<rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" xmlns:dcterms="http://purl.org/dc/terms/" xmlns:geo="http://www.w3.org/2003/01/geo/wgs84_pos#" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/" xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/" xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/" version="2.0"><channel xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/"><title><![CDATA[ डिंडोरी]]></title><link>https://ravivarvichar.in/tags/ddinddorii</link><description/><atom:link href="https://ravivarvichar.in/rss/tags/ddinddorii" rel="self"/><language>en-us</language><lastBuildDate>Tue, 29 Aug 2023 14:48:29 +0530</lastBuildDate><item><title><![CDATA[राखियों पर नज़र आ रही गौंडी आर्ट ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/kahaniyan/shg-women-made-charming-rakhis-in-mandla</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/nYG9S4HhYstF8ur3V120.jpg"><h1 style="text-align: justify;">मंडला में बहनों ने बनाई मनमोहक राखियां</h1>
<p style="text-align: justify;"><strong>मध्यप्रदेश (MP)</strong> के<strong> डिंडोरी (Dindori)</strong> और<strong> मंडला (Mandla)</strong> जिले की <a href="https://ravivarvichar.in/khabar/uttarkhand-shgs-making-rakhis-with-bhojpatra">राखियां</a>&nbsp;बहनों के लिए पहली पसंद बन गई. <strong>(Mandla</strong><strong>(Self Help Group)</strong> की महिलाओं ने राखियों को तैयार करने में<strong> <a href="https://ravivarvichar.in/khabar/gondi-kala-gets-gi-tag">गौंडी कला</a> (Gondi Art)</strong> उकेर दी. इस इलाके की<a href="https://ravivarvichar.in/photovideo/madhya-pradesh-gond-art-gets-gi-tag"> गौंडी कला </a><strong>(Gondi Art) </strong>को<strong> प्राचीन आदिवासी संस्कृति</strong> <strong>(Traditioanal Tribal Culture) </strong>माना जाता है.&nbsp;<strong>आजीविका मिशन</strong> <strong>(Ajeevika Mission)</strong> के अधिकारियों और जिला प्रशासन ने लगातार प्रोत्साहन दिया. ऐसी राखी यहां कई समूह की महिलाएं बना कर बाजार सहित ऑनलाइन बिक्री कर रहीं.&nbsp;<br><strong>मंडला</strong> <strong>(Mandla)</strong>जिले के <strong>नैनपुर विकासखंड</strong> के<strong> प्रकाश स्वयं सहायता समूह</strong>,<strong> शांति स्वयं सहायता समूह तिलई</strong>,<strong> रानी</strong> <strong>दुर्गावती स्वयं सहायता</strong> <strong>समूह</strong> <strong>कमता </strong>और <strong>सागर स्वयं</strong> <strong>सहायता समूह बहेरी</strong> की सदस्य <strong>राखियां</strong> बना रहीं.&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;">तिलई गांव की <strong>सुमन बंदेवार</strong> बताती है- <em>"हमने साल 2022 में ग्रामीण विकास व महिला उत्थान संस्था से &nbsp;से गौंड चित्रकारी का प्रशिक्षण लिया था.लगभग 20 महिलाओं अभी राखी बना रहीं."&nbsp;</em></p>
<p><img alt="gondi rakhi" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/500x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/t9Isa8q97fURVL079BsU.jpg" class="center" style="width: 500px;"></p>
<p class="center"><span style="font-size: 8pt;"><em>गौंडी आर्ट की सुंदर राखी (Image Credits: Ravivar Vichar)</em></span>&nbsp;</p>
<h2 style="text-align: justify;"><strong>राखी कारोबार से बढ़ी कमाई</strong>&nbsp;</h2>
