<rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" xmlns:dcterms="http://purl.org/dc/terms/" xmlns:geo="http://www.w3.org/2003/01/geo/wgs84_pos#" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/" xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/" xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/" version="2.0"><channel xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/"><title><![CDATA[ बीज अम्मा]]></title><link>https://ravivarvichar.in/tags/biij-ammaa</link><description/><atom:link href="https://ravivarvichar.in/rss/tags/biij-ammaa" rel="self"/><language>en-us</language><lastBuildDate>Mon, 10 Apr 2023 16:14:48 +0530</lastBuildDate><item><title><![CDATA['सीड मदर' : देसी बीजों के संरक्षण ने दिलाया पद्मश्री ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/aadhi-aabadi/seed-mother-rahibai-soma-popere-awarded-padma-shri</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/ew7O1ywCAeZV59UHeZUF.jpg"><p>आप बीमार होते है, तो ज़ाहिर है अस्पताल की ओर रुख करते होंगे. पर, राहीबाई सोमा पोपेरे ने जब अपने पोते और आस पास के बच्चों को बीमार और कुपोषण का शिकार होते देखा, तो उन्होंने खेतों की ओर ध्यान दिया. राहीबाई ने पाया कि खेतों में बहुत अधिक कीटनाशकों और रासायनिक उर्वरकों (फर्टिलाइज़र्स) का इस्तेमाल किया जा रहा है. इससे उपज बढ़ाकर ज़्यादा पैसे तो कमाए जा रहे हैं, पर इसके ज़हर से शरीर में पोषण की कमी और बीमारियां होने का खतरा बढ़ रहा है, खासकर बच्चों के लिए. </p>
<p>उन्होंने 154 बीजों के देशी किस्मों के संरक्षण के साथ किसानों को पारंपरिक तरीकों से फसल उगाने के लिए प्रोत्साहित और जागरूक किया. यह काम उन्होंने करीब 25 साल पहले शुरू किया. सोमा पोपेरे बताती है कि स्वदेशी फसलों को उगाने के लिए सिर्फ पानी और हवा की जरूरत है. हाइब्रिड फसलों को उगाने में ज़्यादा पानी और कीटनाशक इस्तेमाल करना पड़ते हैं. उन्हें लोग 'बीज अम्मा', 'सीड मदर', या 'सीड वुमेन' के नाम से भी जानते हैं. 52 साल की सोमा पोपेरे महादेव कोली आदिवासी समुदाय से है. वे महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के अकोले आदिवासी ब्लॉक के कोम्बले गांव में रहती है. </p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/eAclzgxzRdWeeiLAfSJZ.jpg" alt="seed mother"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: Google Images</em></span></p>
<p>उन्होंने खेती के ज़रिये अपने आस-पास की महिलाओं को आर्थिक रूप से मज़बूत बनने में मदद करने के लिए स्वयं सहायता समूह बनाया. 'सीड मदर' ने जैविक खेती को एक नया मुकाम देने के लिए स्वयं सहायता समूहों के ज़रिये किसानों को जोड़ा. समूहों ने मिलकर 50 एकड़ ज़मीन पर 17 से ज़्यादा देसी फसलें उगाईं. वह कभी स्कूल नहीं गई और न ही उनके पास कृषि क्षेत्र में कोई डिग्री है. बचपन में उनके पिता की बातों को ध्यान में रखते हुए उन्होंने बीज संरक्षण का काम शुरू किया. जो पुराने बीज अब बाज़ार में भी नहीं मिलते, वे राहीबाई सोमा पोपेरे के पास सुरक्षित हैं. शुरू में उनके गांव की महिलाएं उन पर हंसती थी. पर पोपेरे ने अपना काम नहीं रोका. धीरे-धीरे लोग उनके काम की एहमियत समझने लगे. उनसे आस-पास के गांवों से लोग सलाह लेने आने लगे. फिर अधिकारियों का ध्यान उन पर गया. </p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/7V9MurGGINOIUSVRjLi4.jpg" alt="seed mother"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: CGTN</em></span></p>
<p>उन्होंने अकोले प्रखंड के 7 गांवों के 210 किसानों के साथ जलकुंभी की पौध, चावल, सब्जियां, फलियां की एक नर्सरी की शुरुआत की.  इन-सीटू जर्मप्लाज्म संरक्षण केंद्र की स्थापना की. इसके ज़रिये धान, जलकुंभी, बाजरा, दलहन, तिलहन समेत 17 अलग-अलग फसलों की खेती की. 5 स्वयं सहायता समूहों की ये लीडर गांव की स्वच्छता, साफ़ रसोई, बीज संरक्षण और जंगली खाद्य के बारे में लोगों को जागरूक कर रही है. एक छोटे से आदिवासी गांव में रहने वाली राहीबाई पोपरे को कृषि में उनके योगदान के लिए देश का चौथा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्मश्री  से सम्मानित किया गया. उन्होंने अपने गांव कोम्भलने की मिट्टी और सभी किसानों को पद्मश्री पुरस्कार समर्पित किया. 'बीज अम्मा' ने आने वाले पीढ़ियों तक के लिए मिसाल क़ायम की है जिनके प्रयासों को कृषि वैज्ञानिकों ने भी सराहा.  </p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मिस्बाह</dc:creator><pubDate>Mon, 10 Apr 2023 16:14:48 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/aadhi-aabadi/seed-mother-rahibai-soma-popere-awarded-padma-shri]]></guid><category><![CDATA[आधी आबादी]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/ew7O1ywCAeZV59UHeZUF.