<rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" xmlns:dcterms="http://purl.org/dc/terms/" xmlns:geo="http://www.w3.org/2003/01/geo/wgs84_pos#" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/" xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/" xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/" version="2.0"><channel xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/"><title><![CDATA[ ग्रामीण महिलाएं]]></title><link>https://ravivarvichar.in/tags/graamiinn-mhilaaen</link><description/><atom:link href="https://ravivarvichar.in/rss/tags/graamiinn-mhilaaen" rel="self"/><language>en-us</language><lastBuildDate>Wed, 22 Mar 2023 13:39:07 +0530</lastBuildDate><item><title><![CDATA[वॉटर विमेन ऑफ़ खंडवा ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/kahaniyan/shg-women-dug-well-in-khandwa</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/QNfS40tbLEvh6sYWswKA.JPG"><p>महिलाओं की ज़िद के आगे चट्टानें भी हार मान सकती हैं. वे चटक सकती हैं. और तो और अब तक जो पुरुष अब तक जिन्हें घूंघट तक सिमित मान रहे हों, वे भी ऐसी महिलाओं के लिए अपनी सोच बदलने पर मजबूर हो गए. ये कमाल कर दिखाया है खंडवा जिले में खालवा ब्लॉक के ठेठ पिछड़े &nbsp;जनजाति बहूल गांव लंगोटी की मजबूर महिलाओं ने. यहां गांव में ठंड के खत्म होने से पहले पानी की किल्लत शुरू हो जाती.गांव का तालाब सूख जाता. हालत इतने बिगड़ जाते कि महिलाएं तीन किमी दूर ताप्ती नदी किनारे छोटी-छोटी झिरी (गड्ढे) से पानी निकाल कर मटकों से पानी लाती पड़ता था. दर दर पानी के लिए भटकने के बाद इन महिलाओं को फिर मजदूरी की आग में तपना पड़ता. &nbsp;इस परेशानी से तंग आ कर महिलाओं ने माउंटेन मैन मांझी की राह पकड़ी और जब तक खुदेगा नहीं तब तक रुकेगा नहीं का मंत्र अपनाया.&nbsp;</p><p>लंगोटी गांव के 162 परिवारों के हजार से ज्यादा सदस्य हर साल पानी की किल्लत से जूझते. गांव की महिलाएं बताती हैं -"इस पीने के पानी को इकठ्ठा करने में दिनभर हो जाता. एक दिन हमने ठान लिया कि पानी की ये जंग लड़ कर रहेंगे. हम अपना ही एक कुआं खोद कर पानी की व्यवस्था करेंगे. यह बात सुन कर हमारे परिवार के पति और दूसरे पुरुषों ने मज़ाक बनाया. हमने परवाह नहीं की." सरकार ने इस गांव में पानी की किल्लत मिटाने के लिए एक या दो नहीं बल्कि आठ ट्यूबवेल खुदवाए. ये भी एक के बाद एक बैठ गए.अब हमारे पास कोई और चारा नहीं था. &nbsp; &nbsp;&nbsp;</p><p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/lROZ4M8jhY9mup9mdsaT.jpg" alt="well dig by SHG women" data-mce-src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/lROZ4M8jhY9mup9mdsaT.jpg"></p><p><span style="font-size: 8pt;" data-mce-style="font-size: 8pt;"><em>Photo Credit: Ravivar vichar</em></span></p><p>अब सवाल था कि आखिर किस जगह या किसके खेत पर ये कुआं खोदें. गांव की दो महिलाएं आगे आईं. रामकली और गंगा बाई. दोनों देवरानी -जिठानी ने अपनी खेत की ज़मीन देने को राजी हो गईं. महिलाओं ने एक शर्त रख दी. जब तक पानी नहीं निकलेगा,तब तक हम चट्टानें तोड़ते रहेंगे. महिलाएं एक जुट हुईं. नारियल फोड़ा और फिर खेत की इस जमीं पर शुरू किया खुदाई का काम. कोई महिला कुदाल लाई तो घर में रखी छैनी, हथोड़े, सब्बल.