<p style="text-align: justify;">अभी तक<strong> गौंडी आर्ट (Gondi Art)</strong> को राखी बनाने में कभी प्रयोग नहीं किया गया.<strong> आजीविका मिशन (Ajeevika Mission)</strong> के<strong> जिला परियोजना प्रबंधक (DPM) बीडी भेसारे</strong> कहते है-<em> "समूह की महिलाओं को राखी कारोबार से काफी रिस्पॉन्स मिला है. अगली बार और भी समूह &nbsp;को प्रमोट किया जाएगा. लगभग 200 राखी बना चुकीं हैं और एक हजार नग से ज्यादा बनाने का प्रयास है."</em><br>समूह सदस्यों ने बताया-<em> "राखी बनाए में 10 से 40 रुपए तक की लागत आ रही. बेचने के लिए 25 से 100 रुपए तक की&nbsp;<a href="https://ravivarvichar.in/khabar/shg-women-made-biggest-eco-friendly-rakhi-in-burhanpur"> राखी </a>है. लगातार डिमांड बनी हुई है."&nbsp;</em></p>
<h3 style="text-align: justify;">गिफ्ट हैंपर से मिलेगी नई पहचान&nbsp;</h3>
<p style="text-align: justify;"><strong>मंडला</strong> <strong>(Mandla) </strong>और<strong> डिंडोरी</strong> <strong>(Dindori) </strong>जिले की <strong>गौंडी आर्ट (Gondi Art) </strong>को &nbsp;<strong>जीआई टैग (GITag)</strong> मिलने के बाद इलाके के कलाकारों में खासा उत्साह है. जिला प्रशासन भी <strong>स्वयं</strong> <strong>सहायता समूह</strong> <strong>(Self Help Group) </strong>से जुडी सदस्यों को प्रोत्साहित कर रहा. <strong>कलेक्टर (DM) डॉ.सलोनी सिडाना (Dr.Saloni Sidana)</strong> कहती हैं - <em>"यहां की आर्ट को नई पहचान मिली. समूह की महिलाओं सहित दूसरे आर्टिस्ट को और रोजगार के अवसर और कमाई बढ़ने के लिए योजना बनाई जा रही है. लोकल प्रोडक्ट्स का गिफ्ट हैंपर तैयार कर रहे. इसमें कोदो-कुटकी के बिस्किट,आवंला के लड्डू, बेल केंडी सहित गोंडी पेंटिंग की राखियां रहेंगी.इस हैंपर से अधिक कमाई मिलेगी."</em><br>कलेक्टर सिडाना ने साड़ियों पर भी गौंडी आर्ट का काम शुरू करवाया.</p>
<p><img alt="mandla dm gondi rakhi" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/501x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/zNNwN9ZXETzqLd6lzFq0.jpg" class="center" style="width: 501px;"></p>
<p class="center"><span style="font-size: 8pt;"><em>मंडला डीएम डॉ सलोनी सिडाना&nbsp; (Image Credits: Ravivar Vichar)&nbsp;</em></span></p>
<h3 style="text-align: justify;">साक्षरता मिशन भी था चर्चा में&nbsp;</h3>
<p style="text-align: justify;">इसके पहले भी <strong>मंडला </strong>जब चर्चा में आया था जब तत्कालीन <strong>कलेक्टर </strong>(DM) और वर्तमान में&nbsp;<strong>इंदौर</strong> की <strong>नगर निगम (NN)आयुक्त (Commisinor) हर्षिका सिंह (Harshika Singh) </strong>ने महिलाओं के साक्षरता का मिशन चलाया. खुद गांव-गांव जाकर पढ़ाती. नतीजा यह हुआ कि इसका असर साक्षरता दर बढ़ा.&nbsp;</p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">विवेक वर्द्धन श्रीवास्तव </dc:creator><pubDate>Tue, 29 Aug 2023 14:48:29 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/kahaniyan/shg-women-made-charming-rakhis-in-mandla]]></guid><category><![CDATA[कहानियां]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/nYG9S4HhYstF8ur3V120.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/nYG9S4HhYstF8ur3V120.jpg"/></item><item><title><![CDATA[महिलाओं के सफल प्रोजेक्ट पर सरकार फेल ! ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/sharminda/government-failure-on-success-of-women-project</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/BFyc9DYpcShLCSsdJYqR.JPG"><h1 dir="ltr"><strong>महिलाओं के सफल प्रोजेक्ट पर सरकार फेल !</strong></h1>
<p dir="ltr"><span><strong>मध्यप्रदेश</strong> (MP) के <strong>डिंडोरी</strong> (Dindori) जिले की <strong>बैगा आदिवासी </strong>(Baiga Tribe) महिला फूलमती टेकाम की नींद उडी हुई है. गांव की उद्यमी का दर्जा हासिल करने के बाद सरकार की यह योजना ही उलटी पड़ गई. किसी समय 35 से 40 हजार रुपए महीना कमाने वाली फूलमती पर अब 60 लाख रुपए की उधारी चढ़ गई. साहूकारों ने फूलमती का जीना मुश्किल कर दिया. इस जिले में सिर्फ एक फूलमती नहीं बल्कि ऐसी सैंकड़ों महिलाएं हैं जिनका जीना और घर से निकलना मुश्किल हो गया. यह वे ही <a href="https://ravivarvichar.in/kahaniyan/adani-foundation-trains-rural-people-run-milk-collection-center">महिलाएं</a> हैं, जिनकी मेहनत और काम के दम पर सरकार और प्रशासन मिसाल देता था. ये सब महिलाएं जिले के<a href="https://ravivarvichar.in/sharminda/complaint-filed-against-two-shgs-for-siphoning-off-cmsdf-funds"> स्वयं सहायता समूह </a> से जुड़ीं हुईं हैं.</span></p>
