<rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" xmlns:dcterms="http://purl.org/dc/terms/" xmlns:geo="http://www.w3.org/2003/01/geo/wgs84_pos#" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/" xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/" xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/" version="2.0"><channel xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/"><title><![CDATA[ हस्तशिल्प]]></title><link>https://ravivarvichar.in/tags/hstshilp</link><description/><atom:link href="https://ravivarvichar.in/rss/tags/hstshilp" rel="self"/><language>en-us</language><lastBuildDate>Sun, 21 May 2023 12:40:38 +0530</lastBuildDate><item><title><![CDATA[महिलाओं के सपनों की बन रही जूलरी ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/kahaniyan/neelkanth-woman-shg-making-handmade-jewellery-to-become-financially-independent</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/9vcYgvUNanmfUyEUBCzT.jpeg"><p>" मैं पहले से ही सिलाई का काम कर रही थी. पर मुझे लगा कि कुछ ऐसा काम करूं कि दूसरी जरूरतमंद महिलाओं को भी काम दे सकूं. मैंने नीलकंठ सखी मंडल बनाया. इसमें दस महिलाओं का समूह (self help group-SHG) बना कर हैंडीक्रॉफ्ट आइटम (handicraft) बनाना शुरू किया. कुछ सीखा और कुछ मन से तैयार किया. मुझे ख़ुशी है कि मैं 15 दूसरी जरूरतमंद महिलाओं को भी रोजगार दे सकी.अब हम देशभर के हस्तशिल्प मेले में जाकर हिस्सा लेते हैं. हमारे प्रोडक्ट को बहुत पसंद किया जा रहा है." नीलकंठ सखी मंडल की अध्यक्ष मनीषा ने यह बात बहुत गर्व से कही. हाल ही में इंदौर में आयोजित मालवा उत्सव (Malwa Utsav) में शामिल होने आए सूरत गुजरात के नीलकंठ सखी मंडल के स्टॉल पर ग्राहकों की बहुत भीड़ रही. </p>
<p>हस्तशिल्प मेले में शामिल हुए इस समूह की अध्यक्ष मनीषा बेन डोबरिया आगे कहती हैं -" हमारे समूह द्वारा तैयार प्रोडक्ट की मार्केटिंग के लिए मेरे पति राकेश डोबरिया पूरा साथ देते हैं.हम कच्छ से ब्लॉक प्रिंट का बचा वेस्ट कपड़ा खरीद कर लाते हैं.इससे फेब्रिक जूलरी तैयार की जाती है. इसके दूसरे आइटम भी तैयार किए जाते हैं." इस समूह से जुडी हुईं कीर्ति बेन कहती हैं - "हम इस से समूह  से जुड़े तभी से हमारी आर्थिक स्थिति में बहुत सुधार हुआ. हम कच्चा माल ले जाकर अपने घर से आइटम सप्लाई कर देते हैं." इसमें सभी महिलाएं अलग -अलग तरह की चीज़ें बनती हैं. इस समूह के काम से जुड़ीं मित्तल कथिरिया भी बहुत खुश है. मित्तल कहती हैं - " मैंने कभी सोचा नहीं था कि घर बैठ कर भी इतना अच्छा काम मिल जाएगा. कच्चे माल से मैं वूडन जूलरी सहित कई तरह के सामान बना लेती हूं. मुझे कहीं जाना भी नहीं पड़ता और कमाई नहीं अच्छी हो जाती है."  </p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/Ur1lsYbgdOusl6V6qNpE.jpeg" alt="gujarat handicraft"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>समूह के सदस्यों को कई जगह अवार्ड मिल चुके हैं (फोटो क्रेडिट: रविवार विचार)</em></span></p>
