जय जयकार कर रहे थे, उसके समर्थन में नारे लगा रहे थे और उसकी एक जीत की खुशी में जश्न मना रहे थे. </span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>आपको एक और तस्वीर दिखाई दी होगी. एक मंच पर कुछ लोग बैठे थे, कुछ रोती बिलखती महिलाएं थी और उनका साथ दे रहे लोग थे. अब तक आप शायद समझ गए होंगे कि मैं किस बारे में बात कर रही हूं. जी हां, बिल्कुल सही. बात हो रही है हमारे खिलाड़ियों की, बात हो रही है Brij Bhushan singh की, वह शख्स जिस पर महिला खिलाड़ियों ने यौन शोषण का आरोप लगाया है.</span></p>
<h2 style="text-align: justify;"><span>Wrestling Federation of India के चुनाव में Brij Bhushan Singh की जीत कितनी सही?</span></h2>
<p style="text-align: justify;"><span>देखिए, वैसे तो मामला इस साल की शुरुआत में सामने आ गया था लेकिन क्योंकि हाल ही में Wrestling Federation of India के चुनाव हुए थे और चुनाव के नतीजे चौंकाने वाले तो नहीं लेकिन हताश करने वाले ज़रूर रहे, इसी वजह से यह मामला एक बार फिर राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बना.</span><span></span><span></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>यह ही पढ़े- <a href="https://ravivarvichar.in/nazariya/self-help-groups-in-inda-history-progress-and-development-1708467">भारत में स्वयं सहायता समूह- आरम्भ, उत्थान और विकास</a></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>ज़रा पीछे चल के देखते हैं. दरअसल हुआ यह था कि साल की शुरुआत में भारत के कुछ पहलवानों ने जो कि देश दुनिया में अपने खेल के ज़रिए, अपनी कला के ज़रिए भारत का डंका बज चुके हैं, उन्होंने Wrestling Federation of India के अध्यक्ष पर एक बहुत संगीन आरोप लगाया. महिला पहलवानों ने कहा कि Brij Bhushan singh जो की Wrestling Federation of India में प्रेसिडेंट के पद पर आसीन था, उसने एक लंबे अरसे तक कई मौकों पर कई महिला पहलवानों का यौन शोषण किया.</span></p>
<p><span><img alt="brij bhushan singh news" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/600x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/0PDTdq21GiMdiqpkJRtu.jpg" style="width: 600px;" class="center"></span></p>
<p class="center"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image credits: Mint</em></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>कुछ महिला पहलवानों का कहना था कि पीड़ितों में एक नाबालिक महिला पहलवान भी थी. मामला जल्द ही हर न्यूज़ चैनल की बहस का मुद्दा बन गया. लेकिन उस तरीके से नहीं जैसा आप सोच रहे होंगे. बल्कि सबसे पहली चीज़ जिसकी लोगों ने चर्चा की वह यह थी कि कहीं यह पहलवान, यह खिलाड़ी कोई राजनीति तो नहीं कर रहे. बिना किसी एफआइआर के, बिना किसी मुकदमे के, बिना किसी फैसले के, मानो एक होड़ सी लग गई Brij Bhushan singh को निर्दोष मानने की. </span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>देखिए कोई नहीं कह रहा कि बिना किसी फैसले के किसी को भी गुनहगार साबित किया जाए या माना जाए. लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि बिना किसी पुख़्ता सुबूत के शिकायतकर्ता की भी हर बात को झूठ माना जाए. लेकिन ऐसा लग रहा था मानो हो यही रहा था. ख़ैर, सरकार ने खिलाड़ियों को समझाने बुझाने की कोशिश की. उन्हें सख़्त कार्रवाई करने का आश्वासन दिया और पहलवानों ने अपना विरोध वापस लिया. लेकिन उसके बाद फ़िर से कुछ महीनों बाद भी जब उन्हें समझ में आया कि बात कहीं नहीं जा रही तो उन्होंने एक बार फ़िर विरोध प्रदर्शन शुरू किए.</span><span></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>यह भी पढ़े- <a href="https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/self-help-groups-promoting-women-empowerment-and-feminism-in-rural-india-2036313">भारतीय नारीवाद और ग्रामीण भारत</a></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>आपको वह तस्वीर भी याद ही होगी जब दिल्ली पुलिस ने इन खिलाड़ियों को जंतर मंतर पर विरोध प्रदर्शन करने से रोका था. उन्हें किस तरह से खींचा, किस तरह से घसीटा, ये भी आपने देखा होगा. इनमें महिला-पुरुष सभी शामिल थे. आपको यह भी याद होगा कि किस तरह से रोते बिलखते पहलवानों ने यह इरादा किया कि अपने मेडल जो उन्होंने जीते थे, जो उनके साथ-साथ इस देश की भी शान हैं, उन्हें वह गंगा में बहा देंगे.</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>लेकिन शायद हम में से किसी ने नहीं सोचा होगा कि आगे जो होने वाला था वह और भी ज़्यादा हताश करने वाला होगा. इन सब विरोध प्रदर्शनों के बाद यह फैसला लिया गया कि कुश्ती संघ के चुनाव वापस करवाए जाएंगे. क्योंकि Brij Bhushan singh पर आरोप था कि उसने महिला पहलवानों का यौन शोषण अपनी कुर्सी का फ़ायदा उठाते हुए किया, तो बहुत ज़रूरी था कि Brij Bhushan singh को पद से हटाया जाए और उससे जुड़े हुए या उसके परिवार के किसी भी सदस्य को कुश्ती संघ के चुनाव में हिस्सा न लेने दिया जाए.</span></p>
<p><img alt="sakshi malik news" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/600x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/dgbvyetOwtZ8FsTboINY.jpg" style="width: 600px;" class="center"></p>
<p class="center"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image credits: ABP live</em></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>पर ऐसा हुआ नहीं. कुश्ती संघ के चुनाव में वह लोग जीते जो कि Brij Bhushan singh के वफ़ादार थे. 15 सीटों पर नियुक्ति होनी थी इनमें से 13 सीटें Brij Bhushan singh के लोगों के पास गईं. संघ का नया अध्यक्ष संजय सिंह को बनाया गया जो कि कई सालों से Brij Bhushan singh का खासमखास रहा है. एक बार फ़िर से हताश, क्रोधित रोते-बिलखते खिलाड़ी जनता के बीच पहुंचे. Sakshi Malik ने ऐलान किया कि वह कुश्ती को हमेशा के लिए अलविदा कह रहीं हैं. बजरंग पुनिया से लेकर और कई सारे खिलाड़ियों ने अपने सम्मान भी वापस किए.