<rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" xmlns:dcterms="http://purl.org/dc/terms/" xmlns:geo="http://www.w3.org/2003/01/geo/wgs84_pos#" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/" xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/" xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/" version="2.0"><channel xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/"><title><![CDATA[ ग्रामीण]]></title><link>https://ravivarvichar.in/tags/graamiinn</link><description/><atom:link href="https://ravivarvichar.in/rss/tags/graamiinn" rel="self"/><language>en-us</language><lastBuildDate>Fri, 24 Feb 2023 15:33:15 +0530</lastBuildDate><item><title><![CDATA["वो स्त्री है ... कुछ भी कर सकती है" ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/kahaniyan/wo-stree-hai</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/mueEXdVEHFT7MovIqUy0.jpeg"><p>स्त्री फिल्म का मशहूर डायलॉग वो स्त्री है कुछ भी कर सकती है. आज ऐसा मीम बन चुका हैं जो ज्यादातर महिलाओं की हंसी उड़ाने या उन पर तंज़ करने में इस्तेमाल होता है. लेकिन जब नर्मदापुरम ( होशंगाबाद) के छोटे से आदिवासी गांव सोमलवाड़ा की मालती यही डायलॉग इस अंदाज में बोलती है कि - "स्त्री कुछ भी कर सकती है". तो उसमें गर्व और खुशी दोनों छलकती है. क़रीब तीन साल की मेहनत और मशक्कत ने यह गर्व चेहरे पर गढ़ दिया और बोली में कॉन्फिडेंस ला दिया. वैसे यह बोलते वक्त मालती नोटों को गड्डी गिन रही थी और हिसाब मिला रहीं थी. कल रविवार जो था, रविवार है SHG के हिसाब किताब और आगे की प्लानिंग का दिन.</p>
<p>इस हिसाब को करता देख समूह की लगभग सारी दीदी ना केवल मौजूद है बल्कि हर मुद्दे और काम में हिस्सेदार है. जहां पहले रविवार हो या सोमवार हर दिन मजदूरी के नाम था वहीं आज रविवार मतलब बैठकर निर्णय लेने का दिन. कई सालों तक मजदूरी करने के बाद भी मुश्किलों से घर चला. मौसम और अत्याचार के पहिए बस इन्हे रौंदते चलें गए. कम उम्र में शादी और जल्दी हुए बच्चों ने इस कुचक्र को और मजबूत कर दिया. पास कुछ बचा तो पति की शराब ने डूबो दिया. खेत मालिकों का कर्ज चढ़ता गया और फिर लेनदारों का ब्याज भी बढ़ता गया.</p>
<p>मालती आगे बताती है -"खेत मजदूरी में सौ रुपए रोज़ भी नहीं कमा पाते थे." ऐसे में एक दिन उनके गांव में ब्लॉक सिवनी मालवा से आजीविका मिशन के ब्लॉक प्रबंधक मेहराज अली आए.उन्होंने मालती और किरण बाई,मीना,गुलाब बाई आदि महिलाओं को परेशानियां सुनी. उसके बाद राज्य आजीविका मिशन और स्वसहायता समूह के फायदे भी बताए. लेकिन बात बनी नही. नशे के आदी परिवार के मुखिया का डर और कर्ज उतारने की चिंता के कारण महिलाएं तैयार नहीं हुई. बात सब्र और विश्वास की थी. धीरे-धीरे उनको यह योजना कुछ दिन बाद फिर बताई. शुरू में कुछ महिलाएं  तैयार हुई और कुछ के पति भी तैयार हुए. इस तरह 10 महिलाओं ने मिलकर 'दुर्गा आजीविका स्वसहायता समूह' बनाया. इन कुछ महिलाओं के पास पशु थे वो बेहद कमजोर हो गए थे. तंगहाली में जब खुद के खाने के लाले पड़े हो तो इन पशुओं को पूरी खुराक कहां से मिले .</p>