<p>गुजरात में भी रोजगार हासिल करना और आत्मनिर्भर बनने की प्रक्रिया में स्वयं सहायता महिला समूह की भूमिका नज़र आने लगी है. नीलकंठ समूह ऐसी हैंडमेड जूलरी बना रहा जो गरीब महिलाओं के सपने और इच्छा तो पूरी कर ही रहा बल्कि समूह से जुड़ी महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत कर रहा.अब तक कई जगह इस समूह को सम्मान मिल चुके हैं. समूह की मनीषा आगे बताती है -" महिलाओं को सबसे ज्यादा जूलरी पसंद है और मंहगी जूलरी पहन नहीं सकती.इसे ध्यान में रख सब आइटम बनाए. इसके अलावा सभी हैंडमेड बेल्ट,मिरर, बटंस और प्रिंट कपड़े जो प्रेस के साथ कपड़ों पर स्थाई डिज़ाइन बन जाता है,बनाए जा रहे. "</p>
<p>मनीषा सभी महिलाओं को साथ लेकर चल रही है. उनके पति राकेश कहते हैं -" मुझे ख़ुशी है  कि महिलाओं को इंदौर,बेंगलुरू, मैसूर, दिल्ली. गुजरात के कई शहर में अहमदाबाद,सूरत,बड़ौदा,पावागढ़ सहित कई शिल्प मेलों में बुलाया. समूह की सभी महिलाओं की आर्थिक हालात सुधर गए. और अब वे सभी स्वाभिमान की जिंदगी जी रहीं हैं."</p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">विवेक वर्द्धन श्रीवास्तव </dc:creator><pubDate>Sun, 21 May 2023 12:40:38 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/kahaniyan/neelkanth-woman-shg-making-handmade-jewellery-to-become-financially-independent]]></guid><category><![CDATA[कहानियां]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/9vcYgvUNanmfUyEUBCzT.jpeg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/9vcYgvUNanmfUyEUBCzT.jpeg"/></item><item><title><![CDATA[खजूर पत्तियों से बन रहे झुमके, कंगन और गुड़िया ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/kahaniyan/women-making-handicrafts-from-khajoor-leaves-to-revive-the-traditio-art</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/MR2lzgVMO1LG7tAK8sdP.jpg"><p>"अब बड़े -बड़े बंगलों और घरों में टाइल्स लगने लगी. झाड़ू भी बदल गए. अब कहां कच्चे मकान और कहां लिपे हुए आंगन... अब खजूर के पेड़ की पत्तियों (खोड़) से बनने वाले झाड़ू लगभग ख़त्म से हो गए. खजूर की पत्तियों से झाड़ू के अलावा मैंने फिर कुछ ऐसी चीज़ें बनाई जिसने इस कला को बचा लिया. मेरे बेटे-बहू और बच्चे तक खजूर की पत्तियों से अलग-अलग सजावट का सामान बना रहे हैं. " इंदौर में आयोजित मालवा उत्सव में आई शारदा बाई ने अपनी बात कही. </p>
<p>मप्र सहित कई इलाकों में खजूर की पत्तियों से झाड़ू बनाए जाते रहे. बदलते वक़्त के साथ अब कच्चे घरों और आलीशान बंगलों में टाइल्स का उपयोग फर्श के लिए किए जा रहे हैं. खोड़ से बने झाड़ू का प्रचलन नहीं रहा. आसाम में बने झाड़ुओं ने इनके जगह ले ली. उज्जैन जिले के कमेड़ गांव की 73 साल की शारदा बाई का परिवार इस परंपरागत कला को बचाने में लगा है. इन पत्तियों से वह मोर, गणेश, गुलदस्ते, झुमके, हेयरबेंड, गुड़िया जैसे कई आइटम यह परिवार बना रहा है. पत्तियों से बने आइटम की खूबसूरती इतनी है कि देश के कई हस्तशिल्प मेले में इस कला को जगह मिलने लगी. कई पुरस्कार से नवाज़ा गया. </p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/1URgmdFVvTGrWy1T9epX.jpg" alt=" handicrafts from khajoor leaves"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;">मालवा उत्सव में स्टॉल (फोटो क्रेडिट : रविवार विचार)</span></p>
