<rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" xmlns:dcterms="http://purl.org/dc/terms/" xmlns:geo="http://www.w3.org/2003/01/geo/wgs84_pos#" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/" xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/" xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/" version="2.0"><channel xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/"><title><![CDATA[ आत्मनिर्भर]]></title><link>https://ravivarvichar.in/tags/aatmnirbhr</link><description/><atom:link href="https://ravivarvichar.in/rss/tags/aatmnirbhr" rel="self"/><language>en-us</language><lastBuildDate>Tue, 30 Jan 2024 00:00:40 +0530</lastBuildDate><item><title><![CDATA[वेस्ट से बेस्ट पेपर बेग ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/kahaniyan/shg-women-making-bags-from-newspaper</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/oVgbFe0n71aLYpRJDKLu.jpeg"><p>मनीषा पाटीदार और अलका  तिवारी के हाथों में अखबार का पेपर है. वही पेपर जो रद्दी हो गया.जिसे हम रद्दी वाले को बेचने के सिवाय कुछ उपयोग में नहीं लाते. उसी अख़बार को बड़े खूबसूरत अंदाज़ में मनीषा ने नया शेप दे दिया. देखते ही देखते पेपर बेग तैयार हो गया. मनीषा ,अनिता के चेहरे पर मुस्कान आ गई. वह पिछले छह दिन से ऐसे  ही बेग बनाने की प्रेक्टिस कर रही थी. आज वह बहुत ही सुंदर बेग बनाना सीख गई. ये स्वसहायता समूह से जुड़ी महिलाएं खरगोन जिले की हैं. आजीविका मिशन ने ऐसी 15 महिलाओं को पहली बार पेपर बेग बनाने की ट्रेनिंग दी.  बिना किसी लागत के इस कारोबार को लेकर महिलाओं ने नए सपने संजोये और भरोसा हो गया कि वह अब अपने पैरों पर खड़ी हो जाएंगी.</p>
<p>दरअसल पॉलीथिन के उपयोग और बढ़ते खतरे से निपटने के लिए कुछ महिलाओं ने आगे कदम बढ़ाए. गांव में फेंकी गई पॉलीथिन की थैलियां, पन्नियां को  मवेशियों द्वारा खा लेने के बाद तड़प -तड़प कर मरते देख महिलाओं का दिल पसीज गया. यह घटनाएं गांव में सामान्य है. मवेशियों की मौत और पशु पालकों के लाखों के नुकसान का असर ये हुआ कि महिलाओं ने विकल्प तलाशना शुरू किए. हर हाल में पॉलीथिन का बढ़ता उपयोग और उसके नुकसान से बचने के लिए महिलाओं ने ठान ली.कपड़े की थैलियों के घटते प्रचलन से गांव की महिलाओं सहित दूसरे लोग भी परेशान थे. जहां चाह,वहां राह की सोच रखने वाली इन महिलाओं के लिए आजीविका मिशन प्रोजेक्ट राह बन कर आ गई. महिलाओं ने अलग-अलग गांव में स्वसहायता समूह बनाए. रास्ता भी मिला और विकल्प भी. </p>
<p>रानी लक्ष्मी स्वसहायता समूह की मनीषा पाटीदार  कहती हैं -" मैं कई दिनों से परेशान थी. रामपुरा गांव में समूह बनाया पर कोई खास काम नहीं हो पा रहा था. बेग बनाने में कोई अलग खर्ज या बजट कि जरूरत नहीं होगी. इसी समूह कि पारू पाटीदार और वंदना भी खुश हैं. गांव की ही महालक्ष्मी समूह की आशा यादव कहती हैं -" मेरे पास केवल दो एकड़ जमीन है. इतना खर्च नहीं निकल पाता. मुझे पाता चला कि बेग बनाने की ट्रेनिंग दी जा रही है. मैंने मन लगा कर सीखा. "रामपुरा की ही महिला शक्ति समूह की अलका यादव  ने भी ट्रेनिंग ली. वे  कहती हैं -" हमारे समूह में कई गरीब महिलाएं भी हैं. उनको इस धंधे से लाभ मिलेगा. गोपालपुरा की अनिता तिवारी कहती हैं -इस ट्रेनिंग में बेग बनाने में कोई लागत नहीं आती. हमारे पास कोई बजट नहीं था. अब बेग बनाकर कारोबार करेंगे इस ट्रेनिंग में ज्योति ,किरण आदि भी शामिल हुई.  </p>
<p><img src="https://d2vbj8g7upsspg.cloudfront.net/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/mwElpOnIZmj6491BqGEp.jpeg" alt="paper bags"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>(समूह द्वारा बनाये पेपर बैग Image Credits: Ravivar vichar)</em></span></p>
<p>आजीविका मिशन ने इस प्रोजेक्ट पर खास फोकस किया. मिशन की परियोजना प्रबंधक सीमा निगवाल ने बताया कि आरसेटी द्वारा यह ट्रेनिंग दिलवाई गई.यह ट्रेनिंग लगातार जारी रहेगी.महिलाओं को लगातार प्रोत्साहन दिया जा रहा है.  नरेश  शेंद्रे का कहना है - यह ट्रेनिंग खास विशेषज्ञों ने महिलाओं को दी. महिलाएं केवल पांच सौ रुपए में अपना कामकाज शुरू कर सकती है. ट्रेनर हितेश पंवार ने बताया कि रद्दी पेपर से किराना सामान में उपयोग कर सकते हैं. आजकल शॉपिंग मॉल में जी पेपर बेग का उपयोग करते हैं, उनको बनाने कि भी ट्रेनिंग दी गई. ये पेपर थोक में सस्ते मिल जाता है. अब तक वे खरगोन के अलावा धार ,हरदा ,बैतूल ,छिंदवाड़ा शहरों में भी महिलाएं ट्रेनिंग ले कर काम शुरू कर चुकी हैं. </p>
<p><img src="https://d2vbj8g7upsspg.cloudfront.net/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/YAFSkAysm2GMula7bJye.jpeg" alt="paper bags"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>(समूह द्वारा बनाये पेपर बैग Image Credits: Ravivar vichar)</em></span></p>
<p>जिला पंचायत की सीईओ ज्योति शर्मा कहती हैं -" यह प्रोजेक्ट बहुत सफल रहेगा. समूह की महिलाओं ने मन लगा कर ट्रेनिंग ली. ऑफिस फाइल्स बनाना भी सीखी जिसका उपयोग हर ऑफिस में किया जाता है. और भी समूह की महिलाओं को इसकी ट्रेनिंग दिलवाई जाएगी.मुझे ख़ुशी है कि जिले में महिलाएं कई तरह के रोजगार से जुड़ कर परिवार में कंधे से कंधा मिला कर साथ चल रहीं है. "कलेक्टर शिवराज सिंह वर्मा कहते हैं -" जिले की महिलाएं बहुत मेहनती हैं. समूह को अलग-अलग क्षेत्रों में रोजगार के अवसर दिलवाए जाएंगे. जिले में बहुत संभावनाएं हैं.महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए स्थानीय विकल्पों पर जोर दिया जा रहा है. " </p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">विवेक वर्द्धन श्रीवास्तव </dc:creator><pubDate>Tue, 30 Jan 2024 00:00:40 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/kahaniyan/shg-women-making-bags-from-newspaper]]></guid><category><![CDATA[कहानियां]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/oVgbFe0n71aLYpRJDKLu.jpeg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/oVgbFe0n71aLYpRJDKLu.jpeg"/></item><item><title><![CDATA[मुरैना में घुल रही शहद की मिठास ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/kahaniyan/world-bee-day-shg-women-become-self-dependent-through-honey-production</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/FXWAyEGSeMQQLqY83VAY.jpg"><p>मुरैना जिला यानि ख़ास स्वाद वाली गजक की पहचान. लेकिन समय के साथ मुरैना में शहद की मिठास भी घुल रही है. शहद उत्पादन को लेकर मुरैना एक नई पहचान बना रहा है. जिले आजीविका मिशन से जुड़े कई स्वयं सहायता समूह (Self Help Group- SHG) की महिलाएं भी शहद उत्पादन में आत्मनिर्भर हो गईं. इसके अलावा शहद उत्पादन से कई किसान और शहद उत्पादक जुड़े, जिसमें उनके परिवार की महिलाएं प्रमुख रूप से भूमिका निभा रही. </p>
