<rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" xmlns:dcterms="http://purl.org/dc/terms/" xmlns:geo="http://www.w3.org/2003/01/geo/wgs84_pos#" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/" xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/" xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/" version="2.0"><channel xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/"><title><![CDATA[ आदिवासी]]></title><link>https://ravivarvichar.in/tags/aadivaasii</link><description/><atom:link href="https://ravivarvichar.in/rss/tags/aadivaasii" rel="self"/><language>en-us</language><lastBuildDate>Sat, 05 Aug 2023 12:07:01 +0530</lastBuildDate><item><title><![CDATA[पथरीली ज़मीन पर बिछी हरियाली की चादर ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/kahaniyan/ajeevika-mission-and-pradan-helping-singroli-farmers-reap-benefits</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/2PvfulNwGzoHG4Qg2t4M.jpg"><h1><strong>पथरीली ज़मीन पर बिछी हरियाली की चादर&nbsp;</strong></h1>
<p><strong>सिंगरौली</strong> <strong>(Singarauli)</strong> के <strong>आदिवासी</strong> <strong>(Tribal)</strong> बहुल इलाकों में तस्वीर बदली-बदली सी है. कुछ साल पहले तक जिस ज़मीन को पथरीली मान कर अपनी किस्मत समझ लिया. उन बंज़र ज़मीनों में हरियाली छाई हुई है. यह कहानी है&nbsp;<strong>देवसर (Deosar)</strong> ब्लॉक के <strong>सरौंधा (Saraundha)&nbsp;</strong>की. इस इलाके में डेढ़ हजार से ज्यादा <a href="https://ravivarvichar.in/nazariya/widowed-at-20-village-woman-started-organic-farming-which-helps-500-farmers">किसान</a> दीदियों की चर्चा देश में हो रही. जिन्होंने <a href="https://ravivarvichar.in/kahaniyan/sangeeta-sawalakhe-is-helping-farmers-to-switch-on-to-bio-alternatives-for-chemical-fertilizers-and-pesticides">मेहनत</a> कर अपनी ज़मीन को संवार दिया.</p>
<h2><strong>किसान दीदियों की बनी नई पहचान &nbsp;</strong></h2>
<p><strong>सरौंधा&nbsp;(Saraundha)&nbsp;</strong>की रहने वाली <strong>किसान दीदी</strong> <strong>रामकली</strong> बताती है- <em>"मेरे पास तीन एकड़ ज़मीन थी. आधे में पथरीली हिस्सा. एक बार जैसे-तैसे फसल मिलती. कमाई तो थी ही नहीं. घर चलाना तक मुश्किल था. गांव में समूह से जुड़ी.अफसरों ने साथ दिया. आज मेरा खेत देखने सब आते हैं. मैं हर सीज़न में 20 हजार का मुनाफा कमा रही. बच्चे भी अब अच्छे स्कूल-कॉलेज में पढ़ रहे.मैं शान से परिवार के साथ जीती हूं."</em><br>इसी गांव की <strong>धनोवा</strong> दीदी कहती है-<em> " हमारे परिवार ने तो आस ही छोड़ दी थी. मन में आता था ज़मीन गिरवीं रख दें. कोई कमाई नहीं होती.अब एकदम बदल गया. खेत में काम मेहनत के बाद भी अच्छी फसल हो रही."</em></p>
<p><img alt="pradan singarauli" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/406x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/eyq2PAJbLlnNLSoO1ga7.jpg" style="width: 406px;"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>सरौंधा गांव की रामकली जिनके चेहरे पर मुस्कान बिखर गई (Image Credit: Ravivar Vichar)</em></span></p>
<h3><strong>ट्रेनिंग से ट्रेन हुई किसान दीदियां &nbsp;</strong><em><strong> &nbsp; &nbsp; &nbsp;&nbsp;</strong></em></h3>
<p><strong>मध्य प्रदेश (MP)</strong> के सिंगरौली जिले के सरौंधा में <strong>आजीविका मिशन</strong> <strong>(Ajeevika Mission)</strong> के<strong> समूह (SHG) </strong>से जुड़ी महिलाओं को गैर सरकारी <strong>सामाजिक संस्था</strong> <strong>(NGO) 'प्रदान' (Pradan) </strong>का साथ मिला. देखते ही देखते यहां किसान दीदियों और उनके परिवार की आर्थिक आर्थिक स्थिति में बदलाव आ गया. 'प्रदान' संस्था के अनुसार-&nbsp;<em>"इस इलाके में हमारे लिए बड़ी चुनौती थी. <strong>देवसर</strong> ब्लॉक के <strong>सरौंधा</strong> में दो <strong>संकुल ग्राम संगठन (CLF)</strong> हैं. इसमें <strong>चेतना संकुल संगठन </strong>और<strong> तिनगुड़ी</strong> शामिल हैं. हमने किसान दीदियों और उनके परिवार को खेती करने के लिए संतोष सिन्हा जैसे एग्रीकल्चर एक्सपर्ट से ट्रेनिंग दिलवाई."&nbsp;</em></p>
<h3><strong>थ्री लेयर खेती से चमकी किस्मत&nbsp;</strong></h3>
<p><strong>सरौंधा</strong>&nbsp;<strong>(Saraundha) </strong>में जहां एक सीज़न में भी<a href="https://ravivarvichar.in/kahaniyan/housewifes-startup-seedbasket-selling-local-seeds-to-urban-gardeners"> फसल </a>&nbsp;लेना मुश्किल था,वहां एडवांस खेती से मुनाफा लगातार मिलने लगा.<strong>&nbsp;</strong>किसान परिवारों को&nbsp;<strong>थ्री लेयर</strong>&nbsp;<strong>फार्मिंग (Three Layer Farming)&nbsp;</strong>खेती का मतलब सिखाया. ज़मीन के पथरीले हिस्से में बेल वाली लौकी, गिलकी, करेला जैसी सब्जियां लगवाईं. सेकेंड लेयर में गोभी, पालक, मैथी &nbsp;जैसे काम हाइट की सब्जियों को बोने की सलाह दी. एक हिस्से में <a href="https://ravivarvichar.in/kahaniyan/stevia-replaces-artificial-sweetener-proves-helpful-for-farmers">ज़मीन</a> के अंदर से मिलने वाली सब्जियां हल्दी, आलू और अदरक को बोना सिखाया. इस थ्री लेयर मेथड से किसान दीदियों की ज़िंदगी ही बदल गई.&nbsp;</p>
<p><img alt="pradan singrauli" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/536x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/3fRrE0HwB0MNzqcO3vFv.jpg" style="width: 536px;"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>सरौंधा गांव में रामकली का खेत जहां थ्री लेयर फसल दिखाई दे रही (Image Credit: Ravivar Vichar) &nbsp;</em></span> &nbsp; &nbsp; &nbsp;&nbsp;</p>
<h3><strong>क्वालिटी सीड का कमाल</strong></h3>
<p>इस योजना में जहां ट्रेनिंग काम आई वहीं क्वालिटी सीड का कमाल भी देखने को मिला.&nbsp;'प्रदान' संस्था&nbsp;सिंगरौली में किसान बहनों के खेत में बुआई के समय क्वालिटी सीड उपलब्ध करवाए. आदिवासी ब्लॉक को मिले फंड का सही उपयोग किया. 30 हजार रुपए के फंड में अब तक 20 हजार रुपए खर्च किए. शेष रुपए की मदद और की जाएगी. जिले में छह एक्ज़ीक्युटिव मॉनिटरिंग कर रहे.&nbsp;<br>जिले के ब्लॉक में कोर्डिनेशन से योजना का लाभ किसान दीदियों को मिला.<strong> आजीविका मिशन</strong> के<strong> जिला परियोजना प्रबंधक</strong> <strong>(DPM) मगलेश्वर सिंह </strong>का कहना है- <strong>"सिंगरौली में किसान परिवारों ख़ास कर महिला किसानो को ख़ास प्रोत्साहित किया. ट्राइबल योजना के लाभ ने महिलाओं की पारिवारिक स्थिति को पूरी तरह बदल दिया."</strong></p>
<h3><strong>किसानी पर ख़ास फ़ोकस</strong></h3>
