<rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" xmlns:dcterms="http://purl.org/dc/terms/" xmlns:geo="http://www.w3.org/2003/01/geo/wgs84_pos#" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/" xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/" xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/" version="2.0"><channel xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/"><title><![CDATA[ बुन्देलखंड]]></title><link>https://ravivarvichar.in/tags/bundelkhndd</link><description/><atom:link href="https://ravivarvichar.in/rss/tags/bundelkhndd" rel="self"/><language>en-us</language><lastBuildDate>Sat, 13 May 2023 17:01:04 +0530</lastBuildDate><item><title><![CDATA[पानी की कोई जात नहीं होती ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/hum-bhi-hero/women-handpump-mechanics-of-bundelkhand-challenge-caste</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/NlAfYKBF5MUYYP0aR3C2.jpg"><p>प्यास लगी हो, कपड़े-बर्तन धोना हो, या सफाई करनी हो, पलक झपकते ही नल चालू, और पानी आने लगता है. पर इस बुनियादी सहूलियत से आज भी कई गांव मीलों दूर हैं. कुछ ऐसा ही हाल बुंदेलखंड के कोइलीहाई गांव का है. सूखाग्रस्त होने की वजह से पानी लेने कई मीलों दूर जाना पड़ता है. जिसकी वजह से रोज़गार पर ध्यान देना मुश्किल था, हाथों में भारी मटकों से निशान पड़ गए. सरकार से मदद न मिली, और न ही खुद कुछ समाधान ढूंढ पा रहे थे. पानी की किल्लत से तंग आकर, कोली दलित महिला चमेला ने हालात बदलने का सोचा. चमेला हर दिन  दूर के कुएं तक पैदल चलते-चलते थक चुकी थी. एक दिन उनका ध्यान पास के एक जंग खा चुके हैंडपंप पर गया जो तीन साल से खराब था. चमेला ने हैंडपंप को ठीक करने का फैसला लिया.</p>
<p>आसपास के गांवों में हर कोई उन्हें एकमात्र महिला हैंड-पंप मैकेनिक के रूप में जानता है. यह उन शुरुआती दिनों से बहुत अलग है जब लोग कहते थे, "छोटी जाति की औरत कैसे हैंड-पंप सुधारना जानेगी, ये तो बस गोबर उठा सकती है." शुरुआत में, चमेला के पति ने भी सोचा की ये इतना भारी हैंड-पंप कैसे उठाएगी, सुधारना तो दूर की बात. सभी ने उनकी क्षमता पर संदेह किया, लेकिन उन्होंने जल्द ही सबका शक दूर कर दिया. चमेला ने सोचा अगर वे रोज़ कटी हुई लकड़ी के 75 किलो के एक दर्जन बंडल उठा सकती है, तो हैंडपंप क्यों नहीं?</p>
<p>एक बार चमेला को ग्राम प्रधान के घर के पास हैंडपंप ठीक करने के लिए भवारी गांव बुलाया गया. चमेला ने बड़ी सावधानी से कदम आगे बढ़ाया, ताकि हैंड-पंप के चारों ओर बना अदृश्य घेरा पार न हो जाए. कोली दलित होने की वजह से, चमेला गाँव के किसी 'बामन' (ब्राह्मण) का जाने-अनजाने अपमान नहीं करना चाहती थी. प्रधान को जल्द ही एहसास हो गया कि वह दलित है. चिल्लाते हुए प्रधान ने आदेश दिया, "सुनो, सुनो, हमारे हैंडपंप को मत छुओ. तुम एक कोली चमार (दलित) हो, फ़ौरन चली जाओ . ' चमेला ने प्रधान के जाते ही हैंडपम ठीक किया. पंप पिछले पांच साल से खराब था और इसके चारों ओर मल जमा हो गया था.  बामन देखने आया तो चमेला ने कहा, "'मेरे घर का आंगन आपके घर से कहीं ज्यादा साफ है, मिस्टर. </p>