<p>मुरैना में आजीविका मिशन, जिला प्रशासन और कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक इसमें खास रूचि ले रहे. इस जिले में लगभग 6 हजार लोग शहद उत्पादन (Honey Production) से जुड़े हुए हैं. स्वयं सहायता समूह से जुड़ी सैकड़ों महिलाएं भी अब इस कारोबार से जुड़ कर अलग-अलग राज्यों में शहद बेच रहीं है. </p>
<p>धूरकुडा गांव में मां संतोषी स्वयं सहायता समूह की अध्यक्ष रेखा धाकड़ कहती है - "मैंने 2018 में समूह का गठन किया. मधुमक्खी पालन की ट्रेनिंग ली. अभी मेरे पास 300 बॉक्स की कॉलोनी है.पिछले साल हमने 7 लाख रुपए का कारोबार किया था. पहाड़गढ़ में प्रोसेसिंग यूनिट जल्दी शुरू होना चहिए, जिससे ज्यादा आदिवासी महिलाओं को काम मिल सके." गांव मिरघान के बजरंग स्वयं सहायता समूह की सदस्य माया देवी कुशवाह कहती है -" पिछले साल मेरे पास 700 बॉक्स थे. इस बार 550 बॉक्स हैं. अच्छे उत्पादन के लिए आगरा जिले के जंगल में कॉलोनी लगाई है. मैं चाहती हूं कि शहद के भाव अच्छे मिले. पिछली बार 150 रुपए किलो तक शहद के भाव थे,जबकि इस बार घट कर 70 रुपए किलो के आसपास आ गए."       <img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/7D09G2yscxqoaFRnWWRY.jpeg" alt="bee day ">  </p>
<p><em><span style="font-size: 8pt;">आजीविका मिशन से जुड़ी महिलाएं (फोटो क्रेडिट : रविवार विचार)</span></em></p>
<p>जिले में SHG की महिलाओं ने इसे खास कारोबार बना लिया.अभी यहां रिकॉर्ड 35 हजार क्विंटल शहद का उत्पादन मधुमक्खी पालकों ने कर लिया.एक लाख कॉलोनी (बॉक्स का समूह जिसमें मधु मक्खी रहती हैं ) में यह उत्पादन लिया जा रहा है. आजीविका मिशन के जिला परियोजना प्रबंधक दिनेश तोमर कहते हैं -" महिलाओं ने शहद उत्पादन में खास रूचि दिखाई. लगभग 500 महिलाएं सीधे तौर पर जुड़ीं हैं,जबकि सैकड़ों महिलाएं परिवार के साथ भी इस व्यवसाय से जुड़ गईं. महिलाओं ने कई टन शहद का उत्पादन कर रिकॉर्ड बनाया.जिले में पहाड़गढ़ में प्रोसेसिंग यूनिट भी लगाई है. "        </p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/3YcEv7BV3K2CFap5eZSO.jpeg" alt="bee day "></p>
<p><em><span style="font-size: 8pt;">मुरैना जिले मधुमक्खी पालन से जुड़ी महिलाओं से चर्चारत अधिकारी और वैज्ञानिक (फोटो क्रेडिट : रविवार विचार)</span></em></p>
<p>जिले सरसों, बरशिन (मवेशियों का चारा), धनिया, अजवाइन आदि का उत्पादन अधिक होने से फ्लॉवरिंग वातावरण मिल जाता है. कृषि विज्ञान केंद्र के सीनियर कीट वैज्ञानिक और हनी बी विशेषज्ञ डॉ. योगेश यादव कहते हैं - " मुरैना में शहद उत्पादन को लेकर मधु मक्खियों को अनुकूल माहौल मिलता है. मुझे ख़ुशी है कि छह हजार से ज्यादा लोग खास कर महिलाएं भी शहद उत्पादन से जुड़ी हुईं है. यहां लगातार उत्पादन बढ़ रहा है. इसकी शुद्धता बढ़ाने के लिए जिले में तीन प्रोसेसिंग यूनिट लगाई है. यह प्लांट जौरा में दो और पहाड़गढ़ में एक हैं. सरसों फ्लॉवरिंग अधिक होने से यह ख़ास पसंद बनी हुई है. मुरैना में ही एक लाख 70 हजार हैक्टेयर में सरसों की फसल लगाई जाती है.एक बॉक्स में रानी और 300 नर  मधु मक्खी केअलावा लगभग 60 हजार श्रमिक मधु मक्खियां रहती हैं जो फूलों का रस इकठ्ठा करती हैं. "</p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/UqKXBFFXbZTW9iqndw6Z.jpeg" alt="bee day "></p>
<p><em><span style="font-size: 8pt;">मुरैना जिले में लगी मधुमक्खी की कॉलोनी, पास में लगे सरसों के खेत (फोटो क्रेडिट: रविवार विचार)</span></em></p>
<p>मधुमक्खी पालन को लेकर कई सावधानी रखना होती है. इसकी खास ट्रेनिंग के बाद ही बॉक्स दिए जाते हैं. वैज्ञानिक अशोक यादव आगे बताते हैं- "हमें भ्रम होता है कि शहद जम जाने का मतलब अशुद्ध है. शहद का प्रकृतिक नेचर है जमना. इसमें नेचुरल ग्लूकोज़ की मात्रा ज्यादा होती है. प्रोसेसिंग यूनिट से शहद का मॉइश्चर और अशुद्धि भी हट जाती है. "</p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/lzSR46tt4ZN5nGSl7xDl.jpeg" alt="bee day "></p>
<p> <em><span style="font-size: 8pt;">मुरैना जिले में लगी प्रोसेसिंग यूनिट को समझाते हुए अधिकारी और वैज्ञानिक (फोटो क्रेडिट: रविवार विचार)</span></em></p>
<p>जिले में जिला प्रशासन भी महिलाओं को इस कारोबार से जोड़ने का प्रयास कर रहा है. जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी इच्छित गढ़पाले कहते हैं - " जिले में मधु मक्खी पालन और कारोबार में महिलाओं को अधिक से अधिक जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है. मुरैना जिला शहद उत्पादन को लेकर नई पहचान बना चुका है. अच्छे भाव मिले यह भी कोशिश की जा रही है. "  </p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/7txQigbcbnGKrRSyvPkP.jpeg" alt="bee day "></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>मुरैना जिले मधुमक्खी पालन से जुड़ी महिलाओं से चर्चारत अधिकारी और वैज्ञानिक (फोटो क्रेडिट: रविवार विचार)</em></span></p>
<p>इस बार शहद उत्पादन अधिक होने और भाव काम मिलने की वजह से उत्पादकों ने स्टॉक अपने पास ही रख लिया है.समूह की महिलाओं के अलावा किसानों की मांग है कि शहद के अच्छे भाव दिलवाने के लिए सरकार प्रयास करे. ग्वालियर -चंबल संभाग के कमिश्नर दीपक सिंह कहते हैं -" मुरैना के किसानों खास कर स्वयं सहायता समूह की महिलाओं ने शहद उत्पादन में नया मुकाम  हासिल किया है. विशेषज्ञों से और ट्रेनिंग दिलवाई जाएगी. आने वाल दिनों कई देशों में एक्सपोर्ट देखने को मिलेगा." </p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">विवेक वर्द्धन श्रीवास्तव </dc:creator><pubDate>Tue, 23 May 2023 11:17:32 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/kahaniyan/world-bee-day-shg-women-become-self-dependent-through-honey-production]]></guid><category><![CDATA[कहानियां]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/FXWAyEGSeMQQLqY83VAY.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/FXWAyEGSeMQQLqY83VAY.jpg"/></item><item><title><![CDATA[फ़ूड वेन का स्वाद चखेंगे विदेशी पर्यटक ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/kahaniyan/self-help-group-in-raisen-started-food-van</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/Sp4gJjLGBl17SdXMQJ9p.jpg"><p>"जब मेरे कैफे फ़ूड वेन (Cafe Food Van) के पास इतने बड़े-बड़े अधिकारी खड़े थे,और जब कहा कि आप तो बहुत अच्छा मोमोज़ बनाती हो. मैं ख़ुशी से न समाई. मैं सोच ही नहीं पा रही थी कि मैं वही हेमलता हूं जो कुछ साल पहले तक खेतों में मजदूरी करती थी. सिर पर ईंट ढोती थी. मेरी और परिवार कि ज़िंदगी ही बदल गई." ख़ुशी से चमकते हुए चेहरा लिए हेमलता पाल अब सब को यह बात कहती है. हेमलता आजीविका मिशन के सरस्वती स्वयं सहायता समूह की अध्यक्ष हैं. अब वे सबसे अध्यात्म,पर्यटन और बुद्ध स्तूप की पहचान वाले सांची में अपना फ़ूड ट्रक चला रही हैं. इनके फ़ूड वेन पर केंद्रीय ग्रामीण एवं पंचायत सचिव शैलेश सिंह और ग्रामीण एवं पंचायत विकास के अपर प्रमुख सचिव मलय श्रीवास्तव पहुंचे. उन्होंने यहां कई तरह के खाने का स्वाद लिया.</p>