<p>आदिवासी जिलों में पिछड़े और गरीब किसानों को शासन ने ख़ास फोकस किया.इसमें खेतों में ही मजदूरी करने वाली महिलाओं को आत्म सम्मान की जिंदगी &nbsp;जी सकें, इसके प्रयास किए जा रहे.यहां सात जिलों के आठ आदिवासी ब्लॉक में उन्नत किसानी और महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए संस्था काम कर रही है. स्वयं सहायता समूह से जुड़ी दीदियों में बहुत उत्साह है<em>. </em><strong>राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन (SRLM) </strong>के&nbsp;<strong>स्टेट प्रोजेक्ट मैंनेजर</strong> <strong>(SPM) मनीष पंवार&nbsp;</strong>कहते है-<em> "आजीविका मिशन के समूहों में महिलाओं को खास ट्रेनिंग देकर सक्षम बनाया जा रहा.इस समय सात जिलों के आठ ब्लॉक में विशेष ट्रेनिंग से सैकड़ों किसान दीदियों के आर्थिक हालत बदल गए."</em></p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">विवेक वर्द्धन श्रीवास्तव </dc:creator><pubDate>Sat, 05 Aug 2023 12:07:01 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/kahaniyan/ajeevika-mission-and-pradan-helping-singroli-farmers-reap-benefits]]></guid><category><![CDATA[कहानियां]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/2PvfulNwGzoHG4Qg2t4M.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/2PvfulNwGzoHG4Qg2t4M.jpg"/></item><item><title><![CDATA[महाश्वेता देवी : समाज का साहित्य लिखती मां ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/nazariya/remembering-mahasweta-devi-the-feminist-icon-on-her-death-anniversary</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/GDfdy8vkT1mvjAcCgq8e.jpg"><p>कुछ लोगों को आंदोलन करने के लिए मशालों की नहीं, सिर्फ कलम की ज़रुरत होती है. महाश्वेता देवी (<span>Mahasweta Devi</span>) भी भारतीय साहित्य (Indian literature) में ऐसे ही लेखकों की सूची में जगह बनाती हैं. बंगाली फिक्शन राइटर. सामाजिक कार्यकर्ता. आदिवासी समुदाय की आवाज़. फेमिनिस्ट. महाश्वेता देवी ने सभी टाइटल जिये (Fiction writer, voice of the subaltern, feminist Mahaswets Devi). उनके लेख में ज़मीनी हक़ीक़त दिखाई देती. पर्यावरण का शोषण, मेहनतकश गरीबों का संघर्ष, पश्चिम बंगाल और बिहार के भूमिहीन और छोटे किसानों, बंधुआ मज़दूरों की परेशानियां, पितृसत्ता से दबी <a href="https://ravivarvichar.in/nazariya/female-characters-of-guru-dutt">महिलाओं</a> की चुनौतियां उनके लेखों में जगह पाते.&nbsp;</p>
<h2>महाश्वेता देवी को किया गया पद्म विभूषण और बंग विभूषण से सम्मानित&nbsp;</h2>
<p>संहिचारी, मैरी ओरांव, रुदाली, छोटी मुंडा, दोपदी मेजेन जैसे कई ऐतिहासिक किरदारों की रचनाकार देवी ने बंगाली लेखन के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार, पत्रकारिता के लिए रेमन मैग्सेसे पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार, पद्म विभूषण और बंग विभूषण से सम्मानित किया गया. उनके उपन्यास 'हजार चुराशिर मां' में परिवारों पर राजनीतिक हिंसा को दिखाया गया, 'अरण्येर अधिकार' में उन्होंने जमींदारों और राज्य द्वारा शोषण और विस्थापन का सामना करने वाले आदिवासी समुदायों की दुर्दशा पर बात की.</p>
<h3>महिलाओं के सशक्तिकरण की लड़ाई की कहानियां लिखी</h3>
<p><a href="https://feminisminindia.com/2021/01/14/remembering-mahasweta-devi-the-social-activist-on-her-birth-anniversary/">महाश्वेता देवी</a> की लघु कहानी 'द्रौपदी' ने सुरक्षा बलों द्वारा यौन हिंसा और यातना का शिकार आदिवासी <a href="https://ravivarvichar.in/nazariya/leila-seth-the-mother-of-a-suitable-boys-writer-vikram-seth-accepted-his-sons-sexuality-of-being-a-gay-and-supported-him-throughout">महिलाओं</a> के दुखद अनुभवों को दर्शाया. 'चोट्टी मुंडा और उसका तीर' और 'बशाई टुडू' जैसी उनकी कहानियों ने उत्पीड़न और सामाजिक अन्याय के खिलाफ अपने लोगों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले आदिवासी नेताओं की हिम्मत को दिखाया. कलेक्शन 'ब्रेस्ट स्टोरीज़' के ज़रिये, उन्होंने अलग-अलग परिवेश से आने वाली महिलाओं के <a href="https://ravivarvichar.in/nazariya/steven-spielberg-e-t-the-xtra-terrestrial-based-on-satyajit-ray-script-claims-shama-zaidi">सशक्तिकरण</a> की लड़ाई की कहानियां लिखी.</p>
<h3>लेख के ज़रिये महिलाओं और वंचित समुदायों के न्याय और समानता की वकालत की&nbsp;</h3>
<p>महाश्वेता देवी की साहित्यिक कला ने उन्हें <a href="https://ravivarvichar.in/nazariya/we-need-a-feminist-response-to-end-child-labour">फेमिनिस्ट</a> आइकॉन (feminist icon) बना दिया. उन्होंने निडरता से उन लोगों की आवाज़ बुलंद की, जिन्हें अक्सर अनसुना कर दिया जाता है. महिलाओं और वंचित समुदायों के न्याय और समानता की वकालत करने के लिए अपनी कलम का इस्तेमाल किया. उनकी साहित्यिक विरासत समाज को अपने अन्यायों पर विचार करने और इन्क्लूसिव और खुशहाल दुनिया बनाने के लिए प्रेरित करती है.&nbsp;</p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मिस्बाह</dc:creator><pubDate>Fri, 28 Jul 2023 11:15:22 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/nazariya/remembering-mahasweta-devi-the-feminist-icon-on-her-death-anniversary]]></guid><category><![CDATA[नज़रिया]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/GDfdy8vkT1mvjAcCgq8e.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/GDfdy8vkT1mvjAcCgq8e.jpg"/></item><item><title><![CDATA[मज़दूरी छोड़ ठेकेदार बनी दीदियां ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/photovideo/shg-women-of-jhabua-to-benefit-from-the-partnership-between-mp-govt-and-mprdc</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/ayqvsPvwUFiDi06W7EOh.jpg"><p><iframe width="722" height="405" src="https://www.youtube.com/embed/O6P0w-woIJU" allowfullscreen="allowfullscreen"></iframe></p>
<p><span>आदिवासी जिले झाबुआ में आजीविका मिशन की महिलाओं को सरकार ने बड़ा तोहफा दे दिया. जिन सड़कों को बनाने में इन महिलाओं ने मजदूरी की, अब उन सड़कों की देखरेख के लिए ठेकेदार बना दिया.मध्य प्रदेश ग्रामीण सड़क प्राधिकरण (MPRDC) के साथ बकायादा MOU साइन कर ये जवाबदारी आजीविका मिशन के एक समूह को सौंपी. </span></p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">रविवार ब्यूरो </dc:creator><pubDate>Fri, 30 Jun 2023 16:31:19 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/photovideo/shg-women-of-jhabua-to-benefit-from-the-partnership-between-mp-govt-and-mprdc]]></guid><category><![CDATA[वीडियो]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/ayqvsPvwUFiDi06W7EOh.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/ayqvsPvwUFiDi06W7EOh.jpg"/></item><item><title><![CDATA[सखियों ने दिया पशुओं को नया जीवनदान ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/kahaniyan/nrlm-trains-shg-women-to-become-veterinary-doctor</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/extqjjlDXeSCBiJJY1CB.jpeg"><p>पशु सखी (Pashu Sakhi) बन जाने के बाद इन महिलाओं में एक नया आत्मविश्वास दिखाई देने लगा. "हमारे मवेशी-हम ही डॉक्टर" इस अभियान के बाद महिलाओं में अलग ही उत्साह है. अब ये महिलाएं इलाज के बिना पशुओं को  उनकी ही आंखों के सामने दम तोड़ते नहीं देखेंगी. राष्ट्रीय आजीविका मिशन (NRLM) की इस योजना ने प्रदेश में स्वयं सहायता समूह (Self Help Groups) की महिलाओं को 'वेटेनरी डॉक्टर' (Veterinary Doctor) बना दिया.17 दिनों की इस संभागीय ट्रेनिंग के परिणाम नज़र आने लगे हैं.अब गांव में पशु पालकों को इमरजेंसी में डॉक्टर (doctor) का इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा. शुरुआती इलाज वो खुद कर सकेंगी.इन सखियों ने गांव में पशुओं को नया जीवनदान दे दिया.   </p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/uC1kQoyPzNZYQ99QUFjG.jpg" alt="SHG become veterinary doctor"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>सीहोर के गांव ललियाखेड़ी की पशु सखी ममता भारती (Image Credits: Ravivar vichar)</em></span></p>
<p>आदिवासी जिला बैतूल के गांव सैलया की <span style="font-size: 12pt;">पुष्पा</span> मिश्रा कहती है - "गांव में मुझे बताया कि एक गाय बीमार है. वह चारा भी नहीं खा पा रही. मैंने चेक किया और कृमि खत्म करने की दवाई दे दी. कुछ समय बाद गाय की तबियत ठीक हो गई.तड़पती गाय को नॉर्मल होते देख मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा. समाज सेवा मेरा मकसद रहा. तीन साल पहले हमने गांव में बजरंग स्वयं सहायता समूह बनाया. जब पशु सखी योजना की ट्रेनिंग मिली ,उसके बाद गांव में ऐसा लगा जैसे कोई त्यौहार है. मैं गांव में हर मवेशी का ध्यान रख रही हूं. हमारा काम पहले शुरुआती इलाज करो. पशु अस्पताल और पशु पालक के बीच हम लोग ब्रिज का काम कर रहे. गांव में 350 से ज्यादा गाएं और दूसरे पशु हैं."</p>
