<rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" xmlns:dcterms="http://purl.org/dc/terms/" xmlns:geo="http://www.w3.org/2003/01/geo/wgs84_pos#" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/" xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/" xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/" version="2.0"><channel xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/"><title><![CDATA[ बंगाल]]></title><link>https://ravivarvichar.in/tags/bngaal</link><description/><atom:link href="https://ravivarvichar.in/rss/tags/bngaal" rel="self"/><language>en-us</language><lastBuildDate>Fri, 30 Jun 2023 12:34:48 +0530</lastBuildDate><item><title><![CDATA[पर्यावरण को 'जूट ज्वेलरी' का तौफा ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/khabar/jharkhand-shg-women-are-making-jute-jewelry-to-save-environment</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/KvAgvoxkKlgvCuB2NWBx.jpeg"><p dir="ltr"><span>पर्यावरण को लेकर जागरूक होना, यह बात किसी के सिखाने से  नहीं समझी जा सकती. जिस तेजी से हमारे पर्यावरण को नुक्सान हो रहा है, उठाए जाने वाले कदम भी उसी तेजी से आगे बढ़ने चाहिए. भारत सरकार भी इस समस्या को नियंत्रण में लाने के लिए भरसक प्रयास कर रही है. यह समस्या ऐसी नहीं है कि सिर्फ सरकार के कदम से काम हो जाए. देश के हर व्यक्ति को इस मुहीम में अपना पूरा साथ देना होगा. <strong>स्वयं सहायता समूह </strong>(SHG) की महिलाएं पर्यावरण सुरक्षा पर बहुत ज़्यादा ध्यान देती है. <strong>झारखण्ड के धनबाद शहर में सिल्वर और भारत भक्ति Self Help Group द्वारा इसी कड़ी में अपना योगदान देते हुए जूट से नेचर फ्रेंडली उत्पाद तैयार किये जा रहे हैं.</strong></span><span><strong></strong></span><span><strong></strong></span></p>
<p dir="ltr"><span><strong><img alt="Jute Jewelry" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/rc5haUY2K7ss7wJIbYYS.jpg" style="width: 556px; height: 348px;" class="center"></strong></span></p>
<p dir="ltr"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: Prabhat khabar</em></span></p>
<p dir="ltr"><span><strong>जूट</strong> के <strong>फैशनेबल बैग, लिफाफा, डॉल, मूर्ति, चप्पल, फाइल के साथ स्टोरेज बैग</strong> बनाये जा रहे हैं. इसे काफी सराहा जा रहा है और डिमांड में भी है. जूट से लेटेस्ट फैशनेबल ज्वेलरी भी तैयार की जा रही है. यह ज्वेलरी छात्राओं, दुल्हन व महिलाओं के बीच काफी लोकप्रिय हो रही है. इसकी कीमत भी बहुत मिनिमल है. </span></p>
<p dir="ltr"><span><img alt="Jewelry making news" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/wmvfbM0W4F7dLxLOMOyt.jpg" style="width: 580px; height: 326px;" class="center"></span></p>
<p dir="ltr"><em><span style="font-size: 8pt;">Image Credits: Volunteers Initiative Nepal</span></em></p>