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/ew7O1ywCAeZV59UHeZUF.jpg"/></item><item><title><![CDATA['बीज अम्मा' ला रहीं जैविक मिलेट क्रांति ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/khabar/beej-amma-leading-organic-millets-revolution</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/orsyq6tWudxa9IGLS2vy.jpeg"><p dir="ltr">लाल, पथरीली, सूखी, ज़मीन में आज एक क्रांति की कोपल पनप रही है. तेलंगाना के ज़हीराबाद शहर के लगभग 70 गांवों में, महिलाएं अब बाजरा, दालें और तिलहन की कई किस्में उगा रही हैं. दुनिया भर में मिलेट्स की जागरूकता पैदा करने और उसकी खपत बढ़ाने के लिए, संयुक्त राष्ट्र (UN) ने वर्ष 2023 को 'इंटरनेशनल ईयर ऑफ़ मिलेट' घोषित किया. मिलेट्स को बढ़ावा देने के लिए देशभर में स्वसहायता समूह की महिलाएं नए-नए तरीके खोज रहीं है, कभी मिलेट्स का चीला बनाकर, तो कही कुकीज़ बनाकर. मिलेट्स के सफ़र की ये कहानियां रविवार विचार ने आपसे साझा की हैं. ऐसी ही एक कहानी हैं ज़हीराबाद की बीज अम्माओं की. वे एक कृषि-आधारित स्थानीय गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) डेक्कन डेवलपमेंट सोसाइटी (डीडीएस) में काम करती है. 60 साल की अम्मा मिट्टी से प्लास्टर किए हुए प्यालों में 75 किस्मों के बीजों को सावधानी से रखती है और कहती है, "वे भी हमारे बच्चे हैं, और हम उनका ध्यान रखते हैं क्योंकि ये बीज हमारे लिए बहुत ज़रूरी है," </p>
<p dir="ltr"><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/2DWJPVDzgwvwVxEZoelQ.png" alt="beej amma telangana"></p>
<p dir="ltr"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: Google Images</em></span></p>
<p dir="ltr">ये सभी महिलाएं अपने आप को 'बीज रक्षक' मानते हुए हर मौसम में मिलेट की 25 किस्में उगाती हैं और अभी तक कई महिलाओं को ट्रेनिंग भी दे चुकी हैं. लक्ष्मी अम्मा कनाडा, लंदन, जर्मनी, सिंगापुर, सेनेगल, सिंगापुर, माली समेत 20 देशों का दौरा कर मिलेट्स के बारे में जागरूकता फैला चुकी है. उन्हें महिला सशक्तिकरण के तहत राज्यपाल से पुरस्कार भी मिला. वे मिट्टी की पलस्तर वाली टोकरियों का इस्तेमाल अपने ज्वार के बीजों को बचाने के लिए करते हैं. बीज डालकर गोबर से टोकरियों को ऊपर से बंद कर देते हैं. यह बीजों को बचाने का पारंपरिक तरीका है जिसे ये बीज बैंक कहते हैं. बाजरा अनाज के साथ-साथ चारे के रूप में भी बिकते हैं. </p>
<p dir="ltr">मोगुलम्मा भी समूह के बीच एक मिनी-सेलिब्रिटी हैं, क्योंकि उन्हें भारत के राष्ट्रपति ने सम्मानित किया. मोगुलम्मा जानती है कि नई मां को कौनसा बीज देना है और बीमार होने पर कोनसा बीज खाया जाता है, अलग-अलग बीमारियों के लिए भी अलग-अलग वैरायटी के आटे का इस्तेमाल किया जा सकता है. उन्होंने अपने बाजरे को खाने से पहले अंकुरित करना भी शुरू कर दिया है जिससे बाजरे के आटे में ताकत बढ़ जाती है. वह हर साल रबी सीजन में 28 और खरीफ सीजन में 30 किस्में उगाती हैं.</p>
<p dir="ltr"><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/0ueqQZzcr3dVsAfKhfNW.jpeg" alt="beej amma telangana"></p>
<p dir="ltr"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: Google Images</em></span></p>
<p dir="ltr">उनकी एक और साथी चंद्रम्मा छोटी-छोटी कृषि तरकीबों को अच्छे से जानती है और उन्होंने अपना पूरा जीवन खेती में लगा दिया. उन्होंने  मिलेट्स और अन्य फसलों की सैकड़ों किस्मों को बचाया और पीढ़ियों के लिए उदाहरण बन गई. वे शादी के बाद महिलाओं के समूह में शामिल हो गईऔर बाजरा के बीज बचाने के नए-नए तरीके खोजने लगी. वे केवल जैविक और प्राकृतिक खेती में विश्वास रखती है. हर दोपहर फसल काटते समय वो धुन गुनगुनाती है और बाजरे की इस क्रांति को और आगे लेजाने के बारे में सोचती है. ये सभी महिलाएं 'इंटरनेशनल ईयर ऑफ़ मिलेट' को नई ऊचाई दे रही हैं. <strong id="docs-internal-guid-a19f49f9-7fff-8f8e-4543-9e1c59b8ff11"></strong></p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">रविवार ब्यूरो </dc:creator><pubDate>Thu, 16 Mar 2023 14:03:38 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/khabar/beej-amma-leading-organic-millets-revolution]]></guid><category><![CDATA[ख़बर]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/orsyq6tWudxa9IGLS2vy.jpeg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/orsyq6tWudxa9IGLS2vy.jpeg"/></item></channel></rss>