<rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" xmlns:dcterms="http://purl.org/dc/terms/" xmlns:geo="http://www.w3.org/2003/01/geo/wgs84_pos#" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/" xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/" xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/" version="2.0"><channel xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/"><title><![CDATA[ जिला प्रशासन]]></title><link>https://ravivarvichar.in/tags/jilaa-prshaasn</link><description/><atom:link href="https://ravivarvichar.in/rss/tags/jilaa-prshaasn" rel="self"/><language>en-us</language><lastBuildDate>Tue, 17 Mar 2026 16:04:01 +0530</lastBuildDate><item><title><![CDATA[बांस की टोकरी ने कैसे बदल दी सिंगपुर स्कूल की पूरी कहानी ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/stories-of-women/khammam-bai-singpur-school-education-donation-11220764</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/2026/03/17/khammam-bai-singpur-school-donation-2026-03-17-15-55-46.png"><p data-start="294" data-end="691" style="text-align: justify;">धमतरी: जब इरादे मजबूत हों तो हालात कभी रुकावट नहीं बनते. इसी बात को सच कर दिखाया है सिंगपुर गांव की आदिवासी महिला खम्मन बाई कमार ने। खुद पढ़ाई का अवसर न मिलने के बावजूद उन्होंने गांव के बच्चों के लिए शिक्षा का रास्ता आसान बनाने की ठानी. अपनी मेहनत की कमाई से स्कूल को जरूरी संसाधन उपलब्ध कराना उनके जीवन का मकसद बन चुका है.उनकी इस पहल ने पूरे क्षेत्र में एक सकारात्मक संदेश दिया है.</p>
<h2 data-start="294" data-end="691" style="text-align: justify;">किस स्कूल के लिए कर रही हैं खम्मन बाई प्रयास?</h2>
<p data-start="698" data-end="1155" style="text-align: justify;">धमतरी जिले के मगरलोड ब्लॉक में स्थित सिंगपुर गांव घने जंगलों के बीच बसा है. यह गांव जिला मुख्यालय से करीब 65 किलोमीटर और ब्लॉक से लगभग 30 किलोमीटर दूर है. यहां पहुंचने के लिए कठिन रास्तों से गुजरना पड़ता है. गांव में एक ही सरकारी स्कूल है, जहां 12वीं तक पढ़ाई होती है। इसके बाद छात्रों को आगे की पढ़ाई के लिए दूर जाना पड़ता है. इसी स्कूल को बेहतर बनाने के लिए खम्मन बाई लगातार योगदान दे रही हैं.</p>
<h2 data-start="698" data-end="1155" style="text-align: justify;">शिक्षा को लेकर एक अलग सोच</h2>
<p style="text-align: justify;">खम्मन बाई कमार खुद अनपढ़ हैं, लेकिन उनका सपना है कि सिंगपुर गांव के बच्चे पढ़-लिख सकें और शिक्षित बनें. उनके इस प्रयास ने न सिर्फ गांव के लोगों को प्रेरित किया है, बल्कि जिला प्रशासन की भी सराहना हासिल की है. महुआ बीनना, बांस की टोकरी बनाकर बेचना और जंगल से तेंदूपत्ता लाना&mdash;इन सारी मेहनतों के बावजूद, खम्मन बाई अपनी कमाई का एक हिस्सा स्कूल में जरूरी सामान दान करने में लगाती हैं. उनका मकसद बेहद सरल लेकिन शक्तिशाली है: बच्चों और आने वाली पीढ़ी को <a href="https://ravivarvichar.in/women-news-india/punjab-budget-2026-women-allowance-education-health-11188662">शिक्षा</a>&nbsp;का अवसर देना. खम्मन बाई कहती हैं,</p>
<blockquote>
<p><strong><em>&nbsp;"मैं चाहती हूं कि लोग शिक्षा के महत्व को समझें, इसलिए अपनी मेहनत से स्कूल में सामान दान करती हूं, ताकि गांव की अगली पीढ़ी पढ़ाई-लिखाई करके अपना भविष्य खुद बना सके."</em></strong></p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