&nbsp;</p><p>तेज़ गर्मी और पारा 46-47 डिग्री. चिलचिलाती धूप और बहते पसीने में लथपथ इन महिलाओं के जोश को ठंडा नहीं कर पाई. गांव के पुरुष अभी भी हंसी उड़ा रहे थे. उनको अंदाज़ा था एक-दो दिन में थक कर चूर ये महिलाएं लौट आएंगी.रोज लगभग सत्ताईस महिलाएं चट्टानों से दो &nbsp;चार होती रहीं. पच्चीस फिट पर बड़ी चट्टान रोड़ा बना गई. ग्रामीण महिलाएं कहतीं हैं -" हम सभी पंचायत गए. सरपंच -उपसरपंच ने फंड की दिक्कत बता कर हाथ खड़े कर दिए. हमने कुछ दिन मजदूरी की. अपना पेट काट कर पैसा बचाया और चट्टान के लिए आठ हजार रुपए देकर ब्लास्ट करवाया." फिर महिलाएं कुआं खोदने में जुट गई.</p><p>मजबूत इरादों के आगे कोई इन महिलाओं को डिगा नहीं पाया. पूर्व उप सरपंच सामु बाई कहती हैं - "सरकार की प्रक्रिया में ट्यूबवेल खुदे ,जो सफल नहीं हुए. पंचायत के पास इतना पैसा नहीं था." इस बीच तीस दिन बीत गए. कई सब्बल टूटे. छैनी मुड़ गई. लेकिन पानी नहीं दिखा. दिखा तो सिर्फ इन महिलाओं के चेहरे पर पहले दिन वाला जोश और भरोसा. गांव की फूलवती कहती है- "चालीसवां दिन था. हाथों में छाले पड़ गए. अचानक छैनी पर पड़े हथौड़े से चट्टान टूट गई. अंदर तली से पानी की धार फूट गई. पानी की बूंदों की तरह हमारे चेहरों पर खुशियां नाच उठी."</p><p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/VPoUXkCanzWpHKvbPaOr.jpg" alt="well dig by SHG women" data-mce-src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/VPoUXkCanzWpHKvbPaOr.jpg"></p><p><span style="font-size: 8pt;" data-mce-style="font-size: 8pt;"><em>Photo Credit: Ravivar vichar</em></span><br>&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;<br>क्षेत्र में काम कर रही स्पंदन संस्था की सीमा प्रकाश कहती हैं -इन महिलाओं ने कमाल कर दिया. संस्था इन महिलाओं को दो किलो चावल और पाव भर दाल देती. कपड़े मुहैया कराए जिससे महिलाओं का मनोबल बना रहे. "गांव के ही सूरज कहते हैं - "ये महिलाओं का चमत्कार है. उन्होंने साबित कर दिया कि वे ठान &nbsp;लें तो कुछ भी कर सकती हैं."</p><p>चट्टानों को चीर कर अपने हक़ का पानी निकाल लिया. गांव की मजदूर और बेबस महिलाओं ने समाज में जल देवियां बन कर नई पहचान बना ली ,जो हर घर की प्यास बुझा रही है.