<p>पूरे प्रदेश में महिला सशक्तिकरण को लेकर एक प्रयोग हुआ. इस प्रयोग की सफलता भी नज़र आने लगी है. राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका  मिशन ने 'पशु सखी' प्रोजेक्ट (Project) अंतर्गत 17 दिन की ट्रेनिंग करवा कर स्वयं सहायता समूह की सैकड़ों महिलाओं को 'पशु सखी' बना दिया. राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के अनुसार अब प्रदेश के अलग-अलग जिले से स्वयं सहायता समूह की सदस्यों को लेवल पर ट्रेनिंग दिलवाई. अब तक 4668 सदस्य पशु सखी बन चुकीं हैं. ये सखियां अपने ही गांव में किसी भी बीमार मवेशी का शुरुआत में इलाज कर वेटेनरी डॉक्टर को सूचना देगी. A -हेल्प के तहत ये ट्रेनिंग हुई. ये सखियां ब्रिज की भूमिका में होंगी. राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड, पशु पालन विभाग के द्वारा या ट्रेनिंग (Training) आयोजित की गई. </p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/Sz5wjQIwwlqUZw0Uc3UT.jpg" alt="SHG become veterinary doctor"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>बैतूल के सलैया गांव में पशुओं का इलाज करती सखी पुष्पा मिश्रा (Image Credits: Ravivar vichar)</em></span></p>
<p>शासन ने आदिवासी (Tribes) जिलों में खास फोकस किया. उमरिया, बैतूल, सीहोर सहित कई जिलों की सदस्य लगातार ट्रेनिंग ले रहीं हैं. बैतूल के जिला परियोजना प्रबंधक सतीश पंवार कहते हैं - "इस योजना का लाभ सीधे गांव के पशु पालकों को मिल रहा है.बैतूल में ही लगभग 30 महिला सदस्य पशु सखी की ट्रेनिंग ले चुकीं हैं. इसके पहले भी हमने प्रयास कर 57 महिलाओं को इसकी ट्रेनिंग दिलवाई ,जो गांव में पशुओं की देखभाल कर रहीं हैं." यह ट्रेनिंग हर संभाग में चल रही है. उमरिया के जिला परियोजना प्रबंधक प्रमोद शुक्ला बताते हैं - "आदिवासी इलाकों में इमरजेंसी सुविधा नहीं मिल रही थी. पशु सखी एक वरदान है. हमारे जिले की कई सदस्यों ने भी ट्रेनिंग ले ली. "</p>
<p>सीहोर जिले के ललियाखेड़ी गांव की ममता भारती बताती हैं -"मेरे गांव में ढाई सौ से ज्यादा मवेशी हैं. ट्रेनिंग के बाद गांव में सभी खुश हैं. मेरे पास सप्ताह में 7-8 बीमार मवेशी को पशु पालक लाते हैं. मुझे ख़ुशी होती है कि कई समय पर इलाज न मिल पाने के कारण दम तोड़ देते थे. मैं टीका, इंजेक्शन, दवाई देना सीख गई. इलाज शुरू कर मैं पशु विभाग को सूचना दे देती हूं.मैंने राधा स्वयं सहायता समूह बना कर यह काम किया." इसी तरह उमरिया जिले की सखियां भावना वर्मा, विमला साहू,सुमन साहू ,आशा बाई जैसे कई महिलाएं पशु सखी बन कर अपने गांवों में बीमार पशुओं का इलाज कर रहीं हैं. </p>
<p>पशु सखी ट्रेनिंग को लेकर आदिवासी बहुल जिले के जिला परियोजना प्रबंधक योगेश तिवारी कहते हैं - " ऐसी ट्रेनिंग ले चुकी 25 सदस्यों को डेयरी बोर्ड द्वारा A -Help सखी प्रमाण-पत्र (Certificate) बांटे गए और पुरस्कार भी दिए गए. इसमें ट्रेनिंग में पशु पालन विभाग के डॉ.अनिल ठाकुर, सारिका चौहान सहित कई डॉक्टर्स ने ट्रेनिंग दी. "</p>
<p>पूरे प्रदेश में चल रही पशु सखी ट्रेनिंग को लेकर पशु पालन मंत्री प्रेमसिंह पटेल खुद जानकारी ले रहे हैं. बड़वानी जिले में वे खुद पहुंचे.मंत्री प्रेमसिंह कहते हैं - " यह योजना गांव के लिए कारगर साबित हुई. इससे बीमार पशुओं को गांव की बहनें पशु सखी बन कर इलाज कर सकेंगी. पशुओं को इमरजेंसी में इलाज मिलेगा, जिससे उनकी मौत का आंकड़ा कम होगा. दूध और डेयरी प्रोडक्ट उत्पादन बढ़ने से पशु पालकों की आर्थिक स्थिति भी ठीक होगी. " </p>
<p>ट्रेनिंग के बाद ये सखियां वेक्सिनेशन,दवाइयां देकर नस्ल बेहतर करने के लिए लगातार पशु  पालकों की काउंसलिंग कर रहीं हैं.</p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">विवेक वर्द्धन श्रीवास्तव </dc:creator><pubDate>Tue, 06 Jun 2023 15:44:57 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/kahaniyan/nrlm-trains-shg-women-to-become-veterinary-doctor]]></guid><category><![CDATA[कहानियां]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/extqjjlDXeSCBiJJY1CB.jpeg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/extqjjlDXeSCBiJJY1CB.jpeg"/></item><item><title><![CDATA["महिला या आदिवासी होने में कोई बुराई नहीं" ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/photovideo/president-droupadi-murmu-praises-tribal-shg-women-of-jharkhand</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/JDQSlcJlCcLQJDFNaGoU.jpg"><p><iframe style="width: 745px; height: 418px;" src="https://www.youtube.com/embed/wa6SH90efM8" width="745" height="418" allowfullscreen="allowfullscreen"></iframe></p>
<p>राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू (President Droupadi Murmu) ने अपने आदिवासी गौरव का परिचय देते हुए कहा कि उनके समाज में कन्या का जन्म कभी भी सकारात्मक विकास के रास्ते में बाधा नहीं बना. झारखंड के खूंटी में आयोजित स्वयं सहायता समूह सम्मेलन (conference of self-help groups) में राष्ट्रपति मुर्मू ने शिरकत की. उन्होंने जोर देकर कहा कि आदिवासी महिलाएं युगों से अलग-अलग क्षेत्रों में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रही हैं.</p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">रविवार ब्यूरो </dc:creator><pubDate>Fri, 26 May 2023 18:13:49 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/photovideo/president-droupadi-murmu-praises-tribal-shg-women-of-jharkhand]]></guid><category><![CDATA[वीडियो]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/JDQSlcJlCcLQJDFNaGoU.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/JDQSlcJlCcLQJDFNaGoU.jpg"/></item><item><title><![CDATA['वन धन' से जनजाति मज़बूत ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/aadhi-aabadi/government-started-csc-trifed-van-dhan-scheme-for-the-tribal-people-to-give-better-life-to-adivasis</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/6Di2MCmdBEjtM1fCFe1n.jpg"><p>देश की सरकार द्वारा हर तबके तक विकास पहुंचाने के लिए कई तरह की योजनाएं चलाई जाती हैँ. ऐसे ही सरकार द्वारा जनजाति लोगों के लिए एक स्कीम चलाई जा रही है. इस स्कीम का नाम सीएससी वन धन स्कीम (CSC Van Dhan Scheme) है. यह स्कीम भारत सरकार, TRIFED और CSC ने मिलकर शुरू की है. सीएससी वन धन योजना आदिवासी समुदायों की आजीविका को बढ़ाने का प्रयास करती है. इसका पहला लक्ष्य वनों से मिले या आदिवासियों द्वारा बनाये उत्पादों की बिक्री को बढ़ाना है. इससे उनके उत्पादों को सही दाम मिल सकेगा.  यह योजना इन समुदायों को ज़रूरी वित्तीय सहायता देगी, जिससे वे समृद्धि और सशक्त होंगे.</p>
<p>TRIFED का पूरा नाम The Tribal Cooperative Marketing Development Federation Of India है. TRIFED का काम जनजातियों द्वारा बनाये या जंगल से इकठ्ठा किए गए प्रोडक्ट को बाजार में सही दाम पर बिकवाने के लिए अवसर तैयार करना और नुकसान होने पर आर्थिक मदद करना है. आज भी जनजाति लोगों के जीवन में सामाजिक, राजनीतिक, और आर्थिक चुनौतियां हैँ . इनका हल करने के लिए सरकार ने यह स्कीम शुरू की. इस काम में CSC को शामिल किया गया. CSC की पहुंच ग्रामीण इलाकों में है और ऐसे ही इलाकों में CSC आवास करते हैं. इस तरह सीएससी वन धन स्कीम (CSC Van Dhan Scheme) का फायदा सीधा पहुंचाया जा सकेगा.</p>