<p dir="ltr"><span><strong>सिल्वर SHG</strong> की <strong>सचिव प्रीति सुमन </strong>बताती हैं- "<em>समूह से 20 सदस्य जुड़ी हैं. 10 से 20 रुपये मार्जिन पर ज्वेलरी व जूट के अन्य उत्पाद तैयार किया जा रहा है. नावाडीह में उनलोगों का वर्कशॉप है. जूट की ज्वेलरी पर ज्यादा फोकस किया जा रहा हैं.</em>" जूट से बनी ज्वेलरी धनबाद के साथ बंगाल में भी डिमांड में है. प्रीति सुमन ने बताया- "पॉलिथीन का विरोध जरूरी था. ऐसे में विकल्प की जरूरत थी, जो हमारे लिए सहजता से उपलब्ध हो. इसीलिए हमनें जूट के उत्पाद पर फोकस किया. यह ज्वेलरी और बैग्स आकर्षक होने के साथ ही पर्यावरण के लिए सुरक्षित भी है." </span></p>
<p dir="ltr"><span>धनबाद के स्वयं सहायता समूह की यह पहल भले ही छोटा कदम हो, लेकिन अगर हर शहर में इस तरह का कदम उठा लिया गया तो बदलाव बहुत तेजी से आएगा. अगर हर गांव के SHGs यह ठान ले कि वे प्लास्टिक और पर्यावरण को नुक्सान पहुंचाने वाले उत्पादों का इस्तेमाल ना करेंगी ना करने देंगी, तो असर बहुत बड़ा होगा.</span></p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">रिसिका जोशी</dc:creator><pubDate>Fri, 30 Jun 2023 12:34:48 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/khabar/jharkhand-shg-women-are-making-jute-jewelry-to-save-environment]]></guid><category><![CDATA[ख़बर]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/KvAgvoxkKlgvCuB2NWBx.jpeg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/KvAgvoxkKlgvCuB2NWBx.jpeg"/></item><item><title><![CDATA[सशक्त महिलाएं बनायेंगी समृद्ध समुदाय ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/khabar/shg-in-bengal-became-a-tool-of-economic-empowerment-of-women</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/uJ1YtYAu3WPjBH60DHJC.jpg"><p><strong>महिलाओं के सशक्तिकरण</strong> (women empowerment) की चाबी<strong> आर्थिक आज़ादी </strong>(financial freedom) है. आर्थिक रूप से सक्षम होने पर महिलाएं <strong>सामाजिक और आर्थिक बदलाव</strong> (social and economic change) की अगुवाई करती हैं. आज देशभर में <strong>महिलाओं को वर्कफोर्स</strong> (female workforce) से जोड़ा जा रहा है, ताकि <strong>राज्य और देश की अर्थव्यवस्था</strong> में वे भागीदार बन सकें. शहर के साथ-साथ ग्रामीण महिलाएं (rural women) भी अपना रोज़गार शुरू कर कार्यबल का हिस्सा बन रही हैं. रोज़गार की शुरुआत करने के लिए वे <strong>स्वयं सहायता समूहों (Self Help Groups) को ज़रिया </strong>बना रही हैं. समूह (SHG) से जुड़कर वे आत्मनिर्भरता का सफर शुरू करती हैं. देश के और राज्यों की तरह बंगाल में भी स्वयं सहायता समूह की संख्या बढ़ रही है. </p>
<p>हाल ही में, <strong>बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी</strong> (Bengal CM Mamta Banerjee) ने ट्वीट कर कहा, <em>"<strong>जब महिलाएं सशक्त होती हैं, तो समुदाय समृद्ध होता है!"</strong> </em>बंगाल में स्वयं सहायता समूह महिला सशक्तिकरण का कारगर ज़रिया बन रहे हैं.  ट्वीट में उन्होंने बंगाल SHG से जुड़े कुछ आंकड़े साझा किया. बताया कि पिछले <strong>12 वर्षों में</strong>, स्वयं सहायता समूहों की <strong>क्रेडिट सप्लाई</strong> (credit supply) <strong>25 गुना बढ़ी</strong> है. 2010-11 में <strong>93,425 से बढ़कर </strong>2022 -23 में समूहों की संख्या <strong> 6.77 लाख हो गई</strong>. पिछले <strong>12 सालों में क्रेडिट 443 करोड़</strong> रुपयों से बढ़कर <strong>13,660 करोड़</strong> हो गया. </p>