<p>झाड़ू का उपयोग अब केवल गांवों तक सिमित रह गया. शारदा बाई कहती है -" <em>मुझे लगभग 60 साल हो गए. झाड़ू की बिक्री कम हो गई. मुझे लगा अब यह कला ख़त्म हो जाएगी.मैंने परिवार के साथ नए आइटम तैयार किए. वह शासन ने पसंद किए किए. मुझे ख़ुशी है कि हस्तशिल्प मेले में हर जगह मुझे बुलाया जाता है. मेरे पति भी मेरा साथ देते हैं. अब बहुओं के साथ मेरे पोते-पोती भी इस कला को बचा रहे.</em>" शारदा बाई हरियाणा के सूरज कुंड, दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद, पुरी, चैन्नई, बड़ौदा, खजुराहो सहित कई जगह बुलाया जा चुका है. </p>
<p>इस कला से जुड़ी परिवार की ही संगीता और रजनी कहती हैं - "<em>शादी हो कर आए जब से ही हमने भी इस कला को सीखा. हमें ख़ुशी है कि सरकार और शासन ने हस्तशिल्प मेले में हमें प्रदर्शन करने और स्टॉल की जगह दी.</em>" शारदा बाई के बेटे सुनील वर्मा कहते हैं - "<em>हम लोग जंगल से खजूर की पत्तियां तोड़ कर लाते हैं. उन्हें सूखा कर अलग-अलग तरह का सामान बनाते हैं. मेरा बेटा प्रदीप सहित दूसरे बच्चे भी इस कला को सीख गए."        </em></p>
<p><em><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/lsT8BQwvLln8BLUVrdDb.jpg" alt=" handicrafts from khajoor leaves"></em></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>शारदा बाई खजूर कि पत्तियों से गुड़िया बनाते हुए (फोटो क्रेडिट : रविवार विचार)</em></span></p>
<p>मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और कई मंत्री,अधिकारियों ने सम्मान दिया. इंदौर के मालवा उत्सव में शामिल होने आई नैरोबी देश की संध्या दुबे कहती है -"<em> मैं 16 सालों से नैरोबी में रह रही हूं. लेकिन भारतीय लोक संस्कृति और कला की जगह कोई नहीं ले सकता. खजूर की पत्तियों से झाड़ू के अलावा इतनी सुंदर चीज़ें भारत के कलाकार ही बना सकते हैं. इसके यहां की मेहनती महिलाओं ने जिस तरह चूड़ियां और दूसरे सजावटी सामान बनाए, वह मैंने ख़रीदे. सभी विदेश ले जाऊंगी."</em></p>
<p>प्रदेश में कई जगह हस्तशिल्प मेले के आयोजन सरकार करवा रही है. इंदौर के लालबाग में आयोजित मालवा उत्सव में कई तरह के स्टॉल लगे. मेले में आई धीरल ने भी हस्तशिल्प से जुड़ा सामान ख़रीदा. धीरल कहती हैं - " <em>मुझे खजूर से बने सामान बहुत पसंद आए. मैंने कुछ ख़रीदे भी. ऐसे मेले में हस्तशिल्प और हमारी भारतीय संस्कृति को पहचाने का मौका मिलता है. "</em>  शारदा बाई के टेबल पर सजे हुए खजूर के आईटम देखने वालों की भीड़ ने साबित कर दिया कि हस्तशिल्प को पसंद करने वालों की तादाद बहुत ज्यादा है.</p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">विवेक वर्द्धन श्रीवास्तव </dc:creator><pubDate>Fri, 19 May 2023 12:32:45 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/kahaniyan/women-making-handicrafts-from-khajoor-leaves-to-revive-the-traditio-art]]></guid><category><![CDATA[कहानियां]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/MR2lzgVMO1LG7tAK8sdP.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/MR2lzgVMO1LG7tAK8sdP.jpg"/></item></channel></rss>