<p>उन्हें बिजनेस कैसे करना है और बाजार में प्रॉफिट कैसे कमाना है जैसे विषयों पर भी बताया जाएगा. साथ ही जंगल से निकाले गए उत्पादों को बाजार में कैसे भेजेंगे और उनके बदले सही कीमत कैसे पानी है आदि चीजों के बारे में मदद की जाएगी. ये पहल जनजाति समुदायों के विकास में अहम भूमिका निभाएगी जिससे  उनके आर्थिक सशक्तिकरण का सपना सच हो सकेगा. </p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">रविवार ब्यूरो </dc:creator><pubDate>Sun, 14 May 2023 14:00:37 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/aadhi-aabadi/government-started-csc-trifed-van-dhan-scheme-for-the-tribal-people-to-give-better-life-to-adivasis]]></guid><category><![CDATA[आधी आबादी]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/6Di2MCmdBEjtM1fCFe1n.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/6Di2MCmdBEjtM1fCFe1n.jpg"/></item><item><title><![CDATA[मदर्स डे: मां के शब्द ने बना दिया अफसर ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/kahaniyan/mothers-motivated-daughter-to-become-sdm-of-balaghat</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/WkxBy5QaGmbecQPFhGYD.jpg"><p>बालाघाट जिले के किरनापुर के सरकारी मुख्यालय में इस वक़्त एसडीएम निकिता राधा मंडलोई की नेम प्लेट लगी हुई है. इस कैबिन के दरवाज़े सबके लिए खुले हैं. यहां निकिता जरूरतमंद लोगों की उलझनों को सुलझा देती है. उनकी मदद करने का अंदाज़ इस इलाके में चर्चित है.यही नहीं उनका पर्सनल मोबाइल नंबर भी अब सार्वजनिक है. निकिता बालाघाट जिले में  लगभग तीन साल से एसडीम और डिप्टी कलेक्टर के पद अपनी सेवाएं दे रही है. लोकप्रियता और इस मुकाम पर पहुंचने का श्रेय निकिता अपनी मां राधा मंडलोई को देती हैं.निकिता के संघर्ष और मेहनत की कहानी आज युवाओं के बीच मिसाल बन गई. मदर्स डे पर "रविवार विचार" ऐसी युवा लेडी ऑफिसर की कहानी लोगों तक पहुंचा रहा,जो दूसरे लोगों के लिए बड़ी सीख  बनेगी.</p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/tA84f3khM29wNUqwEJoc.jpg" alt=" एसडीएम निकिता"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>सरकारी स्कूल में पढ़ाते हुए एसडीएम निकिता </em></span></p>
<p>एसडीएम निकिता कहती हैं - "मैं सिर्फ क्लास 12 वीं थी. उस रात मुझ पर और परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट गया,जब पिता चल बसे. अकेली मां और हम तीन बच्चे ,सभी आधी-अधूरी बीच पढ़ाई में पिता का साया उठ गया.आर्थिक और मानसिक रूप से मैं टूट गई.इस वक़्त मां के भीतर गज़ब का धैर्य मैंने देखा. कुछ दिन में ही वह दोहरी भूमिका में दिखाई दी. उनमें मेरे पिता और मां की झलक दिखने लगी. वह चाहे ज्यादा न पढ़ सकी पर मां ने एक बात कही -पिता के सपने को पूरा करो.और अधिक मेहनत करो.उस दिन मैंने संकल्प लिया और पलट कर पीछे नहीं देखा."  </p>
<p>खरगोन के उत्कृष्ट सरकारी स्कूल में पढ़ाई की. निकिता ने पिता के निधन के बाद पढ़ाई में पूरी ताकत झोंक दी. दोनों बड़े भाइयों ने भी ग्रेजुएशन पूरा किया.पिता के समय मिली थोड़ी सी जमीन पर खेती में मां जुटी रही.उधर निकिता की मेहनत रंग ले आई. प्रदेश के प्रतिष्ठित एसजीएसआईटीएस इंजीनियरिंग कॉलेज इंदौर में चयन हुआ और उसने वहां से ग्रेजुएशन किया.</p>
<p>निकिता आगे बताती है -" पिता मुझे बचपन से कहते थे. समाज के लिए कुछ करना है तो अफसर बनो. उनके चले जाने के बाद भी यह बात मुझे संकल्प की तरह याद थी. मैंने एक ही मकसद बनाया सिर्फ पढ़ाई और मेहनत. आखिर घर में खुशियां आईं और मेरा चयन पीएससी बैच 2019 के लिए हो गया. और पहली ही पोस्टिंग नक्सल प्रभावित बालाघाट जिले में हुई. मुझे यह दोहरी चुनौती मिली. और मैंने सहर्ष स्वीकार किया. "</p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/GQzY4CsBwBROs9ea5nf9.jpg" alt="एसडीएम निकिता"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em> बाढ़ के दौरान रेस्क्यू टीम के साथ निकिता </em></span></p>
<p>अपनी बेटी की उपलब्धि पर मां राधा मंडलोई कहती है -" निकिता शुरू से बहुत मेहनती और संवेदनशील रही. उसकी मेहनत के आगे मैं सारे गम भूल गई. खेत में जाते हुए भी यह नहीं भूली कि मुझे बच्चों को पिता की कमी भी पूरी करनी है.निकिता के अफसर बनने पर मुझे गर्व है. उसने अपने पिता का सपना पूरा कर दिया. " निकिता के भाई भी अब रोजगार से जुड़ गए. </p>
<h2>"मां की सीख ने बनाया सफल " </h2>
<p>आदिवासी गरीब बस्ती के लोगों की मदद के कई किस्से इलाके में चर्चा में आ गए. निकिता अपने जॉब के अनुभव बताती है -" लोगों की मदद के लिए ही हमें इस पद पर बैठाया गया है. अवकाश लेकर मैं रेलवे स्टेशन जा रही थी. पता चला कि एक छात्रा जाति प्रमाण-पत्र बनवाने आई और वह दिन एडमिशन का आखरी दिन था. मेरे साइन के बिना वह एडमिशन से वंचित रह जाती.मैंने अपना वाहन ऑफिस की ओर ले जाने को कहा.ऑफिस में उदास बच्ची के प्रमाण-पत्र पर साइन किए और निकल गई ट्रेन पकड़ने. चहरे पर ख़ुशी और चमक देख मुझे मेरी मां की सीख याद आ गई."</p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/fHWky8vrZDJ6CFzhYpGo.jpg" alt="Nikita Mandlio Balaghat"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>अपनी मां राधा मंडलोई के साथ एसडीएम निकिता</em></span></p>
<p>कई बार लोगों को मदद के बाद मोबाइल पर थेंक्यु के मैसेज आते हैं. यही निकिता को ऊर्जा देते हैं. वे अपने जिले के सरकारी स्कूल में कई बार विद्यार्थियों को पढ़ाने जाती हैं. अपनी मां को बिजली के बिल और बैंकों की लाइन देखने वाली निकिता चाहती है कि लोकसेवक जनता को आसानी से उपलब्ध हो. ऑफिस के चक्कर न लगाने पड़ें. निकिता कहती है -"संवेदना और भावुकता के बीच यदि हम किसी पीड़ित की बात सुनते हैं तो प्रशासन पर उसका विश्वास बढ़ता है.और हर पल मुझे मेरे कर्तव्य याद रहे इसलिए मैं अपनी मां राधा के साथ पूरा नाम निकिता राधा मंडलोई लिखती हूं. " </p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">विवेक वर्द्धन श्रीवास्तव </dc:creator><pubDate>Sun, 14 May 2023 11:00:37 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/kahaniyan/mothers-motivated-daughter-to-become-sdm-of-balaghat]]></guid><category><![CDATA[कहानियां]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/WkxBy5QaGmbecQPFhGYD.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/WkxBy5QaGmbecQPFhGYD.jpg"/></item><item><title><![CDATA[बेकसूर महिलाओं को सजा मत दीजिए ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/nazariya/blindness-prevention-week</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/mHSLLxrQ4BBDPpMRa7pF.jpg"><p>मैं उस वक़्त अवाक रह गई जब देखा कि आदिवासी अंचल में महिलाएं अपनी आंखों की जाती हुई रौशनी से बेखबर थी.उसकी मासूमियत पर दया भी आई और दुःख भी हुआ.एनीमिया से पीड़ित इस महिला के मोतियाबिंद आखरी स्टेज पर था. उसे अगले दिन मैंने उसे इंदौर बुलाया. सवाल था खेत-मजदूरी छूट जाएगी. इतने पैसे भी नहीं. खैर,उसे बुलाया और निःशुल्क ऑपरेशन कर रौशनी लौटाई. ये कोई एक केस नहीं था. दो लगातार कैंप में ढाई सौ से ज्यादा मरीज़ों की आंखें जांचीं. ख़ास कर महिलाओं की संख्या अधिक थी जिनकी आंखें कमज़ोर निकली. अपने परिवार का ध्यान रखने वाली ये महिलाएं अपने ही हेल्थ से बेखबर है.घरों में चूल्हों की परंपरा और धुएं में कमी के बाद भी महिलाएं आंखों की सजा भुगत रही.ये सामाजिक चिंता का विषय है. </p>
<p>सामान्य तौर पर ये देखा जाता है कि शहरी इलाकों में कम उम्र में ही बच्चों से लगा कर अधिकांश लोग चश्में का उपयोग कर रहे जबकि ग्रामीण इलाकों में बिना चश्मों को लगाए लोग दिख जाते हैं. इस बात से ये भ्रम अब दूर कर लेना चाहिए कि गांव में लोग स्वस्थ हैं और उनकी आंखें भी बढ़िया है. बिगड़ते खान-पान और जागरूकता की कमी का असर ये हो रहा कि लोग अपनी रौशनी खो रहे हैं. "अंधत्व की रोकथाम जैसे सप्ताह" में ये समझना जरुरी है आखिर आंखों को कैसे बचाएं. क्या ध्यान रखें.</p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/CKOnoMzNMAlqkgtKPflh.jpg" alt="Dr anshu Khare"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: Dr. Anshu Khare</em></span></p>
