<rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" xmlns:dcterms="http://purl.org/dc/terms/" xmlns:geo="http://www.w3.org/2003/01/geo/wgs84_pos#" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/" xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/" xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/" version="2.0"><channel xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/"><title><![CDATA[ कोदो कुटकी]]></title><link>https://ravivarvichar.in/tags/kodo-kuttkii</link><description/><atom:link href="https://ravivarvichar.in/rss/tags/kodo-kuttkii" rel="self"/><language>en-us</language><lastBuildDate>Wed, 12 Apr 2023 13:54:53 +0530</lastBuildDate><item><title><![CDATA[चखिए स्वाद रेंगाखार की कोदो-कुटकी कुकीज़ का ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/kahaniyan/kodo-kutki-cookies-give-employment-to-women-in-naxal-affected-areas</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/cCN0N3KlDWZmiU3GrJiH.jpg"><p>हर दिन सुबह उठ कर जब तक हाथ में चाय-बिस्कुट ना हो, दिन की शुरुआत ही नहीं होती. यह सिर्फ़ कुछ घरों की नहीं बल्कि देश के हर घर की कहानी है. बच्चे हो या बूढ़े, बिस्कुट और कुकीज़ खाना किसे पसंद नहीं होता और अगर ये ही कुकीज़ स्वाद के साथ साथ सेहत भी दे तो? यही सोच रखकर नक्सल प्रभावित 'रेंगाखार जंगल' में महिलाएं 'कोदो-कुटकी' से कुकीज़ बना रहीं है. रेंगाखार में प्रोसेसिंग प्लांट लगा है, जहां कोदो- कुटकी और रागी से कई तरह से प्रोडक्ट तैयार किया जा रहे हैं. इस क्षेत्र की महिलाएं ना सिर्फ़ खुद आत्मनिर्भर बनने की तरफ कदम बढ़ा रही है बल्कि अपनी जैसे दूसरी महिलाओं को भी रोजगार दे रहीं है. </p>
<p>कोदो-कुटकी, रागी से कुकीज बनाने का काम रेंगाखार की 'नई किरण स्वयं सहायता समूह' की महिलाओं ने शुरू करा. समूह की अध्यक्ष कुसुम अग्रवाल ने बताया - "इसकी कीमत वर्तमान में 500 रुपए किलो है। अभी तक 30 किलो कुकीज की बिक्री की जा चुकी है. प्रति किलो 500 रुपए की दर से अभी तक 15 हजार रुपए का व्यापार कर चुके हैं, जिससे समूह को फायदा हुआ है." उन्होंने बताया - "कुकीज बनाने के लिए कोदो-कुटकी, रागी का पाउडर, आटा, शक्कर, ग्लूकोज पाउडर, दूध पाउडर, इलायची पावडर खोपरा, चॉकलेट पावडर, चॉकलेट चिप्स मार्ग्रीन पेस्ट की ज़रूरत पड़ती है, जिसकी खरीदी रायपुर से की जाती है." रेंगाखार के वन-धन विकास में प्रोसेसिंग प्लांट लगा है जहां कोदो-कुटकी, रागी के लिए 4 तरह की मशीन लगी है. इसकी देख-रेख सिवनीखुर्द की 'जय मां कर्मा समूह' की महिलाएं कर रहीं है. जून 2022 में महिलाओं ने कोदो-कुटकी और रागी से प्रोडक्ट्स बनाना शुरू किया था और अभी तक 10 क्विंटल कोदो खरीदी कर चुकीं हैं. अभी तक 9 क्विंटल 50 किलो प्रोडक्ट बेच चुके हैं.</p>
<p>समूह की महिलाएं बताती हैं, "कोदो-कुटकी, रागी से कुकीज व अन्य प्रोडक्ट पर्याप्त मात्रा में तैयार करते हैं लेकिन इन प्रोडक्ट्स की बिक्री के लिए उनके पास इतना बड़ा मार्केट नहीं है. मार्केट उपलब्ध नहीं होने के कारण नियमित काम नहीं कर पाते हैं." महिलाओं ने कहा, "इसे लेकर प्रशासन को और ध्यान देने की ज़रूरत है." लघु वनोपज समिति के प्रबंधक कमलेश साहू का भी कहना है - "कोदो-कुटकी, रागी वनांचल क्षेत्र में पर्याप्त मात्रा में मिल जाता है. लेकिन अत्यधिक मात्र में यहाँ बिक्री नहीं हो पाती." </p>