<p><img style="width: 580px; height: 326px;" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/QWY6KA0eFTXwG9yWvhBX.jpg" alt="food van"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em> केंद्रीय सचिव शैलेश सिंह और अपर मुख्य सचिव मलय श्रीवास्तव ने सांची में फ़ूड वेन का शुभारंभ किया (फोटो क्रेडिट:अम्बुज माहेश्वरी)</em></span></p>
<p>आजीविका मिशन (Ajeevika Mission) की ओर से बनवाया गया सरस्वती स्वयं सहायता समूह (Self Help Group-SHG) चर्चा में है. यहां शासन ने देशी-विदेशी पर्यटकों को ध्यान में रखते यह मौका महिला समूह को दिया.रायसेन जिले के पर्यटक स्थल सांची पर 500 से अधिक पर्यटक रोज़ आते हैं. यहां फ़ूड वेन को शुरुआत से ही बढ़िया रिस्पॉन्स मिलने लगा. प्रशासन के जिले में नवाचार से स्वयं सहायता समूह की महिलाओं में उत्साह है और उनकी उम्मीद बढ़ गई. अब यहां फ़ूड वेन का स्वाद विदेशी भी चखेंगे. केंद्रीय सचिव सिंह और अपर मुख्य सचिव श्रीवास्तव के साथ कलेक्टर अरविंद दुबे तथा जिला पंचायत सीईओ अंजू भदौरिया भी थी. अपर प्रमुख सचिव श्रीवास्तव ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि प्रदेश में आजीविका मिशन ने महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया दिया.      </p>
<p>मजदूरी कर अपना घर चलाने वाली मुक्तापुर गांव की हेमलता आगे बताती है -" मैं और मेरे पति परसराम पाल खेतों में मजदूरी करते या जहां काम मिला जाता वहां मजदूरी करते. आजीविका मिशन के अधिकारियों ने हमसे समूह बनवाया. सरस्वती समूह की अध्यक्ष बनी. ग्राम संगठन जाग्रति समूह से जुड़े और लोन लेकर पहले आटा चक्की खरीदी. धीरे-धीरे हालत सुधरे. मेरे पति ने चक्की का कारोबार संभाला. मुझे फ़ूड वेन का मौका मिला तो समूह की दूसरी साथी कीर्ति पाल के साथ नई शुरुआत की. अब मैं आत्मनिर्भर हो गई."</p>
<p>आजीविका मिशन की जिला परियोजना प्रबंधक एम. राजा कहते हैं - " लगातार काउंसलिंग के बाद यहां कई समूह बनवाए. ग्रामीण महिलाओं को ट्रेनिंग दिलवाई. हेमलता दीदी को भोपाल भेज कर कुकिंग होटल मैनेजमेंट की खास ट्रेनिंग दिलवाई गई. वह सभी तरह की डिशेस बनाने लगी है.पर्यटकों को बहुत पसंद आने लगा है." जिले में नौ हजार से ज्यादा समूहों में महिलाएं जुड़ गईं. सांची के ब्लॉक प्रबंधक ब्रज भूषण पांडेय बताते हैं - " सांची ब्लॉक में हेमलता पाल का फ़ूड वेन का संचालन बड़ी उपलब्धि है. इनके समूह को और प्रोत्साहित किया जा रहा है. इस समूह में दस मिलाएं जुड़ीं हैं." </p>
<p><br>जिला पंचायत सीईओ भदौरिया ने ख़ुशी जाहिर करते हुए कहा -"जिले में दूसरे समूह से जुड़ी महिलाएं भी अलग-अलग रोजगार से जुड़ चुकीं हैं. यहां महिलाएं बहुत मेहनती हैं और आत्मनिर्भर होना चाहती हैं. उनको प्रोत्साहित किया जा रहा है." </p>
<p><strong>रिपोर्टर : अम्बुज माहेश्वरी </strong></p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">विवेक वर्द्धन श्रीवास्तव </dc:creator><pubDate>Mon, 22 May 2023 11:23:21 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/kahaniyan/self-help-group-in-raisen-started-food-van]]></guid><category><![CDATA[कहानियां]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/Sp4gJjLGBl17SdXMQJ9p.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/Sp4gJjLGBl17SdXMQJ9p.jpg"/></item><item><title><![CDATA[गुजरात की फेब्रिक आर्ट बनी पहली पसंद ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/kahaniyan/dharmishta-training-women-to-become-independent</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/mKUyyeM9zyFjduX1QjY2.jpg"><p>गुजरात में एक घरेलु महिला ने न केवल मेहनत कर आत्मनिर्भर बनी बल्कि अलग-अलग समूह की जरूरतमंद महिलाओं को रोजगार देकर उन्हें भी आत्मनिर्भर बना दिया. इस महिला धर्मिष्ठा ने अलग-अलग जगह जाकर चार हजार से ज्यादा महिलाओं को ट्रेनिंग भी दी. ऐसी ट्रेंड महिलाएं अब अपना रोजगार चला रहीं हैं. ऐसी महिलाएं भी जुड़ीं जो बेसहारा,अकेली या तलाकशुदा हैं. अहमदाबाद की धर्मिष्ठा अशोक भाई चुड़ासमा गुजरात सरकार के कहने पर कई संस्थाओं में ट्रेनिंग देने जाती हैं.</p>
<p>इंदौर में आयोजित मालवा उत्सव में शामिल हुई धर्मिष्ठा कहती हैं -“ मैं ट्रेडिशनल आर्ट और हैंडीक्रॉफ्ट को बचाने में लगी हूं. इस काम से जहां संस्कृति को अगली पीढ़ी तक पहुंचा रहे वहीं जरूरतमंद महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत भी कर पा रहे. मैंने महिलाओं को मदद करने के लिए सिद्धि विनायक संस्था बनाई. 11 सदस्य बने. मैं फैब्रिक जूलरी, मिरर फेब्रिक वर्क, एम्ब्रॉयडरी सहित कई प्रोजेक्ट से जुड़ गए. मुझे ख़ुशी है की इंदौर मालवा उत्सव में हमें लगभग 50 हजार रुपए का वर्क ऑर्डर मिला."</p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/GxNfaxq7UQDWYlWmTSwm.jpg" alt="Gujarat Malwa Utsav"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>फेब्रिक को जमाते हुई धर्मिष्ठा (फोटो क्रेडिट :रविवार विचार) </em></span></p>
<p>अहमदाबाद सेंटर से धर्मिष्ठा अभी 300 महिलाओं के साथ काम करती है. कोरोना काल से  पति अशोक भाई अब मार्केटिंग संभालते हैं. महिलाओं को दिक्क्त न हो इसलिए उनको घर जा कर कच्चा माल दे दिया जाता है. वे घर से ही सामान तैयार कर सेंटर पर भेज देती है. इस संस्था से जुड़ी पायल परमार कहती है -" हैंडीक्रॉफ्ट आइटम और फेब्रिक हैंडवर्क से मैं आत्मनिर्भर हो गई. मेरे आर्थिक हालात सुधर गए. मैं 12 से 15 हजार रुपए महीने कमा लेती हूं." इस संस्था से 60 अधिक महिलाएं सखी मंडल ( SELF HELP GROUP -SHG )  की सदस्य हैं जिन्हें रोज काम मिल जाता है. इस संस्था की एक और महिला धर्मिष्ठा भी जुड़ गई. धर्मिष्ठा कहती है -" मेरी आर्थिक हालत अच्छी नहीं थी. जब से इस काम में जुटी हर महीने दस हजार रुपए महीने से ज्यादा कमा लेती हूं."</p>