<p>इन दिनों शुगर (डायबिटीज़) के मरीज़ लगातार बढ़ रहे.आपको यदि शुगर हो गई तो सबसे पहले आंखों का भी चेकअप करवाइये. दूसरा मोतियाबिंद के मामले में देखने में आ रहा है  कि कम उम्र में ही यह हो सकता है. धुंधला दिखाई दे,चश्में के नंबर का बदलना,तेज़ लाइट में चकाचौंध लगना या एक से ज्यादा परछाई दिखाई देना लक्षण हो सकते हैं.डॉक्टर से आंखों की जांच करवाना ही चाहिए. आजकल इसका ऑपरेशन भी आसानी से हो जाता है.आंखों की रौशनी जाने का सबसे बड़ा कारण ग्लूकोमा है. इसे आम भाषा में कांचबिंद या आंखों में काला पानी उतरना भी कहते हैं. ये आंखों के लिए सबसे खतरनाक है. इसमें कई बार लक्षण नज़र आखरी तक नज़र नहीं आते और पेशेंट इलाज में लेट हो जाता है. इसमें आंखों की नसों में दबाव बनता है और आंख परदे पर खून के धब्बे बन जाते हैं.आंखों में चोंट,ब्लड प्रेशर,शुगर,ड्रग्स, अल्कोहल भी ग्लूकोमा के कारण हैं. शुरुआत में इसका इलाज किया जा सकता है. आजकल अच्छे ड्रॉप और दवाइयां मिल जाती हैं. </p>
<p>ख़ास बात यही है कि 40 की उम्र में समय पर जांच जरुरी है. कोविड में इस्टीरॉयड के उपयोग के बाद भी आंखों और नज़र कमज़ोर की शिकायतें बढ़ीं हैं. लगातार स्क्रीन पर काम करने वाले बीच में ब्रेक दें. पर्याप्त रौशनी रखें.प्रोटेक्टिव ग्लास का उपयोग करें. प्रकृति के सुंदर उपहार इन आंखों की देखभाल कर ही हम इस अनुपम प्रकृति को निहार सकते हैं.</p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">किरण मुरिया</dc:creator><pubDate>Wed, 05 Apr 2023 15:16:46 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/nazariya/blindness-prevention-week]]></guid><category><![CDATA[नज़रिया]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/mHSLLxrQ4BBDPpMRa7pF.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/mHSLLxrQ4BBDPpMRa7pF.jpg"/></item><item><title><![CDATA[आदिवासी रेखा पेंड्राम ने UN तक पहुंचाया कोदो कुटकी को ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/photovideo/adivasi-woman-presened-on-kodo-kutki</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/NxwcHolc3nIzYomOnK6G.jpg"><p><iframe style="width: 1103px; height: 619px;" src="https://www.youtube.com/embed/crUeKptx_zw" width="1103" height="619" allowfullscreen="allowfullscreen"></iframe></p>
<p>मध्य प्रदेश महिला वित्त निगम के महाप्रबंधक अरविन्द सिंह भाल जो न्यूयॉर्क में रेखा के साथ थे कहते हैं, " पेंड्राम यूं तो केवल 10वीं तक पढ़ी हैं. लेकिन उनकी वैचारिक शक्ति बहुत मजबूत है. वो अपने धुन की पक्की है और एक मजबूत इच्छा शक्ति वाली महिला है. उन्होंने तेजस्विनी के साथ जुड़कर हजारों महिलाओं की आर्थिक स्थिति को सुधारा". रेखा के साथ उस वक़्त मध्य प्रदेश की महिला एवं विकास मंत्री, और विभाग की प्रमुख सचिव भी अमेरिका गयी थी. लेकिन दुनिया की नज़रों में  रेखा ही थी.</p>
<p>डिंडोरी की बैगा आदिवासी रेखा पेंड्राम की अपने गांव से न्यूयॉर्क तक की यात्रा नारी सशक्तिकरण की अनूठी कहानी है. जिले की आदिवासी महिलाओं को एक कर उन्हें स्वावलंबी बनाने में उनका बहुत बड़ा योगदान है. अमेरिका में 2017 में उन्होंने खाद सुरक्षा पर मध्य प्रदेश के प्रतिनिधि के रूप में एक प्रेसेंटेशन दिया था. भारी करतल ध्वनि के बीच, उन्होंने दुनिया को खाद्य सुरक्षा, महिलाओं के आर्थिक- सामाजिक उत्थान और उनके स्वास्थ्य सम्बंधित विषयों पर उनके स्वसहायता समूह के महासंघ द्वारा चलाये जा रहे कार्यों का विस्तार से विवरण दिया था. रेखा का प्रयास अब जिले की हर एक महिला को SHG आंदोलन से जोड़ना है.</p>
<p>डिंडोरी जिले के मेहंदवानी के फलवाही गांव की रेखा 2007 में तेजस्विनी महिला स्वसहायता समूह से जुड़ीं. जीवन को दिशा मिली तो उन्होंने गांव-गांव में महिलाओं से संपर्क साधा और महिला समूह खड़े कर दिए. मेहंदवानी विकासखंड की 24 ग्राम पंचायतों और 41 गांवों को जोड़कर एक संघ बनाया और शुरू कर दिया विलुप्त हो रही कोदो-कुटकी की खेती का काम. उस वक़्त शायद रेखा इस बात से अनिभिज्ञ  थी कि वो एक राष्ट्रीय स्तर का कार्य करने जा रही है. कुछ ही वर्षों में उनके समूह ने कोदो कुटकी को राष्ट्रीय परिदृश्य पर ला कर खड़ा कर दिया. 2013 में रेखा को तेजस्विनी महिला स्वसहायता समूह का सचिव बना दिया गया. 2007 उनके पति देव सिंह मजदूर थे लेकिन अब वो कोदो कुटकी की खेती उन्नत तरीके से करते हैं. </p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">रविवार ब्यूरो </dc:creator><pubDate>Tue, 04 Apr 2023 16:09:18 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/photovideo/adivasi-woman-presened-on-kodo-kutki]]></guid><category><![CDATA[वीडियो]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/NxwcHolc3nIzYomOnK6G.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/NxwcHolc3nIzYomOnK6G.jpg"/></item><item><title><![CDATA[ससुराल ने ठुकराया, आज 'बैंक सखी' बन संवार रही है ठीकरी को ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/kahaniyan/bank-sakhi-helps-95-shgs-get-bank-loans</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/5n15ODzGWtWWGYCfRvpS.jpeg"><p>फर्श पर कई महिलाओं के बीच घिरी हुई, पूजा यादव. महिलाओं की ऐसी भीड़ रोज लग जाती है. पूजा इन महिलाओं के कहते खोल रही, तो किसी के आधारकार्ड बना रही. बड़वानी जिले के ठीकरी ब्लॉक में आजीविका मिशन सेंटर पर रोज़ ये नज़ारा दिखता है. जिले में पूजा सफलता के ऐसे रिकॉर्ड बना दिए कि खुद दूसरों के लिए आदर्श बन गई. जिले में अपने काम के बलबूते पर नंबर वन पायदान पर है. आज केवल बारहवीं पास पूजा आज करोड़ों रुपए का हिसाब चुटकियों में कर देती है. लेकिन पूजा को सफलता का ये मुकाम यूहीं नहीं मिला.इस सफर की शुरुआत बहुत कड़वी है.&nbsp;</p><p>अपने लेपटॉप पर काम में व्यस्त पूजा कहती है -"आज मैं आठ घंटे से ज्यादा समय ग्रामीण महिलाओं से घिरी रहती हूं. कभी-कभी खुद पर विश्वास नहीं होता. हर लड़की की तरह मेरे भी सपने थे. शादी अच्छे घर हो. मेरा भी अच्छा परिवार हो. ससुराल वाले मुझे प्यार करे. मेरी शादी भी हुई ,लेकिन मेरे सपने चकनाचूर हो गए. मुझे ससुराल वालों ने नकार दिया. मुझे भगा दिया. ज़िंदगी में अलग-थलग पड़ गई.जीवन में उदासी के अलावा कुछ नहीं बचा</p><blockquote><p>ठीकरी तहसील के ही छोटे से गांव सेगवाल की रहने वाली पूजा अपनी पढ़ाई बारहवीं तक कर पाई. परिवार के लोग भी बहुत परेशान थे.पूजा ने कुछ दिन बाद चुप्पी तोड़ी. पूजा आगे बताती &nbsp;है - <em>"मैंने खुद को साबित</em></p><p><em>&nbsp;करने की ठान ली.तीन साल पहले गणगौर महिला स्वसहायता समूह बनाया. ग्राम संगठन से जुड़ी. सबसे बड़ी दिक्क्त थी नई टेक्नोलॉजी नहीं आती थी. लेपटॉप ऑपरेट करना सीखा. देखते ही देखते सब आसान लगने लगा.अब तक मैं 95 समूहों कि सैकड़ों दीदियों को दो करोड़ अस्सी लाख रुपए के लोन दिलवा चुकी हूं. ये जरूरतमंद महिलाएं अपने रोजगार से जुड़ गई.आजीविका मिशन से &nbsp;मेरी ज़िंदगी पूरी तरह बदल गई."&nbsp;</em></p><p>पूजा ने जिन महिलाओं को लोन दिलवाए वे महिलाएं किराना,जनरल स्टोर, आटा चक्की, सिलाई मशीने और मवेशी पालन का कारोबार कर रहीं हैं. सेगवाल की लक्ष्मी बाई कहती हैं -<em>" लोन मिल गया तो दूध डेयरी खोल ली. मजदूरी और दूसरे काम में भी घर नहीं चल पाता था." एक दूसरी दीदी सुनीता धनगढ़ बताती हैं -" गांव मदरानिया में ही लोन से छह भैसें खरीदी. दूध बेच कर कमाई शुरू कर दी. अब मैं &nbsp;मजदूरी पर नहीं जाती.ये लोन हमें पूजा दीदी ने दिलवाए. हम लोग कभी बैंक गए ही नहीं."</em></p></blockquote><p>ब्लॉक प्रबंधक श्रद्धा शर्मा कहती हैं - "<em>यहां दीदियां बहुत मेहनती हैं. सभी क्षेत्र में ये दीदियां काम कर रहीं हैं. इन सभी को लगातार प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाती है. सहायक ब्लॉक प्रबंधक सूरज जमरे हर सेंटर का नियमित दौरा करती है."&nbsp;</em>जिले में चर्चित हुए यहां के ग्राम संगठन को लेकर जिला पंचायत के परियोजना प्रबंधक योगेश तिवारी ने बताया- "ठीकरी ब्लॉक में सभी सहायता समूह बहुत अच्छा काम कर रहे हैं. मजदूरी &nbsp;से अब ये दीदियां खुद के पैरों पर खड़ी हो रही हैं.पूजा सबसे सफल बैंक सखी कि पहचान बना चुकी है।"&nbsp;</p><p>आदिवासी जिले में मजदूरी को अपनी किस्मत मान लेने वाली ये दीदियां खुद अब अपनी किस्मत बदलने को बेताब हैं. पूजा और परिवार को ख़ुशी है कि तलाक जैसी घटना को भूल कर वह अब ग्रेजुएशन कर रही है.