<p>किरण बाई बताती हैं-"पहली बार SHG ने हर हफ्ते दस रुपए से बचत शुरू की. हालात ऐसे थे की यह दस रूपये भी बमुश्किल की इक्कट्ठे हो रहे थे". लेकिन काम में असली चमक तब आई जब उन्हें मिशन से दस हजार रुपए की ग्रांट मिली. यहीं से दीदियों का खुद पर भरोसा बढ़ने लगा.कल्पना, ज्योति पुराने दिन याद कर कहती हैं-" मजदूरी पर जाना धीरे-धीरे कम किया. हालांकि खेत मालिकों और पटेलों ने ग्रुप को खत्म करने का दबाव बनाया. क्योंकि क़र्ज़ में दबी ये महिलाएं असल से कई गुना ज़्यादा सूद दे चुकी थी".लेकिन महिलाओं ने यह ठान लिया कि अब मजदूरी नहीं करेंगी. इस शुरूआत के बाद समूह को अपना पहला लोन एक लाख रुपए मिला. यह तो वो रकम थी जिसने गांव में उत्सव का माहौल बना लिया. गांव में अन्य महिलाओं को जोड़ तीन और समूह बना लिए. इस मिशन से सामुदायिक निधि निवेश से 75 हजार का लोन भी मिला. समूह ने इस लोन के साथ सबसे पहले अच्छी नस्ल की गाय और भैंस खरीदी.मालती सहित कुछ ने इस से दूध और मावा बना कर नए धंधे की शुरुआत की. बाक़ी बची महिलाओं ने बंजर पड़ी खेती को तैयार किया.</p>
<p>मीना गजानन,ममता इमने ने बताया कि उनके पति भी हौसला बढ़ाने लगे. उनके बच्चों को अच्छे स्कूल में भर्ती किया. लेकिन पटेलों के यहां मजदूरी छोड़ने के कारण क़र्ज़, ज़बरन वसूली और विवाद होने लगे. इस सबके बावजूद वे घबराई नहीं और बिना किसी की परवाह किए धीरे धीरे पटेलों के क़र्ज़ से मुक्त हो गई. नई बाहर तो तब आई जब ख़ुद की खेती से ट्रैक्टर तक खरीद लिए. एक साल में तीन लाख 84 हजार रुपए कमाए. समूह सदस्यों ने प्रशासन की मदद से रोजगार मेला भी लगया. इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही की 24 युवाओं को नए रोज़गार मिल गए. मालती दीदी और अन्य महिलाएं खुद के दम पर मजदूर से मालकिन बन गई. सच में मानना पड़ेगा-"स्त्री कुछ भी कर सकती है". </p>
<p><img src="https://d2vbj8g7upsspg.cloudfront.net/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/W2vO6GtRB8FhgX9eOLgx.jpg" alt="shg women"> <img src="https://d2vbj8g7upsspg.cloudfront.net/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/K4FuQmuUQNjEvXUvQFnl.jpeg" alt="shg initiative"></p>
<p>(Photo Credits: Ravivar vichar)</p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">विवेक वर्द्धन श्रीवास्तव </dc:creator><pubDate>Fri, 24 Feb 2023 15:33:15 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/kahaniyan/wo-stree-hai]]></guid><category><![CDATA[कहानियां]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/mueEXdVEHFT7MovIqUy0.jpeg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/mueEXdVEHFT7MovIqUy0.jpeg"/></item><item><title><![CDATA[SHG की मुश्किलें जिन्हें सुलझाना है ज़रूरी ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/nazariya/issues-of-shg-need-to-be-resolved</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/9THitQodEkWuuoBIriqm.jpeg"><p>स्वसहायता समूह (SHG) भारत का ऐसा माइक्रोफाइनेंस मॉडल हैं जिसका पूरी दुनिया के आर्थिक और सामाजिक संस्थानों ने लोहा माना. SHG क्रांति के बीज तो 80 के दशक में पड़ चुके थे और 90 का दशक आते आते  ग़ैर-सरकारी संगठनों (NGO) भी इस आर्थिक आंदोलन से पूरी तरह जुड़ गए. आज ये NGO, SHG के सबसे बड़े प्रमोटर (SHPI) बन गए. SHG भारत में स्वरोज़गार और गरीबी हटाने का एक बड़ा साधन बने. SHG ने ग्रामीण महिलाओं को अपना रोज़गार शुरू करने का ज़रिया बनाया और इसके साथ उन्होंने आर्थिक आज़ादी हासिल की. लेकिन इन बदलाव की कहानियों के बीच कुछ ऐसी महिलाएं भी हैं जिनमें SHG से जुड़ने को लेकर झिझक है या SHG से जुड़ने के कुछ समय बाद ही वो उससे अलग हो जाती हैं.</p>