<p>बहरहाल, यह एक बहुत अच्छी और बड़ी पहल है, जो महिलाओं को रोजगार के अवसर भी प्रदान करेगी और लोग सेहत पर ही उतना ही ध्यान दे पाएंगे.  सिर्फ रेंगाखार की महिलाएं ही क्यों, अगर ये पहल पुरे देश की सहज महिलाएं शुरू कर दे तो, वो अपने हालातों को बहुत आसानी से बदल सकतीं है.</p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">रिसिका जोशी</dc:creator><pubDate>Wed, 12 Apr 2023 13:54:53 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/kahaniyan/kodo-kutki-cookies-give-employment-to-women-in-naxal-affected-areas]]></guid><category><![CDATA[कहानियां]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/cCN0N3KlDWZmiU3GrJiH.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/cCN0N3KlDWZmiU3GrJiH.jpg"/></item><item><title><![CDATA[आदिवासी रेखा पेंड्राम ने UN तक पहुंचाया कोदो कुटकी को ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/photovideo/adivasi-woman-presened-on-kodo-kutki</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/NxwcHolc3nIzYomOnK6G.jpg"><p><iframe style="width: 1103px; height: 619px;" src="https://www.youtube.com/embed/crUeKptx_zw" width="1103" height="619" allowfullscreen="allowfullscreen"></iframe></p>
<p>मध्य प्रदेश महिला वित्त निगम के महाप्रबंधक अरविन्द सिंह भाल जो न्यूयॉर्क में रेखा के साथ थे कहते हैं, " पेंड्राम यूं तो केवल 10वीं तक पढ़ी हैं. लेकिन उनकी वैचारिक शक्ति बहुत मजबूत है. वो अपने धुन की पक्की है और एक मजबूत इच्छा शक्ति वाली महिला है. उन्होंने तेजस्विनी के साथ जुड़कर हजारों महिलाओं की आर्थिक स्थिति को सुधारा". रेखा के साथ उस वक़्त मध्य प्रदेश की महिला एवं विकास मंत्री, और विभाग की प्रमुख सचिव भी अमेरिका गयी थी. लेकिन दुनिया की नज़रों में  रेखा ही थी.</p>
<p>डिंडोरी की बैगा आदिवासी रेखा पेंड्राम की अपने गांव से न्यूयॉर्क तक की यात्रा नारी सशक्तिकरण की अनूठी कहानी है. जिले की आदिवासी महिलाओं को एक कर उन्हें स्वावलंबी बनाने में उनका बहुत बड़ा योगदान है. अमेरिका में 2017 में उन्होंने खाद सुरक्षा पर मध्य प्रदेश के प्रतिनिधि के रूप में एक प्रेसेंटेशन दिया था. भारी करतल ध्वनि के बीच, उन्होंने दुनिया को खाद्य सुरक्षा, महिलाओं के आर्थिक- सामाजिक उत्थान और उनके स्वास्थ्य सम्बंधित विषयों पर उनके स्वसहायता समूह के महासंघ द्वारा चलाये जा रहे कार्यों का विस्तार से विवरण दिया था. रेखा का प्रयास अब जिले की हर एक महिला को SHG आंदोलन से जोड़ना है.</p>
<p>डिंडोरी जिले के मेहंदवानी के फलवाही गांव की रेखा 2007 में तेजस्विनी महिला स्वसहायता समूह से जुड़ीं. जीवन को दिशा मिली तो उन्होंने गांव-गांव में महिलाओं से संपर्क साधा और महिला समूह खड़े कर दिए. मेहंदवानी विकासखंड की 24 ग्राम पंचायतों और 41 गांवों को जोड़कर एक संघ बनाया और शुरू कर दिया विलुप्त हो रही कोदो-कुटकी की खेती का काम. उस वक़्त शायद रेखा इस बात से अनिभिज्ञ  थी कि वो एक राष्ट्रीय स्तर का कार्य करने जा रही है. कुछ ही वर्षों में उनके समूह ने कोदो कुटकी को राष्ट्रीय परिदृश्य पर ला कर खड़ा कर दिया. 