&nbsp;<br></p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">विवेक वर्द्धन श्रीवास्तव </dc:creator><pubDate>Wed, 22 Mar 2023 13:39:07 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/kahaniyan/shg-women-dug-well-in-khandwa]]></guid><category><![CDATA[कहानियां]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/QNfS40tbLEvh6sYWswKA.JPG" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/QNfS40tbLEvh6sYWswKA.JPG"/></item><item><title><![CDATA[SA में SHG समूहों ने साथ आकर शुरू किया नया सिलसिला ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/duniyadari/shg-in-sa</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/1zyNjRqlL123LlY5FwRi.jpg"><p><br>दक्षिण अफ्रीका के पास वह सब कुछ रहा है जो किसी भी देश को चाहिए; प्राकृतिक सुंदरता, समृद्ध इतिहास और सांस्कृतिक विविधता. लेकिन यही खूबसूरती और समृद्धि पर जब वैश्विक शक्तियों की नज़र पड़ी तो अभिशाप बन गई. सदियों की गुलामी और अत्याचार ने यहां रंगभेद , लैंगिक भेदभाव,असमानता, बेरोज़गारी और गरीबी को जन्म दिया.  लेकिन इतिहास से साबित है कि दक्षिण अफ्रीकी लोगों ने परेशानियों को हराकर रास्ता निकाला और इसका सबसे बड़ा उदाहरण नेल्सन मंडेला रहे. जैसे नेल्सन मंडेला ने रंगभेद और उपनिवेशवाद से दक्षिण अफ्रीका को आज़ादी दिलाई वैसे ही लैंगिक भेदभाव के खिलाफ़ आज SHG लड़ रहे है.</p>
<p>दक्षिण अफ्रीका में लाखों ग्रामीण महिलाएं संसाधनों की कमी और जानकारियों से दूर, पुरुष प्रधान समाज में रहने को मजबूर हैं, जहां घर के भीतर उनके योगदान को महत्व नहीं मिलता. इसी समस्या को देखते हुए सिनामंडला फाउंडेशन ने लगभग 2 हज़ार गरीब और कमज़ोर महिलाओं को समूहों में संगठित किया. इन समूहों ने महिलाओं से रिसोर्स मैनेजमेंट, कमाई के ज़रियों के ऑप्शन, और अपना बिज़नेस शुरु करने के तरीकों पर बात की. उनमें आत्मविश्वास जगाकर अपने समुदाय के विकास में सक्रिय रूप से भाग लेने में सक्षम बनाया.</p>
<p>ज़िमेलेवथु फाउंडेशन ने दक्षिण अफ्रीका के क्वा-ज़ुलु नटाल प्रांत में 11 ग्रामीण समुदायों</p>
<p>के 4 हज़ार तीन सौ इकत्तर महिलाएं, युवा और पुरुषों के साथ स्वसहायता समूह तीन चरणों में शुरू किये. लक्ष्य था गरीब लोगों को सामाजिक और आर्थिक रूप से सशक्त बनाना. पहले चरण में सदस्य जोड़े, उन्हें फाइनेंशियल लिट्रेसी की ट्रेनिंग दी और बचत शुरू करवाई. छोटा ग्रुप बनाकर रिटेल दुकान, खेती, मुर्गी पालन, फ़ूड प्रोसेसिंग, और क्राफ्ट बिज़नेस शुरू किये.  दूसरे चरण में लगभग 12 स्वसहायता समूहों ने मिलकर क्लस्टर स्तरीय संघ (सीएलए) बनाया. सीएलए ने मिलकर सामाजिक परियोजनाएं शुरू की.  इसमें बाल विकास केंद्र, मरीज़ की घर पर देखभाल,अनाथालय, युवाओं के लिए जीवन कौशल और कंप्यूटर लर्निंग सेंटर खोले. तीसरे चरण में 8 से अधिक सीएलए जिसमें 12 सौ से अधिक प्रतिभागियों ने मिलकर फेडरेशंस बनाये और बड़े पैमाने पर ऐसे रोज़गार शुरू किये जो सामाजिक समस्याओं को हल करें. डिटर्जेंट बनाने, बेकिंग, सिलाई, बकरी पालन, साज सजावट और केटरिंग के काम शुरू किये.</p>