<figure class="image"><img alt="महुआ बीनकर और बांस की टोकरी बनाकर बच्चों के लिए स्कूल में संसाधन जुटाती खम्मन बाई" src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/580x348/filters:format(webp)/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/2026/03/17/bamboo-basket-mahua-khammam-bai-2026-03-17-15-57-47.png" style="width: 1280px;">
<figcaption>महुआ बीनकर और बांस की टोकरी बनाकर बच्चों के लिए स्कूल में संसाधन जुटाती खम्मन बाई Photograph: (etv bharat)</figcaption>
</figure>
<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
<h2 style="text-align: justify;">मदद करना अब बन गया जीवन का हिस्सा</h2>
<p data-start="105" data-end="750" style="text-align: justify;">सिंगपुर कमारपारा में रहने वाली 50 वर्षीय खम्मन बाई कमार न सिर्फ अपने जनजाति के पारंपरिक कामों में जुटी हैं, बल्कि बच्चों की शिक्षा के लिए भी प्रेरक उदाहरण हैं. झोपड़ी जैसे घर में रहने के बावजूद, दो पुत्र और एक बेटी की मां खम्मन बाई ने अपने जीवन में शिक्षा को प्राथमिकता दी. पति के 2008 में देहांत के बाद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपने घर को संभालते हुए गांव के स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को पढ़ाई के प्रति जागरूक करने का संकल्प लिया. इसके लिए वे अपनी मेहनत की कमाई से स्कूल में नए-नए सामान खरीदती हैं, ताकि बच्चों को बेहतर संसाधन मिल सकें. यह उनकी जीवनशैली का एक अहम हिस्सा बन चुका है, और उनकी यह पहल पूरे गांव के लिए प्रेरणा बन रही है.</p>
<h2 data-start="105" data-end="750" style="text-align: justify;">बच्चों के चेहरे पर आई मुस्कान</h2>
<p style="text-align: justify;">स्वामी आत्मानंद उत्कृष्ट हिंदी विद्यालय में खम्मन बाई कमार की पहल से बच्चों को नया कंप्यूटर मिला है. अब स्कूली बच्चे कंप्यूटर पर पढ़ाई कर हाई एजुकेशन की बेसिक जानकारी सीख रहे हैं. बच्चों और शिक्षकों का मानना है कि यह कदम गांव की शिक्षा में नई क्रांति लेकर आएगा। खम्मन बाई बताती हैं, "मैं पढ़ी-लिखी नहीं हूं, लेकिन मेरा मकसद है कि मेरा स्कूल और गांव के लोग शिक्षा के प्रति जागरूक हों. 2 साल बाद मैं फिर एक बड़ा गिफ्ट दूंगी, लेकिन वह मैं अभी नहीं बताऊंगी."</p>
<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
<figure class="image"><img alt="खम्मन बाई ने सिंगपुर स्कूल में बच्चों के लिए कंप्यूटर दान किया" src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/580x348/filters:format(webp)/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/2026/03/17/school-computer-donation-2026-03-17-15-59-45.png" style="width: 1280px;">
<figcaption>खम्मन बाई ने सिंगपुर स्कूल में बच्चों के लिए कंप्यूटर दान किया Photograph: (etv bharat)</figcaption>
</figure>
<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
<h2 style="text-align: justify;">आने वाली पीढ़ी को बेहतर भविष्य देने की कोशिश</h2>
<p style="text-align: justify;">खम्मन बाई कमार ने कई वर्षों से अपने गांव के स्कूलों में बच्चों के लिए जरूरी सामान दान किया है. उन्होंने बाल्टी, किताबें, टीवी और कंप्यूटर जैसी चीजें स्कूल में उपलब्ध कराई हैं. खुद पढ़ी-लिखी न होने के बावजूद, और <a href="https://ravivarvichar.in/kahaniyan/shg-woman-turned-to-her-pain-of-child-marriage-into-success-life-through-business-in-dewas-4735130">बाल विवाह</a> का अनुभव होने के बावजूद, उनका उद्देश्य गांव के बच्चों को शिक्षित और जागरूक बनाना है, ताकि आने वाली पीढ़ी पढ़ाई और सीखने के महत्व को समझ सके. वर्तमान में वे महुआ बीनने, तेंदूपत्ता और टोकरी बनाने का काम करती हैं और अपनी मेहनत की कमाई का हर बचा-पचा हिस्सा बच्चों की पढ़ाई पर खर्च करती हैं. खम्मन बाई कहती हैं कि बच्चों को पढ़ते हुए देखकर उन्हें बहुत खुशी मिलती है, और गांव के लोग उन्हें सम्मान से &ldquo;स्कूल में सामान दान देने वाली खम्मन बाई कमार&rdquo; के रूप में जानते हैं.</p>