</span><span></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>यह भी पढ़े- <a href="https://ravivarvichar.in/nazariya/p-nariharan-shares-why-women-are-better-managers-of-money">लाडली बहना- महिलाएं रुपये पैसे की बेहतर प्रबंधक क्यों होती है</a></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>एक तरफ़ यह रोती बिलखती महिला पहलवान थीं और दूसरी तरफ़ फूलमालाओं से ढका हुआ Brij Bhushan singh था जिसने छाती ठोक कर चुनाव के नतीजे आने के बाद कहा कि उसका 'दबदबा था, दबदबा है, और दबदबा रहेगा.' शायद यही वह चीज़ थी जो लोगों के मन में सबसे ज़्यादा चोट कर गई. हम पहले ही कह चुके हैं कि किसी को भी न्यायालय का फैसला आने से पहले गुनहगार नहीं माना जा सकता. लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि इतने संगीन आरोप झेल रहे इंसान को एक हीरो की तरह समाज में ख़ुद को प्रस्तुत करने दिया जाए. </span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>यह अपमान है हमारी न्याय व्यवस्था का है, इस देश की बेटियों का है, उन महिला पहलवानों का और उन सब लोगों का है जिन्होंने किसी भी नाइंसाफी के खिलाफ़ कभी भी आवाज उठाई थी. उस वीभत्स जश्न ने जनता के मन में वह चोट की जिसका असर सरकार भी समझ गई. नतीजा आपके सामने है. नए चुने हुए संघ को सरकार में यह आदेश दिया कि वह अब किसी भी काम को अंजाम नहीं दे सकते. </span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>इंडियन ओलिंपिक एसोसिएशन को आदेश दिए कि अब कुश्ती संघ उनकी निगरानी में काम करेगा. कुछ लोग इसे जीत ज़रूर मान रहे हैं. लेकिन क्या सच में इसे जीत कहा जा सकता है? शायद नहीं. क्योंकि सच बात तो यह है कि यह सब होने दिया गया, इतने संगीन आरोप झेल रहे इंसान के सबसे खास लोगों को वही चुनाव लड़ने दिया गया, वह चुनाव जीतने दिया गया, और उसके बाद उसे जीत की नुमाइश भी इस तरीके से करने का मौका दिया गया.</span></p>
<p><span><img alt="why is sakshi malik retiring from wrestling" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/600x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/ec6JpVIVpXqzwogkNEFR.jpeg" style="width: 600px;" class="center"></span></p>
<p class="center"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image credits: The Federal News</em></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>यह सब ऐसे हुआ मानो महिला पहलवानों द्वारा लगाए गए आप कुछ मायने ही नहीं रखते. भारत सरकार के इस फ़ैसले को एक जीत के तौर पर तो शायद नहीं लेकिन एक राहत के तौर पर ज़रूर देखा जा सकता है. और यह राहत भी कोई छोटी बात नहीं है. ध्यान रखिए यह वह सरकार है जिसने बहुत ज्यादा मौकों पर अपने कदम अपने फैसलों से पीछे नहीं हटाए हैं. तो इस राहत का श्रेय जाता किसे है? </span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>इस राहत का श्रेय जाता है विरोध प्रदर्शन में लगे हुए पहलवानों को, इंसाफ की मांग कर रहीं महिला खिलाड़ियों को और हर उस इंसान को जिसने किसी न किसी तरीके से, चाहे वह सोशल मीडिया पर हो, चाहे नुक्कड़ पर हो, चाहे चाय की टपरी पर हो या अपने परिवार में हो, Brij Bhushan singh के उस वीभत्स जश्न की निंदा की.&nbsp;</span><span>य</span><span>ह राहत नतीजा है उन सभी आवाज़ों का जो एक सुर में यह मांग कर रही थी कि न्याय की सही प्रक्रिया को अंजाम दिया जाए, सुनवाई हो, मुकदमा हो और इंसाफ हो. शुक्र है उस आवाज़ का, इस राहत का कि दबदबा था ज़रूर, पर दबदबा रहा नहीं.</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>यह भी पढ़े- <a href="https://ravivarvichar.in/nazariya/government-increasing-women-participation-women-led-development-and-women-empowerment-by-implementing-women-centric-schemes-in-india-2049502">भारत में इन schemes से बढेगा महिला participation</a></span></p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मैत्री </dc:creator><pubDate>Sat, 30 Dec 2023 10:30:39 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/the-win-of-brij-bhushan-singh-sounds-like-the-loss-of-every-single-heart-who-felt-female-wrestlers-pain-2056518]]></guid><category><![CDATA[एक्सपर्ट विचार]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/2cOuDaYVTVYfecD4CGuw.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/2cOuDaYVTVYfecD4CGuw.jpg"/></item><item><title><![CDATA[भारतीय नारीवाद और ग्रामीण भारत ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/self-help-groups-promoting-women-empowerment-and-feminism-in-rural-india-2036313</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/93FDwbO9hzntjQLiqDeF.jpg"><p style="text-align: justify;">आपने कितनी ही बार सुना होगा और कितनी ही बार पढ़ा होगा कि असली भारत यहां के गांव में बसता है. महात्मा गांधी ने भी कुछ ऐसी ही बात कही थी. तो ज़ाहिर सी बात है कि भारत में किसी भी बड़े बदलाव और बड़े आंदोलन की जड़ें भारत के गांव की मिट्टी में रूपी हुईं होंगी. भारत की आज़ादी की लड़ाई में <strong>ग्रामीण भारत </strong>का योगदान किसी से भी छुपा हुआ नहीं है. और यह अपने आप में सिर्फ़ एक ही उदाहरण नहीं है.</p>
<h2 style="text-align: justify;">भारत के ग्रामीण परिवेश में Feminism की मौजूदगी <span>नई नहीं</span>&nbsp;&nbsp;</h2>
<p style="text-align: justify;">चलिए आज इस बारे में बात करते हैं कि किस तरह से नारीवाद जिसे अक्सर कई लोग सिर्फ़ और सिर्फ़ शहरों से या शहरी महिलाओं से जोड़कर देखने की गलती कर लेते हैं, भारत के <strong>ग्रामीण परिवेश में भी Feminism</strong> यानी कि नारीवाद न सिर्फ़ सदियों से मौजूद है बल्कि वक्त के साथ सशक्त भी हो रहा है. इस सशक्तिकरण (women empowerment) की रफ़्तार वह नहीं है जो कि होनी चाहिए. लेकिन उसके अस्तित्व को ना तो नकारा जा सकता है और ना ही नज़रअंदाज किया जा सकता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><img alt="feminism in rural india" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/600x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/WdXCwr6AEXZwqisQs0eS.webp" style="width: 600px;" class="center"></p>
<p class="center"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: Counterview.in</em></span></p>