<p>ऐसी ही मिलती-जुलती कहानी चित्रकूट की राजकुमारी की है.  वे भी हैंडपंप मैकेनिक है. गांव के ऊंची जाति के पुरुषों ने उनका विरोध किया और उनके काम करने पर पाबंदी लगाने की कोशिश की. फिर, गांव की महिलाओं ने उनका साथ दिया, वे समूह बनाकर एकजुट हुई, हाथ में पाना लिए साड़ी का पल्लू फहराती हुई गई और पुरुषों के सामने गांव में दो बोरवेल खोद दिए. </p>
<p>बुंदेलखंड इलाके में लम्बे समय से चली आ रही पानी की समस्या हर चनाव का मुद्दा बनी, पर वादों से आगे कुछ समाधान नहीं निकला. हस्ते हुए एक कम उम्र की दुल्हन कहती है, "मुझे पता होता तो, बुंदेलखंड में कभी शादी न करती. " पानी इस्तेमाल तो सभी करते हैं, पर पानी भरने की ड्यूटी केवल महिलाओं की रहती है.  इसी वजह से इस समस्या को महिलाओं की समस्या समझकर अनदेखा कर दिया जाता है. महिलाओं की समझी जाने वाली इस समस्या का समाधान खुद महिलाओं ने निकाला. उठती उंगलियों और जाति के सवालों से लड़ते हुए, वे कर दिखाया जो ऊंची जाति के पुरुष और नेता भी पूरा करने में असमर्थ थे.  </p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मिस्बाह</dc:creator><pubDate>Sat, 13 May 2023 17:01:04 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/hum-bhi-hero/women-handpump-mechanics-of-bundelkhand-challenge-caste]]></guid><category><![CDATA[हम में है हीरो]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/NlAfYKBF5MUYYP0aR3C2.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/NlAfYKBF5MUYYP0aR3C2.jpg"/></item><item><title><![CDATA[खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी... ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/kahaniyan/shg-women-in-bundelkhand-conserves-water-through-jal-saheli-model</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/8ZHXxDFaTVHbVqIUUTeW.jpeg"><p dir="ltr">बुंदेलखंड की  वीरांगना लक्ष्मी बाई ने अंग्रेज़ो से लोहा लेकर वीरगति  प्राप्त की. लेकिन लगभग 180 साल बाद आज दुश्मन बदल गया है.   बुंदेलखंड की सैकड़ों वीरांगनाएं आज जलवायु परिवर्तन से दो-दो हाथ आज़मा रही हैं. सूखाग्रस्त इलाके में पानी की उपलब्धता को बनाये रखने के लिए एक जुट होकर संघर्ष कर रही हैं.       </p>
<p dir="ltr">बुंदेलखंड मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश की सीमा से सटा एक ऐसा पठारी क्षेत्र है, जो दोनों राज्यों के 13 जिलों से मिलकर बना है. एक करोड़ से भी ज़्यादा आबादी वाले इस क्षेत्र की ज़्यादातर नदियां, तालाब और कुंए सूख रहे हैं. पानी ना होने के कारण किसान आत्महत्या कर रहे हैं और परिवार के परिवार पलायन को मजबूर हैं. क्षेत्र में उद्योगों का विकास ना के बराबर है. पानी की समस्या सबसे बड़ी और पुरानी है. </p>
<p dir="ltr">ऐसे में गांव -देहातों में रहने वाली महिलाएं आगे आई हैं. उन्होंने यहां की एक स्वयं सेवी संस्था की पहल पर एक समूह बनाया है, जिसका नाम है जल सहेली. समूह के नाम के आधार पर समूह से जुड़ने वाली महिलाओं को भी जल सहेली कहते हैं, जो अपने गांव के क्षेत्र में पानी की समस्या को दूर करने के लिए सभी प्रकार के प्रयास करती हैं. </p>
<p dir="ltr"><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/f4L8VJUIVuQw4f76j23o.jpeg" alt="SHG women saving water"></p>
<p dir="ltr"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: Ravivar vichar</em></span></p>