<p>SHG में हर दिन जुड़ती महिलाओं की संख्या के बीच उन आंकड़ों पर ध्यान देने की भी ज़रुरत है जो बताते हैं कि अभी भी SHG कुछ महिलाओं का विश्वास नहीं जीत पाएं. महिलाओं का SHG से अलग हो जाने का बड़ा कारण उनका दूसरे गांव शिफ्ट कर जाना है. शादी हो जाने के कारण या पति की नौकरी, काम-धंधे में गांव बदलना या नौकरी की तलाश ग्रामीण महिलाओं को कस्बों व शहर की ओर खींच लाई. जिसकी वजह से SHG से उनका साथ छूटा. SHPI कुछ दिनों के लिए दूर जाने वाली SHG सदस्यों को छूट देने के लिए बैंकरों को समझाये और ई-बैंकिंग को बढ़ावा दे ताकि आसानी से उपस्थित न होने पर भी वो लोन का भुगतान कर सकेें.</p>
<p>कुछ महिलाएं बतातीं है कि वे SHG में शामिल नहीं हो पाई क्योंकि मौजूदा SHG सदस्य अपने फायदे को बांटना नहीं चाहती. समूह की लीडर्स कई बार अपने झुकावों, मान्यताओं, पूर्वाग्रह,  विचारों की वजह से नए सदस्यों को नहीं जोड़ती. ईमानदारी से सदस्यों में मुनाफ़े का बंटवारा न होने, बचत में पक्षपात करने, और बहीखातों का सही मैनेजमेंट न होने के कारण समूह में तनाव पैदा होता है. SHPI को लीडर्स और सभी सदस्यों के साथ बातचीत का नेटवर्क बनाना ज़रूरी है, ताकि सभी को अपनी बात कहने और संदेह दूर करने का प्लैटफॉर्म मिल सके. स्वसहायता समूहों के साथ सीधे काम करने वाली सरकारी और ग़ैर सरकारी संस्थाओं को एकसाथ आकर समूह की महिलाओं के भ्रम दूर करने होंगे। रविवार विचार भी ऐसा प्लेटफॉर्म है जहां सम्बंधित संस्थाओं को साथ लाकर स्वसहायता समूह की महिलाओं की शंकाओं का समाधान किया जाता है।  </p>
<p>कई महिलाएं अपने SHG  बनाकर बचत और व्यवसाय की शुरुआत करना चाहती हैं पर उन्हें नहीं पता किससे संपर्क करना है, या SHG में शामिल होने के लिए किस प्रक्रिया का पालन करना होगा. SHPI और सरकारी संस्थानों को बड़े पैमाने पर ऐसे इलाकों में जागरूकता अभियान चलाने की ज़रुरत है जहां महिलाएं कठिन ज़िन्दगी गुज़ार रहीं हैं. फाइनेंशियल अवेयरनेस प्रोग्राम यहां बहुत मददगार साबित हो सकते है.</p>
<p>अशिक्षा के कारण पैसों के लेन देन का सही हिसाब न रख पाने की वजह से बचत या लोन का फ़ायदा नज़र नहीं आता. फाइनेंशियल लिट्रेसी की ट्रेनिंग में ये मुद्दे सिखाये जाने चाहिए. SHG फेडरेशन SHG की पुस्तकों के रखरखाव के लिए बुक कीपर रखे जो समय समय पर उनका ऑडिट करे. ये प्रैक्टिस उनमे पारदर्शिता लाकर एक दूसरे के लिए विश्वास बढ़ाएगी.</p>
<p>मार्केटिंग,पैकेजिंग, सोशल मीडिया,और डिस्ट्रीब्यूशन चैनल की समझ न होने के कारण समूह अपने उत्पादों को एक दायरे के बाहर नहीं ले जा पाते. उन्हें इस दिशा में SHPI और सरकार से मिली ट्रैनिंग से राज्य, देश, यहां तक कि विदेश में प्रोडक्ट बेचने में मदद मिलेगी.</p>
<p>SHG आज पूरे देश में आर्थिक क्रांति ला रहें है, यदि उनकी समस्याओं पर ग़ौर कर उन्हें समाधान बताया जाये तो SHG महिलाओं की आर्थिक आज़ादी को और आगे ले जा पाएंगे. इसके लिए इस दिशा में काम कर रहें सरकारी और ग़ैर सरकारी संस्थानों को एक साथ आने की ज़रुरत है। और यही पहल कर रहा है रविवार …</p>
<p><img src="https://d2vbj8g7upsspg.cloudfront.net/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/7OX5sOurpZMec44avcaa.jpeg" alt="shg"></p>
<p><em>(Image Credits: Google images)</em></p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">रविवार ब्यूरो </dc:creator><pubDate>Sat, 18 Feb 2023 18:42:24 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/nazariya/issues-of-shg-need-to-be-resolved]]></guid><category><![CDATA[नज़रिया]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/9THitQodEkWuuoBIriqm.jpeg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/9THitQodEkWuuoBIriqm.jpeg"/></item></channel></rss>