<p>सरकार अलग-अलग योजनाओं के तहत स्वयं सहायता समूहों को बढ़ावा दे रही है. ज़्यादा से ज़्यादा महिलाओं को इससे जुड़ने के लिए प्रेरित किया जा रहा है. उन्हें ट्रेनिंग देकर, आसान लोन देकर, और बचत के लिए प्रोत्साहित कर आर्थिक आज़ादी का रास्ता दिखाया जा रहा है. </p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">रविवार ब्यूरो </dc:creator><pubDate>Mon, 12 Jun 2023 17:30:46 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/khabar/shg-in-bengal-became-a-tool-of-economic-empowerment-of-women]]></guid><category><![CDATA[ख़बर]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/uJ1YtYAu3WPjBH60DHJC.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/uJ1YtYAu3WPjBH60DHJC.jpg"/></item><item><title><![CDATA[कशीदाकारी से अपनी कहानियां बुनती गुमनाम महिलाएं ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/nazariya/women-embroidered-their-sufferings-in-punjab-kashmir-kutch-gujarat-and-other-places</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/2yxDP67FeXyAL0A2jQmg.jpg"><p>कला हमेशा से ही अपनी छुपी-दबी भावनाओं को साझा करने का एक ख़ूबसूरत ज़रिया रहा है. कला के कई रंग,रूप, और आकार हैं. इसका एक ख़ूबसूरत रूप कशीदाकारी है. कशीदाकारी से सिर्फ फूलों पत्तियों को ही नहीं, पर अपने अनुभवों, भावों, और विचारों को भी सुंदर आकार और रंग दिये जाते हैं. पूरे भारत में कई महिलाओं ने ऐतिहासिक सुईवर्क के ज़रिये अपनी स्वतंत्रता, पहचान और प्रतिरोध को दर्शाया है. पहले के समय में लैंगिक भूमिकाओं और सामाजिक अपेक्षाओं ने कढ़ाई को सिर्फ स्त्रीत्व के रूप में देखा.</p>
<p>इतिहास बताता है कि महिलाओं ने इस सुई धागे से जुड़ी लैंगिक भूमिकाओं को त्याग, इसे क़लम की तरह इस्तेमाल किया और अपनी कहानी बुनदी. पंजाब की फुलकारी एम्ब्रॉइडरी से बनी लताओं और शानदार रंगों के चमकीले पैटर्न उल्लास की भावना को दर्शाते थे. लेकिन,1947 के विभाजन ने इसके पैटर्न को धुंदला और रंगों के फीका कर दिया. बड़ी सहजता से अशांति, विस्थापन और हिंसा से पनपी व्यथा को कशीदाकारी के ज़रिये कपड़े पर उकेरा गया. फूलों और ज्योमेट्रिकल पैटर्न से ऊपर उठकर, कढ़ाई महिलाओं के लिए चुप रहकर अपनी कहानी सुनाने का एक रंगबिरंगा ज़रिया बन गई. उन्होंने अपने जीवन के क्षणों,अनुभवों, विचारों और विश्वासों को सुई धागे कि ज़रिये एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाया. महिलाओं की इस कला के पीछे एक छिपी हुई अनूठी कहानी थी जो उसकी भावनाओं के साथ-साथ उसकी यादों का भी चित्रण थीं. </p>