<p>इस संस्था के सदस्यों के साथ संस्था अध्यक्ष धर्मिष्ठा अब तक अहमदाबाद के अलावा सूरत ,बड़ौदा ,गांधीनगर ,इंदौर ,सौराष्ट्र और दिल्ली के मेले में अपनी प्रदर्शनी लगा चुकीं  हैं. धर्मिष्ठा आगे बताती है -" सबस ज्यादा फायदा हमें कच्चा माल लेने में होता है. हम कॉटन और दूसरा फेब्रिक अहमदाबाद से ही ले लेते हैं. इस पर डिमांड के अनुसार तैयार करते हैं. मिरर वर्क ब्लाउस की कीमत 2 हजार रुपए तक होती है और महिलाएं मेले में बड़े शौक से खरीदती हैं. हम इस आर्ट को और राज्यों तक ले जाएंगें. "</p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">विवेक वर्द्धन श्रीवास्तव </dc:creator><pubDate>Sun, 21 May 2023 13:20:38 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/kahaniyan/dharmishta-training-women-to-become-independent]]></guid><category><![CDATA[कहानियां]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/mKUyyeM9zyFjduX1QjY2.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/mKUyyeM9zyFjduX1QjY2.jpg"/></item><item><title><![CDATA[महिलाओं के सपनों की बन रही जूलरी ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/kahaniyan/neelkanth-woman-shg-making-handmade-jewellery-to-become-financially-independent</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/9vcYgvUNanmfUyEUBCzT.jpeg"><p>" मैं पहले से ही सिलाई का काम कर रही थी. पर मुझे लगा कि कुछ ऐसा काम करूं कि दूसरी जरूरतमंद महिलाओं को भी काम दे सकूं. मैंने नीलकंठ सखी मंडल बनाया. इसमें दस महिलाओं का समूह (self help group-SHG) बना कर हैंडीक्रॉफ्ट आइटम (handicraft) बनाना शुरू किया. कुछ सीखा और कुछ मन से तैयार किया. मुझे ख़ुशी है कि मैं 15 दूसरी जरूरतमंद महिलाओं को भी रोजगार दे सकी.अब हम देशभर के हस्तशिल्प मेले में जाकर हिस्सा लेते हैं. हमारे प्रोडक्ट को बहुत पसंद किया जा रहा है." नीलकंठ सखी मंडल की अध्यक्ष मनीषा ने यह बात बहुत गर्व से कही. हाल ही में इंदौर में आयोजित मालवा उत्सव (Malwa Utsav) में शामिल होने आए सूरत गुजरात के नीलकंठ सखी मंडल के स्टॉल पर ग्राहकों की बहुत भीड़ रही. </p>
<p>हस्तशिल्प मेले में शामिल हुए इस समूह की अध्यक्ष मनीषा बेन डोबरिया आगे कहती हैं -" हमारे समूह द्वारा तैयार प्रोडक्ट की मार्केटिंग के लिए मेरे पति राकेश डोबरिया पूरा साथ देते हैं.हम कच्छ से ब्लॉक प्रिंट का बचा वेस्ट कपड़ा खरीद कर लाते हैं.इससे फेब्रिक जूलरी तैयार की जाती है. इसके दूसरे आइटम भी तैयार किए जाते हैं." इस समूह से जुडी हुईं कीर्ति बेन कहती हैं - "हम इस से समूह  से जुड़े तभी से हमारी आर्थिक स्थिति में बहुत सुधार हुआ. हम कच्चा माल ले जाकर अपने घर से आइटम सप्लाई कर देते हैं." इसमें सभी महिलाएं अलग -अलग तरह की चीज़ें बनती हैं. इस समूह के काम से जुड़ीं मित्तल कथिरिया भी बहुत खुश है. मित्तल कहती हैं - " मैंने कभी सोचा नहीं था कि घर बैठ कर भी इतना अच्छा काम मिल जाएगा. कच्चे माल से मैं वूडन जूलरी सहित कई तरह के सामान बना लेती हूं. मुझे कहीं जाना भी नहीं पड़ता और कमाई नहीं अच्छी हो जाती है."  </p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/Ur1lsYbgdOusl6V6qNpE.jpeg" alt="gujarat handicraft"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>समूह के सदस्यों को कई जगह अवार्ड मिल चुके हैं (फोटो क्रेडिट: रविवार विचार)</em></span></p>
<p>गुजरात में भी रोजगार हासिल करना और आत्मनिर्भर बनने की प्रक्रिया में स्वयं सहायता महिला समूह की भूमिका नज़र आने लगी है. नीलकंठ समूह ऐसी हैंडमेड जूलरी बना रहा जो गरीब महिलाओं के सपने और इच्छा तो पूरी कर ही रहा बल्कि समूह से जुड़ी महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत कर रहा.अब तक कई जगह इस समूह को सम्मान मिल चुके हैं. समूह की मनीषा आगे बताती है -" महिलाओं को सबसे ज्यादा जूलरी पसंद है और मंहगी जूलरी पहन नहीं सकती.इसे ध्यान में रख सब आइटम बनाए. इसके अलावा सभी हैंडमेड बेल्ट,मिरर, बटंस और प्रिंट कपड़े जो प्रेस के साथ कपड़ों पर स्थाई डिज़ाइन बन जाता है,बनाए जा रहे. "</p>
<p>मनीषा सभी महिलाओं को साथ लेकर चल रही है. उनके पति राकेश कहते हैं -" मुझे ख़ुशी है  कि महिलाओं को इंदौर,बेंगलुरू, मैसूर, दिल्ली. गुजरात के कई शहर में अहमदाबाद,सूरत,बड़ौदा,पावागढ़ सहित कई शिल्प मेलों में बुलाया. समूह की सभी महिलाओं की आर्थिक हालात सुधर गए. और अब वे सभी स्वाभिमान की जिंदगी जी रहीं हैं."</p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">विवेक वर्द्धन श्रीवास्तव </dc:creator><pubDate>Sun, 21 May 2023 12:40:38 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/kahaniyan/neelkanth-woman-shg-making-handmade-jewellery-to-become-financially-independent]]></guid><category><![CDATA[कहानियां]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/9vcYgvUNanmfUyEUBCzT.jpeg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/9vcYgvUNanmfUyEUBCzT.jpeg"/></item><item><title><![CDATA[ग्रामीण महिलाओं के साथ 'आदित्य बिडला ग्रुप' ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/nazariya/csr-of-aditya-birla-group-work-towards-empowerment-of-rural-women</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/Oj7L05CrcekeU8M3kEv3.jpg"><p>स्वयं सहायता समूह महिलाओं के लिए एक दूसरे से जुड़ने और साथ मिलकर लाभ उठाने का एक कारगर तरीका है. SHG महिलाओं को आगे बढ़ाने के लिए सरकार के अलावा बड़े कॉर्पोरेट्स भी आगे आ रहे हैं. अपनी कॉर्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी (Corporate Social Responsibiity-CSR) गतिविधियों में ग्रामीण महिलाओं को शामिल कर रहे हैं. जानी- मानी बहुराष्ट्रीय कंपनी आदित्य बिडला ग्रुप (एबीजी) ने भी अपने CSR में इन महिलों को जगह दी. आदित्य बिडला ग्रुप (Aditya Birla Group -ABG) भारत के साथ थाईलैंड, दुबई, सिंगापुर, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, चीन, अमरीका, ब्रिटेन समेत 25 देशों में काम कर रहा है.</p>
<p>आदित्य बिडला ग्रुप की सीएसआर पहल ने 45 हज़ार महिलाओं को सशक्त बनाया और उनके लिए एक स्थायी आजीविका का ज़रिया तैयार किया. महिलाएं आत्मनिर्भर हुई और अपना मार्ग खुद चुनने के काबिल बनी. सतत विकास हेतु महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए उन्हें आजीविका से जुड़े कौशल सिखाना, बाजार से जुड़ाव, फंडिंग (funding) सहायता और दूसरे अवसरों से जोड़ने के लिए वित्तीय मुख्यधारा में लाना एबीजी की महिला सशक्तिकरण (women empowerment) पहलों का मूल है. </p>
<h2>उद्यमिता को बढ़ावा देना </h2>
<p>लैंगिक समानता (gender equality) और महिलाओं का सशक्तिकरण - संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों में से एक है, जो एबीजी की CSR परियोजनाओं का आधार है. इस लक्ष्य की दिशा में, एबीजी उद्यमिता और उद्यम विकास के लिए ग्रामीण भारत में महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों (SHG) के साथ काम करता है. एसएचजी सदस्यों को माइक्रो-उद्यमी बनाने के लिए सिलाई, खाद्य उत्पादन, कपड़ा बनाने, पशुधन पालन आदि जैसे कौशल के साथ सशक्त बनाया जाता है.</p>