<p dir="ltr">परमार्थ सेवी संसथान की मदद से देखते ही देखते पूरे बुंदेलखंड में 1000 से अधिक जल सहेलियों का एक मॉडल खड़ा हो गया. ये ग्रामीण  महिलाएं गांव के लोगों को पानी से जुड़े हर प्रकार की समस्या के समाधान बताती हैं | इसमें पानी का संचयन, जल संरक्षण, कुओं को गहरा करना, जल संरचनाओं का पुनर्द्धार, छोटे बांध बनाना, हैंड पंप को सुधारना, सरकार के साथ समुदाय की भागीदारी करवाना, प्रशासनिक अधिकारियों से मिलना और ज्ञापन देना तक शामिल है |</p>
<p dir="ltr">परमार्थ सेवी संसथान के संजय सिंह बताते है, 'जल सहेली' मॉडल के माध्यम से बुंदेलखंड के चंदेल कालीन तालाबों के पुनरुद्धार का बेहतर प्रयास किया है. इन जल सहेलीयो ने पानी पंचायत के माध्यम से न केवल 2256 हेक्टेयर कृषि भूमि को कुल 10.121 बिलियन लीटर पानी उपलब्ध कराया, बल्कि फ़सल पद्धति में बदलाव और स्मार्ट कृषि के माध्यम से कुल 3.288 बिलियन लीटर पानी की बचत की. जल सहेलियों  के इन प्रयासों से 1194.60 टन अतिरिक्त कृषि उत्पादन और 8867 श्रमिक दिवस का रोज़गार भी उत्पन्न किया.</p>
<p dir="ltr">गांव की यह महिलाएं बहुत से कामों में पुरुषों से भी ज़्यादा बेहतर तरीके से भागीदारी करती हैं. जल सहेलियों का कहना है कि जिन गांवों में जल सहेलियों के ग्रुपों का गठन हुआ है, वहां विकास खुद-ब-खुद दिखता है. जल स्रोंतों से अतिक्रमण हटा है. पीने के पानी की व्यवस्था भी काफी अच्छी हुई है. सिंचाई आदि के साधनों की कमी भी दूर हुई.</p>
<p dir="ltr"><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/Hlh8rZUejvSkxi4x4Y6J.jpeg" alt="SHG women saving water"></p>
<p dir="ltr"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: Ravivar vichar</em></span></p>
<p dir="ltr">मध्य प्रदेश में छतरपुर जिले की जल सहेली गंगा लोधी कहती है, "लोग जलवायु परिवर्तन की बात करते हैं लेकिन यहां हम लोगों को पता है की मौसम में बदलाव हमे कैसे और कितना परेशान कर रहा है. बढ़ते हुए तापमान से बुंदेलखंड की धरती और ज़्यादा प्यासी हो गयी है और अब हमे पानी की हर एक बूंद को बचाना है. जल सहेलियों की एक बड़ी सफलता है कि लोगों को पानी बचाना आ गया है."</p>
<p dir="ltr"><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/8aWRLoHNaZWSgaZKIt5P.jpeg" alt="SHG women saving water"></p>
<p dir="ltr"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: Ravivar vichar</em></span></p>
<p dir="ltr">ट्यूबवेल से पानी निकालते समय पहले काफी पानी बह भी जाता था. लेकिन हमने  उसको भी बचाने का प्रयत्न किया है."</p>
<p dir="ltr">गंगा कहती हैं, " हमने ट्यूबवेल के पास पानी को बहने के लिए  नालियां बना दीं है और उनका निकास गढ्ढो में होता है. गढ्ढे भरते हैं और उसका पानी मवेशी पी लेते हैं. धरती का पानी भी रिचार्ज हो जाता है."</p>
<p dir="ltr"><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/AiHhyvRuxsJ2W8tkkB13.jpeg" alt="SHG women saving water"></p>
<p dir="ltr"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: Ravivar vichar</em></span></p>
<p dir="ltr">गंगा के अनुसार जल सहेलियों ने अपने गांव की एक नदी को भी पुनर्जीवित किया है. ये छोटी सी सही लेकिन गांव के लिए वरदान है और ये केन नदी की एक सहायक नदी है.  </p>