<p>पंजाब की महिलाओं ने अपने विभाजन के दर्द को दूर करने के लिए कढ़ाई का सहारा लिया. उनकी टेपेस्ट्री कलाकृतियों ने क्रोध के दृश्यों, शरणार्थियों से भरी ट्रेनों, जबरन पलायन, पीछे छूटे घरों और पुरानी यादों का दस्तावेजीकरण किया. परिवार बिखर गए, महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार हुआ, उनका अपहरण कर लिया गया, और ग़रीबी ज़िंदगी छीन रही थी- ये कहानियां उन्होंने कपड़े पर बुनी. पितृसत्ता में गड़ी बाल विवाह, पर्दा प्रथा और दहेज़ की पीड़ा भी बांटी. ये वो कहानियां थी जो वे सुना नहीं सकती थी, शायद उनका सुनने वाला भी कोई न था. </p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/lG4bPG1xppYAnh0TAAFM.jpg" alt="embroidery and politics"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: Tribune India</em></span></p>
<p>कश्मीर घाटी लंबे समय से हिंसा और विरोध से जूझ रही है. राजनीतिक संघर्ष, इंटरनेट बैन और कर्फ्यू के दौरान, कशीदा ने महिलाओं को अपनी व्यथा बांटने और मुश्किल समय का मुकाबला करने का होंसला दिया. सदियों से चली आ रही यह पारंपरिक कश्मीरी कशीदाकारी धरती की जन्नत कहे जाने वाले कश्मीर की ख़ूबसूरती को दर्शाती है. इसे ज़्यादातर पुरुषों द्वारा किया जाता था. लेकिन वहां चल रहे टकराव और रोज़गार की खोज में महिलाओं ने पुरुष-प्रधान नौकरियों में अपनी पकड़ बनाई. कशीदा को कश्मीरी महिलाओं ने अभिव्यक्ति और सशक्तिकरण का साधन बनाया. </p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/cBOLVlsOJSpukDREAq62.jpg" alt="embroidery and politics"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: <span class="cS4Vcb-pGL6qe-lfQAOe">Daily Sabah</span></em></span></p>
<p>ब्रिटिश राज में, सरकार ने भारतीय टेक्सटाइल पर कई तरह की पाबंदियां लगाईं, और कशीदकारों की वस्तुओं पर टैक्स लगाया, जो टेक्सटाइल इंडस्ट्री के लिए ख़ासकर बंगाल के लिए एक कठिन लड़ाई साबित हुई. गरीबी और भुखमरी से बचने के लिए बंगाल के लोगों ने कांथा कढ़ाई का सहारा लिया हुआ था जिसपर लगी बंदिशों ने मुसीबत और बढ़ादी. स्वदेशी आंदोलन के दौरान, कांथा कढ़ाई ब्रिटिश  शासन के ख़िलाफ़ विरोध का प्रतीक बनी.  ब्रिटिश वस्तुओं का बहिष्कार कर भारतीय उत्पादों को बढ़ावा देने और लोगों को आत्मनिर्भर बनने में कांथा कढ़ाई ने सहायता की. विभाजन ने लोगों को पड़ोसी देशों में पलायन करने पर मजबूर कर दिया, जिसके साथ कांथा की संस्कृति दम तोड़ने लगी. एक प्रमुख बंगाली कशीदाकार प्रतिमा देवी ने ग्रामीण महिलाओं को कांथा की कला सिखाकर उन्हें सशक्त बनाया, और साथ ही, वर्षों पुरानी संस्कृति को फिर से जीवित किया. </p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/aribsMSX1ct5NZmfP9F8.jpg" alt="kantha and politics"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: Pinterest</em></span></p>
<p>गुजरात 2002 के दंगों के दौरान, कच्छ में पीड़ित महिलाओं ने अपने दर्द को कलात्मकता में ढाला. घरों और रोज़गारों का बिखर जाना, अपनों की मृत्यु और विस्थापन के दृश्य, सब कुछ कपड़े, फ्रेम और धागों में सिमट गया. </p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/PKHtdr7zYdGO4wqBFOFZ.jpg" alt="embroidery and politics"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: Your Libaas</em></span></p>