2013 में रेखा को तेजस्विनी महिला स्वसहायता समूह का सचिव बना दिया गया. 2007 उनके पति देव सिंह मजदूर थे लेकिन अब वो कोदो कुटकी की खेती उन्नत तरीके से करते हैं. </p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">रविवार ब्यूरो </dc:creator><pubDate>Tue, 04 Apr 2023 16:09:18 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/photovideo/adivasi-woman-presened-on-kodo-kutki]]></guid><category><![CDATA[वीडियो]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/NxwcHolc3nIzYomOnK6G.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/NxwcHolc3nIzYomOnK6G.jpg"/></item><item><title><![CDATA[UN तक पहुंचाया कोदो कुटकी को ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/hum-bhi-hero/adivasi-women-presents-at-uno</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/FudyHynjUw11UeLXePfT.jpeg"><p>डिंडोरी की बैगा आदिवासी रेखा पेंड्राम की अपने गांव से न्यूयॉर्क तक की यात्रा नारी सशक्तिकरण की अनूठी कहानी है. जिले की आदिवासी महिलाओं को एक कर उन्हें स्वावलंबी बनाने में उनका बहुत बड़ा योगदान है. अमेरिका में 2017 में उन्होंने खाद सुरक्षा पर मध्य प्रदेश के प्रतिनिधि के रूप में एक प्रेसेंटेशन दिया था. भारी करतल ध्वनि के बीच, उन्होंने दुनिया को खाद्य सुरक्षा, महिलाओं के आर्थिक- सामाजिक उत्थान और उनके स्वास्थ्य सम्बंधित विषयों पर उनके स्वसहायता समूह के महासंघ द्वारा चलाये जा रहे कार्यों का विस्तार से विवरण दिया था. रेखा का प्रयास अब जिले की हर एक महिला को SHG आंदोलन से जोड़ना है.</p>
<p>"वह एक सपना जैसा था जब न्यूयॉर्क के कैनेडी हवाई अड्डे पर हमारा हवाई जहाज़ उतरा था ", रेखा बताती है. मुझे याद है, दुबली पतली आदिवासी महिला थोड़ा ठहर के कहती हैं, 2007 के पहले में घर से बाहर कम ही निकलती थी. दूसरों से बात करने में एक झिझक होती थी और सरकारी कर्मचारियों से बात करने में थोड़ा डर ही लगता था. लेकिन स्वसहायता समूह से जुड़ने के बाद सब बदल गया. " एकता में शायद ये ही शक्ति होती है". रेखा की अमेरिका अंतर्राष्ट्रीय कृषि विकास कोष द्वारा प्रायोजित थी. और रेखा का प्रेजेंटेशन संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) के हेड क्वार्टर में आयोजित था. प्रेजेंटेशन का शेड्यूल 5 मिनट का था. लेकिन वह चलता रहा, रेखा बोलती रही और दुनिया सुनती रही. "शायद लोग सुनना चाहते थे कि इतनी विपन्नता के बावजूद हम कैसे संघर्ष कर रहे हैं और न केवल खुश हैं बल्कि आर्थिक सामाजिक विकास भी कर रहे हैं", रेखा कहती है. उसके बाद रेखा ने कभी पलट के नहीं देखा.<br> <br>डिंडोरी जिले के मेहंदवानी के फलवाही गांव की रेखा 2007 में तेजस्विनी महिला स्वसहायता समूह से जुड़ीं. जीवन को दिशा मिली तो उन्होंने गांव-गांव में महिलाओं से संपर्क साधा और महिला समूह खड़े कर दिए. मेहंदवानी विकासखंड की 24 ग्राम पंचायतों और 41 गांवों को जोड़कर एक संघ बनाया और शुरू कर दिया विलुप्त हो रही कोदो-कुटकी की खेती का काम. उस वक़्त शायद रेखा इस बात से अनिभिज्ञ  थी कि वो एक राष्ट्रीय स्तर का कार्य करने जा रही है. कुछ ही वर्षों में उनके समूह ने कोदो कुटकी को राष्ट्रीय परिदृश्य पर ला कर खड़ा कर दिया. 2013 में रेखा को तेजस्विनी महिला स्वसहायता समूह का सचिव बना दिया गया. 2007 उनके पति देव सिंह मजदूर थे लेकिन अब वो कोदो कुटकी की खेती उन्नत तरीके से करते हैं. </p>