<p style="text-align: justify;">बहुत ज़्यादा पीछे न जाते हुए भारत के आधुनिक इतिहास की अगर बात करें और ख़ासकर कि मैं अगर सिर्फ़ महाराष्ट्र की ही बात कर लूं, तो चाहे वह सावित्रीबाई फुले हों या ताराबाई शिंदे, इनके नारीवाद का आधार और इन्होंने नारी उत्थान के लिए जो भी काम किया उसका एक बहुत बड़ा अंश ग्रामीण भारत में था. और बात अगर अभी की करनी है तो अभी के दौर में राजस्थान की भंवरी देवी <strong>ग्रामीण नारीवाद</strong> की सबसे बड़ी नेत्री हैं.</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="color: rgb(230, 126, 35);">यह भी पढ़ें :&nbsp;</span><a href="https://ravivarvichar.in/nazariya/b-r-ambedkar-feminism-indian-women-right-to-vote-divorce-property-rights-gender-equality-1779758">आज़ाद भारत में Ambedkar ने रखी Gender Equality की नींव&nbsp;</a></p>
<h2 style="text-align: justify;">ग्रामीण नारीवाद की सबसे बड़ी नेत्री हैं भंवरी देवी</h2>
<p style="text-align: justify;">1985 में भंवरी देवी सरकार द्वारा चलाए गए एक कार्यक्रम के तहत 'साथिन' बनीं. उन्होंने अपने इलाके में राशन आवंटन, स्वास्थ्य, शिक्षा और साफ़-सफ़ाई जैसे कई सारे कार्यक्रमों को सुचारू रूप से चलाने में सरकार की मदद की. लेकिन वह चीज़ जिस पर उन्होंने सबसे ज़्यादा ध्यान दिया था, वह था <strong>महिला सशक्तिकरण</strong> (women empowerment in rural India). इसके तहत छोटी बच्चियों की शादी को रोकना, बाकी महिलाओं को 'साथिन' बनने के लिए प्रोत्साहित करना और महिला सुरक्षा पर विशेष ध्यान देना, यह सब भंवरी देवी ने किया. हालांकि उन्हें इसकी बहुत बड़ी कीमत भी चुकानी पड़ी.&nbsp;</p>
<p><img alt="bhawari devi child marriage " src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/600x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/fbIYesMPJ5CO0Dyui9MG.jpg" style="width: 600px;" class="center"></p>
<p class="center"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: ThePrint</em></span></p>
<p style="text-align: justify;">1992 में गुर्जर परिवार के कुछ लोगों ने भंवरी देवी के साथ ज़बरदस्ती की क्योंकि उन्होंने उसे परिवार में हो रहे एक बाल विवाह को रोकने की कोशिश की थी. अपराधियों को लगा कि इसके बाद वह <strong>भंवरी देवी</strong> को हमेशा के लिए चुप करा देंगे. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. भंवरी देवी अपने इंसाफ़ के लिए लड़ी और आज भी लड़ रहीं हैं. लेकिन भंवरी देवी ने अपने मिशन को नहीं रोका और आज भी भंवरी देवी <strong>ग्रामीण नारीवाद</strong> की सबसे जिंदा तस्वीर हैं.</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="color: rgb(230, 126, 35);">यह भी पढ़ें :&nbsp;</span><a href="https://ravivarvichar.in/nazariya/ravivar-vichar-wishes-a-very-happy-birthday-to-legendary-actor-amitabh-bachchan-who-has-played-many-feminist-characters-in-his-films-1519269">अपने किरदारों से फेमिनिज़्म के रंगों से रूबरू करवाते अमिताभ बच्चन&nbsp;</a></p>
<h2 style="text-align: justify;">ग्रामीण भारत में महिला सशक्तिकरण को राह दे रहे Self Help Groups</h2>
<p style="text-align: justify;">अब बात <strong>ग्रामीण महिलाओं</strong> की हो और <strong>महिला स्वयं सहायता समूह</strong> का ज़िक्र ना आए यह तो मुमकिन नहीं है. देखिए ग्रामीण नारीवाद (rural feminism) आपको शहरी नारीवाद से थोड़ा अलग दिखाई दे सकता है. लेकिन वह फ़र्क &nbsp;सिर्फ़ और सिर्फ़ सतही है. मूल रूप से दोनों ही परिवेशों में ज़ोर समानता और women empowerment पर ही है.</p>
<p style="text-align: justify;">शहरी परिवेश में अक्सर लोगों को यह टर्म जो है 'फेमिनिज्म' यानी कि नारीवाद, यह पता होती है. तो हर कदम जो <strong>महिला सशक्तिकरण</strong> की तरफ़ उठाया जाता है उसे फेमिनिज्म का नाम दिया जाता है. उसे लेबल करना आसान हो जाता है. उसे समझना आसान हो जाता है. ग्रामीण परिवेश में ऐसा नहीं होता.</p>
<h2 style="text-align: justify;">एक साथ पनप रहा ग्रामीण और शहरी नारीवाद</h2>
<p style="text-align: justify;">आप भारत के गांव में जाकर पूछेंगे तो नारीवाद या फेमिनिज्म वहां की महिलाएं शायद नाम से जान भी ना पाएं. लेकिन उनके आचरण में, उनके उठाए कदमों में, और उनके संघर्षों में समानता पाने की ललक होती भी है और दिखती भी है. और <strong>महिला स्वयं सहायता समूह</strong> (women self help group) इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है.</p>
<p><img alt="self help group enabling women empowerment" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/600x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/swfxHKoBTkfH9qzDlifB.jpg" style="width: 600px;" class="center"></p>
<p class="center"><em><span style="font-size: 8pt;">Image Credits: Oxfam India</span></em></p>
<p style="text-align: justify;">भारत का <strong>आधुनिक नारीवाद</strong>, चाहे वह ग्रामीण हो चाहे शहरी, लगभग एक ही साथ पनपा है. आज़ादी से पहले महाराष्ट्र के अमरावती जिले में महज़ 25 पैसों के साथ महिलाओं का एक छोटा सा समूह साथ में आया और शुरुआत हुई भारत के सबसे पहले माने जाने वाले<strong> महिला स्वयं सहायता समूह</strong> की. इसके बाद एक के बाद एक कई सारे गांव में, कई सारे जिलों में और कई सारे राज्यों में यह महिला स्वयं सहायता समूह एक के बाद एक बनते रहे.</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="color: rgb(230, 126, 35);">यह भी पढ़ें :&nbsp;</span><a href="https://ravivarvichar.in/nazariya/amrita-pritam-paved-way-to-modern-day-feminism-through-her-writings">महिला नज़रिए को रोशनी देता सितारा Amrita Pritam</a></p>
<h3 style="text-align: justify;">Self Help Groups को मिल रहा सरकार का समर्थन</h3>
<p style="text-align: justify;">यह महिला स्वयं सहायता समूह ग्रामीण महिलाओं को एक प्लेटफार्म देते हैं, एक मंच देते हैं एक साथ आने का, अपने हुनर का इस्तेमाल करने का, अपनी आजीविका कमाने का. यह आजीविका उन्हें सक्षम बनाती है अपने पैरों पर खड़े होने में, अपने फ़ैसले ख़ुद लेने में और अपना अधिकार लेने में. महिला स्वयं सहायता समूहों ने <strong>ग्रामीण महिलाओं के सशक्तिकरण</strong> (rural women empowerment) में एक बहुत अहम भूमिका निभाई है. और यह सिलसिला जारी है, और इसका जारी रहना बहुत जरूरी भी है.&nbsp;</p>