<p>ये कहानी सुनाती महिलाएं तो कहीं खो गई, पर उनकी कला अमर है. इंटरनेट पर इनकी कला की तस्वीरें मिल जाएंगी, पर इनके कलाकारों का कुछ पता नहीं. भारत में ऐसे कई कलाकारों को वो पहचान नहीं मिल पाती जिनकी वो हक़दार हैं, सिर्फ इसीलिए क्योकि ये कलाकार चूड़ियां पहनती हैं. आपके घरों में भी दादी-नानी ने कशीदाकारी कर आपके लिए कुछ ख़ास बनाया होगा, माँ ने कभी तोहफ़े में एम्ब्रॉयडरी कर कुछ दिया होगा. इस तरह वो शायद सिर्फ डिज़ाइन नहीं बनतीं, पर सुई धागे से प्रेम बुनती हैं. अगली बार कशीदाकारी की तारीफ करें, तो भूले न कि ये महज़ धागा, रंग, और डिज़ाइन नहीं, एक कशीदाकार की कहानी है.   </p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मिस्बाह</dc:creator><pubDate>Sun, 14 May 2023 11:20:37 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/nazariya/women-embroidered-their-sufferings-in-punjab-kashmir-kutch-gujarat-and-other-places]]></guid><category><![CDATA[नज़रिया]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/2yxDP67FeXyAL0A2jQmg.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/2yxDP67FeXyAL0A2jQmg.jpg"/></item><item><title><![CDATA[बंगाल के 'जमदूत' ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/nazariya/loan-companies-in-bengal-exploit-poors</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/DAQ9Qpzb8DOxicQIjZUN.jpg"><p><br>देश के कुछ इलाकों में खासकर बंगाल की कुछ माइक्रोफाइनेंस कंपनियां आज पुराने ज़माने के साहूकारों जैसा काम कर रही हैं. यह कंपनियां अपने तथाकथित अधिकारियों का इस्तेमाल करके निम्न-आय वाले परिवारों से ज़ोर-ज़बरदस्ती और लगातार धमकियों के साथ पैसा इकट्ठा करने में लगे हुए है. हालात इतने खराब हो चुके हैं कि इस तरह की वसूली अब फिल्मों का विषय भी बनती जा रही है, जैसे 2017 की बांग्ला फिल्म 'कड़वी हवा'. इस फिल्म में कर्ज़ वसूलने वाले को 'जमदूत' (मौत का देवता) कहा गया. लेकिन बंगाल के गांवों में इन्हें अधिकारी समझ कर 'सर' कहा जाता है.<br> <br>बंगाल में बेरोज़गारी और गरीबी का जाल गहरा है इसके चलते परिवारों को घर चलाने के लिए, शादी, अंतिम संस्कार, बीमारी, त्योहारों टूटे हुए घरों की मरम्मत जैसे पारिवारिकऔर सामाजिक कामों में रुपये की ज़रुरत पड़ती रहती है. अब इन सब के लिए अनसेक्यूर्ड लोन गरीब महिलाएं इन कंपनियों से लेती है. बस बन जाता है कर्ज़ का एक घेरा जिसका पूरा फायदा यह कंपनियां उठाती है. इनका घिनौना खेल ऐसा है कि बंगाल में यह क़र्ज़ मुख्य रूप से महिलाओं को ही दिया जाता है. बंगाल के पिछड़े बांकुड़ा, पुरुलिया जैसे जिलों का तो यह ऐसा सच है जिसे मान्यता मिल चुकी है. जनप्रतिनिधि से लेकर अधिकारियों, सबको पता है कि कैसे इन सूदखोर कंपनियों ने अपनी जड़ें इन जिलों में फैला ली है लेकिन इसे रोकने के लिए कुछ नहीं किया जा रहा. </p>
<p>हालात यह हैं कि बंगाल के ग़रीब लोगों के पास कोई विकल्प नहीं बचा.  क़र्ज़ लेने के बाद भी पूरी राशि नहीं मिलती; प्रोसेसिंग, बीमा के नाम पर रुपये काट लिए जाते हैं. ब्याज दर ऊंची होती है और कर्ज़ वसूलने वालों की धमकियों के कारण कितनों को अपना घर छोड़ भागना पड़ा. इस सबका इलाज स्वयं सहायता समूह हो सकते हैं, वैसे भी बंगाल देश के सबसे ज़्यादा SHG वाले प्रदेशों में शामिल है. लेकिन लगातार सरकारों ने जो रवैया अपनाया उनसे इनका सही उपयोग नहीं हो पाया.  