&nbsp;</p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">विवेक वर्द्धन श्रीवास्तव </dc:creator><pubDate>Thu, 23 Mar 2023 14:42:46 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/kahaniyan/bank-sakhi-helps-95-shgs-get-bank-loans]]></guid><category><![CDATA[कहानियां]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/5n15ODzGWtWWGYCfRvpS.jpeg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/5n15ODzGWtWWGYCfRvpS.jpeg"/></item><item><title><![CDATA[देसी लव फेस्टिवल .... ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/khabar/desi-love-festival-of-adivasis</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/q2NjPBTH9rqeHTpgwpBp.jpeg"><p>इस समय हम घूम रहे हैं इंदौर से दो सौ किमी दूर खरगोन जिले के धुलकोट में. जैसे-जैसे सूरज चढ़ रहा है वैसे-वैसे गांव के हाट में भीड़ बढ़ रही है. आदिवासी फैशन की झलक साफ दिखाई दे रही है. मांदल की थाप ... बांसुरी की धुन... गुड़ की जलेबी,मोटी सेंव और बर्फ के गोले के साथ आसमान छूते हाथ के झूले में खुर्राटी भरते आदिवासी उनके खास त्यौहार भगौरिया की मस्ती में झूम उठे. होली की दस्तक के पहले चाहत और रंगों से सराबोर इस त्यौहार का आदिवासियों को साल भर इंतज़ार रहता है. प्रदेश के पश्चिमी इलाके में अलीराजपुर, झाबुआ, बड़वानी, खरगोन सहित धार के कई गांव में यह मस्ती सप्ताहभर छाए रहेगी. <br>होली जलने तक आने वाले सभी हाट भगौरिया हाट में बदल जाएंगे. धुलकोट से यह शुरुआत हुई.  </p>
<p><img src="https://d2vbj8g7upsspg.cloudfront.net/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/sUh6HeBAC6qTTYJQ2QFL.jpeg" alt="bhagoriya 4"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>आदिवासी भगौरिया हाट (Image Credits: Isahaq Pathan, Khargone)</em></span></p>
<p><img src="https://d2vbj8g7upsspg.cloudfront.net/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/xPD0Ag6MBAfaeh31sO3l.jpeg" alt="bhagoriya 3"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>आदिवासी भगौरिया हाट (Image Credits: Isahaq Pathan, Khargone)</em></span></p>
<p>आदिवासी संस्कृति की झलक उनके खास पहनावे में दिखने लगी. महिलाएं खासकर युवतियां लिपस्टिक और परंपरागत गहनों में सजी-धजी हाट बाजार पहुंची. जमकर खरीदी की. खास युवकों से मुलाकात की. गांव के लोग शाम होते-होते मांदल की थाप और लोक गीतों गाते हुए निकले. नई युवतियां जहां साड़ियों में दिखीं वहीं युवा लोग अब पेंट-शर्ट पहने नज़र आए. पहले ये धारणा थी कि यह भगौरिया हाट आदिवासियों में रिश्ते तय करने और युवक-युवतियों के मिलने पर आपस में  पसंद करने का उत्सव है. सालों पहले तक यही हेडलाइन्स अख़बारों की सुर्खियां बनती थी. यहां तक टीवी पर भी ऐसे दृश्य दिखाए गए. इसे आदिवासियों का वेलेंटाइन डे तक कहा. वक़्त के साथ बदलते माहौल और शिक्षित होते समाज ने आपत्ति ली. उनका कहना है यह भगौरिया त्यौहार हमारा हाट है. होली के पहले पकती हुई फसलों की खुशियां और होली की तैयारी, खरीदी की जाती है. ऐसे प्रणय प्रसंग नहीं होते. यह धारणा गलत ढंग से प्रस्तुत की गई.</p>
<p> </p>
<p><img src="https://d2vbj8g7upsspg.cloudfront.net/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/YnXAIhzP5BymzNv1Bfe3.jpeg" alt="bhagoriya 2"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>आदिवासी भगौरिया हाट में युवतियां (Image Credits: Isahaq Pathan, Khargone)</em></span></p>
<p><span style="font-size: 12pt;"><em>धुलकोट के सरपंच सालकराम किराड़े ने कहा -" यह हमारा खास त्यौहार है. होली की तैयारी और खरीदी के बाद एक दूसरे को गुलाल लगाते हैं. अब शिक्षित हो जाने का असर हाट पर दिखने लगा है. समाजसेवी सुभाष डावर ने बताया - "फसल यदि अच्छी होती है तो हाट में उत्साह दुगना हो जाता है.</em></span></p>
<p><img src="https://d2vbj8g7upsspg.cloudfront.net/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/UqWXUAnBKlMBX1zcnEzt.jpeg" alt="bhagoriya 5"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>आदिवासी भगौरिया हाट में युवती  (Image Credits: Isahaq Pathan, Khargone)</em></span></p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">विवेक वर्द्धन श्रीवास्तव </dc:creator><pubDate>Mon, 13 Mar 2023 11:42:32 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/khabar/desi-love-festival-of-adivasis]]></guid><category><![CDATA[अटरम शटरम]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/q2NjPBTH9rqeHTpgwpBp.jpeg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/q2NjPBTH9rqeHTpgwpBp.jpeg"/></item><item><title><![CDATA[UN तक पहुंचाया कोदो कुटकी को ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/hum-bhi-hero/adivasi-women-presents-at-uno</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/FudyHynjUw11UeLXePfT.jpeg"><p>डिंडोरी की बैगा आदिवासी रेखा पेंड्राम की अपने गांव से न्यूयॉर्क तक की यात्रा नारी सशक्तिकरण की अनूठी कहानी है. जिले की आदिवासी महिलाओं को एक कर उन्हें स्वावलंबी बनाने में उनका बहुत बड़ा योगदान है. अमेरिका में 2017 में उन्होंने खाद सुरक्षा पर मध्य प्रदेश के प्रतिनिधि के रूप में एक प्रेसेंटेशन दिया था. भारी करतल ध्वनि के बीच, उन्होंने दुनिया को खाद्य सुरक्षा, महिलाओं के आर्थिक- सामाजिक उत्थान और उनके स्वास्थ्य सम्बंधित विषयों पर उनके स्वसहायता समूह के महासंघ द्वारा चलाये जा रहे कार्यों का विस्तार से विवरण दिया था. रेखा का प्रयास अब जिले की हर एक महिला को SHG आंदोलन से जोड़ना है.</p>
<p>"वह एक सपना जैसा था जब न्यूयॉर्क के कैनेडी हवाई अड्डे पर हमारा हवाई जहाज़ उतरा था ", रेखा बताती है. मुझे याद है, दुबली पतली आदिवासी महिला थोड़ा ठहर के कहती हैं, 2007 के पहले में घर से बाहर कम ही निकलती थी. दूसरों से बात करने में एक झिझक होती थी और सरकारी कर्मचारियों से बात करने में थोड़ा डर ही लगता था. लेकिन स्वसहायता समूह से जुड़ने के बाद सब बदल गया. " एकता में शायद ये ही शक्ति होती है". रेखा की अमेरिका अंतर्राष्ट्रीय कृषि विकास कोष द्वारा प्रायोजित थी. और रेखा का प्रेजेंटेशन संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) के हेड क्वार्टर में आयोजित था. प्रेजेंटेशन का शेड्यूल 5 मिनट का था. लेकिन वह चलता रहा, रेखा बोलती रही और दुनिया सुनती रही. "शायद लोग सुनना चाहते थे कि इतनी विपन्नता के बावजूद हम कैसे संघर्ष कर रहे हैं और न केवल खुश हैं बल्कि आर्थिक सामाजिक विकास भी कर रहे हैं", रेखा कहती है. उसके बाद रेखा ने कभी पलट के नहीं देखा.<br> <br>डिंडोरी जिले के मेहंदवानी के फलवाही गांव की रेखा 2007 में तेजस्विनी महिला स्वसहायता समूह से जुड़ीं. जीवन को दिशा मिली तो उन्होंने गांव-गांव में महिलाओं से संपर्क साधा और महिला समूह खड़े कर दिए. मेहंदवानी विकासखंड की 24 ग्राम पंचायतों और 41 गांवों को जोड़कर एक संघ बनाया और शुरू कर दिया विलुप्त हो रही कोदो-कुटकी की खेती का काम. उस वक़्त शायद रेखा इस बात से अनिभिज्ञ  थी कि वो एक राष्ट्रीय स्तर का कार्य करने जा रही है. कुछ ही वर्षों में उनके समूह ने कोदो कुटकी को राष्ट्रीय परिदृश्य पर ला कर खड़ा कर दिया. 2013 में रेखा को तेजस्विनी महिला स्वसहायता समूह का सचिव बना दिया गया. 2007 उनके पति देव सिंह मजदूर थे लेकिन अब वो कोदो कुटकी की खेती उन्नत तरीके से करते हैं. </p>
<p>स्वसहायता समूह से जुड़ने के 7 सात साल बाद ही 2014 में रेखा को सीताराम राव एशिया पेसीफिक लाइवलीहुड अवॉर्ड से सम्मानित किया गया. ये सम्मान भी रेखा को उनके द्वारा किये गए खाद्य सुरक्षा, महिलाओं के सामाजिक व आर्थिक उत्थान, स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों, महिलाओं व बच्चों के पोषण के क्षेत्र में सराहनीय योगदान का नतीजा था.</p>