<p><img alt="feminism in rural india" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/600x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/bdiFsXai9eNxFzwaU1DQ.jpg" style="width: 600px;" class="center"></p>
<p class="center"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: CSR Mandate</em></span></p>
<p style="text-align: justify;">इसीलिए भले ही वोटों के लिए ही सही, सरकार और विपक्ष जब <strong>महिला सशक्तिकरण</strong> की बात करते हुए स्वयं सहायता समूहों को और ज़्यादा सिस्टमैटिक बनाने की तरफ़ ध्यान देने का वादा करते हैं, तो यह बात स्वागत योग्य मानी जानी चाहिए. क्योंकि <strong>ग्रामीण महिलाओं के सशक्तिकरण</strong> और ग्रामीण नारीवाद के लिए यह ज़रूरी है कि सरकारों का ध्यान महिला स्वयं सहायता समूहों पर बना रहे और वह उनकी प्रगति के लिए जवाबदेह रहें. Self Help Groups से जुड़ी हुई कई और कहानियां हम <strong>Ravivar Vichar</strong> के ज़रिए आप तक पहुंचाते रहेंगे.</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="color: rgb(230, 126, 35);">यह भी पढ़ें : </span><a href="https://ravivarvichar.in/nazariya/first-full-time-female-fm-nirmala-sitharaman-striving-for-women-empowerment">फेमिनिज्म की राह चलती FM निर्मला सीतारमण</a></p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मैत्री </dc:creator><pubDate>Sat, 23 Dec 2023 14:08:36 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/self-help-groups-promoting-women-empowerment-and-feminism-in-rural-india-2036313]]></guid><category><![CDATA[एक्सपर्ट विचार]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/93FDwbO9hzntjQLiqDeF.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/93FDwbO9hzntjQLiqDeF.jpg"/></item><item><title><![CDATA[भारत में स्वयं सहायता समूह- आरंभ, उत्थान और विकास ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/nazariya/self-help-groups-in-inda-history-progress-and-development-1708467</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/Ovumpny73ST2OJAF7Owh.jpg"><p><strong>स्वयं सहायता समूह</strong>, जैसा कि नाम से ही समझा जा सकता है, इसका मतलब ख़ुद की सहायता ख़ुद करना है. बहुत ही सरल सा नाम, बहुत ही सरल सा अर्थ. पर असल में कितना चुनौती भरा है ये काम, कहां से हुई इसकी शुरुआत, कैसे पड़ा इस वट वृक्ष का बीज और कैसे यह विचार एक आंदोलन में बदला और इसने 'स्वयं सहायता समूह' से <strong>'राष्ट्रीय सहायता समूह'</strong> तक का सफ़र तय किया. आइए आज इसी बारे में बात की जाए (about Self Help Groups in Hindi).</p>
<h2>आज़ादी से पहले ही पड़ी SHG की नींव&nbsp;&nbsp;</h2>
<p>भारत में स्वयं सहायता समूहों की नींव आज़ादी से पहले ही पड़ गई थी. और ये <strong>शुरूआत की थी महाराष्ट्र के अमरावती जिले की महिलाओं ने</strong>. इस स्वयं सहायता समूह को पच्चीस पैसे के साथ शुरू किया गया था.&nbsp;</p>
<p><img alt="SHG women History " src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/439x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/2e7T4U3mZKNKg1ApJS43.jpeg" style="width: 439px;" class="center"></p>
<p class="center"><span style="font-size: 8pt;"><em>(Image Credits : VajiRam IAS)</em></span></p>
<p>भारत में स्वयं सहायता समूहों की <strong>औपचारिक शुरआत</strong> सत्तर के दशक में <strong>अहमदाबाद के सेवा</strong> (सेल्फ इंप्लॉयड विमेन एसोसिएशन) से हुई. सेवा को आर्थिक तौर से कमज़ोर और स्वयं-रोज़गार से जुड़ी महिलाओं की यूनियन के तौर पर जाना जाने लगा. सेवा की फाउंडर <strong>इलाबेन भट्ट</strong> ने <strong>'विमेन और माइक्रो-फाइनेंस'</strong> इस कॉन्सेप्ट को जन्म दिया.</p>
<h2>90s में NABARD के साथ फैली महिला Self Help Group की क्रांति&nbsp;</h2>
<p>इसके बाद देश भर में स्वयं सहायता समूहों की शुरूआत हुई. चाहे वो महाराष्ट्र का <strong>'अन्नपूर्णा महिला मंडल' </strong>हो या तमिलनाडु का <strong>'वर्किंग वूमेंस फोरम'</strong> या मैसूर का<strong> MYRADA</strong>, भारत के कई कोनों में महिला स्वयं सहायता समूहों का शंखनाद सुनाई देने लगा. लेकिन अब तक चीज़ें पूरी तरह से स्ट्रीमलाइन नहीं हुईं थीं यानि कि पटरी पर नहीं आईं थीं.&nbsp;</p>
<p><img alt="NABARD training SHG women" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/382x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/wHg6NFQVZE4bBwLuAxZD.jpeg" style="width: 382px;" class="center"></p>
<p class="center"><span style="font-size: 8pt;"><em>( Image Credits : Swastikam )</em></span></p>
<p><strong>नब्बे का दशक</strong> आते आते <strong>NABARD</strong> ने बड़े पैमाने पर स्वयं सहायता समूहों को बढ़ावा देना शुरू कर दिया. 1993 में RBI ने स्वयं सहायता समूहों को बैंकों में बचत खाता खोलने की अनुमति दे दी. इस फैसले ने स्वयं सहायता समूहों को एक नया रूप दे दिया. इस फैसले ने स्वयं सहायता समूहों के <strong>आर्थिक सिस्टम</strong> को पूर्ण रूप से<strong> औपचारिक कर दिया</strong>. यह फैसला इससे जुड़े लोगों, ख़ासकर कि महिलाओं को <strong>आर्थिक स्वतंत्रता</strong> देने की दिशा में एक बहुत प्रभावकारी कदम साबित हुआ.</p>
<p><strong><span style="color: rgb(230, 126, 35);">यह भी पढ़ें : </span></strong><a href="https://ravivarvichar.in/khabar/nabard-has-sanctioned-more-than-rs-148-crore-for-the-development-of-the-tribal-population-spread-over-11-districts-in-bengal-1698918">नाबार्ड की पहल आदिवासी महिलाओं के लिए बनी वरदान</a></p>
<h3>महिला स्वयं सहायता समूह राष्ट्रीय स्वयं सहायता समूह बन चुके हैं : PM मोदी</h3>
<p>भारतीय उपमहाद्वीप की बात करें तो <strong>स्वयं सहायता समूह</strong>, इस कॉन्सेप्ट का चलन बांग्लादेश में भी देखा गया. वहां इसकी शुरुआत 1976 में <strong>बांग्लादेश ग्रामीण बैंक</strong> से हुई. <strong>डॉ मोहम्मद यूनुस</strong> (<a href="https://ravivarvichar.in/duniyadari/an-idea-which-changed-the-world">father of microfinance Dr Muhammed Yunus</a>) ने इस बैंक को शुरू किया जहां भूमिहीन गरीब तबके के लोगों, ख़ासकर कि ग्रामीण महिलाओं को स्वयं रोजगार के लिए लोन दिया जाने लगा.</p>