<h2 style="text-align: justify;">गांव में कॉलेज की मांग</h2>
<p data-start="2735" data-end="3057" style="text-align: justify;">खम्मन बाई की सबसे बड़ी इच्छा है कि उनके गांव में ही कॉलेज खुले, ताकि खासकर लड़कियों को दूर जाकर पढ़ाई न करनी पड़े. उनका कहना है कि लड़कियों के लिए बाहर जाना मुश्किल होता है, इसलिए गांव में ही उच्च शिक्षा की सुविधा होना जरूरी है. उन्होंने सरकार से इस दिशा में कदम उठाने की अपील की है.</p>
<h2 data-start="2735" data-end="3057" style="text-align: justify;">प्रशासन ने की सराहना</h2>
<p data-start="104" data-end="567" style="text-align: justify;">धमतरी के <a href="https://ravivarvichar.in/women-news-india/collectors-office-decorated-with-handcrafts-shg-women-organised-an-exhibition-in-jaipur-collectors-office-9638965">कलेक्टर</a>&nbsp;अबिनाश मिश्रा ने खम्मन बाई कमार के योगदान की सराहना की है और इसे महिला सशक्तिकरण का प्रेरक उदाहरण बताया. पढ़ी-लिखी न होने के बावजूद, खम्मन बाई ने बच्चों के लिए स्मार्ट टीवी, कंप्यूटर और लाइब्रेरी के लिए किताबें दान की हैं. ट्राइबल हॉस्टल में भी उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई है. कमार जनजाति को आम तौर पर पिछड़ा माना जाता है, लेकिन खम्मन बाई ने शिक्षा के क्षेत्र में अपनी पहल से यह साबित कर दिया कि कठिन परिस्थितियों में भी बदलाव लाया जा सकता है.</p>
<p data-start="569" data-end="976" style="text-align: justify;">सिंगपुर गांव में आईटीआई और कॉलेज खोलने का प्रस्ताव राज्य शासन को भेजा गया है और जल्द ही यहां उच्च शिक्षा के नए अवसर उपलब्ध होंगे. कलेक्टर मिश्रा ने बताया कि गांव शहर से लगभग 30 किलोमीटर दूर है और यहां हाई एजुकेशन की सुविधा कम है, इसलिए इस दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं. उन्होंने कहा कि जो महिलाएं शिक्षा और समाज में नवाचार कर रही हैं, उन्हें <a href="https://ravivarvichar.in/tags/jilaa-prshaasn">जिला प्रशासन</a> की तरफ से पूरे समर्थन और शुभकामनाएं मिलती रहेंगी.</p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">रिसिका जोशी</dc:creator><pubDate>Tue, 17 Mar 2026 16:04:01 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/stories-of-women/khammam-bai-singpur-school-education-donation-11220764]]></guid><category><![CDATA[कहानियां]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/2026/03/17/khammam-bai-singpur-school-donation-2026-03-17-15-55-46.png" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/2026/03/17/khammam-bai-singpur-school-donation-2026-03-17-15-55-46.png"/></item><item><title><![CDATA[झारखंड कि रानी 'मिस्त्री' ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/khabar/jharkhand-shg-rani-mistri-udaypura-ranchi</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/4gRMiJJMkoJ92pl0oQ9y.jpg"><p dir="ltr">कौन कहता है की ईंट-कंक्रीट से जुड़े काम सिर्फ पुरुष ही कर पाते है? झारखंड की महिलाओं ने यह बात बहुत साल पहले ही गलत साबित कर दी, और साथ ही उन लोगों की सोच और मुँह पर ताला भी लगा दिया जो महिलाओं को किसी से काम समझते है. झारखण्ड में जब तक रानी मिस्त्रियों ने काम शुरू नहीं कर दिया तब तक लोग यही समझते थे कि ये सब काम तो आदमियों के है. लेकिन आज रांची कि वो रानियां जब काम करती है, तब उनके हाथों कि रफ़्तार देखकर सब दंग रह जाते है. जब तक कोई राज मिस्त्री या पुरुष मिस्त्री एक दिवार कि चिनाई करता है तक तब एक रानी मिस्त्री 2 दीवारों का काम ख़त्म कर देती है. </p>