<h2 dir="ltr"><strong>शासन के आगे बेबस हुईं महिलाएं </strong></h2>
<p dir="ltr"><span>दरअसल, सरकार ने आदिवासी समुदाय की सबसे कमजोर बैगा समुदाय की महिलाओं को <a href="https://ravivarvichar.in/sharminda/seoni-shg-women-struggles-to-get-ccl-amount"> आर्थिक </a>मजबूती और आत्मनिर्भर बनाने के लिए योजना लागू की. इसे आदिवासी बहुल डिंडोरी (Dindori) जिले का <strong>पायलट प्रोजेक्ट</strong> (Pilot Project) बनाया. महिलाओं के बनाए <a href="https://ravivarvichar.in/sharminda/women-shg-members-cheated-of-rs-15-lakh-in-odisha-threaten-mass-suicide">संगठन</a> को फायदा तक हुआ. उस चलती हुई सफल योजना को बिना सोचे-समझे दूसरी योजना में जोड़ने का रिज़ल्ट ये रहा कि महिलाओं के बने चार संघठन बंद हो गए या कुछ बंद होने के कगार पर हैं. ये महिलाएं आर्थिक रूप से बर्बाद हो गईं.</span><span>चौंकाने वाली बात यह है कि इन संघठन का सरकार के पास लगभग साढ़े 81 लाख रुपए लेनदारी है. जिसके लिए ये महिलाएं चक्कर काट रहीं.    </span></p>
<h2><strong>2 करोड़ के टर्नओवर का बना दिया रिकॉर्ड </strong></h2>
<p dir="ltr"><span>सरकार ने बैगा आदिवासी समुदाय की महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए 2007-08 में<strong> तेजस्विनी महासंघ</strong> (Tejasvini Mahasangh) बनाए. 2013 का साल आते-आते-आते जिले के सातों ब्लॉक में 9 संघ के साथ 2470 स्वयं सहायता समूह (Self Help Group) बने. इन समूह में 31 हजार से ज्यादा महिलाओं को काम मिलना शुरू हुआ. 2023 की सरकारी रिपोट के आधार पर  इन महिलाओं के संघठन को जिले की 913 आंगनबाड़ियों में लगभग पचास हजार बच्चों को बाजरा से तैयार कोदो-कुटकी (Millets) जैसे पौष्टिक नाश्ता सप्लाई किया. इसका टर्नओवर दो करोड़ तक पहुंचा. यह रिकॉर्ड बना.</span></p>
<p dir="ltr"><span>तेजस्विनी संघ गाड़ासारा की अध्यक्ष रसीला यादव बताती है-<em> "हमारे जिले में आंगनबाड़ियों में नाश्ता सप्लाई के आलावा <strong>गोंडी पेंटिंग</strong> (Gaundi Panting), सैनेटरी पेड (Sanitary Pad) निर्माण, प्राइमरी स्कूल के बच्चों की यूनिफॉर्म भी बनाई, जिससे महिलाओं की स्थिति अच्छी हुई थी. अब 17 लाख का कर्जा है.इसी ब्लॉक की दो यूनिट बंद हो गई." </em></span></p>
<h2 dir="ltr"><strong>योजनाओं की विसंगति से फंसा पेंच </strong></h2>
<p dir="ltr"><span><strong>स्वयं सहायता समूह</strong> (Self Help Group) पर मुसीबत की वजह 2019 में राष्ट्रीय आजीविका मिशन(NRLM) में इस योजना को मिला दिया. इसके काम और पैसा फंस गया. पूरे जिले में ऐसे संगठनों को आंगनबाड़ी में मिलेट्स (Millets) नाश्ता सप्लाई करने और ऐसे ही दूसरे काम के लिए साढ़े 81 लाख रुपए लेना थे.इस योजना को<strong> आजीविका मिशन </strong>(Ajeevika Mission) में मर्ज़ करते ही पहले मिलने वाली सुविधा में वार्षिक अनुदान. फाइनेंशियल सपोर्ट जैसी कई व्यवस्थाएं छीन गईं. हालत यह हुई कि इन संघ के पदाधिकारियों ने भोपाल मुख्यालय पर महिला एवं बाल विकास निदेशालय के सामने प्रदर्शन तक किया. फिलहाल नतीजा कुछ नहीं निकला.       </span></p>
<p dir="ltr"><span>तेजस्विनी मालसुता महासंघ,गोरखपुर की सचिव फूलमती टेकाम बताती है- <em>"हम बाजार से कच्चा माल खरीद कर नाश्ता तैयार करते थे. हमारे संघ का 12 लाख का भुगतान रुका. हमने बाजार से 12 लाख रुपए का कर्जा किया. यह ब्याज सहित 17 लाख हो गया.साहूकार परेशान कर रहे." </em></span></p>
<h3 dir="ltr"><strong>कब तक शर्मिंदा ! </strong></h3>