<p>वर्तमान में, <strong>2023</strong> के <strong>इकोनॉमिक सर्वे</strong> के मुताबिक, भारत में एक करोड़ <strong>बीस लाख़ स्वयं सहायता समूह</strong> हैं और इनमें से <strong>88% महिला स्वयं सहायता समूह</strong> हैं. <strong>1992 </strong>का <strong>SHG बैंक लिंकेज प्रोजेक्ट</strong> विश्व का सबसे बड़ा माइक्रो फाइनेंस प्रोजेक्ट बन चुका है. इस प्रोजेक्ट में चौदह करोड़ परिवार कवर किए जा रहे हैं.</p>
<p>पिछले साल <strong>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी</strong> ने <strong>मध्य प्रदेश</strong> में हुए <strong>स्वयं सहायता समूह सम्मेलन</strong> के मंच से कहा था कि अब ये महिला स्वयं सहायता समूह राष्ट्रीय स्वयं सहायता समूह बन चुके हैं (<a href="https://ravivarvichar.in/khabar/pm-modi-pledges-women-empowerment-on-tribal-pride-day-1705202">PM Modi promoting SHG</a>). यह बयान इस बात का सूचक है कि ये <strong>स्वयं सहायता समूह</strong> भारत की अर्थव्यस्व्यथा में कितनी अहम भूमिका निभा रहे हैं.</p>
<p><img alt="PM Modi with SHG women" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/349x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/CfMsT2qz3ITdNmS4XSKD.jpeg" class="center" style="width: 349px;"></p>
<p class="center"><em><span style="font-size: 8pt;">(Image Credits : NewsRoom Post )</span></em></p>
<p><strong>रविवार विचार</strong> के ज़रिये हमारा ये प्रयास रहेगा कि हम इन<strong> महिला स्वयं सहायता समूहों</strong> से जुड़ी बातें और इन जाबाज़ महिलाओं की कहानियां आपके सामने लाते रहें.</p>
<p><strong><span style="color: rgb(230, 126, 35);">यह भी पढ़ें : </span></strong><a href="https://ravivarvichar.in/khabar/mountain-based-sisters-will-sprinkle-medicine-with-drone-1521528">पहाड़ पर बसी बहनें ड्रोन से छिड़केंगी दवाई : पीएम</a></p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मैत्री </dc:creator><pubDate>Fri, 15 Dec 2023 18:08:18 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/nazariya/self-help-groups-in-inda-history-progress-and-development-1708467]]></guid><category><![CDATA[एक्सपर्ट विचार]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/Ovumpny73ST2OJAF7Owh.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/Ovumpny73ST2OJAF7Owh.jpg"/></item><item><title><![CDATA[क्या MP सत्ता का रास्ता महिला वोटरों और SHG के गलियारे से गुज़रेगा? ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/mp-election-voting-female-voters-and-shgs-influencing-results-1756828</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/IewObR6YaRKvKNDTXCn7.jpg"><p>इस रविवार को मध्य प्रदेश के चुनावी (<a href="https://ravivarvichar.in/nazariya/vote-percentage-of-women-voters-is-continuously-increasing-due-to-awareness-1702102">MP elections</a>) नतीजे आएंगे. लोकसभा चुनाव (Loksabha elections) से चंद महीने पहले होने वाले पांच राज्यों के चनावों को राजनीतिक विशेषज्ञ अलग अलग तरीके से देखते हैं. कुछ इसे आने वाले लोकसभा चुनाव का ट्रेलर मानते हैं और कुछ का मानना है कि इन राज्यों के नतीजे लोकसभा के नतीजों का सूचक नहीं होते.</p>
<h2>230 विधानसभा सीटों वाले MP में लंबे समय से है भाजपा का शासन</h2>
<p>2018 के चुनाव इस बात को सही साबित कर चुके हैं. पिछली बार इन चुनावों में भारी जीत दर्ज कराने के बाद भी लोकसभा में कांग्रेस को एक भारी हार का सामना करना पड़ा था. पर एक चीज़ जिस पर सभी एकमत हैं वो ये कि ये चुनाव विजेता पार्टी की ज़मीन पर, ख़ासकर हिंदीभाषी राज्यों में पकड़ को मज़बूत करते हैं. मध्य प्रदेश इनमें से एक बेहद महत्वपूर्ण राज्य है. 230 विधानसभा सीटों वाले इस राज्य में लंबे समय से भाजपा का शासन है. 2018 चुनाव में कांग्रेस ने जीत हासिल की थी लेकिन 2020 में फ़िर भाजपा ने प्रदेश में अपनी सरकार बना ली.&nbsp;</p>
<p><img alt="MP election voting female voters " src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/500x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/emkiJLaOHx60MFvywQsW.jpg" style="width: 500px;" class="center"></p>
<p class="center"><em><span style="font-size: 8pt;">Image Credits: Naidunia</span></em></p>
<p>मध्य प्रदेश में भाजपा की इस लंबी पारी में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान (Shivraj Singh Chouhan) का बड़ा हाथ रहा है. चार बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके शिवराज सिंह चौहान ने सोलह साल तक राज्य में मुख्यमंत्री पद संभाला है. चौहान की इस लंबी पारी में मध्य प्रदेश के किसानों की बड़ी भूमिका रही. एक लंबे अरसे तक किसान शिवराज सिंह चौहान का सबसे बड़ा वोट बैंक रहें. पर इस बार स्थिति अलग हैं.</p>
<p><span style="color: rgb(230, 126, 35);">यह भी पढ़ें:</span> <a href="https://ravivarvichar.in/nazariya/shg-women-impacting-telangana-elections-1565668">तेलंगाना में महिला वंदन के बाद SHG पर फोकस&nbsp;</a></p>
<h2>महिला वोटरों का मतदान प्रतिशत पुरुष वोटरों से रहा ज़्यादा&nbsp;</h2>
<p>इस बार शिवराज सिंह चौहान ने अपना सारा ध्यान महिला वोटरों को लुभाने में लगा दिया है. चौहान द्वारा शुरू की गई मध्य प्रदेश सरकार की लाड़ली बहना स्कीम इस बात का सबसे बड़ा सुबूत है. और क्यों नहीं. मध्य प्रदेश में 2 करोड़ 67 लाख़ महिला वोटर हैं. 2008 के चुनावों में महिला वोटरों का मतदान प्रतिशत 65.7 था. 2013 में ये बढ़कर 70.1 हुआ और 2018 में 74% तक जा पहुंचा. इस बार के चुनाव में ये और बढ़कर 76% हो गया. राज्य की 230 सीटों में से 34 सीटों पर महिला वोटरों का मतदान प्रतिशत पुरुष वोटरों से ज़्यादा रहा (<a href="https://ravivarvichar.in/nazariya/women-voters-account-for-over-50-percent-in-2023-vidhansabha-elections-1518057">female voters count</a>).&nbsp;</p>
<p><img alt="MP election voting female voters" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/500x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/3rrBgczfRIBBrYOvNY4I.jpg" style="width: 500px;" class="center"></p>