<p dir="ltr">यह सिलसिला शुरू हुआ चार साल पहले जब उनके गांव उदयपुरा में कार्यरत स्वयं सहायता समूह को 'स्वच्छ भारत मिशन' के तहत सौ शौचालय बनाने का काम सौंपा गया. उम्मीद थी कि राज मिस्त्री मिल जाएंगे, लेकिन काम छोटा था तो कोई आदमी तैयार नहीं था. यह देखकर महिलाओं ने काम करने का बीड़ा उठा लिया. जिला प्रशासन की ओर से इन्हें प्रशिक्षण दिया गया, इसके बाद 20-25 महिलाओं ने मिलकर सारे शौचालयों का निर्माण कर दिया. काम करने के बाद जब इन महिलाओं को पैसे मिले तो इनके जोश में और बढ़ावा आया. बस फिर क्या था, वो दिन है और आज का दिन है, झारखंड में 50 हज़ार से ज़्यादा रानी मिस्त्री काम कर रहीं है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक भी इनकी सफलता की कहानियां पहुंची और वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए खूंटी जिले की कुछ रानी मिस्त्रियों वे भी इनका हौसला बढ़ा चुके हैं.</p>
<p dir="ltr"><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/OBhaX5uAcaRU3yn8nokn.jpg" alt="Sunita devi "></p>
<p dir="ltr"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: Ram Nath Kovind facebook official page</em></span></p>
<p dir="ltr">इन्ही में से एक नाम है, सुनीता देवी. झारखंड के लातेहार जिले के उदयपुरा गांव की रहने वाली और अपने इलाके की मशहूर ‘रानी मिस्त्री’. वह वर्ष 2019 में भारत के राष्ट्रपति के हाथों भारत सरकार की ओर से कामकाजी महिलाओं को प्रदान किए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान 'नारी शक्ति पुरस्कार' से नवाजी जा चुकी हैं. इन रानी मिस्त्रियों पर 'वल्र्ड बैंक' ने हाल में एक रिपोर्ट बनाई. हजारीबाग की ही एक रानी मिस्त्री निशात जहां कहती हैं, "महिलाएं पुरुषों से कम नहीं हैं. जो पुरुष कर सकते हैं वो महिलाएं भी कर सकती हैं और कई बार तो पुरुषों से बेहतर कर सकती हैं. रेजा-मजदूर के रूप में महिलाएं पहले भी निर्माण कार्य में लंबे समय से काम करती आयी हैं. अब उन्हें रानी मिस्त्री के रूप में काम करने का मौका मिला है तो वे यहां भी अपना हुनर और काबिलियत दिखा रही हैं." सब लोगों ने यह मान रखा है कि महिलाएं निर्माण गतिविधियों में सहायकों की भूमिका ही निभाती है. लेकिन, झारखंड में महिला मजदूरों ने मिस्त्री के काम में पुरुषों के वर्चस्व को तोड़ दिया है. </p>
<p dir="ltr">झारखंड उन राज्यों में से एक है जिसे 'स्वच्छ भारत अभियान' की योजना बनाने और उसको लागू करने के लिए 'विश्व बैंक' की ओर से तकनीकी मदद मिली थी. इस तकनीकी मदद के हिस्से के रूप में विश्व बैंक ने टॉयलेट बनाने के लिए मिस्त्रियों को प्रशिक्षित करने के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाया था और उनमें से कई कार्यक्रमों में महिला मजदूरों ने भी हिस्सा लिया. कई रानी मिस्त्रियों के परिवार वाले इस काम को सीखने को लेकर उनके खिलाफ खड़े हो गए. पर संघर्ष कर इन रानी मिस्त्रियों ने अपना मुकाम पा ही लिया. झारखंड में यह बात साबित हो गयी कि महिलाएं किसी से भी कम नहीं है. सिर्फ झारखंड ही नहीं बल्कि हर राज्य कि महिला इतनी ही सशक्त है कि वो कुछ भी आसानी से कर सकती है. बस चाहिए तो वो हौसला जो झारखंड महिलाओं ने दिखाया. अगर हर महिला बिना डरे काम करने लग गयी तो देश कि शिथि को बदलने में ज़रा भी वक़्त नहीं लगेगा.