<p>"आदिवासी व गरीब -पिछड़े इलाके में जन्म, उसके बाद शादी फिर बच्चे और इस दौरान किन-किन परेशानियों का मैंने सामना किया इसे भी दुनिया के सामने रखूंगी. लेकिन मैंने कभी हिम्मत नहीं हारी. मुझे जैसे ही समूह से मिलने का मौका मिला मानो जैसे शरीर में ऊर्जा का संचार  सा हो गया. पहले महिलाओं को एक करना और फिर मिलजुल विलुप्त हो रही खेती के प्रति लोगों को जागरूक किया. नतीजा आपके सामने है. </p>
<p><img src="https://d2vbj8g7upsspg.cloudfront.net/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/TmSGEXpRFramb3oidOVU.jpeg" alt="dindori kodo kutki"></p>
<p><em><span style="font-size: 8pt;">(Image Credits: Ravivar Vichar)</span></em></p>
<p>मध्य प्रदेश महिला वित्त निगम के महाप्रबंधक अरविन्द सिंह भाल जो न्यूयॉर्क में रेखा के साथ थे कहते हैं, " पेंड्राम यूं तो केवल 10वीं तक पढ़ी हैं. लेकिन उनकी वैचारिक शक्ति बहुत मजबूत है. वो अपने धुन की पक्की है और एक मजबूत इच्छा शक्ति वाली महिला है. उन्होंने तेजस्विनी के साथ जुड़कर हजारों महिलाओं की आर्थिक स्थिति को सुधारा". रेखा के साथ उस वक़्त मध्य प्रदेश की महिला एवं विकास मंत्री, और विभाग की प्रमुख सचिव भी अमेरिका गयी थी. लेकिन दुनिया की नज़रों में  रेखा ही थी.</p>
<p>समूह से जुड़ने के कुछ वर्षों बाद रेखा फलवाही गांव से मेहंदवानी ब्लॉक शिफ्ट हो गयी जहां उनके संघ का दफ्तर है. रेखा संघ की सचिव हैं और उनकी देख रेख में  275 SHG  की लगभग  4000 महिलाएं काम करती हैं. रेखा का दिन सुबह 8. 30 पर शुरू हो जाता है जब वो अपने दफ्तर पहुंच जाती हैं. "उसके बाद दिन कब खत्म हो गया पता ही नहीं चलता", वो बताती हैं, "दिन भर लोगों से मिलना, समूह और महासंघ के कामो की मॉनिटरिंग दिन भर चलती रहती है. </p>
<p>" ये एक बिज़नेस हेड के काम सामान है. कोदो कुटकी के भाव पर नज़र रखनी पड़ती है. जब भाव तेज हुआ तो तुरंत माल निकालना पड़ता है. फिर कूकीज और नमकीन की सप्लाई पर ध्यान भी देना पड़ता है," अपने पल्लू से चेहरे का पसीना पोंछती हुई रेखा बताती हैं. </p>
<p>रेखा कहती हैं, स्वसहायता समूह के आंदोलन ने आदिवासी समाज के एक बड़े तबके की, जिसमे वो खुद भी शामिल हैं, ज़िंदगी बदल दी. " गरीब हम तब भी थे, गरीब हम अब भी हैं लेकिन उस और इस गरीबी में जमीन आसमान का अंतर है. अब हम मन और विचारों से गरीब नहीं हैं. अगर परेशानी है तो उसका रास्ता निकालना हमे आ गया है," और ऐसा कहते हुए रेखा के चेहरे पर एकआत्मविश्वास भरी मुस्कान थी.</p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">देशदीप सक्सेना </dc:creator><pubDate>Fri, 10 Mar 2023 18:28:27 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/hum-bhi-hero/adivasi-women-presents-at-uno]]></guid><category><![CDATA[हम में है हीरो]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/FudyHynjUw11UeLXePfT.jpeg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/FudyHynjUw11UeLXePfT.jpeg"/></item><item><title><![CDATA[डिंडोरी के समूहों ने कोदो कुटकी को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर पहुंचाया ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/khabar/dindori-shg-cultivating-kodo-kutki</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/D0iEgBNakeRSFdSqXeli.jpeg"><p dir="ltr">ये उच्च पोषक तत्वों का खजाना हैं.पिछले कई दशकों से ये मध्य प्रदेश के आदिवासी जिले डिंडोरी के पथरीले बंजर दिखने वाले भू-भाग में छिपा था.आदिवासी खुद इसका आधा-अधूरा उपयोग कर पाते थे. हम बात कर रहे हैं कोदो और कुटकी जैसे कल तक तुच्छ समझे जाने वाले अनाजों की.ये पोषण तत्वों से भरपूर है, उच्च स्तर प्रोटीन, फाइबर तरह-तरह के मिनरल्स और एंटी ऑक्सीडेंट पाए जाते हैं. पिछले एक दशक में यहां के गोंड और बैगा आदिवासियों  ने कल तक उपेक्षित इन अनाजों की खेती को एक तरह से पुनर्जीवित कर दिया है.    </p>
<p dir="ltr">डिंडोरी जिले के 41 गांवों की बैगा और गोंड महिलाओं  के स्वसहायता समूहों ने तेजस्विनी कार्यक्रम के जरिए कोदो-कुटकी की खेती शुरू की. वर्ष 2012 में 1,497 महिलाओं ने प्रायोगिक तौर पर 748 एकड़ जमीन पर कोदो-कुटकी की खेती की शुरुआत की थी. समूहों की महिलाओं ने राज्य की मदद से आधुनिक तरीके से खेती करना शुरू की. इससे 2,245 क्विंटल उत्पादन हुआ. इससे प्रेरणा लेकर 2013-14 में 7,500 महिलाओं ने 3,750 एकड़ में कोदो-कुटकी की खेती की और15 हजार क्विंटल कोदो-कुटकी का उत्पादन हुआ. कोदो-कुटकी के बढ़ते उत्पादन को देखते हुए नैनपुर में एक प्रसंस्करण यूनिट ने भी काम करना शुरू कर दिया है. बैगा महिलाओं के फेडरेशन द्वारा संचालित इस कोदो-कुटकी कार्यक्रम को वर्ष 2014 में देश का प्रतिष्ठित राष्ट्रीय सीताराम राव लाइवलीहुड अवार्ड से भी नवाजा गया.</p>
<p><img src="https://d2vbj8g7upsspg.cloudfront.net/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/vnEBDqFJ1N8pxGASQ0u0.jpeg" alt="kodo kutki"></p>
<p><em>SHG महिलाएं अपनी फ़सल के साथ (Image Credits: Ravivar vichar)</em></p>
<p> </p>
<p dir="ltr">हालांकि की शुरुआत में काफी दिक्क्तें आई क्योंकि ये वह वक़्त था जब आदिवासियों को कोदो-कुटकी उगाने में रूचि नहीं रह गयी थी. बाजार में ये बहुत कम दाम में बिकता था.किसानों को  कोदो कुटकी की वैज्ञानिक तरीके से   खेती करनी नहीं आती थी और पारम्परिक तरीके से खेत जोतने में  उत्पादन काफी काम था.समाज में भी लोगों  को इस अनाज की न्यूट्रीएंस का वैल्यू जरा भी अंदाज़ नहीं था. और इन्ही कारणों  का नतीजा था कि किसान धान की खेती की तरफ मुंह मोड़ने लगे थे. लेकिन स्वसहायता समूह  और इन समूह की फेडरेशन के कारण सब कुछ बदल गया आज  डिंडोरी जिले के 528 गांव  के 58 हज़ार से ज्यादा आदिवासी मिल कर 39000 हेक्टेयर भूमि पर  35000 मीट्रिक टन से ज्यादा कोदो-कुटकी का उत्पादन कर रहे हैं. </p>
<p dir="ltr">कोदो मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय अफ्रीका में उगाया जाने वाला अनाज है.एक अनुमान के मुताबिक 3,000 साल पहले इसे भारत लाया गया    और  इसलिए ही कोदो  को भारत का एक प्राचीन और ऋषि अन्न माना जाता था. कोदो-कुटकी मधुमेह नियंत्रण, गुर्दो और मूत्राशय के लिए लाभकारी  भी माना जाता है. यह रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक के प्रभावों से भी मुक्त है. कोदो-कुटकी हाई ब्लड प्रेशर के रोगियों के लिए रामबाण बताया जाता है.  इसमें चावल के मुकाबले कैल्शियम भी 12 गुना अधिक होता है. शरीर में आयरन की कमी को भी यह पूरा करता है. इसके उपयोग से कई पौष्टिक तत्वों की पूर्ति होती है.</p>
<p dir="ltr">वर्ष 2009 में जर्नल ऑफ एथनोफार्माकोलोजी में प्रकाशित एक शोध कोदो को मधुमेह के रोगियों के लिए स्वास्थ्यकर पाता है.  वहीँ वर्ष 2014 में प्रकाशित पुस्तक हीलिंग ट्रडिशंस ऑफ द नॉर्थवेस्टर्न हिमालयाज के अनुसार कोदो बुरे कोलेस्ट्रोल घटाने में भी मददगार साबित होता है.</p>
<p dir="ltr">अब और क्या चाहिए. देखते ही  देखते इसकी ख्याति भारत की मेट्रो सिटीज और अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों में फ़ैल गयी.आदिवासियों को अपने उत्पादन का अच्छे दाम मिलने लगे.  </p>
<p> </p>
<p><img style="width: 464px; height: 348px;" src="https://d2vbj8g7upsspg.cloudfront.net/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/0lfY6m8AuJVIRasec5fv.jpeg" alt="kodo"></p>
<p><em>कोदो (Image Credits: Ravivar vichar)</em></p>
<p> <img src="https://d2vbj8g7upsspg.cloudfront.net/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/NGoFFPsWOtIAhepik28h.jpeg" alt="kodo kutki"></p>
<p><em>कुटकी (Image Credits: Ravivar vichar)</em></p>
<p dir="ltr">चंदा महिला स्वसहायता समूह की अंजना मरावी बताती हैं कि- " जितने भी परिवार इसकी खेती कर रहे हैं वह अपना उत्पादन घर पर ही  स्टोर करते हैं. फिर समूहों  के फेडरेशन की मदद  से इससे बाजार में बेच दिया जाता है.हम बाजार में अच्छे रेट का इंतज़ार करते हैं जो समूह   बनने क पहले संभव नहीं था". </p>