<p>कुछ विशेषज्ञ इन आंकड़ों को शिवराज सिंह चौहान के लिए एक शुभ संकेत मान रहे हैं. एक के बाद एक महिला-केंद्रित वेलफेयर स्कीम लाने वाले शिवराज सिंह चौहान ने अपने इस कार्यकाल में महिलाओं, ख़ासकर कि ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमज़ोर महिलाओं पर विशेष ध्यान दिया. महिला स्वयं सहायता समूह शिवराज सिंह चौहान की इस तकनीक का केंद्र रहे.</p>
<h2>MSP पे फ़सल खरीदने का काम भी महिला स्वयं सहायता समूहों को सौंपा जाएगा</h2>
<p>मध्य प्रदेश में क़रीब चार लाख़ महिला स्वयं सहायता समूह हैं और ये समूह राज्य के 45 हज़ार गावों में मौजूद हैं. ये आंकड़े राज्य में महिला स्वयं सहायता समूहों (women self help groups) का महत्व साबित करते हैं. और राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इसी को ध्यान में रखते हैं शिवराज सिंह चौहान और मध्य प्रदेश सरकार ने महिला वोटरों को लुभाने के इस कैंपेन की शुरुआत इन महिला स्वयं सहायता समूहों (<a href="https://ravivarvichar.in/nazariya/women-centric-schemes-in-poll-bound-states-raise-questions-on-governments-intention-1379989">women centric schemes</a>) से की.&nbsp;</p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/500x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/post_attachments/L0MeOI6sppmJdOAemT6m.jpg" alt="MP Assembly elections 2023: Chief Minister Shivraj Chouhan's 'Ladli Behna  Yojana' becomes 'game-changer' for BJP | Mint" style="width: 500px;" class="center"></p>
<p class="center"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: Mint</em></span></p>
<p>2021 में राज्य की भाजपा सरकार ने बीस हज़ार महिला स्वयं सहायता समूहों को 250 करोड़ की सहायता राशि मुहैया कराई. अक्तूबर 2021 में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने घोषणा की कि राज्य में खाद्य पदार्थ पोषण फैक्टरियां अब ठेकेदार नहीं बल्कि सिर्फ़ और सिर्फ़ महिला स्वयं सहायता समूह चलाएंगे. मुख्यमंत्री ने ये भी घोषणा की कि MSP पे फ़सल खरीदने का काम भी महिला स्वयं सहायता समूहों को सौंपा जाएगा.</p>
<h3>CM चौहान ने हर महिला को महीने के दस हज़ार रुपए मुहैया कराने का किया वादा&nbsp;</h3>
<p>2022 में मुख्यमंत्री ने महिला स्वयं सहायता समूहों के साथ कई &nbsp;ऑफलाइन और ऑनलाइन मीटिंग की. अप्रैल 2023 में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भोपाल कलेक्टर को और ज़्यादा महिला स्वयं सहायता समूह बनाने के लिए कैंपेन चलाने का आदेश दिया. अपने चुनाव प्रचार में बार बार महिला स्वयं सहायता समूहों का ज़िक्र चौहान ने किया.</p>
<p>चौहान ने अपने अमूमन हर चुनावी भाषणों में कहा कि वापस चुन कर आने पे उनकी सरकार की प्राथमिकता रहेगी की हर महिला को महीने के दस हज़ार रुपए मुहैया करवाए जाएं. चौहान ने बारंबार महिला स्वयं सहायता समूहों के महत्व, राज्य की अर्थव्यवस्था में उनकी भूमिका, महिला सशक्तिकरण में उनका योगदान की बात की.&nbsp;</p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/post_attachments/mZ2JYBpHofnALagig6L5.jpg" alt="Ladli behna yojna का दूसरा चरण, जिन महिलाओं के परिवार में है ट्रेक्टर, वो  इस तरह करें आवेदन | Ladli behna yojna second time registration started  Indore Madhya Pradesh news - Hindi Oneindia" style="width: 580px;" class="center"></p>
<p class="center"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: Oneindia Hindi</em></span></p>
<p>अब महिला वोटरों और महिला स्वयं सहायता समूहों को लुभाने की मध्य प्रदेश भाजपा सरकार और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की ये कोशिश कितनी कामयाब रहेगी ये बस अब कुछ ही देर में साफ़ हो जायेगा. और अगर ये पैंतरा राजनीतिक जीत का कारण बना तो आने वाले वक्त में कई और राजनेता और सरकारें भी इस पैंतरे को अपनाती दिखें तो कोई आश्चर्य की बात नहीं.</p>
<p><span style="color: rgb(230, 126, 35);">यह भी पढ़ें:&nbsp;</span><a href="https://ravivarvichar.in/khabar/pm-modi-g20-ministerial-conference-on-women-empowerment" rel="dofollow">समृद्ध महिला से समृद्ध विश्व - प्रधानमंत्री मोदी</a></p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मैत्री </dc:creator><pubDate>Sat, 02 Dec 2023 15:26:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/mp-election-voting-female-voters-and-shgs-influencing-results-1756828]]></guid><category><![CDATA[एक्सपर्ट विचार]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/IewObR6YaRKvKNDTXCn7.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/IewObR6YaRKvKNDTXCn7.jpg"/></item><item><title><![CDATA[चुनाव, विजेता शिव राज चौहान और उनकी 'लाड़ली बहनें' ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/cm-shivraj-singh-chouhan-contributed-in-bjp-win-in-mp-with-ladli-behna-yojana-1823904</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/UXkGG0Ytbgw6Kk0zoD8y.jpg"><p style="text-align: justify;">पिछले अंक में हमने कहा था कि <strong>मध्य प्रदेश</strong> चुनाव में महिलाओं का बड़ी संख्या में मतदान करना भाजपा और ख़ासकर <strong>शिवराज सिंह चौहान</strong> के लिए एक शुभ संकेत है. मध्यप्रदेश में चलाई गईं जनकल्याण योजनाएं यानि कि 'वेलफेयर स्कीम्स' भाजपा (BJP welfare schemes) को एक बार फ़िर सत्तारूढ़ करने में अहम भूमिका निभाएंगी. इनमें से सबसे अहम और प्रचलित योजना थी<strong> 'लाड़ली &nbsp;बहना' </strong>(<a href="https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/mp-election-voting-female-voters-and-shgs-influencing-results-1756828">women SHGs impacting MP election</a>).</p>
<h2 style="text-align: justify;">Ladli Behna Yojana बनी BJP की जीत की वजह&nbsp;</h2>
<p style="text-align: justify;">रविवार को <strong>2023 विधानसभा चुनावों </strong>(2023 vidhansabha election)<strong>&nbsp;</strong>के नतीजे आए और वो हुआ जिसकी उम्मीद खुद <strong>भाजपा</strong> को भी नहीं थी. भाजपा ने <strong>163 सीटों</strong> के साथ राज्य में एक शानदार जीत दर्ज़ करवाई. राज्य में यह भाजपा की अबतक की दूसरी बड़ी जीत थी.&nbsp;</p>
<p><img alt="indore" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/ffSdd8a6w4wWdIxdzYI6.jpg" style="width: 580px;" class="center"></p>