</p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">रिसिका जोशी</dc:creator><pubDate>Mon, 24 Apr 2023 16:32:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/khabar/jharkhand-shg-rani-mistri-udaypura-ranchi]]></guid><category><![CDATA[ख़बर]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/4gRMiJJMkoJ92pl0oQ9y.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/4gRMiJJMkoJ92pl0oQ9y.jpg"/></item><item><title><![CDATA[टंट्या भील 90.8 FM का माइक संभालती आदिवासी महिलाएं ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/aadhi-aabadi/adivasi-women-give-message-of-social-change-from-radio-tantya-bhil-908-fm</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/tFOU1iKWcxzEVLxJrzWX.jpg"><p>रेडियो हमेशा से ही न केवल मनोरंजन का, पर अपने विचारों को साझा कर समाज में बदलाव की पहल करने का साधन रहा है. वैसे तो रेडियो की जगह अब इंटरनेट ने ली है, पर कुछ जगहों पर आज भी ये अपने विचारों और भावों को व्यक्त करने का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाला साधन बना हुआ है. झाबुआ की महिलाओं ने भी रेडियो को अपनी बात समाज तक पहुंचाने का साधन बनाया. रेडियो स्टेशन टंट्या भील 90.8 एफएम ने झाबुआ में सामाजिक मुद्दों और सामुदायिक विकास के मुद्दों पर बात करने की लिए महिलाओं को विशेष अवसर दिया.</p><p>हाल ही में, जिले के विभिन्न हिस्सों से महिलाएं आदिवासी समाज में दहेज प्रथा, शराब और डीजे प्रथाओं सहित विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर बोलने के लिए एक साथ आईं. इन प्रथाओं को उन्होने आदिवासी समाज के पिछड़ेपन और क़र्ज़ में डूबने की बहुत बड़ी वजह बताई. परिवार अक्सर कर्ज में डूबे रहते हैं और इसकी वजह से उन्हें पलायन करना पड़ता है. इससे स्वास्थ्य समस्याओं, शिक्षा की कमी और स्थानीय नौकरियों की कमी सहित कई समस्याएं पैदा हुई और कई प्रकार की घटनाएं, उत्पीड़न और अपराधों में भी बढ़ोतरी दिखी.</p><p>नवापाड़ा, झरनिया, हत्यादेली और मुंदत गांव की में संगठन की महिलाएं अपने गांवों में इन बुराइयों को खत्म करने के लिए जागरूकता पैदा करने का काम कर रही हैं. वे अपने गांव में इन मुद्दों पर जिला प्रशासन का सहयोग करने के लिए तैयार हैं. जत्थे से सेवली परमार का कहना है कि जिला कलेक्टर, सरपंच, पटेल और गांवों के सभी मुखियाओं के साथ मिलकर नियम तय करना होगा. रेडियो स्टेशन के ज़रिये महिलाओं ने प्रशासन से सहयोग मांगा.</p><p>महिलाओं ने समुदाय और प्रशासन के लिए संदेश भी रिकॉर्ड किये जो रेडियो टंट्या भील 90.8 एफएम पर प्रसारित किये जायेंगे. ये इसीलिए संभव हो सका क्योंकि इन महिलाओं ने संगठित होकर ग़लत के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने की और स्थिति को ख़ुद बदलने की हिम्मत की.&nbsp;</p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मिस्बाह</dc:creator><pubDate>Fri, 14 Apr 2023 15:43:28 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/aadhi-aabadi/adivasi-women-give-message-of-social-change-from-radio-tantya-bhil-908-fm]]></guid><category><![CDATA[आधी आबादी]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/tFOU1iKWcxzEVLxJrzWX.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/tFOU1iKWcxzEVLxJrzWX.jpg"/></item><item><title><![CDATA[मज़दूरी छोड़ बन गई बिज़नेस वुमन ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/photovideo/shg-women-run-a-food-processing-enterprise</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/Sgt3xPUqenbMYIA2Ij10.jpeg"><p><br><iframe style="width: 1154px; height: 647px;" src="https://www.youtube.com/embed/Wc8k1s53s4c" width="1154" height="647" allowfullscreen="allowfullscreen"></iframe></p>