<p>ABG की मेटल फ्लैगशिप कंपनी हिंडाल्को (Hindalco) ने इस क्षेत्र में बड़े कदम उठाए हैं. कंपनी वर्तमान में ओडिशा में 'सक्षम' और गुजरात में 'स्वावलंभ' जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से 24,860 महिलाओं सहित 2,000 एसएचजी के साथ काम करती है.</p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/ZE9trzDVIcOjV20GRXU4.jpg" alt="Aditya Birla Group CSR"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: Aditya Birla Group </em></span></p>
<h2>सक्षम </h2>
<p>हिंडाल्को द्वारा 2015 में ओडिशा में शुरू की गई एक सीएसआर पहल, सक्षम कई उद्यमिता और आर्थिक सशक्तिकरण कार्यक्रमों जैसे पोल्ट्री, मत्स्य पालन, सिलाई, मशरूम और सब्जी की खेती आदि शुरू करने में समर्थन करता है. 2020 में ओडिशा के संबलपुर जिले के नाइकपाड़ा गांव में एसएचजी की 26 महिला लाभार्थियों ने हल्दी की प्रोसेसिंग करके, हर एक ने 15,000 रुपये कमाए. परियोजना की सफलता ने सदस्यों को दूसरे मसालों की प्रोसेसिंग करने के लिए प्रोत्साहित किया ह.  जिसके लिए एबीजी टीम मशीनरी की खरीद और मार्केटिंग में उनकी मदद कर रही है. सक्षम ने संबलपुर, ओडिशा के रेंगाली ब्लॉक में 5875 ग्रामीण परिवारों सहित 51 महिला एसएचजी को सशक्त बनाया है. इस उपलब्धि के लिए इसे 2020 में महिला सशक्तिकरण श्रेणी के तहत इंडिया सीएसआर अवार्ड से सम्मानित किया गया.</p>
<h2>रेशम से बुनी आजीविका</h2>
<p>छत्तीसगढ़ स्थित कोसल सोशल एंड लाइवलीहुड फाउंडेशन, हिंडाल्को द्वारा शुरू किया गया एक सामाजिक उद्यम है. ये राज्य के कोसा रेशम बुनकरों को उनके पारंपरिक हैंडलूम उत्पादों को बाज़ार तक ले जाने में सक्षम बनाता है. कोसा सिल्क से साड़ियों सहित कपड़ा बनाने की कला में महिलाओं को सलाह देने के लिए स्थापित, फाउंडेशन ने महामारी के बावजूद दिवाली और नए साल 2020-21 में सफलतापूर्वक 3 लाख रूपये कमाए. रायगढ़ जिले के गारे पाल्मा में स्थित उद्यम ने स्थानीय गांवों की लगभग 35 महिला रेशम रीलर्स बेहतरीन आजीविका का अवसर दिया. यह भी सुनिश्चित किया गया कि कोसा रेशम जैसे हेरिटेज हैंडलूम भारत की टेक्सटाइल परंपरा में जीवित रहें. </p>
<h2>सिले नए अवसर</h2>
<p>जब महामारी का प्रकोप हुआ, तो इसने जीवन और अर्थव्यवस्था को अस्त-व्यस्त कर दिया, जिसका सबसे बड़ा खामियाजा प्रवासी श्रमिकों और ग्रामीण परिवारों को भुगतना पड़ा. हालाँकि, इसने वंचित महिलाओं के लिए एक आर्थिक अवसर भी खोला. महामारी ने फेस मास्क और अन्य सुरक्षा उत्पादों की भारी मांग को जन्म दिया, जिससे महिलाओं के नेतृत्व वाले सूक्ष्म उद्यमों को इन उत्पादों को बनाने और बेचने के नए अवसर मिले. कंपनी वर्तमान में 390 एसएचजी के साथ काम करती है, जिसमें 5,000 से अधिक महिलाएं शामिल हैं, जो मास्क, जूट बैग, यूनिफॉर्म  और सजावटी उत्पाद बनाते हैं. इस पहल ने महिलाओं को कमाने और महामारी के वित्तीय तनाव को कम करने में मदद की है.</p>
<p>अल्ट्राटेक, जो 840 एसएचजी के माध्यम से 8,000 ग्रामीण महिलाओं के बीच काम करती है, ने सदस्यों को कई तरह के डिटर्जेंट, मास्क और साबुन बनाने की ट्रेनिंग देने के लिए हिमाचल प्रदेश में एक महिला कौशल विकास केंद्र की शुरुआत की. इन वस्तुओं को बेचने से महिलाओं को महामारी के दौरान कमाई का ज़रिया मिला.</p>
<h2>कक्षा में वापसी </h2>
<p>CSR ने समूह की महिलाओं के सतत विकास के लिए वित्तीय साक्षरता और उद्यमिता प्रशिक्षण पर भी निवेश किया गया. कंपनी की वित्तीय सेवा शाखा, आदित्य बिड़ला कैपिटल, ने एसएचजी के माध्यम से ग्रामीण कर्नाटक में 3,000 से ज़्यादा महिलाओं को वित्तीय साक्षरता में ट्रेनिंग  दी. इसी तरह का काम हिंडाल्को द्वारा भी किया जा रहा है.</p>
<h2>डिजिटल मदद </h2>
<p>अल्ट्राटेक ने आर्थिक रूप से वंचित परिवारों के लिए आजीविका उद्यमिता विकास कार्यक्रम की शुरुआत की. छत्तीसगढ़ में ग्राम-स्तरीय उद्यमिता कार्यक्रम महिला उद्यमियों को डिजिटल ग्राम प्रोजेक्ट से जोड़ रहा है, ताकि डिजिटल इंडिया में हो रहे बदलावों में ये महिलाएं पीछे न रह जायें. </p>
<p><em>महिलाओं को सशक्त बनाने से परिवारों, समुदायों और देश पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है. देश में हो रहे बदलाव और प्रगति, देश की आधी आबादी से दूर नहीं रहना चाहिए. इसके लिए आदित्य बिड़ला ग्रुप जैसे बड़े नाम यदि ग्रामीण परिवेश की महिलाओं का साथ देंगे, तो वे भी बेहतर ज़िन्दगी जीने का सपना पूरा कर पाएंगी और देश की प्रगति में योगदान दे सकेंगी.</em></p>
<p>(स्रोत: <a href="https://www.adityabirla.com/media/stories/empowering-women-for-sustainable-development">Aditya Birla Group)</a></p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मिस्बाह</dc:creator><pubDate>Thu, 18 May 2023 13:42:50 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/nazariya/csr-of-aditya-birla-group-work-towards-empowerment-of-rural-women]]></guid><category><![CDATA[नज़रिया]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/Oj7L05CrcekeU8M3kEv3.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/Oj7L05CrcekeU8M3kEv3.jpg"/></item><item><title><![CDATA[हुनर के दम बोल रहे मूक-बधिर ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/hum-bhi-hero/deaf-and-dumb-people-at-malwa-utsav-indore-sell-handicraft-items</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/LasECIIiGkrspgeWv1ze.jpg"><p>इंदौर के लालबाग पैलेस में आयोजित मालवा उत्सव के एक स्टॉल में भीका भाई के पास कुछ लोग आ कर हाथों से बनी सुंदर-सुंदर बांस की टोकनियों का भाव पूछ रहे. कुछ महिलाएं वंदनवार  के भाव पूछ रहीं थी. भीका भाई ने किसी को इशारे में तो किसी को आइटम पर लिखे भाव बताए. भीका भाई मुस्कुराते हुए इशारा करते हैं - मैं बोल और सुन नहीं सकता. आप चीज़ पसंद कीजिए और भाव लिखे हुए हैं. " लोगों ने पैसे दिए और चीज़ खरीद कर चले गए. कुछ सालों से भीका भाई ऐसे ही हस्तशिल्प मेले में स्टॉल संभालते हैं. गुजरात के भीका भाई जैसे कई डेफ एंड डम (मूक-बधिर) लोगों के जीवन में एक ऐसी महिला आई जिसने जरुरतमंदों को आत्मनिर्भर बना और गुजरात में मिसाल कायम कर दी. जाग्रति बेन मेहता पूरा जीवन जरूरतमंद लोगों को आत्मनिर्भर बनाने में लगा रही. भारत के ट्रेडिशनल कल्चर को फोकस कर हस्तशिल्प मेले में शामिल होने वाली जाग्रति के साथ दिव्यांग, तलाकशुदा महिलाओं की टीम है जो आत्मनिर्भर भारत का चेहरा बन गए. ये चाहे लोग चाहे बोल-सुन नहीं सकते लेकिन आज मूक-बधिर कलाकारों का हूनर देशभर में बोल रहा है.  </p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/lqYX2yBgqW0R7ET9zBB7.jpg" alt="malwa utsav deaf and dumb people"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>संस्था लीडर जाग्रति बेन ने भी अपने स्टॉल को संभाला और लोगों के बीच जगह बनाई (फोटो क्रेडिट : रविवार विचार)</em></span></p>