<p dir="ltr">“जल सहेली”और "पानी पंचायत” का यह मॉडल आज भारत सहित पूरी दुनिया में फ़ैल रहा है.</p>
<p> </p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">देशदीप सक्सेना </dc:creator><pubDate>Wed, 22 Mar 2023 12:46:24 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/kahaniyan/shg-women-in-bundelkhand-conserves-water-through-jal-saheli-model]]></guid><category><![CDATA[कहानियां]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/8ZHXxDFaTVHbVqIUUTeW.jpeg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/8ZHXxDFaTVHbVqIUUTeW.jpeg"/></item><item><title><![CDATA[वो मिट्टी है, कभी मिट नहीं सकती ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/kahaniyan/shg-women-doing-terracotta-art</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/TfDpUbR7UUyhVphDC8xu.jpeg"><p>मिट्टी वो है जो कभी नहीं मिटती.इसलिए कहा गया है निर्मम कुम्हार की थापी से कितने रूपों में कुटी,पिटी ; हर बार बिखेरी गई किंतु मिट्टी फिर भी तो नहीं मिटी .और ऐसे ही हमारी लोक कलाएं भी मिटती नहीं है,वो बार-बार वापस आती है. ऐसा इसीलिए भी क्योंकि हमारे पुरखों ने बड़े जतन से इन्हे संभाला सहेजा.बात मिट्टी से शुरू हुई थी और मिट्टी की अद्बुत कला में से एक टेराकोटा है.टेराकोटा मतलब पकी हुई मिट्टी,यह इटालियन शब्द है. गीली मिट्टी को पकाकर जो भी बनाया जाता है उसे टेराकोटा कहते है.भारत में प्राचीन काल से इसे काम में लिया जाता है. टेराकोटा की इस कला में बुन्देलखंड इलाके के छतरपुर जिले के गांव धामना की अपनी एक परंपरा रही है. यहां के कई परिवार इस हूनर में पीढ़ियों से लगे रहे. जैसे-जैसे समय परिस्थिति और पसंद बदली इन परिवारों की बाद वाली पीढ़ियां अपने पुश्तैनी धंधे और हूनर को छोड़,खेत मजदूरी में चले गए. इस तरह परिवार की महिलाएं या तो घर की चार दीवारी में सिमट कर रह गई या खेतों में मजदूरी का रास्ता अपना लिया. टेराकोटा के काम से कमाई का जरिया कम होता चला गया, जब पैसे की कमी ने नयी पीढ़ी को घेरा तो  उसने नए रास्ते चुन लिए. लेकिन कुछ सालों में ही खेती मजदूरी में मिले शोषण और काम मजदूरी ने इस गांव के लोगों को परेशान कर दिया.  इसकी सबसे ज़्यादा शिकार हुई गांव की महिलाएं.  <br> <br>कुछ साल तो यह सोचने में लग गए कि आखिर किया क्या जाए. इधर लगातार बिगड़ते हालात ने परेशान कर रखा था.कोई रास्ता सूझ नहीं रहा था. लेकिन नयी राह चलने के लिए कई बार पीछे मुड़कर देखना भी ज़रूरी होता है.और यही इन महिलाओं ने भी किया.उन्हें याद आयी अपनी  पुश्तैनी कला और हूनर. फिर बना एक प्लान. सबसे पहले तो महिलाओं ने  मिलकर रोशनी महिला स्वसहायता समूह का गठन किया. समूह के गठन और काम करने की ज़िद्द से इन महिलाओं का जीवन रोशनी से जगमगा उठा. इस तरह लगभग ख़त्म हो चुकी टेराकोटा को फिर से ज़िंदा करने की ठानी. पहुंच गयी अपने गांव के बड़े-बूढ़ों के पास.दिल लगाकर सीखा और धीरे धीरे एक्सपर्ट बन गयी,आखिर खून भी तो मिटटी को ही पहचानता है. इन महिलाओं ने मिट्टी को तराशकर सोना बना दिया.</p>
<p><img src="https://d2vbj8g7upsspg.cloudfront.net/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/ItpU07UY4g7LPcJpERd0.jpeg" alt="terracotta 2"></p>