<p dir="ltr">समूह की महिलाएं अपने उत्पादन का कुछ अंश साल भर अपने इस्तेमाल के लिए भी रख लेती हैं. ज्यादातर आदिवासी परिवारों क पास  पांच   एकड़ या उससे कम जमीन ही है.</p>
<p dir="ltr">समूह की अन्य  महिला कार्यकर्ता फूलवती बताती हैं, " कोदो  थोड़ा बड़ा होता है और  उसका रंग भूरा  होता है वहीं कुटकी छोटा और काले रंग का होता है.पहले हमें इसका रेट 7-8 रूपए प्रति किलो मिलता था और इसलिए किसान इसका उत्पादन खत्म करते जा रहे थे."</p>
<p dir="ltr">"लेकिन स्वसहायता समूह बनने के बाद जैसे चमत्कार हो गया.अब कोदो की कीमत 30 -35 रूपए प्रति किलो कुटकी 40 -45  प्रति किलो  के  दाम मिल जाते हैं."</p>
<p dir="ltr">कोदो-कुटकी के उत्पादन के बाद आदिवासी  परिवार आर्थिक रूप से मजबूत भी हुए हैं. " एक समय था जब हम स्थानीय सूदखोरों के चंगुल में फंसे रहते थे. कई लोग अपने गहने भी  सूदखोरों के चक्कर में गंवा देते थे. लेकिन यहां अब कोई उधार नहीं लेता. कोदो-कुटकी से हमारी  आय में खासी वृद्धि हो गयी है", समलिया,गोंड आदिवासी  महिला ,रानी दुर्गावती स्वसहायता समूह की सुनीता और बजरंग महिला समूह की तेजस्वनी कहती है," डिंडोरी की कोदो-कुटकी देश भर में हमारी दीदियों  स्वसहायता समूहों  की पहचान बन चुकी है. हमें गर्व है की हम लोग     देश में  पोषक आहार सप्लाई कर देश निर्माण का काम कर रहे हैं."</p>
<p><img src="https://d2vbj8g7upsspg.cloudfront.net/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/vQYzTwiTsa1o3GDCzu7i.jpeg" alt="kodo"></p>
<p><em>कोदो कुटकी की प्रोसेसिंग यूनिट (Image Credits: Ravivar vichar)</em></p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">देशदीप सक्सेना </dc:creator><pubDate>Sat, 25 Feb 2023 15:42:25 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/khabar/dindori-shg-cultivating-kodo-kutki]]></guid><category><![CDATA[ख़बर]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/D0iEgBNakeRSFdSqXeli.jpeg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/D0iEgBNakeRSFdSqXeli.jpeg"/></item><item><title><![CDATA[अब हम हैं बॉस… ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/nazariya/adivasi-women-running-shg</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/txmjMFzI0M5oQwUH0Hmg.jpg"><p dir="ltr">'सरकारी' यह शब्द सुनते ही आदिवासी इलाकों की महिलाओं को कुछ अनमना सा लगता था. चक्कर पर चक्कर, कागज़ पर कागज़ , रुतबे का ज़ोर यह सब आंखों के सामने घूम जाता. सरकारी दफ़्तरों की सीढ़िया चढ़ना तो दूर की बात रही सरकारी इमारतों के पास जाने में थोड़ा अजीब लगता था. एक दिन इन्ही महिलाओं ने टीवी पर बचत गट के बारे में सुना तो उन्हे लगा फिर कोई 'सरकारी' स्कीम आई है. किसी ने ध्यान ही नहीं दिया. धीरे धीरे बचत गट के इश्तहार बढ़ने लगे और आदिवासी महिलाओं की जिज्ञासा भी. उन्हे लगा कि शायद हम आदिवासी बहनें भी इस गट से जुड़कर कुछ बड़ा कर सकती हैं.  यह ख़याल अभी दिमाग में उपजा ही था कि मन में सवाल आये, ये गट आख़िर है क्या? कैसे बनेगा गट? सरकारी बाबुओं के हाथ पैर तो नहीं जोड़ने पड़ेंगे? इन सब सवालों के बीच कोशिश शुरू हुई, सबने साथ बैंकों के चक्कर लगाए, पोस्ट ऑफिस में पता किया, फिर एक दिन नगरपालिका जाना हुआ, और ऐसे रास्ते खुलते चले गए.</p>
<p dir="ltr">स्वर्ण जयंती शहरी रोजगार योजना के तहत SHG जिसे हम बचत गट कहतीं है, शुरू किये.  एक से दो, दो से चार, और धीरे-धीरे महिलायें खिंची चली आई.  मरीमाता महिला बचत गट, जलगाँव की सदस्यों ने मुद्रा नोटों को बाँधने वाले धागों की कमी पूरी करने का एक अवसर देखा - क्योंकि बैंकों ने अब स्टेपल पिन से धागों पर स्विच किया. फिर क्या था, हम आदिवासी बहनें सरकार को नोट बांधने के धागे बेचने लगीं. </p>
<p dir="ltr">हम तो ज़मीन से जुड़े लोग हैं. कुछ बहनों ने खेत की मालकिन बनने का सपना देखा. बचत गट में बचत करी, 20 हज़ार रुपयों का बैंक लोन लिया और 4 एकड़ ज़मीन खरीदी. कपास और तुअर की बुवाई की. सुरेखा ने पल्लू से मुंह ढकते हुए कहा, "जब मैं तुअर की फ़सल को खिलता हुआ देखती हूं, तो ऐसा लगता है जैसे हमारे हरे-भरे खेत में तारे उतर आए हों."</p>
<p dir="ltr">अन्ना भाऊ साठे स्वसहायता महिला बचत गट, मलकापुर से मंगल बाई लागे कहती हैं , "हम मतंग (अनुसूचित जाति) की औरतें अक्षर तक नहीं जानती, हमारा जीवन चूल्हे चौके तक ही सीमित था. एक वक्त की रोटी का जुगाड़ बड़ी मुश्किल से हो पाता था. लेकिन हमारे SHG ने हमें उम्मीद दिलाई. अब हमारी दस महिलाओं के समूह का झाडू, टोकरियां और बांस के शोपीस बनाने और बेचने का अच्छा काम है." </p>
<p dir="ltr">24 महिलाओं के हमारे बचत गट ने हर महीने 50 रुपये की बचत की. एक सदस्य निलोफर शेख ने पेप्सी मशीन के लिए 5 हज़ार रुपये लिए; शांताबाई देओकर ने अपनी सास के ऑपरेशन के लिए 10 हज़ार रुपये लिए; जनाबाई जाधव ने अपने पति के गुज़र जाने के बाद अपनी बेटी की शादी के लिए 5,000 रुपये लिए. आज अपने बचत गट की वजह से ही हम सब साहूकार के क़र्ज़ के जाल से बाहर आ पाए. हमने 10 हज़ार रुपये में एक तैयार अंगूर का बगीचा खरीदा और सीधे बाज़ार में अंगूर बेच 13,300 रुपये कमाए, 3,300 का लाभ हुआ."</p>
<p dir="ltr">शराबी पति से तंग आकर लता कोहले ने तलाक ले लिया और अपने दो बच्चों के साथ मायके आ गईं. वह एक बचत गट में शामिल हुई और बचत करने लगी, लेकिन उनके पति ने परेशान करना नहीं छोड़ा. लता आत्महत्या करने का सोचने लगी. बचत गट की महिलाओं ने लता का साथ दिया. पुलिस के पास गईं और उसके पति को गिरफ़्तार करवाया. स्व सहायता समूहों में महिलाओं के सक्रिय होने और उनके घर से बाहर निकलने के कारण अब उनके समाज में धीरे-धीरे घरेलू हिंसा के मामलों में कमी आई है. </p>
<p dir="ltr">ये उन आदिवासी महिलाओं की कहानी है जो 'बेचारी' बन कर रहना नहीं चाहतीं.  स्वसहायता समूहों से जुड़कर इन महिलाओं ने उन लोगों को मुंह तोड़ जवाब दिया है जो कहते थे, "अरे, आदिवासी औरत है, ये क्या करेगी?" SHG ने इन महिलाओं को साहूकारों के चंगुल से निकाला, अपनी कमाई शुरू करवाई, फाइनेंशियल लिट्रेसी की समझ बढ़ाई और सपने देखने की हिम्मद दी. आज इन महिलाओं ने शिक्षा की अहमियत को समझा और अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा देने का संकल्प लिया.  </p>
<p dir="ltr">अनुसूचित जनजाति (एसटी) देश की आबादी का लगभग 8.6% है. अगर हम आंकड़ों की ओर नज़र दौडाएं तो पायेंगे कि 49.35 % आदिवासी महिलाएं वर्क फाॅर्स का हिस्सा हैं. ये महिलाएं बहुत कम पैसों में खेत मालिकों के यहां मज़दूरी कर रही हैं. बेहतर काम की तलाश उन्हें शहरों में सफाई कर्मचारी बना देती है. सीज़नल फल या सब्ज़ियों को बेचना उन्हें साल में एक-दो बार कमाई दे देता हैं. </p>
<p dir="ltr">आदिवासी महिलाओं की स्थिति बद्दतर है लेकिन ऐसी निराशाजनक स्थितियों में भी  SHG ने इन्हें यह हौसला दिया कि वो भी मुख्य धारा से जुड़कर भारत में चल रही महिलाओं की आर्थिक क्रांति का हिस्सा बन पाए. किसी की नौकरी करने के बदले खुद बॉस बन जाये. रविवार विचार का मानना है कि हर तबके की महिलाओं की आर्थिक आज़ादी के लिए सरकारी व ग़ैर सरकारी संस्थानों को मिलकर आगे आना होगा.  ये स्वसहायता समूह आदिवासी महिलाओं के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक मज़बूती की वजह बन सकेंगे.  </p>
<p dir="ltr"><img src="https://d2vbj8g7upsspg.cloudfront.net/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/QWYH0GA1aI803FLGPsNr.jpg" alt="sc"></p>
<p dir="ltr"><em>(Image Credits: Google Images)</em></p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">रविवार ब्यूरो </dc:creator><pubDate>Mon, 20 Feb 2023 17:59:30 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/nazariya/adivasi-women-running-shg]]></guid><category><![CDATA[नज़रिया]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/txmjMFzI0M5oQwUH0Hmg.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/txmjMFzI0M5oQwUH0Hmg.jpg"/></item></channel></rss>