<p>भारत के ट्रेडिशनल कल्चर को बढ़ावा देने वाली जाग्रति बेन गुजरात के पालनपुर से यहां हस्तशिल्प मेले में आईं. जाग्रति कहती हैं -" मैं सिर्फ 12 वीं पास हुई. मेरी शादी कर दी गई. घर की आर्थिक हालत  इतनी अच्छी नहीं थी कि माता-पिता मुझे आगे पढ़ा पाते. पिता महेश भाई ड्राइवर और मां दक्षा बेन छोटा-मोटा काम करती थी. ससुराल में मुझे पति पति विजय भाई मेहता ने हौसला दिया. मैंने ग्रेजुएशन की. मैं एक स्कूल में टीचर बन गई. फिर भी घर की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी. मुझे लगा कि मुझ जैसे जाने कितने लोग होंगें जो ऐसे हालातों से जूझ रहे होंगें. मैंने ज़िंदगी में कुछ अलग करने कि ठानी. वक़्त बदला और आज न केवल मैं आर्थिक रूप से निर्भर बनी बल्कि कई लोगों को रोजगार दे सकी.साथ ही मैं विलुप्त होती हमारे भारतीय कलाओं को बचाने की कोशिश कर रहीं हूं। " </p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/kYnYKftIg7akRMvh3sLs.jpg" alt="malwa utsav deaf and dumb people"></p>
<p><em><span style="font-size: 8pt;">गुजरात के पालनपुर से आए मूक-बधिर भीका भाई ने अपना स्टॉल संभाला (फोटो क्रेडिट : रविवार विचार)</span></em></p>
<p>देश में बढ़ते स्टार्टअप का बढ़िया उदाहरण वात्सल्य चैरिटेबल संस्था है. रोजगार के लिए यहां हमेशा अवसर तैयार रहते हैं. गुजरात के पालनपुर की जाग्रति आगे बताती है -" निजी स्कूल में जॉब करते हुए मैनें पोस्ट ग्रेजुएट किया. कम्प्यूटर में आगे पढाई की. लगा कि संस्था के बिना मैं लोगों की मदद नहीं कर पाउंगी. वात्सल्य संस्था बनाई. इस समय 20 लोग सक्रिय रूप से जुड़े हैं  हैं. इसमें महिलाएं भी हैं. संस्था में छह से ज्यादा दिव्यांग साथी और डेफ एंड डम लोगों को जोड़ा. और वे स्वाभिमान से जिंदगी जी रहे हैं.'</p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/fCExuDsibwwixRlGCkpP.jpg" alt="malwa utsav deaf and dumb people"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>इंदौर के लालबाग पैलेस में आयोजित मालवा उत्सव (फोटो क्रेडिट : रविवार विचार)</em></span></p>
<p>देश के बड़े-बड़े शहरों में आयोजित हस्तशिल्प मेले में जाग्रति टीम के साथ शामिल होती है. अब तक उनको कई पुरस्कार मिल चुके हैं. जाग्रति के साथ आए भीका भाई अपनी लीडर जाग्रति की ओर इशारा कर बताते हैं -" जाग्रति ने कई लोगों को की जिंदगी में खुशियां दी. उनको सम्मान से जीना सिखाया. शॉप पर रखा सामान बेचना सिखाया. " पालनपुर में ही संस्था ने अपनी यूनिट डाली. इस यूनिट की कमान भी एक महिला को दी.संस्था मैनेजर अर्चना बेन कहती है-" इस संस्था में महिलाएं और दिव्यांगों को खास जगह दी जाती है. यहां तक कि जाग्रति बेन सभी को पार्टनर की तरह रखती है.कोई भी व्यक्ति कर्मचारी की तरह संस्था में नहीं रहता. संस्था का मकसद जो काम में समर्थ नहीं है,उनको पहले रोजगार का मौका देना है. इस संस्था में कोकोनट फाइबर्स से कई आइटम तैयार किए जाते हैं. घर कि सजावट के परंपरागत आइटम तैयार किए जाते हैं." अभी तक 60 लोग लगातार इससे जुड़े हैं और कई लोगों को ट्रेनिंग दे चुकीं हैं. गुजरात सरकार और कई संगठन इस संस्था को सम्मानित कर चुकी है. </p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">विवेक वर्द्धन श्रीवास्तव </dc:creator><pubDate>Wed, 17 May 2023 14:42:02 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/hum-bhi-hero/deaf-and-dumb-people-at-malwa-utsav-indore-sell-handicraft-items]]></guid><category><![CDATA[हम में है हीरो]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/LasECIIiGkrspgeWv1ze.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/LasECIIiGkrspgeWv1ze.jpg"/></item><item><title><![CDATA[आत्मनिर्भर बनकर सरकार को कर रही मदद ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/khabar/shg-women-helping-others-to-get-benefit-of-ladli-behna-yojana</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/NRZFnSRlt1HBoEE6cSxk.jpg"><p>मजदूरी से बाहर निकल कर आत्मनिर्भर महिलाओं की ताकत का असर दिखने लगा है. प्रदेश के स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाएं अब बड़ी भूमिका में नज़र आ रहीं हैं. यहां तक कि सरकार इनकी ताकत को देखते हुए इनकी मदद ले रही है.पूरे प्रदेश में चल रही मुख्यमंत्री लाड़ली बहना योजना का लाभ दिलाने के लिए समूह की सदस्य महिलाएं ही साथ दे रहीं हैं. सरकार खुद इसे प्रदेश की आर्थिक मजबूती और महिलाओं के स्वाभिमान के लिए अच्छा मान रही है.जिले में ही समूह की दस हजार महिलाओं ने मैदान संभाला और खुद की क्षमता को साबित कर दिया. हाल ही में उमरिया जिले में आयोजित कैंप में बड़ी संख्या में समूह की महिलाओं ने हिस्सा लिया और लाभ मिलने वाली महिलाओं को सहयोग किया. इस आयोजन में खुद कलेक्टर केडी त्रिपाठी और सीईओ इला तिवारी मौजूद रही.  </p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/hZ2TeMVe4PwOubtuDbpA.jpg" alt=" Ladli Behna yojana "></p>
<p><em><span style="font-size: 8pt;">आयोजन में कई तरह की प्रतियोगिताएं का आयोजन हुआ (फोटो क्रेडिट- रविवार विचार)</span></em></p>
<p>उमरिया में आयोजित कैंप में महिलाओं को प्रोत्साहित करने के लिए कई आयोजन भी किए गए. इसमें महिला एवं बाल विकास विभाग से जुड़ी आंगनबाड़ी कार्यकर्त्ता,सेक्टर सुपरवाइज़र,सहित आजीविका मिशन से जुड़े समूह की महिलाओं ने लाभार्थियों को फॉर्म भरवाए और योजना के बारे में समझाया. कार्यक्रम जिला अधिकारी भरत सिंह राजपूत ने बताया कि विभिन्न विभागों से जुड़ी लगभग 16 हजार महिलाओं ने भाग लिया. इसमें मेहंदी प्रतियोगिता सहित दूसरी गतिविधियां की गईं.इसमें महिलाओं को बढ़ावा देने के लिए पुरस्कार भी दिए गए. </p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/U2dpCOryjk7fzR43PqNj.jpg" alt=" Ladli Behna yojana "></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>आयोजन में फूलों और मेंहदी आर्ट का प्रदर्शन भी हुआ (फोटो क्रेडिट- रविवार विचार)</em></span></p>
<p>जिले में लाड़ली बहना योजना के प्रचार-प्रसार के लिए और उसकी प्रक्रिया को समझने के लिए स्वयं सहायता समूह की महिलाओं ने हर गांव तक घर-घर दस्तक दी. आजीविका मिशन के जिला परियोजना प्रबंधक प्रमोद शुक्ला कहते हैं -" जिले में समूह की लगभग दस हजार महिलाओं ने इस योजना में अपनी भूमिका निभाई. कई गांव में महिलाओं को इस योजना की सही जानकारी नहीं थी. उसको समझाने और फॉर्म भरवाने में ये महिलाएं ही आगे रहीं." मलिया गुढा गांव की समूह सदस्य राधा बाई कहती हैं -"हमें ख़ुशी है कि खुद अब आत्मनिर्भर हो गए और महिला साथियों कि मदद कर पा रहे." </p>