<p dir="ltr"><span>सरकार महिलाओं को मजबूत बनाने के लिए स्वयं सहायता समूह (SHG) बनवा रही.इसमें पुराने संघ खत्म हो गए. जिले के मेहंदवानी, कंजारिया, बाजर और शाहपुर के संघों ने दम तोड़ दिया. आजीविका मिशन (Ajeevika Mission) में चाहे नए समूह और उनसे जुड़ी महिलाओं को योजनाओं का लाभ मिलने का दावा सरकार करे, लेकिन इसी शासन की एक योजना में अदूरदर्शिता ने जहां उद्यमी महिलाओं को साहूकारों के सामने मुंह छुपाना पड़ रहा, वहीं विभागों से जुड़े अफसर फाइलों को धूल चटा रहे.अफसरों के इस लेटलतीफी के कारण उन महिलाओं को साहूकारों के सामने शर्मिंदा होना पड़ रहा, जिन्होंने अपनी मेहनत से योजनाओं को सफल बना कर सरकार और अफसरों की नाक ऊंचीं की थी. </span></p>
<p><b> </b></p>
<p dir="ltr"></p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">विवेक वर्द्धन श्रीवास्तव </dc:creator><pubDate>Tue, 18 Jul 2023 17:22:03 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/sharminda/government-failure-on-success-of-women-project]]></guid><category><![CDATA[शर्मिन्दा]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/BFyc9DYpcShLCSsdJYqR.JPG" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/BFyc9DYpcShLCSsdJYqR.JPG"/></item><item><title><![CDATA[UN तक पहुंचाया कोदो कुटकी को ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/hum-bhi-hero/adivasi-women-presents-at-uno</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/FudyHynjUw11UeLXePfT.jpeg"><p>डिंडोरी की बैगा आदिवासी रेखा पेंड्राम की अपने गांव से न्यूयॉर्क तक की यात्रा नारी सशक्तिकरण की अनूठी कहानी है. जिले की आदिवासी महिलाओं को एक कर उन्हें स्वावलंबी बनाने में उनका बहुत बड़ा योगदान है. अमेरिका में 2017 में उन्होंने खाद सुरक्षा पर मध्य प्रदेश के प्रतिनिधि के रूप में एक प्रेसेंटेशन दिया था. भारी करतल ध्वनि के बीच, उन्होंने दुनिया को खाद्य सुरक्षा, महिलाओं के आर्थिक- सामाजिक उत्थान और उनके स्वास्थ्य सम्बंधित विषयों पर उनके स्वसहायता समूह के महासंघ द्वारा चलाये जा रहे कार्यों का विस्तार से विवरण दिया था. रेखा का प्रयास अब जिले की हर एक महिला को SHG आंदोलन से जोड़ना है.</p>
<p>"वह एक सपना जैसा था जब न्यूयॉर्क के कैनेडी हवाई अड्डे पर हमारा हवाई जहाज़ उतरा था ", रेखा बताती है. मुझे याद है, दुबली पतली आदिवासी महिला थोड़ा ठहर के कहती हैं, 2007 के पहले में घर से बाहर कम ही निकलती थी. दूसरों से बात करने में एक झिझक होती थी और सरकारी कर्मचारियों से बात करने में थोड़ा डर ही लगता था. लेकिन स्वसहायता समूह से जुड़ने के बाद सब बदल गया. " एकता में शायद ये ही शक्ति होती है". रेखा की अमेरिका अंतर्राष्ट्रीय कृषि विकास कोष द्वारा प्रायोजित थी. और रेखा का प्रेजेंटेशन संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) के हेड क्वार्टर में आयोजित था. प्रेजेंटेशन का शेड्यूल 5 मिनट का था. लेकिन वह चलता रहा, रेखा बोलती रही और दुनिया सुनती रही. "शायद लोग सुनना चाहते थे कि इतनी विपन्नता के बावजूद हम कैसे संघर्ष कर रहे हैं और न केवल खुश हैं बल्कि आर्थिक सामाजिक विकास भी कर रहे हैं", रेखा कहती है. उसके बाद रेखा ने कभी पलट के नहीं देखा.<br> <br>डिंडोरी जिले के मेहंदवानी के फलवाही गांव की रेखा 2007 में तेजस्विनी महिला स्वसहायता समूह से जुड़ीं. जीवन को दिशा मिली तो उन्होंने गांव-गांव में महिलाओं से संपर्क साधा और महिला समूह खड़े कर दिए. मेहंदवानी विकासखंड की 24 ग्राम पंचायतों और 41 गांवों को जोड़कर एक संघ बनाया और शुरू कर दिया विलुप्त हो रही कोदो-कुटकी की खेती का काम. उस वक़्त शायद रेखा इस बात से अनिभिज्ञ  थी कि वो एक राष्ट्रीय स्तर का कार्य करने जा रही है. कुछ ही वर्षों में उनके समूह ने कोदो कुटकी को राष्ट्रीय परिदृश्य पर ला कर खड़ा कर दिया. 2013 में रेखा को तेजस्विनी महिला स्वसहायता समूह का सचिव बना दिया गया. 2007 उनके पति देव सिंह मजदूर थे लेकिन अब वो कोदो कुटकी की खेती उन्नत तरीके से करते हैं. </p>