<p>SHG 'मेंबर ऑफ द ईयर' अवार्ड की विजेता 35 वर्षीय बनेलिले शेज़ी ने 500 ZAR का लोन लेकर अपना होटल शुरू किया. लोग उनके सलाद, केक, चिप्स, कॉफी के साथ भोजन का भी लुत्फ़ ले रहे हैं. बाद में 600 ZAR फिर 1000 ZAR का लोन लेकर उन्होंने 2-प्लेट स्टोव,माइक्रोवेव, और चिप्स तलने की मशीन खरीदी. समय पर लोन चुकाने के साथ उन्होंने मुनाफ़ा भी कमाया. SHG ऑफ द ईयर अवार्ड का विजेता थूथुकानी SHG के 10 सदस्यों ने एक अनोखी पहल की. उन्होंने घर पर बीमार लोगों की मदद करने के लिए घर-घर जाकर देखभाल प्रोजेक्ट शुरू किया जिसके तहत समूह ने 124 कमज़ोर बच्चों की सहायता की, ज़रूरतमंद परिवारों को 81 फूड पार्सल डोनेट किए और 10 परिवारों को सोशल ग्रांट दिलवाई.</p>
<p><img style="width: 522px; height: 348px;" src="https://d2vbj8g7upsspg.cloudfront.net/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/0B8sHdnaR8AGJNQvGQlZ.jpg" alt="africa"></p>
<p>(<em>Image Credits: Global Giving)</em></p>
<p>28 साल की बोनीसीवे हलेंग्वा पहले अपनी दादी की पेंशन पर निर्भर थी , SHG से जुड़कर उन्होंने 200 ZAR का लोन लिया और चिप्स का बिज़नेस शुरू किया. लोन चुकाने के बाद दोबारा लोन लेकर अपने बिज़नेस को बढ़ाया. चेहरे पर मुस्कान लिए कहती हैं - "मेरे घर की स्थिति अब बदल चुकी हैं इसके लिए मैं हमेशा SHG की शुक्रगुज़ार रहूंगी." SHG में बचत कर कई सदस्यों ने अपने घर बनाये, मरम्मत का काम किया, बच्चों को स्कूल यूंनीफॉर्म  दिलवाई, मेडिकल खर्चों का भुगतान किया और घर ज़रुरत का सामान भी ख़रीदा.</p>
<p>स्वसहायता समूहों ने महिलाओं को रोज़गार देकर आर्थिक आज़ादी दिलवाई और लैंगिक भेदभाव को कम करने की शुरुआत की। जब इन महिलाओं ने अपने परिवार का साथ दिया तो पुरुषों ने उनके योगदान को माना और उनकी अहमियत बढ़ी। धीरे-धीरे महिलाओं की उपस्थिति कई जगहों पर पुरुषों के साथ बराबरी में दिखना शुरू हुई। </p>
<p>दक्षिण अफ्रीका ने एक तीर से दो निशाने लगाते हुए गरीबी से बाहर निकलने के रास्ते खोजे और साथ ही सामाजिक दिक्कतों के हल निकाले. दुनियाभर में चल रहें स्वसहायता समूहों को दक्षिण अफ्रीका से सीखकर अपने इलाके में चल रहे समूहों को एक साथ लाने की कोशिश करनी चाहिए. रविवार विचार का भी प्रयास है कि वो एक ऐसा प्लेटफॉर्म बन पाए जहां अलग-अलग SHG अपने विचार, योजनाएं ,और दिक्कतें एक दूसरे से बांटे और साथ मिलकर काम करें.</p>
<p><img src="https://d2vbj8g7upsspg.cloudfront.net/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/SDsVJ7DuqTHEklrpE8Pm.jpg" alt="africa"></p>
<p><em>(Image Credits: Global Giving)</em></p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">रविवार ब्यूरो </dc:creator><pubDate>Sat, 18 Feb 2023 18:42:41 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/duniyadari/shg-in-sa]]></guid><category><![CDATA[दुनियादारी]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/1zyNjRqlL123LlY5FwRi.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/1zyNjRqlL123LlY5FwRi.jpg"/></item></channel></rss>