<blockquote>
<p><em>जिले में अब तक बड़ी संख्या में महिलाओं ने योजना का लाभ लेने के लिए फॉर्म भरे. सीईओ इला तिवारी कहती हैं -"स्वयं सहायता समूह की सदस्य महिलाओं ने बहुत सकारात्मक काम किया.दूसरे विभाग की महिलाओं ने भी साथ दिया. स्थानीय बोली में वे इस योजना की प्रक्रिया और इससे मिलने वाले लाभ को बहुत अच्छे से समझा सकीं. यही वजह अधिक से अधिक महिलाओं को लाभ मिल सकेगा."</em></p>
</blockquote>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">विवेक वर्द्धन श्रीवास्तव </dc:creator><pubDate>Tue, 25 Apr 2023 15:40:17 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/khabar/shg-women-helping-others-to-get-benefit-of-ladli-behna-yojana]]></guid><category><![CDATA[ख़बर]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/NRZFnSRlt1HBoEE6cSxk.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/NRZFnSRlt1HBoEE6cSxk.jpg"/></item><item><title><![CDATA[यहां रेशा रेशा है काम का.... ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/kahaniyan/shg-women-made-handicrafts-by-banana-fiber</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/gPAQ2NXwlmKrXcc6lyNO.jpeg"><p>खेतों में मजदूरी करते-करते बरसों गुजार देने वाली प्रियंका कुशवाह अब घर से कमान संभाल रही है. प्रियंका कहती है-"मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि जिन खेतों में केले तोड़ कर उसके तने काट कर सूखने के लिए फेंक देते थे,वही हमारे स्वाभिमान की ज़िन्दगी का हिस्सा हो जाएंगे. हम गांव  महिलाएं इन केले के तनों से निकाले गए रेशों से क्रॉफ्ट के आईटम बना रहे हैं. इन रेशों ने हमारी ज़िंदगी बदल दी. " बुरहानपुर जिले के जयसिंगपुरा की महिलाओं की मेहनत और हाथों का कमाल आज मिसाल बन गया. उनके हाथों से बनी सुंदर और नायब चीज़ें पर्यटकों को लुभा रही है. रेशे से तैयार प्रोडक्ट की पहचान दूर-दूर तक बन रही है. </p>
<p>दरअसल तीन साल पहले तक बुरहानपुर जिले के केले किसान फसल लेने के बाद अगली फसल लेने के लिए ये सूखे तने काट कर फेंक देते थे. इसका कोई उपयोग नहीं किया. सरकार की ' एक जिला एक उत्पाद ' योजना का लाभ ले कर शहर के युवक मेहुल श्रॉफ ने लोन लेकर  केले के तनों से रेशे निकालने की मशीन लगाई. इसी से महिला समूह के आत्मनिर्भर बनने के रस्ते खुल गए. जिले में केले की बंपर पैदावार के बाद यहां केले के पेड़ के तने आसानी से मिल जाते हैं. इन्हीं से रेशे निकाल सुखाए जाते हैं. </p>
<p>पुरातत्व और संस्कृति विभाग की तरफ से भेजे गए टेक्सटाइल विभाग से जुड़े ट्रेनर धर्मेंद्र पाटिल कहते हैं -"इन महिलाओं को समूह में ट्रेंड किया गया. केले के रेशे से इन महिलाओं को रस्सी ,देव सथल की सफाई उपयोगी झाड़ू ,बास्केट्स,केप सहित अन्य आइटम बनाना सिखाए. अब ये पूरी तरह ट्रेंड हैं. "आजीविका मिशन की परियोजना प्रबंधक कृष्णा रावत कहतीं हैं -" ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने और मजदूरी से मुक्त करने में प्रशासन काफी हद तक सफल रहा. जो महिलाएं कारखाने में रेशा लेकर  वही काम करना नहीं चाहती ,उन्हें घर पर ही प्रोडक्ट बनाने की सुविधा दी गई. इसमें ग्रामीण महिलाओं के  अलावा नेपानगर की स्वसहायता समूह की शहरी रोजगार योजना अंतर्गत इस रोजगार से जोड़ा गया है. "फाइबर क्राफ्ट्स से लगभग शहरी और ग्रामीण इलाके की सौ से अधिक महिलाएं अलग-अलग तीस समूहों में जुड़ कर अब मजदूरी से दूर इस कारोबार से जुड़ आत्मनिर्भर हो गईं.     </p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/glBzlfSTCNvaqXGpjBj7.jpeg" alt="SHG"></p>
<p>नेपानगर की सरला सचिन कहती हैं -" मैं बेरोजगार थी.इस बीच प्रशासन की मदद से मैंने रेशे से आईटम बनाना सीख लिया. अधिकारी हमें मार्केटिंग भी सीखा रहे हैं. मुझे ख़ुशी है कि अब खुद इन तैयार आइटम से पैसा कमा लेती हूं. " इस कारोबार से जुडी रंजना पंवार भी गर्व से बताती है - " घर कि जरूरतें पहले पूरी नहीं हो पाती थी. अब वह इस कला से पैसा कमा रहीं हैं. उनके ग्रुप में तीस महिलाएं हैं. " प्रियंका और उनके ही परिवार की नर्मदा बाई कहती हैं -"  हम लोग अब बास्केट्स ,केप,चटाई ,योग मेट आदि बना लेती है.इन्हें बाहर से आने वाले टूरिस्ट बहुत लेते हैं."</p>
<p>कलेक्टर भव्या मित्तल कहती हैं -" जिले में केले की पैदावार देश में खास जगह रखती है. किसान अभी तक केले के पेड़ और फसल लेने के बाद काट कर फेंक देते थे, लेकिन इसे रॉ मटेरियल बनाकर इससे फाइबर्स निकाल उनका उपयोग किया. इससे जिले की महिलाओं को नई पहचान मिली. टूरिज़्म डिपार्टमेंट से भी कोर्डिनेट किया गया है ,यह विभाग जिला टूरिज़्म काउंसिल को आर्थिक सपोर्ट भी कर रहा है. जिससे ये आईटम प्रदेश और राष्ट्रीय प्रदर्शनी में भी और प्रभावी ढंग से शामिल किए जा सके. प्रयास किए जा रहें हैं कि इस वेस्ट मटेरियल से बनाए गए आकर्षक प्रोडक्ट को विदेशी धरती पर भी पहचान मिले. "     <br>        </p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/fHAxccNmEuV9gDlZWP2J.jpeg" alt="SHG"></p>
<p>जिला प्रशासन और कलेक्टर भव्या मित्तल खुद इस प्रोडक्ट के लिए लगातार समूह कि महिलाओं को प्रोत्साहित कर ट्रेनिंग दिलवा रही हैं. जिला प्रशासन के सहयोग और महिलाओं के प्रयासों से अब तक शाहजहां के लाल ताजमहल और मुमताज सहित कई कहानियों को अपने इतिहास में समेटे बुरहानपुर शहर की मेहनती महिलाएं फाइबर्स क्रॉफ्ट निर्माता के रूप में नया इतिहास रच देगीं.  </p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">विवेक वर्द्धन श्रीवास्तव </dc:creator><pubDate>Thu, 23 Mar 2023 17:11:32 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/kahaniyan/shg-women-made-handicrafts-by-banana-fiber]]></guid><category><![CDATA[कहानियां]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/gPAQ2NXwlmKrXcc6lyNO.jpeg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/gPAQ2NXwlmKrXcc6lyNO.jpeg"/></item><item><title><![CDATA[छह से बना छह हजार का कारवां ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/kahaniyan/barwani-shg-success-story</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/hNNCN07YDV7qZMEAT1mq.jpeg"><p>2015 का साल था, गरीबी से जूझ रही वैशाली और उसकी महिला साथियों ने मोर्चा निकाल कर बैंक अधिकारियों को चौंका दिया. "बैंकों की तानाशाही नहीं चलेगी ,नहीं चलेगी. हमारी मांगे पूरी करो. लोन हमको देना होगा ,देना होगा." महज आठ-दस महिलाएं सड़कों पर नारे लगाती हुई बैंक की तरफ बढ़ रहीं थीं. गांव की दुकानों और गुमटियों पर खड़े लोग इन्हें देखते रहे. इन नारों में आवाज़ चाहे महिलाओं की कमज़ोर हो लेकिन आत्मविश्वास और आक्रोश लिए बैंक में घुस गई. मैनेजर भी चौंक गए. " हम घरेलु महिलाएं हैं. मजदूरी पर जाने को विवश हैं. आमदनी नहीं हैं. पति फैक्ट्रियों में मजदूरी करते हैं. आप ही बताओ घर का गुजारा कैसे चले. हमें लोन नहीं दिया तो और बड़ा आंदोलन करेंगे. आप खुद हमारे घर लोन देने आओगे. " बड़वानी जिले के आदिवासी ब्लॉक की रहने वाली वैशाली एक सांस में बैंक मैनेजर को खरी-खोटी सुना दी. मैनेजर ने फिर भी महिलाओं को अनसुना कर दिया. वे निराश लौट आईं.        </p>