<p>स्वसहायता समूह से जुड़ने के 7 सात साल बाद ही 2014 में रेखा को सीताराम राव एशिया पेसीफिक लाइवलीहुड अवॉर्ड से सम्मानित किया गया. ये सम्मान भी रेखा को उनके द्वारा किये गए खाद्य सुरक्षा, महिलाओं के सामाजिक व आर्थिक उत्थान, स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों, महिलाओं व बच्चों के पोषण के क्षेत्र में सराहनीय योगदान का नतीजा था.</p>
<p>"आदिवासी व गरीब -पिछड़े इलाके में जन्म, उसके बाद शादी फिर बच्चे और इस दौरान किन-किन परेशानियों का मैंने सामना किया इसे भी दुनिया के सामने रखूंगी. लेकिन मैंने कभी हिम्मत नहीं हारी. मुझे जैसे ही समूह से मिलने का मौका मिला मानो जैसे शरीर में ऊर्जा का संचार  सा हो गया. पहले महिलाओं को एक करना और फिर मिलजुल विलुप्त हो रही खेती के प्रति लोगों को जागरूक किया. नतीजा आपके सामने है. </p>
<p><img src="https://d2vbj8g7upsspg.cloudfront.net/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/TmSGEXpRFramb3oidOVU.jpeg" alt="dindori kodo kutki"></p>
<p><em><span style="font-size: 8pt;">(Image Credits: Ravivar Vichar)</span></em></p>
<p>मध्य प्रदेश महिला वित्त निगम के महाप्रबंधक अरविन्द सिंह भाल जो न्यूयॉर्क में रेखा के साथ थे कहते हैं, " पेंड्राम यूं तो केवल 10वीं तक पढ़ी हैं. लेकिन उनकी वैचारिक शक्ति बहुत मजबूत है. वो अपने धुन की पक्की है और एक मजबूत इच्छा शक्ति वाली महिला है. उन्होंने तेजस्विनी के साथ जुड़कर हजारों महिलाओं की आर्थिक स्थिति को सुधारा". रेखा के साथ उस वक़्त मध्य प्रदेश की महिला एवं विकास मंत्री, और विभाग की प्रमुख सचिव भी अमेरिका गयी थी. लेकिन दुनिया की नज़रों में  रेखा ही थी.</p>
<p>समूह से जुड़ने के कुछ वर्षों बाद रेखा फलवाही गांव से मेहंदवानी ब्लॉक शिफ्ट हो गयी जहां उनके संघ का दफ्तर है. रेखा संघ की सचिव हैं और उनकी देख रेख में  275 SHG  की लगभग  4000 महिलाएं काम करती हैं. रेखा का दिन सुबह 8. 30 पर शुरू हो जाता है जब वो अपने दफ्तर पहुंच जाती हैं. "उसके बाद दिन कब खत्म हो गया पता ही नहीं चलता", वो बताती हैं, "दिन भर लोगों से मिलना, समूह और महासंघ के कामो की मॉनिटरिंग दिन भर चलती रहती है. </p>
<p>" ये एक बिज़नेस हेड के काम सामान है. कोदो कुटकी के भाव पर नज़र रखनी पड़ती है. जब भाव तेज हुआ तो तुरंत माल निकालना पड़ता है. फिर कूकीज और नमकीन की सप्लाई पर ध्यान भी देना पड़ता है," अपने पल्लू से चेहरे का पसीना पोंछती हुई रेखा बताती हैं. </p>
<p>रेखा कहती हैं, स्वसहायता समूह के आंदोलन ने आदिवासी समाज के एक बड़े तबके की, जिसमे वो खुद भी शामिल हैं, ज़िंदगी बदल दी. " गरीब हम तब भी थे, गरीब हम अब भी हैं लेकिन उस और इस गरीबी में जमीन आसमान का अंतर है. अब हम मन और विचारों से गरीब नहीं हैं. अगर परेशानी है तो उसका रास्ता निकालना हमे आ गया है," और ऐसा कहते हुए रेखा के चेहरे पर एकआत्मविश्वास भरी मुस्कान थी.</p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">देशदीप सक्सेना </dc:creator><pubDate>Fri, 10 Mar 2023 18:28:27 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/hum-bhi-hero/adivasi-women-presents-at-uno]]></guid><category><![CDATA[हम में है हीरो]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/FudyHynjUw11UeLXePfT.jpeg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/FudyHynjUw11UeLXePfT.jpeg"/></item><item><title><![CDATA[डिंडोरी के समूहों ने कोदो कुटकी को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर पहुंचाया ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/khabar/dindori-shg-cultivating-kodo-kutki</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/D0iEgBNakeRSFdSqXeli.jpeg"><p dir="ltr">ये उच्च पोषक तत्वों का खजाना हैं.पिछले कई दशकों से ये मध्य प्रदेश के आदिवासी जिले डिंडोरी के पथरीले बंजर दिखने वाले भू-भाग में छिपा था.आदिवासी खुद इसका आधा-अधूरा उपयोग कर पाते थे. हम बात कर रहे हैं कोदो और कुटकी जैसे कल तक तुच्छ समझे जाने वाले अनाजों की.ये पोषण तत्वों से भरपूर है, उच्च स्तर प्रोटीन, फाइबर तरह-तरह के मिनरल्स और एंटी ऑक्सीडेंट पाए जाते हैं. पिछले एक दशक में यहां के गोंड और बैगा आदिवासियों  ने कल तक उपेक्षित इन अनाजों की खेती को एक तरह से पुनर्जीवित कर दिया है.    </p>