<p class="center"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: File Photo</em></span></p>
<p style="text-align: justify;">भाजपा की जीत का सबसे बड़ा श्रेय<strong> लाड़ली बहना स्कीम</strong> (<a href="https://ravivarvichar.in/ladli-behna-yojna-became-a-major-player-in-mp-election-win-1757009">ladli behna scheme impact</a>) को जाता है. चुनाव के पहले के कई सर्वे, यहां तक की भाजपा के आंतरिक सर्वे भी कांग्रेस को जीता हुआ दिखा रहे थे. लेकिन लाड़ली बहना योजना और जिस तरीके से <strong>मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान</strong> (CM Shivraj Singh Chouhan)&nbsp;ने चुनाव के आख़िरी दिनों में जमकर इस योजना का प्रचार किया, उससे सारा गणित ही बदल गया.&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;">भाजपा की इस जीत ने अब आगे आने वाले चुनावों के लिए भी एक खांचा तैयार कर दिया है.&nbsp;</p>
<h2 style="text-align: justify;">Ladli Behna DBT ने जीता महिलाओं का विश्वास</h2>
<p style="text-align: justify;">सवाल ये है कि <strong>जनकल्याण योजनाओं</strong> की तो राजस्थान और तेलंगाना सरकार ने भी भरमार लगा रखी थी. लेकिन क्यों इन योजनाओं ने उन सरकारों के लिए वो नहीं किया जो लाड़ली बहना ने शिवराज सिंह चौहान के लिए किया. इसका एक बड़ा कारण रहा इस स्कीम का <strong>कैश ट्रांजेक्शन</strong> (direct benefit transfer- DBT) के फॉर्मूला पर आधारित होना. वो योजनाएं जहां सीधे सीधे पैसे लाभकारिओं के खाते में आ जाते हैं, वहां पे वोटरों के लिए कई वजहों से फ़ैसला लेना आसान हो जाता है.&nbsp;</p>
<p><img alt="CM shivraj MP election win" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/600x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/kk9jXse9GBvof5eG6X9r.jpg" style="width: 600px;" class="center"></p>
<p class="center"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: ABP Live</em></span></p>
<p style="text-align: justify;">सबसे पहले वोटर साफ़ साफ़ देख पाते हैं कि योजना का लाभ मिला है या नहीं. यानि की खाते में पैसे आएं हैं या नहीं. ऐसी योजनाओं का ढांचा ही इस तरह का है कि सब कुछ दूध का दूध और पानी का पानी दिखता है. मध्य प्रदेश में भी यही हुआ. लाड़ली बहना स्कीम कैश ट्रांजेक्शन पर आधारित एक स्कीम है. मार्च महीने में शुरू की गई इस स्कीम में हर महीने लाभकारी महिलाओं के खाते में पहले <strong>1000 रुपए </strong>और अब <strong>1250 रुपए</strong> जमा कराए जाते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="color: rgb(230, 126, 35);">यह भी पढ़ें :</span> <a href="https://ravivarvichar.in/nazariya/self-help-groups-influencing-politics-in-india">राजनीती के केंद्र में SHG</a></p>
<h2 style="text-align: justify;">लाड़ली बहना योजना में पहले दिन से ही दिखे नतीजे</h2>
<p style="text-align: justify;">स्कीम के शुरू होने से चुनाव तक बिना किसी नागा, तय तारीख़ को रुपए महिलाओं के खाते में जमा हो जाते थे. ऐसे में महिलाओं को साफ़ साफ़ नज़र आ रहा था कि स्कीम काम कर रही थी या नहीं. दूसरा, इस तरह की <strong>कैश ट्रांजेक्शन वाली योजना</strong>ओं में वोटर ये देख पाते हैं जितनी रकम जमा करने का वादा सरकार ने किया था, उतनी ही रकम जमा हो रही है या नहीं.&nbsp;</p>
<p><img alt="CM shivraj" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/600x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/z64BNkFVmMM3Qb6WYZbS.jpg" style="width: 600px;" class="center"></p>
<p class="center"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: File photo</em></span></p>
<p style="text-align: justify;">ऐसी योजनाओं में चूंकि सारा पैसे सीधे वोटर के खाते में जमा होता है तो बिचौलियों के हेर फेर कर देने की गुंजाइश खत्म हो जाती है. लाड़ली बहना स्कीम के चल पड़ने और चुनाव में भाजपा के लिए कारगर साबित होने के ये बड़े कारण रहे. सीधे कैश ट्रांजेक्शन पर आधारित ये स्कीम फ्री बिजली की यूनिट, ऋण माफ़ी और इस तरह की बाकी योजनाओं से ज्यादा कारगर साबित हुई. बाकी योजनाएं वादों पे आधारित थीं और <strong>लाड़ली बहना योजना</strong> में पहले दिन से ही नतीजे दिख रहे थे.&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="color: rgb(230, 126, 35);">यह भी पढ़ें : </span><a href="https://ravivarvichar.in/nazariya/women-centric-schemes-in-poll-bound-states-raise-questions-on-governments-intention-1379989">राजनीति को राह दे रही महिला केंद्रित योजनाएं&nbsp;</a></p>
<h2 style="text-align: justify;">शिवराज सिंह चौहान का प्रदर्शन बना भाजपा की जीत का बड़ा कारण</h2>
<p style="text-align: justify;">दूसरी तरफ़ शिवराज सिंह चौहान का प्रदर्शन भी भाजपा की जीत का बड़ा कारण रहा. एक तरफ़ <strong>राजस्थान सरकार</strong> थी जो सभी वादों और जनकल्याण योजनाओं को पूरी तरह से लागू नहीं कर पाई. 2018 के चुनाव में <strong>कांग्रेस</strong> ने <strong>राजस्थान के किसानों</strong> को पूर्ण ऋण माफ़ी देने का वादा किया था. लेकिन सत्ता में आने के बाद कांग्रेस ने उन किसानों का ऋण तो माफ़ कर दिया जिन्होंने राज्य के सहकारी बैंकों के ऋण लिया था. लेकिन बाकी सरकारी और निजी बैंकों से लिए गए लोन, जो कि संख्या में बहुत ज्यादा थे, माफ़ नही हुए.</p>
<p><img alt="Second installment transferred to ladali Behna account by CM" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/600x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/2NGAKqDHzdYlMlFmtWoB.jpg" style="width: 600px;" class="center"></p>
<p class="center"><em><span style="font-size: 8pt;">Image Credits: Google News</span></em></p>
<p style="text-align: justify;">कांग्रेस ने कहा कि उन्हें केंद्र की <strong>भाजपा सरकार </strong>से सहयोग नहीं मिला जो कि सरकारी और निजी बैंकों से लिए गए ऋण की माफ़ी के लिए ज़रूरी था. इसलिए पूर्ण ऋण माफ़ी नहीं हो सकी. वजह चाहे जो भी रही, किसानों को ये दिखा कि उनसे किया गया वादा पूरा नहीं हुआ. दूसरी तरफ़ <strong>लाड़ली बहना स्कीम</strong> से शिवराज सिंह चौहान ने दिखाया कि उन्होंने जो वादा किया वो सही समय पर और लगातार पूरा हो रहा है. इन कारणों ने वोटरों का मन बनाने में अहम भूमिका निभाई.&nbsp;</p>