<p>स्वसहायता समूह से जुड़ने के 7 सात साल बाद ही 2014 में रेखा को सीताराम राव एशिया पेसीफिक लाइवलीहुड अवॉर्ड से सम्मानित किया गया. ये सम्मान भी रेखा को उनके द्वारा किये गए खाद्य सुरक्षा, महिलाओं के सामाजिक व आर्थिक उत्थान, स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों, महिलाओं व बच्चों के पोषण के क्षेत्र में सराहनीय योगदान का नतीजा था.</p>
<p>"आदिवासी व गरीब -पिछड़े इलाके में जन्म, उसके बाद शादी फिर बच्चे और इस दौरान किन-किन परेशानियों का मैंने सामना किया इसे भी दुनिया के सामने रखूंगी. लेकिन मैंने कभी हिम्मत नहीं हारी. मुझे जैसे ही समूह से मिलने का मौका मिला मानो जैसे शरीर में ऊर्जा का संचार  सा हो गया. पहले महिलाओं को एक करना और फिर मिलजुल विलुप्त हो रही खेती के प्रति लोगों को जागरूक किया. नतीजा आपके सामने है. </p>
<p><img src="https://d2vbj8g7upsspg.cloudfront.net/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/TmSGEXpRFramb3oidOVU.jpeg" alt="dindori kodo kutki"></p>
<p><em><span style="font-size: 8pt;">(Image Credits: Ravivar Vichar)</span></em></p>
<p>मध्य प्रदेश महिला वित्त निगम के महाप्रबंधक अरविन्द सिंह भाल जो न्यूयॉर्क में रेखा के साथ थे कहते हैं, " पेंड्राम यूं तो केवल 10वीं तक पढ़ी हैं. लेकिन उनकी वैचारिक शक्ति बहुत मजबूत है. वो अपने धुन की पक्की है और एक मजबूत इच्छा शक्ति वाली महिला है. उन्होंने तेजस्विनी के साथ जुड़कर हजारों महिलाओं की आर्थिक स्थिति को सुधारा". रेखा के साथ उस वक़्त मध्य प्रदेश की महिला एवं विकास मंत्री, और विभाग की प्रमुख सचिव भी अमेरिका गयी थी. लेकिन दुनिया की नज़रों में  रेखा ही थी.</p>
<p>समूह से जुड़ने के कुछ वर्षों बाद रेखा फलवाही गांव से मेहंदवानी ब्लॉक शिफ्ट हो गयी जहां उनके संघ का दफ्तर है. रेखा संघ की सचिव हैं और उनकी देख रेख में  275 SHG  की लगभग  4000 महिलाएं काम करती हैं. रेखा का दिन सुबह 8. 30 पर शुरू हो जाता है जब वो अपने दफ्तर पहुंच जाती हैं. "उसके बाद दिन कब खत्म हो गया पता ही नहीं चलता", वो बताती हैं, "दिन भर लोगों से मिलना, समूह और महासंघ के कामो की मॉनिटरिंग दिन भर चलती रहती है. </p>
<p>" ये एक बिज़नेस हेड के काम सामान है. कोदो कुटकी के भाव पर नज़र रखनी पड़ती है. जब भाव तेज हुआ तो तुरंत माल निकालना पड़ता है. फिर कूकीज और नमकीन की सप्लाई पर ध्यान भी देना पड़ता है," अपने पल्लू से चेहरे का पसीना पोंछती हुई रेखा बताती हैं. </p>
<p>रेखा कहती हैं, स्वसहायता समूह के आंदोलन ने आदिवासी समाज के एक बड़े तबके की, जिसमे वो खुद भी शामिल हैं, ज़िंदगी बदल दी. " गरीब हम तब भी थे, गरीब हम अब भी हैं लेकिन उस और इस गरीबी में जमीन आसमान का अंतर है. अब हम मन और विचारों से गरीब नहीं हैं. अगर परेशानी है तो उसका रास्ता निकालना हमे आ गया है," और ऐसा कहते हुए रेखा के चेहरे पर एकआत्मविश्वास भरी मुस्कान थी.