<p><em> टेराकोटा से तैयार कलाकृति को सजाती हुई (Photo Credits: Ravivar Vichar)</em><br> <br>बुंदेलखंड में कभी अभिशप्त समझे जाने वाली बेटियों ने ऐसी सोच रखने वालों को करारा जवाब दिया. इन बेटी-बहुओं ने चौके-चूल्हे से निकल कर आत्मनिर्भरता की नई इबारत गढ़ दी.यह संभव हुआ रोशनी स्वसहायता समूह की महिला सदस्यों को मिले जिला प्रशासन और आजीविका मिशन के मार्गदर्शन और सहयोग से. इन महिलाओं ने अपने  पुरखों के हूनर को संरक्षित कर संवार दिया. ये महिलाएं अपने हाथों से मिट्टी से बनाए जाने वाले टेराकोटा की खूबसूरत मूर्तियां और खिलौने बना रहीं हैं.  <br> <br>गांव की एक घर छत पर बैठी हल्की बाई अपने काम में व्यस्त है.गीली मिट्टी का लौंदा हाथ में लिए वह उसे एक शेप दे रही है. हल्की बाई कहती हैं -" मेरी उम्र हो गई थी. खेत में मजदूरी करने जाने की हिम्मत नहीं बची इसीलिए उन्होंने कुछ नया करने की सोचा".इस सोच को लेकर वह अपने परिवार की बहुओं और बेटियों के साथ बैठी. दूसरी महिलाएं मजदूरी से तंग आ चुकी थीं. कुछ महिलाओं का जीवन तो घर में खाना बनाने और बच्चों को संभालना ही था.</p>
<p><img src="https://d2vbj8g7upsspg.cloudfront.net/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/2stDiuIeUXFXsrmT61BH.jpeg" alt="teracotta"></p>
<p><em> टेराकोटा से तैयार कलाकृति को रंगते हुए  (Photo Credits: Ravivar Vichar) </em></p>
<p> <br>समूह सदस्य आगे बताती हैं - "हमने अपने परिवार की ही बड़े -बुज़ुर्गों से उन्होंने मिट्टी की इन कलाकृतियों को बनाना सीखा " .धीरे-धीरे यह बदलाव आया कि परिवार में पति और यहां तक के ससुर भी महिलाओं की मदद करने में जुट गए.आखिर SHG ने उन्हें भी मौका दिया वापस मिटटी में आकर आपने हाथ आजमाने का. आज महिलाएं खुश हैं, घर का काम निपटा कर उनको बाहर मजदूरी  पर जाना नहीं पड़ता. और तो और उनके हूनर की पहचान और धाक प्रदेश के साथ पूरे देश में भी जम गई.<br> <br>पुरखों की टेराकोटा कला को ज़िंदा कर रौशनी स्वसहायता समूह की इन महिलाएं की गांव और परिवार नया सम्मान दिलाया, वहीं पुश्तैनी पहचान को फिर स्थापित कर दिया. यह धामना गांव अब मिट्टी से बनी मूर्तियों और कलाकृतियों के लिए तो जाना ही जाता है, महिलाओं के वापस अपनी मिट्टी तक पहुंचने की मिसाल भी है.इन्हीं महिलाओं और पावन मिट्टी  के लिए कहा गया है -<br>मिट्टी की महिमा मिटने में,मिट-मिट हर बार संवरती है,<br>मिट्टी मिट्टी पर मिटती है, मिट्टी मिट्टी को रचती है..।</p>
<div class="yj6qo"><img src="https://d2vbj8g7upsspg.cloudfront.net/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/I2Tbqk7YhZNSYnuOeYqp.jpeg" alt="terracotta 1"></div>
<div class="yj6qo"><em>मिटटी से टेराकोटा कलाकृति बनाते हुए (Photo Credits: Ravivar Vichar)</em></div>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">विवेक वर्द्धन श्रीवास्तव </dc:creator><pubDate>Sat, 25 Feb 2023 15:48:20 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/kahaniyan/shg-women-doing-terracotta-art]]></guid><category><![CDATA[कहानियां]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/TfDpUbR7UUyhVphDC8xu.jpeg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/TfDpUbR7UUyhVphDC8xu.jpeg"/></item></channel></rss>