जैसे समूह तो बन गए लेकिन उन्हें कर्ज़ पर सब्सिडी नहीं मिली. समूह अक्सर स्कूलों में मिड-डे मील बनाते हैं और राजनीतिक रैलियों के लिए भोजन पकाते हैं. साथ ही उन्हें अक्सर इन रैलियों की भीड़ की तरह काम में लिया जाता है और भुगतान के समय भ्रष्टाचार होता है.  मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम) की ख़राब स्थिति ने बंगाल के जिलों में बेरोज़गारी को और भी बदतर बना दिया.  इन्ही हालातों का फायदा कंपनियों ने उठाया. आर्थिक रूप से ग़रीब महिलाओं की मदद करने की आड़ में इन कंपनियों ने साहूकारी की पुरानी व्यवस्था को फिर से शुरू कर दिया. </p>
<p>इसका तरीका भी इन कंपनियों ने SHG जैसा ही बनाया.  यह कंपनियां अपने दलालों के माध्यम से ग़रीब इलाकों में पहुंचते है, सबसे पहले कम से कम 10 विवाहित महिलाओं का समूह बनाते हैं. इसके बाद कुछ दिनों के अंदर, समूह के प्रत्येक सदस्य को तक़रीबन 20,000 रुपये का लोन मिल जाता है. और ऐसे शुरू होता है कुचक्र. जैसे एक महिला ने इन कंपनी से लोन लिया 70,000 रुपये का. अब ऐसे कागज़ पर दस्तखत करवा लिए, जिसमें 104 हफ़्ते के लिए 1,300 रुपये की साप्ताहिक किश्त का भुगतान करना था. इस तरह 70,000 रुपये की मूल राशि के लिए उसने दो सालों में लगभग 1,35,200 रुपये भरे जो की 50% से अधिक की ब्याज़ दर के बराबर है. इस तरह शोषण और धमकियों का चक्र शुरू होता है. जो की सीधे तौर पर धोखाधड़ी का मामला बनता है.</p>
<p>समूह के सदस्यों को धमकी दी जाती है कि यदि एक सदस्य किश्तों का भुगतान करने में विफल रहता है, तो बाक़ी सभी के लोन समाप्त कर दिए जाएंगे. इसके परिणामस्वरूप, जब समूह का कोई सदस्य किश्त चुकाने के लिए संघर्ष करती है, तो अन्य सदस्य अक्सर उस पर दबाव डालते हैं. इससे उनके आपसी संबंधों में खटास आ रही है. इसके अलावा, कर्ज़ लेने वालों के साथ अमानवीय व्यवहार के कारण विनाशकारी स्थिति पैदा होती है. कुछ महिलाओं ने कथित तौर पर आत्महत्या करने की भी कोशिश की है. </p>
<p>महिलाओं को कर्ज़ के चंगुल में फंसाए रखने के लिए इन कंपनियों ने एक और तरीका अपनाया है. पांच से सात किश्तों का भुगतान करने के बाद, महिलाओं को बताया जाता है कि वे फिर से लोन लेने के लिए पात्र हैं. पुराने कर्ज़ का पैसा काटकर नए का दोबारा बीमा कराने के बाद इन महिलाओं को नए कर्ज़ के तहत काफ़ी कम पैसा दिया जाता है. इसके बाद महिलाओं को ऊंची ब्याज़ दर के साथ ज़्यादा पैसा देने को मजबूर होना पड़ता है.</p>
<p>बंगाल की इन महिलाओं को कंपनियों  के चंगुल से छुटकारा दिलाने के लिए राज्य सरकार को इस पर ध्यान देना होगा और एक ऐसी स्वयं सहायता प्रणाली बनानी होगी जिसकी निगरानी और नियमन राज्य सरकार का वित्त मंत्रालय करे या फिर रिज़र्व बैंक को यह काम दिया जाए. SHG महिलाओं को इस चंगुल से बचाना उनके भविष्य और आर्थिक आज़ादी दोनों के लिए महत्वपूर्ण है. </p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">रोहन शर्मा</dc:creator><pubDate>Mon, 10 Apr 2023 15:33:18 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/nazariya/loan-companies-in-bengal-exploit-poors]]></guid><category><![CDATA[नज़रिया]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/DAQ9Qpzb8DOxicQIjZUN.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/DAQ9Qpzb8DOxicQIjZUN.jpg"/></item></channel></rss>