<p dir="ltr">डिंडोरी जिले के 41 गांवों की बैगा और गोंड महिलाओं  के स्वसहायता समूहों ने तेजस्विनी कार्यक्रम के जरिए कोदो-कुटकी की खेती शुरू की. वर्ष 2012 में 1,497 महिलाओं ने प्रायोगिक तौर पर 748 एकड़ जमीन पर कोदो-कुटकी की खेती की शुरुआत की थी. समूहों की महिलाओं ने राज्य की मदद से आधुनिक तरीके से खेती करना शुरू की. इससे 2,245 क्विंटल उत्पादन हुआ. इससे प्रेरणा लेकर 2013-14 में 7,500 महिलाओं ने 3,750 एकड़ में कोदो-कुटकी की खेती की और15 हजार क्विंटल कोदो-कुटकी का उत्पादन हुआ. कोदो-कुटकी के बढ़ते उत्पादन को देखते हुए नैनपुर में एक प्रसंस्करण यूनिट ने भी काम करना शुरू कर दिया है. बैगा महिलाओं के फेडरेशन द्वारा संचालित इस कोदो-कुटकी कार्यक्रम को वर्ष 2014 में देश का प्रतिष्ठित राष्ट्रीय सीताराम राव लाइवलीहुड अवार्ड से भी नवाजा गया.</p>
<p><img src="https://d2vbj8g7upsspg.cloudfront.net/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/vnEBDqFJ1N8pxGASQ0u0.jpeg" alt="kodo kutki"></p>
<p><em>SHG महिलाएं अपनी फ़सल के साथ (Image Credits: Ravivar vichar)</em></p>
<p> </p>
<p dir="ltr">हालांकि की शुरुआत में काफी दिक्क्तें आई क्योंकि ये वह वक़्त था जब आदिवासियों को कोदो-कुटकी उगाने में रूचि नहीं रह गयी थी. बाजार में ये बहुत कम दाम में बिकता था.किसानों को  कोदो कुटकी की वैज्ञानिक तरीके से   खेती करनी नहीं आती थी और पारम्परिक तरीके से खेत जोतने में  उत्पादन काफी काम था.समाज में भी लोगों  को इस अनाज की न्यूट्रीएंस का वैल्यू जरा भी अंदाज़ नहीं था. और इन्ही कारणों  का नतीजा था कि किसान धान की खेती की तरफ मुंह मोड़ने लगे थे. लेकिन स्वसहायता समूह  और इन समूह की फेडरेशन के कारण सब कुछ बदल गया आज  डिंडोरी जिले के 528 गांव  के 58 हज़ार से ज्यादा आदिवासी मिल कर 39000 हेक्टेयर भूमि पर  35000 मीट्रिक टन से ज्यादा कोदो-कुटकी का उत्पादन कर रहे हैं. </p>
<p dir="ltr">कोदो मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय अफ्रीका में उगाया जाने वाला अनाज है.एक अनुमान के मुताबिक 3,000 साल पहले इसे भारत लाया गया    और  इसलिए ही कोदो  को भारत का एक प्राचीन और ऋषि अन्न माना जाता था. कोदो-कुटकी मधुमेह नियंत्रण, गुर्दो और मूत्राशय के लिए लाभकारी  भी माना जाता है. यह रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक के प्रभावों से भी मुक्त है. कोदो-कुटकी हाई ब्लड प्रेशर के रोगियों के लिए रामबाण बताया जाता है.  इसमें चावल के मुकाबले कैल्शियम भी 12 गुना अधिक होता है. शरीर में आयरन की कमी को भी यह पूरा करता है. इसके उपयोग से कई पौष्टिक तत्वों की पूर्ति होती है.</p>
<p dir="ltr">वर्ष 2009 में जर्नल ऑफ एथनोफार्माकोलोजी में प्रकाशित एक शोध कोदो को मधुमेह के रोगियों के लिए स्वास्थ्यकर पाता है.  वहीँ वर्ष 2014 में प्रकाशित पुस्तक हीलिंग ट्रडिशंस ऑफ द नॉर्थवेस्टर्न हिमालयाज के अनुसार कोदो बुरे कोलेस्ट्रोल घटाने में भी मददगार साबित होता है.</p>
<p dir="ltr">अब और क्या चाहिए. देखते ही  देखते इसकी ख्याति भारत की मेट्रो सिटीज और अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों में फ़ैल गयी.आदिवासियों को अपने उत्पादन का अच्छे दाम मिलने लगे.  </p>
<p> </p>
<p><img style="width: 464px; height: 348px;" src="https://d2vbj8g7upsspg.cloudfront.net/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/0lfY6m8AuJVIRasec5fv.jpeg" alt="kodo"></p>