<p>जिस BPL कार्ड को बनवाने के लिए परिवार ताकत झोंक देते हैं. पंचायतों के चक्कर काटते रहते हैं. लोग इस कार्ड से सरकार मिलने वाली मुफ्त की सुविधाओं को लेने से नहीं चूकते ,वही BPL कार्ड धार जिले के छोटे से गांव खंडवा की रहने वाली गंगा दीदी ने पंचायत को वापस लौटा दिया. खुद के पैरों पर खड़े होकर वह आत्मनिर्भर बनी. अपनी मेहनत और प्रयासों को आजीविका मिशन ने पंख लगा दिए. गंगा दीदी आज जिले की मैनेजमेंट गुरु बन चुकी है."लगातार पांच साल मेहनत की. जब कमाई बढ़ी तो हिसाब लगाने बैठ गई. पति को भी साथ बिठा लिया. मेरी तो ख़ुशी का ठिकाना ही नहीं रहा, जब लगातार कमाई एक जैसी बढ़िया होने लगी. हमने सोचा मेहनत का फल मिला. ज़िंदगी सुधर गई. एक दिन पंचायत ऑफिस गए और बीपीएल कार्ड जमा करा आए. " लगातार मेहनत करने वाली धार जिले के पिछड़े गांव छोटा खंडवा की गंगा बाई ने कही. गंगा बाई कहती है - " यदि सोच लो तो हम अपनी ज़िंदगी को अच्छे से जी सकते हैं. मुझे गर्व है कि प्रशासन और आजीविका मिशन के सहयोग से मैं लखपति समूह में शामिल हो गई."</p>
<p>किसी समय पहले मजदूरी और फिर सब्जी बेचने वाली गंगा बाई आज धार जिले में हर काम  को रोजगार के नए अवसर में बदलने की सोच रखती है.<br>कई समूह और इससे जुड़ी  महिलाएं गंगा बाई से धंधे का हुनर सीखने और सलाह लेने पहुंच रही हैं.वह अपना कारोबार तो कर ही रही लेकिन दो सौ लोगों के लिए भी रोजगार के रास्ते खोल दिए. गंगा दीदी को इलाके में चिप्स वाली दीदी के नाम से भी पहचान मिल गई. यह क्षेत्र का सबसे  बड़ा कारोबार बन सकता है.</p>
<p>कुछ साल पहले तक मजदूरी करने वाली गंगा दीदी ने नवदुर्गा स्वसहायता समूह का गठन किया. गंगा दीदी अपने संघर्ष की कहानी कहते हुए बताती हैं -" शुरू में समूह की सभी महिलाओं ने पच्चीस रुपए हर सप्ताह बचत शुरू किए. यह रकम भी बहुत ज्यादा थी. समूह से लोन लेकर सब्जी बेचना शुरू की.हमें बैंक से पचास हजार का लोन मिल गया. किराने का सामान भी रखने लगे. पति भी मजदूरी के बाद विक्रम चौधरी ने भी साथ दिया. फिर हमने मुड़ कर पीछे नहीं देखा." </p>
<p>जिला प्रशासन और जिला पंचायत अधिकारियों के लिए गंगा दीदी आत्मनिर्भरता की मिसाल बन गई है. फेडरेशन और एक संगठन ने आलू चिप्स का कारखाना खंडवा गांव में खोलने की योजना बनाई. जिला पंचायत के अधिकारियों के साथ फेडरशन के अधिकारी आए. समूह की महिलाओं को योजना और कमाई का ये जरिया समझाया ,लेकिन नतीजा ज़ीरो. अधिकारी पहली बार में निराश लौट गए. गांव की ममता ने बताया- " मेरे  शिव शक्ति समूह के सदस्य भी बैठक में शामिल हुए थे. सभी को लगा कि बाहर वालों का कारखाना है. पैसा न डूब जाए. इस बैठक के बाद गंगा दीदी ने समझाया कि पंचायत की परियोजना प्रबंधक अपर्णा पांडेय पर भरोसा  करो. और गंगा दीदी की बात पर सब जुड़ते चले गए. </p>
<p>मिसाल बन चुकी गंगा दीदी कहती हैं - " वह समाज में बदलाव चाहती थी. इसलिए हिम्मत नहीं हारी. किराने की दुकान जब पति ने संभाली तो लगा कुछ और करना चाहिए. बस इसी सोच को लेकर मैं सैनेटरी नैपकिन बना कर बेच लगी.गांव में पिछड़ी सोच को ख़त्म कर युवतियों और महिलाओं को कपड़े की जगह नैपकिन का महत्व बताती हूं."</p>