<h3 style="text-align: justify;">2024 लोकसभा चुनाव पर टिकी निगाहें&nbsp;</h3>
<p style="text-align: justify;"><strong>विधानसभा चुनाव</strong> तो खत्म हुए. अब <strong>2024 लोकसभा चुनाव</strong> सर पर हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि लाड़ली बहना की तर्ज पर और कई योजनाएं इन चुनावों से पहले देखने को मिल सकती हैं.&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;">सरकारें किस तरह इन योजनाओं का आर्थिक भार उठाएंगी और कैसे इन योजनाओं का राजस्व पर पड़ता हुआ असर कम होगा, ये एक अलग किस्सा है. लेकिन फ़िलहाल <strong>मध्य प्रदेश</strong> चुनाव ने लाड़ली बहना जैसी योजनाओं और इनके <strong>कैश ट्रांजेक्शन</strong> के फॉर्मूला को जीत के रास्ते पर एक लंबी छलांग के रूप में स्थापित कर दिया है.</p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मैत्री </dc:creator><pubDate>Fri, 15 Dec 2023 18:04:29 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/experts-thoughts-editorial/cm-shivraj-singh-chouhan-contributed-in-bjp-win-in-mp-with-ladli-behna-yojana-1823904]]></guid><category><![CDATA[एक्सपर्ट विचार]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/UXkGG0Ytbgw6Kk0zoD8y.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/UXkGG0Ytbgw6Kk0zoD8y.jpg"/></item><item><title><![CDATA[लाड़ली बहना: महिलाएं रुपये-पैसे की बेहतर प्रबंधक क्यों होती हैं? ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/nazariya/p-nariharan-shares-why-women-are-better-managers-of-money</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/jkxsGMT2zT1gGqyluAkZ.jpg"><p>मुख्यमंत्री लाड़ली बहना योजना (MMLBY) मध्य प्रदेश में 23 से 60 वर्ष की आयु की महिलाओं के लिए विशेष योजना है. जून 2023 से चयनित लाभार्थी महिलाओं के खाते में 1000/- रुपये का वास्तविक प्रत्यक्ष लाभार्थी हस्तांतरण (डायरेक्ट बेनेफिशरी ट्रांसफर) किया जाएगा.</p>
<p>मध्य प्रदेश के महिला एवं बाल विकास विभाग की वेबसाइट के अनुसार सांख्यिकीय साक्ष्य (स्टैटिस्टिकल एविडेंस) बताते हैं कि शहरी क्षेत्रों में महिला से पुरुष श्रम बल भागीदारी अनुपात 23.3: 57 है, जो क्रमशः .7% और 13.6:59.6% है.</p>
<p>इसका तात्पर्य यह है कि ऐसी महिलाएं, जिनके पास व्यय योग्य आय (एक्सपेंडेबल इनकम) का अपना स्रोत है, वे पुरुषों की तुलना में बहुत कम है. इससे न सिर्फ उनकी आर्थिक स्वतंत्रता प्रभावित होती है बल्कि इसका सीधा असर उनके स्वास्थ्य और पोषण के साथ-साथ उनके बच्चों पर भी पड़ता है. गरीब और निम्न आय वर्ग परिवारों के लिए MMLBY के तहत दिया जा रहा पैसा आवश्यक घरेलू सामान, सब्ज़ियों, फल, दूध और किराने का सामान खरीदने को आसान बना रहा है.</p>
<p>5 मार्च, 2023 को लॉन्च के बाद, एक बहस शुरू हुई कि राजकीय खजाने से महिलाओं को प्रति वर्ष 12,000 रुपये दिए जाएं या नहीं ? इस व्यय का मतलब यहां आवश्यक वस्तुओं के भुगतान से है. यह पहले से निर्धारित योजना का हिस्सा होता है, जिसके लिए बजट भी पहले से तय किया जाता है. महिलाएं घर का बजट संभालती है और ऐसा देखा गया है कि खर्च करने के मामले में महिलाएं स्वभाव से सतर्क होती हैं. दिन-प्रतिदिन के खर्चों का प्रबंधन करना और यह सुनिश्चित करना कि परिवार के वित्तीय लक्ष्य पूरे हों, उनकी प्राथमिकता होती है.</p>
<p>व्यवहार संबंधी अध्ययनों से पता चलता है कि महिलाएं पैसे बचाने और बुद्धिमानी से निवेश करने की अधिक संभावना रखती हैं. साथ ही परिवार-उन्मुख होने की वजह से प्राथमिकताओं को बेहतर ढंग से संतुलित कर पाती हैं. खरीदारी करने से पहले डील, छूट और स्कीम को देखती हैं.&nbsp;</p>
<p>महिलाओं में उद्यमिता होती है. छोटे उद्यमों को शुरू कर, सफलता पाना आज कई घरों की कहानी है. उद्यम का स्केल और आकर उनके लिए ज़्यादा मायने नहीं रखता . उनके लिए मार्जिन मायने रखती है. महिला स्वयं सहायता समूहों (SHG) ने भारत में बड़ी सफलता पाई है. रोज़मर्रा के वित्तीय निर्णय लेने की क्षमता उन्हें अपने खर्चे बेहतर तरीके से करना सिखाती है. इस तरह समझकर खर्च करना, एक कौशल के रूप में देखा जा सकता है. &nbsp;</p>
<p>महिलाएं किराए, उपयोगिताओं, आवश्यक वस्तुओं और रेस्तरां में बाहर खाने के बीच किस पर पहले खर्च करना है इसको बखूबी प्राथमिकता देती है. अपनी नेगोशियेशन क्षमता की वजह से वह बेहतर निर्णय लेती हैं. खरीदारी के दौरान पूछना परखना और फिर कोई निर्णय लेना, छोटी खरीददारी से लेकर हवाई जहाज खरीदने में ज़रूरी होता है. &nbsp;</p>
<p>भारत में महिलाओं के खर्च और बचत की आदतों में संस्कृति भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं. इसीलिए उनसे अक्सर रुपये-पैसे के साथ मितव्ययी और जिम्मेदार होने की उम्मीद भी की जाती है. जैसे अपनी सीमित आय और अप्रत्याशित खर्चों को पूरा करने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं में बचत करने की अधिक संभावना देखी जाती है. सांस्कृतिक और सामाजिक मानदंडों के आधार पर भारतीय महिलाओं की वित्तीय संसाधनों तक पहुंच में अंतर है.</p>
<p>समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से, MMLBY के तहत दी जाने वाली राशि महिलाओं के वित्तीय सशक्तिकरण का मार्ग प्रशस्त करेगी. ऐसी नीतियां महिलाओं को अपने परिवार का बजट तय करने के अवसर देती हैं. इस तरह से निम्न आय वर्ग महिलाओं में आत्मसम्मान की बढ़ोतरी होगी और वह अपनी बात रखने में सक्षम बनेगी. &nbsp;<br>&nbsp;</p>
<p><em>(लेखक पी. नरहरि, आईएएस अधिकारी हैं और वर्तमान में सचिव, एमएसएमई उद्योग विभाग, मध्य प्रदेश सरकार के पद पर कार्यरत है)</em><br><em>(साभार - द टाइम्स ग्रुप)</em><br><em>(अनुवाद - रविवार ब्यूरो)</em></p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"> पी. नरहरि</dc:creator><pubDate>Thu, 30 Nov 2023 15:28:23 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/nazariya/p-nariharan-shares-why-women-are-better-managers-of-money]]></guid><category><![CDATA[एक्सपर्ट विचार]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/jkxsGMT2zT1gGqyluAkZ.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/jkxsGMT2zT1gGqyluAkZ.jpg"/></item></channel></rss>