<p><em>कोदो (Image Credits: Ravivar vichar)</em></p>
<p> <img src="https://d2vbj8g7upsspg.cloudfront.net/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/NGoFFPsWOtIAhepik28h.jpeg" alt="kodo kutki"></p>
<p><em>कुटकी (Image Credits: Ravivar vichar)</em></p>
<p dir="ltr">चंदा महिला स्वसहायता समूह की अंजना मरावी बताती हैं कि- " जितने भी परिवार इसकी खेती कर रहे हैं वह अपना उत्पादन घर पर ही  स्टोर करते हैं. फिर समूहों  के फेडरेशन की मदद  से इससे बाजार में बेच दिया जाता है.हम बाजार में अच्छे रेट का इंतज़ार करते हैं जो समूह   बनने क पहले संभव नहीं था". </p>
<p dir="ltr">समूह की महिलाएं अपने उत्पादन का कुछ अंश साल भर अपने इस्तेमाल के लिए भी रख लेती हैं. ज्यादातर आदिवासी परिवारों क पास  पांच   एकड़ या उससे कम जमीन ही है.</p>
<p dir="ltr">समूह की अन्य  महिला कार्यकर्ता फूलवती बताती हैं, " कोदो  थोड़ा बड़ा होता है और  उसका रंग भूरा  होता है वहीं कुटकी छोटा और काले रंग का होता है.पहले हमें इसका रेट 7-8 रूपए प्रति किलो मिलता था और इसलिए किसान इसका उत्पादन खत्म करते जा रहे थे."</p>
<p dir="ltr">"लेकिन स्वसहायता समूह बनने के बाद जैसे चमत्कार हो गया.अब कोदो की कीमत 30 -35 रूपए प्रति किलो कुटकी 40 -45  प्रति किलो  के  दाम मिल जाते हैं."</p>
<p dir="ltr">कोदो-कुटकी के उत्पादन के बाद आदिवासी  परिवार आर्थिक रूप से मजबूत भी हुए हैं. " एक समय था जब हम स्थानीय सूदखोरों के चंगुल में फंसे रहते थे. कई लोग अपने गहने भी  सूदखोरों के चक्कर में गंवा देते थे. लेकिन यहां अब कोई उधार नहीं लेता. कोदो-कुटकी से हमारी  आय में खासी वृद्धि हो गयी है", समलिया,गोंड आदिवासी  महिला ,रानी दुर्गावती स्वसहायता समूह की सुनीता और बजरंग महिला समूह की तेजस्वनी कहती है," डिंडोरी की कोदो-कुटकी देश भर में हमारी दीदियों  स्वसहायता समूहों  की पहचान बन चुकी है. हमें गर्व है की हम लोग     देश में  पोषक आहार सप्लाई कर देश निर्माण का काम कर रहे हैं."</p>
<p><img src="https://d2vbj8g7upsspg.cloudfront.net/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/vQYzTwiTsa1o3GDCzu7i.jpeg" alt="kodo"></p>
<p><em>कोदो कुटकी की प्रोसेसिंग यूनिट (Image Credits: Ravivar vichar)</em></p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">देशदीप सक्सेना </dc:creator><pubDate>Sat, 25 Feb 2023 15:42:25 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/khabar/dindori-shg-cultivating-kodo-kutki]]></guid><category><![CDATA[ख़बर]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/D0iEgBNakeRSFdSqXeli.jpeg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/D0iEgBNakeRSFdSqXeli.jpeg"/></item><item><title><![CDATA[मिलेट कुकीज़ ने की ज़िंदगी सेट ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/kahaniyan/millet-cookies-dindori-shg</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/j7AQ6l29Ncpg8k5EAtdW.jpeg"><p>अमेरिका और यूरोप के साथ अब भारत में भी सुपर फूड्स का क्रेज़ है. मिलेट्स या मोटा अनाज सुपर हेल्थ फूड बन अपने देसी स्वाद और न्यूट्रीशन के साथ दुनियाभर में धूम मचा रहा है. यह स्वाद है महुआ और कोदो-कुटकी जैसे मोटे अनाज से बनी कुकीज़ (बिस्कुट) का.</p>
<p>मध्य प्रदेश के आदिवासी बाहुल्य डिंडोरी में बैगा और गौंड जाति की महिलाओं ने मिलकर स्व -सहायता समूह SHG बनाया. इन महिलाओं की इस कोशिश ने यहां का नजारा ही बदल दिया। कभी गुमनाम जिंदगी जी रही इन महिलाओं ने आज इन कुकीज़ के साथ अपना नाम देश विदेश में मशहूर कर लिया.  रात दिन मेहनत कर दो सौ से ज्यादा महिला समूह में 34 हजार से ज्यादा महिलाएं जुट गई.अब यही उनकी कमाई का साधन बन गया. प्रोटीन और फाइबर से भरपूर इन कुकीज़ का स्वाद और नाम अब प्रसिद्ध हो रहा है.</p>