<p> </p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">रविवार ब्यूरो </dc:creator><pubDate>Thu, 16 Mar 2023 18:07:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/photovideo/shg-women-run-a-food-processing-enterprise]]></guid><category><![CDATA[वीडियो]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/Sgt3xPUqenbMYIA2Ij10.jpeg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/Sgt3xPUqenbMYIA2Ij10.jpeg"/></item><item><title><![CDATA[छह से बना छह हजार का कारवां ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/kahaniyan/barwani-shg-success-story</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/hNNCN07YDV7qZMEAT1mq.jpeg"><p>2015 का साल था, गरीबी से जूझ रही वैशाली और उसकी महिला साथियों ने मोर्चा निकाल कर बैंक अधिकारियों को चौंका दिया. "बैंकों की तानाशाही नहीं चलेगी ,नहीं चलेगी. हमारी मांगे पूरी करो. लोन हमको देना होगा ,देना होगा." महज आठ-दस महिलाएं सड़कों पर नारे लगाती हुई बैंक की तरफ बढ़ रहीं थीं. गांव की दुकानों और गुमटियों पर खड़े लोग इन्हें देखते रहे. इन नारों में आवाज़ चाहे महिलाओं की कमज़ोर हो लेकिन आत्मविश्वास और आक्रोश लिए बैंक में घुस गई. मैनेजर भी चौंक गए. " हम घरेलु महिलाएं हैं. मजदूरी पर जाने को विवश हैं. आमदनी नहीं हैं. पति फैक्ट्रियों में मजदूरी करते हैं. आप ही बताओ घर का गुजारा कैसे चले. हमें लोन नहीं दिया तो और बड़ा आंदोलन करेंगे. आप खुद हमारे घर लोन देने आओगे. " बड़वानी जिले के आदिवासी ब्लॉक की रहने वाली वैशाली एक सांस में बैंक मैनेजर को खरी-खोटी सुना दी. मैनेजर ने फिर भी महिलाओं को अनसुना कर दिया. वे निराश लौट आईं.        </p>
<p>वैशाली आगे बताती है-" कुछ सालों में वक़्त बदला. और एक दिन वह भी आया जब वही बैंकों के अधिकारी हमारी चौखट पर लोन देने के लिए खड़े थे. " वैशाली जैसी कई महिलाओं की यह कहानी है. कई बार असफलताओं का स्वाद चख चुकी वैशाली आज निमाड़ ही नहीं पूरे प्रदेश की चर्चित महिला बन चुकी है. वैशाली सफलता की रोज नई-नई इबारत लिख रही है.यहां क्या कलेक्टर और क्या और अधिकारी बल्कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, पूर्व राज्यपाल आनंदी बेन पटेल भी सेंटर पर मिलने आ चुकी हैं.    </p>
<p>हम आपको बड़वानी जिले के ठीकरी ले चलते हैं. यहां गुलाबी रंग से पुता आजीविका सेंटर दूर से ही दिख जाएगा. इस सेंटर में गुलाबी रंग की साड़ी पहने एक दीदी दूसरी महिलाओं को गाइड कर रही है.आप दूर से ही समझ जाएंगे ये ही वैशाली चौधरी है. लगभग 70  सिलाई मशीनों की आवाज़ से हॉल गूंज रही  है. पापड़ की दो मशीनों से पापड़ बन कर तैयार हो रहे. एक जगह सिवइयां बन रही. कहीं साबुन तो कहीं  घरेलु मसाले की पैकेजिंग की जा रही. यह नज़ारा यहां रोज़ आप देख सकते हैं. लगभग डेढ़ सौ से ज्यादा दीदियां यहां अपने अपनी धुन में काम में जुटी हैं.</p>
<p>सात साल पहले ठीकरी की सड़कों पर मोर्चा निकलने वाली चंद महिलाओं का यह सफर अब लघु  गृह उद्योग की शक्ल में खड़ा है. यह सफर इतना सरल नहीं था. वैशाली आगे बताती है -" मेरे पति सुनील की सैलेरी केवल आठ हजार रुपए थी. किराये का कमरा और बच्चे पालना मुश्किल हो रहा था. गरीबी जान ले रही थी. मेरी पढ़ाई केवल 12 वीं तक हुई और शादी हो गई. सोचा कुछ करें. गांव की ही मेरी जैसी गरीब सहेलियों ने लोन कर कुछ करने का सोचा. बैंक वालों ने लोन देने से मना कर दिया. बेइज्जत कर भगा दिया. बस हम भी ज़िद पर अड़ गए. प्रेरणा महिला स्वसहायता समूह बनाया.इसमें दस महिलाएं जुड़ीं.  "</p>
<p><img src="https://d2vbj8g7upsspg.cloudfront.net/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/lPAvKlQstxTYesn5iN9J.jpeg" alt="SHG women tailoring"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>ठीकरी में आजीविका भवन में सिलाई करती समूह की दीदियां</em></span> </p>