<p>वैशाली आगे बताती है-" कुछ सालों में वक़्त बदला. और एक दिन वह भी आया जब वही बैंकों के अधिकारी हमारी चौखट पर लोन देने के लिए खड़े थे. " वैशाली जैसी कई महिलाओं की यह कहानी है. कई बार असफलताओं का स्वाद चख चुकी वैशाली आज निमाड़ ही नहीं पूरे प्रदेश की चर्चित महिला बन चुकी है. वैशाली सफलता की रोज नई-नई इबारत लिख रही है.यहां क्या कलेक्टर और क्या और अधिकारी बल्कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, पूर्व राज्यपाल आनंदी बेन पटेल भी सेंटर पर मिलने आ चुकी हैं.    </p>
<p>हम आपको बड़वानी जिले के ठीकरी ले चलते हैं. यहां गुलाबी रंग से पुता आजीविका सेंटर दूर से ही दिख जाएगा. इस सेंटर में गुलाबी रंग की साड़ी पहने एक दीदी दूसरी महिलाओं को गाइड कर रही है.आप दूर से ही समझ जाएंगे ये ही वैशाली चौधरी है. लगभग 70  सिलाई मशीनों की आवाज़ से हॉल गूंज रही  है. पापड़ की दो मशीनों से पापड़ बन कर तैयार हो रहे. एक जगह सिवइयां बन रही. कहीं साबुन तो कहीं  घरेलु मसाले की पैकेजिंग की जा रही. यह नज़ारा यहां रोज़ आप देख सकते हैं. लगभग डेढ़ सौ से ज्यादा दीदियां यहां अपने अपनी धुन में काम में जुटी हैं.</p>
<p>सात साल पहले ठीकरी की सड़कों पर मोर्चा निकलने वाली चंद महिलाओं का यह सफर अब लघु  गृह उद्योग की शक्ल में खड़ा है. यह सफर इतना सरल नहीं था. वैशाली आगे बताती है -" मेरे पति सुनील की सैलेरी केवल आठ हजार रुपए थी. किराये का कमरा और बच्चे पालना मुश्किल हो रहा था. गरीबी जान ले रही थी. मेरी पढ़ाई केवल 12 वीं तक हुई और शादी हो गई. सोचा कुछ करें. गांव की ही मेरी जैसी गरीब सहेलियों ने लोन कर कुछ करने का सोचा. बैंक वालों ने लोन देने से मना कर दिया. बेइज्जत कर भगा दिया. बस हम भी ज़िद पर अड़ गए. प्रेरणा महिला स्वसहायता समूह बनाया.इसमें दस महिलाएं जुड़ीं.  "</p>
<p><img src="https://d2vbj8g7upsspg.cloudfront.net/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/lPAvKlQstxTYesn5iN9J.jpeg" alt="SHG women tailoring"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>ठीकरी में आजीविका भवन में सिलाई करती समूह की दीदियां</em></span> </p>
<p>समूह से जुडी महिलाओं का संघर्ष यही ख़त्म नहीं हुआ. समूह की संगीता,हर्षा ,दीपाली ,रुषाली और वैशाली खुद अपने  हालात बताती है कि-" लगभग डेढ़ साल गरीबी में एक और झटका तब लगा जब हमारे पतियों की फैक्ट्री भी बंद हो गई. सभी भी बेरोजगार हो गए.अब कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था. इसी बीच सरकार आजीविका मिशन योजना आई और हमारे समूह को पचास हजार रुपए का लोन मिल गया. मैं अपनी सहेलियों पहले एक और फिर तीन सिलाई मशीन ले आई. बस एक उम्मीद की पहली किरण यहीं से नज़र आई. "   </p>
<p>धीरे-धीरे समूह की महिलाएं काम मांगने जाने लगी. लेकिन कामकाज करने के लिए जगह नहीं थी.किराए से कमरा लिया. दस हजार रुपए महीने का यह कमरा और काम अच्छे से नहीं मिलने के कारण समूह को कमरा छोड़ना पड़ा. अब वैशाली और उसकी साथी संगीता ,दर्शना  ,दीपाली और हर्षा ग्राम सभा में पहुंची. समूह के लिए सरपंच से जगह मांगी.पंचायत से गांव का ही मांगलिक भवन उन्हें मिला. यहां आए दिन विवाद और समूह विशेष की आपत्ति मुसीबत बन गई. समूह की महिलाओं को वहां से कुछ लोगों ने खदेड़ दिया. आखरी रास्ता अपनाया और महिलाएं बड़वानी के उस समय के कलेक्टर तेजस्वी नायक के पास पहुंची. </p>
<p>महिलाओं की मेहनत और परेशानियों को सुन नायक ने ऐसा रास्ता निकाला कि आज ग्राम संगठन में छह हजार महिलाएं जुड़ गईं. संघर्ष और गरीबी के तीन साल के लंबे सफर को पार कर चुकी समूह की अध्यक्ष  वैशाली अपने सफर को बताती है कि-" हमको गांव के ही पुराने जर्जर हॉस्पिटल की बिल्डिंग दे दी गई. हमने उसे ठीक करवाया. अब हमें काम के लिए स्थाई ठिकाना मिल गया था. मैंने अपने पति को समझाया कि वह भी समूह को साथ दे. ऐसे हमारी दीदियों के पति भी जुड़ते चले गए. हमने फिर पीछे पलट कर नहीं देखा. धीरे -धीरे हमने कई काम शुरू किए. </p>
<p><img src="https://d2vbj8g7upsspg.cloudfront.net/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/PA0F6gkxZdWGsyMOEQOY.jpeg" alt="SHG women"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>समूह की बैठक </em></span></p>
<p>उस दिन मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा जब पहली बार समूह को चालीस हजार टी शर्ट का ऑर्डर मिला.अब तो हम पूरे जिले के साथ दूसरे जिले के कई ब्लॉक में भी हमारी बनाई यूनिफॉर्म तैयार की जा रही. हम हर महीने पंद्रह हजार रुपए कमा ही लेते हैं. "<br>महिलाएं अब  पापड़, सिलाई, सिवइयां, चिप्स, पापड़, अगरबत्ती सहित कई आइटम बना रहीं हैं. बैंक से दस लाख रुपए की लिमिट भी मिल गई. सब कर्ज भी उतर गए. अब इसी सेंटर पर दूसरी जगह की महिलाएं भी ट्रेनिंग लेने आती हैं.वैशाली ने श्री गणेश ग्राम संगठन बनाया और जिले 31 गांव की छह हजार महिलाओं को जोड़ कर उन्हें भी आत्मनिर्भर बना दिय. </p>
<p>आजीविका मिशन के जिला प्रबंधक योगेश तिवारी कहते हैं -" ठीकरी के इस समूह ने प्रदेश में नई पहचान बनाई है. यहां नीति आयोग के सदस्यों के अलावा यहां के प्रबंधन को समझने कई संस्थाओं के विद्यार्थी भी आते हैं. अब ये महिलाएं दूसरी महिलाओं को ट्रेनिंग देकर उन्हें रोजगार के नए रास्ते दिखा रही है."</p>
<p>जिला प्रशासन ने इसे मॉडल बनाया है. खेती में जैविक पद्धति को प्रोत्साहन सहित कई प्रोजेक्ट में इस समूह को सेवाएं करते देखा जा सकता है. </p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">विवेक वर्द्धन श्रीवास्तव </dc:creator><pubDate>Sat, 11 Mar 2023 18:02:21 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/kahaniyan/barwani-shg-success-story]]></guid><category><![CDATA[कहानियां]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/hNNCN07YDV7qZMEAT1mq.jpeg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/hNNCN07YDV7qZMEAT1mq.jpeg"/></item></channel></rss>