<p>डिंडोरी की तेजस्विनी नारी विकास महिला संघ की रजनी मांडे अब गर्व से बताते है- "हम 3 से 4 क्विंटल कुकीज़ की पैकिंग तैयार कर अलग अलग बाजारों तक पहुंचा रहे हैं " रजनी ने आगे बताया कि वह 200 समूहों की देखरेख कुकीज बनवाती है.  इन समूहों में जुड़ी सैकड़ों महिला सदस्यों आर्थिक जीवन पटरी पर आने लगा साथ ही हिम्मत भी आई. ।इन्हीं में से कुछ समूहों ने आगे की सोच रखते हुआ नमकीन भी तैयार किए.  </p>
<p>तेजस्विनी नारी विकास महिला संघ की रामसखी धुर्वे का परिवार भी अब खुश है. तंगहाली का जीवन जीने वाला यह परिवार अब अपनी ख्वाहिश पूरी कर रहा है. उनका कहना है कि संघ से कमाई लगभग 30 से 35 हजार रुपए सालाना हो रही है.</p>
<p>इन SHGs को सरकार का भी पूरा साथ मिला जब पूरे देश में मोटे अनाज की खेती पर फोकस किया गया. इनकी फसल को बढ़ावा देने के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया जा रहा है . यहाँ तक की भारत सरकार ने वर्ष 2023 को "ईयर ऑफ द मिलेट्स" घोषित किया. इसका मकसद मोटा अनाज उत्पादन बढ़ावा देना है.  इस पहल मोटे अनाज  की खेती और उससे बनी चीजों को नए बाजार मिलेंगे.</p>
<p>सबसे बड़ी बात इस साल G20 सम्मेलन में जहां भारत मेजबानी कर रहा है, वहीं यहां मोटा अनाज ( मिलेट) चर्चा में है. डिंडोरी और आसपास के जिले में पिछड़े वर्ग में माने जाने वाली बैगा और गौंड जाति के लोगों ने मोटा अनाज(मिलेट्स)का उत्पादन कर अपने आप को दुनिया के नक्शे पर उभरा है.  इस काम में आदिवासी महिला SHG के काम और मेहनत सबसे आगे है.  जब देसी ज्वार ,बाजरा,  कोडा  कुटकी को बढ़ावा देने के लिए जी-20 सम्मेलन के लंच में विदेशी मेहमानों के सामने परोसा गया तो निश्चित तौर पर SHG की महिलाओं के चेहरे पर गर्व देखा गया होगा.</p>
<p> <span class="image-inline ck-widget" contenteditable="false"><img src="https://d2vbj8g7upsspg.cloudfront.net/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/post_attachments/1b4587bb-cfa.jpg"></span></p>
<p><em>(Image Credits: Ravivar Vichar)</em></p>
<p>जहां प्रदेश के डिंडोरी की ही लहरी बाई भी ने दो कमरों के मकान में मोटा अनाज पैदा कर गोदाम बना दिया वही प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी इंदौर में आयोजित जी 20 की पहली कृषि कार्य समिट में मोटा अनाज (मिलेट) को दुनिया भर में पहुंचाने की बात कही. यह शुरुआत है तेजस्विनी नारी विकास महिला संघ जैसे सैकड़ों SHGs के लिए जिन्हे कुकीज से आगे बढ़कर कई नई राहें खोजनी और बनानी है. शायद इसीलिए डिंडोरी में लेहरी बाई हो या रामसखी, इनके महिला समूह देश प्रदेश में अपना नेटवर्क बढ़ा रही है. आसमान तो अभी इनके लिए खुला है इ</p>
<p>न्हे पंख पसारना अभी बाक़ी है. मोटे अनाज के रूप में पहचाने जाने वाला कोदो या इसे क्षेत्रीय भाषा में कोदरा भी कहते हैं. यह एक अनाज की ही किस्म है। भारत के साथ नेपाल में भी इसकी खेती की जा रही है.</p>
<p><br>कोदो- कुटकी की ओर उनका रुझान अधिक बढा जो डायबिटीज,ब्लड प्रेशर और लीवर जैसी बीमारियों से ग्रसित हैं।यह फसल दो से तीन माह में तैयार हो जाती है। यह मोटा अनाज व उत्पाद यूएई,यूएसए,अमन,लीबिया,नेपाल आदि देशों में एक्सपोर्ट किया जा रहा है.</p>
<p><img src="https://d2vbj8g7upsspg.cloudfront.net/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/XX5gLx6B0uzKciiH4Vbo.jpeg" alt="kodo"></p>
<p><em>(Image Credits: Ravivar Vichar)</em></p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">देशदीप सक्सेना </dc:creator><pubDate>Fri, 24 Feb 2023 15:47:06 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/kahaniyan/millet-cookies-dindori-shg]]></guid><category><![CDATA[कहानियां]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/j7AQ6l29Ncpg8k5EAtdW.jpeg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/j7AQ6l29Ncpg8k5EAtdW.jpeg"/></item></channel></rss>