<p>समूह से जुडी महिलाओं का संघर्ष यही ख़त्म नहीं हुआ. समूह की संगीता,हर्षा ,दीपाली ,रुषाली और वैशाली खुद अपने  हालात बताती है कि-" लगभग डेढ़ साल गरीबी में एक और झटका तब लगा जब हमारे पतियों की फैक्ट्री भी बंद हो गई. सभी भी बेरोजगार हो गए.अब कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था. इसी बीच सरकार आजीविका मिशन योजना आई और हमारे समूह को पचास हजार रुपए का लोन मिल गया. मैं अपनी सहेलियों पहले एक और फिर तीन सिलाई मशीन ले आई. बस एक उम्मीद की पहली किरण यहीं से नज़र आई. "   </p>
<p>धीरे-धीरे समूह की महिलाएं काम मांगने जाने लगी. लेकिन कामकाज करने के लिए जगह नहीं थी.किराए से कमरा लिया. दस हजार रुपए महीने का यह कमरा और काम अच्छे से नहीं मिलने के कारण समूह को कमरा छोड़ना पड़ा. अब वैशाली और उसकी साथी संगीता ,दर्शना  ,दीपाली और हर्षा ग्राम सभा में पहुंची. समूह के लिए सरपंच से जगह मांगी.पंचायत से गांव का ही मांगलिक भवन उन्हें मिला. यहां आए दिन विवाद और समूह विशेष की आपत्ति मुसीबत बन गई. समूह की महिलाओं को वहां से कुछ लोगों ने खदेड़ दिया. आखरी रास्ता अपनाया और महिलाएं बड़वानी के उस समय के कलेक्टर तेजस्वी नायक के पास पहुंची. </p>
<p>महिलाओं की मेहनत और परेशानियों को सुन नायक ने ऐसा रास्ता निकाला कि आज ग्राम संगठन में छह हजार महिलाएं जुड़ गईं. संघर्ष और गरीबी के तीन साल के लंबे सफर को पार कर चुकी समूह की अध्यक्ष  वैशाली अपने सफर को बताती है कि-" हमको गांव के ही पुराने जर्जर हॉस्पिटल की बिल्डिंग दे दी गई. हमने उसे ठीक करवाया. अब हमें काम के लिए स्थाई ठिकाना मिल गया था. मैंने अपने पति को समझाया कि वह भी समूह को साथ दे. ऐसे हमारी दीदियों के पति भी जुड़ते चले गए. हमने फिर पीछे पलट कर नहीं देखा. धीरे -धीरे हमने कई काम शुरू किए. </p>
<p><img src="https://d2vbj8g7upsspg.cloudfront.net/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/PA0F6gkxZdWGsyMOEQOY.jpeg" alt="SHG women"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>समूह की बैठक </em></span></p>
<p>उस दिन मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा जब पहली बार समूह को चालीस हजार टी शर्ट का ऑर्डर मिला.अब तो हम पूरे जिले के साथ दूसरे जिले के कई ब्लॉक में भी हमारी बनाई यूनिफॉर्म तैयार की जा रही. हम हर महीने पंद्रह हजार रुपए कमा ही लेते हैं. "<br>महिलाएं अब  पापड़, सिलाई, सिवइयां, चिप्स, पापड़, अगरबत्ती सहित कई आइटम बना रहीं हैं. बैंक से दस लाख रुपए की लिमिट भी मिल गई. सब कर्ज भी उतर गए. अब इसी सेंटर पर दूसरी जगह की महिलाएं भी ट्रेनिंग लेने आती हैं.वैशाली ने श्री गणेश ग्राम संगठन बनाया और जिले 31 गांव की छह हजार महिलाओं को जोड़ कर उन्हें भी आत्मनिर्भर बना दिय. </p>
<p>आजीविका मिशन के जिला प्रबंधक योगेश तिवारी कहते हैं -" ठीकरी के इस समूह ने प्रदेश में नई पहचान बनाई है. यहां नीति आयोग के सदस्यों के अलावा यहां के प्रबंधन को समझने कई संस्थाओं के विद्यार्थी भी आते हैं. अब ये महिलाएं दूसरी महिलाओं को ट्रेनिंग देकर उन्हें रोजगार के नए रास्ते दिखा रही है."</p>
<p>जिला प्रशासन ने इसे मॉडल बनाया है. खेती में जैविक पद्धति को प्रोत्साहन सहित कई प्रोजेक्ट में इस समूह को सेवाएं करते देखा जा सकता है. </p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">विवेक वर्द्धन श्रीवास्तव </dc:creator><pubDate>Sat, 11 Mar 2023 18:02:21 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/kahaniyan/barwani-shg-success-story]]></guid><category><![CDATA[कहानियां]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/hNNCN07YDV7qZMEAT1mq.jpeg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/hNNCN07YDV7qZMEAT1mq.jpeg"/></item></channel></rss>