</p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">देशदीप सक्सेना </dc:creator><pubDate>Fri, 10 Mar 2023 18:28:27 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/hum-bhi-hero/adivasi-women-presents-at-uno]]></guid><category><![CDATA[हम में है हीरो]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/FudyHynjUw11UeLXePfT.jpeg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/FudyHynjUw11UeLXePfT.jpeg"/></item><item><title><![CDATA[डिंडोरी के समूहों ने कोदो कुटकी को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर पहुंचाया ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/khabar/dindori-shg-cultivating-kodo-kutki</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/D0iEgBNakeRSFdSqXeli.jpeg"><p dir="ltr">ये उच्च पोषक तत्वों का खजाना हैं.पिछले कई दशकों से ये मध्य प्रदेश के आदिवासी जिले डिंडोरी के पथरीले बंजर दिखने वाले भू-भाग में छिपा था.आदिवासी खुद इसका आधा-अधूरा उपयोग कर पाते थे. हम बात कर रहे हैं कोदो और कुटकी जैसे कल तक तुच्छ समझे जाने वाले अनाजों की.ये पोषण तत्वों से भरपूर है, उच्च स्तर प्रोटीन, फाइबर तरह-तरह के मिनरल्स और एंटी ऑक्सीडेंट पाए जाते हैं. पिछले एक दशक में यहां के गोंड और बैगा आदिवासियों  ने कल तक उपेक्षित इन अनाजों की खेती को एक तरह से पुनर्जीवित कर दिया है.    </p>
<p dir="ltr">डिंडोरी जिले के 41 गांवों की बैगा और गोंड महिलाओं  के स्वसहायता समूहों ने तेजस्विनी कार्यक्रम के जरिए कोदो-कुटकी की खेती शुरू की. वर्ष 2012 में 1,497 महिलाओं ने प्रायोगिक तौर पर 748 एकड़ जमीन पर कोदो-कुटकी की खेती की शुरुआत की थी. समूहों की महिलाओं ने राज्य की मदद से आधुनिक तरीके से खेती करना शुरू की. इससे 2,245 क्विंटल उत्पादन हुआ. इससे प्रेरणा लेकर 2013-14 में 7,500 महिलाओं ने 3,750 एकड़ में कोदो-कुटकी की खेती की और15 हजार क्विंटल कोदो-कुटकी का उत्पादन हुआ. कोदो-कुटकी के बढ़ते उत्पादन को देखते हुए नैनपुर में एक प्रसंस्करण यूनिट ने भी काम करना शुरू कर दिया है. बैगा महिलाओं के फेडरेशन द्वारा संचालित इस कोदो-कुटकी कार्यक्रम को वर्ष 2014 में देश का प्रतिष्ठित राष्ट्रीय सीताराम राव लाइवलीहुड अवार्ड से भी नवाजा गया.</p>
<p><img src="https://d2vbj8g7upsspg.cloudfront.net/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/vnEBDqFJ1N8pxGASQ0u0.jpeg" alt="kodo kutki"></p>
<p><em>SHG महिलाएं अपनी फ़सल के साथ (Image Credits: Ravivar vichar)</em></p>
<p> </p>
<p dir="ltr">हालांकि की शुरुआत में काफी दिक्क्तें आई क्योंकि ये वह वक़्त था जब आदिवासियों को कोदो-कुटकी उगाने में रूचि नहीं रह गयी थी. बाजार में ये बहुत कम दाम में बिकता था.किसानों को  कोदो कुटकी की वैज्ञानिक तरीके से   खेती करनी नहीं आती थी और पारम्परिक तरीके से खेत जोतने में  उत्पादन काफी काम था.समाज में भी लोगों  को इस अनाज की न्यूट्रीएंस का वैल्यू जरा भी अंदाज़ नहीं था. और इन्ही कारणों  का नतीजा था कि किसान धान की खेती की तरफ मुंह मोड़ने लगे थे. लेकिन स्वसहायता समूह  और इन समूह की फेडरेशन के कारण सब कुछ बदल गया आज  डिंडोरी जिले के 528 गांव  के 58 हज़ार से ज्यादा आदिवासी मिल कर 39000 हेक्टेयर भूमि पर  35000 मीट्रिक टन से ज्यादा कोदो-कुटकी का उत्पादन कर रहे हैं. </p>
<p dir="ltr">कोदो मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय अफ्रीका में उगाया जाने वाला अनाज है.एक अनुमान के मुताबिक 3,000 साल पहले इसे भारत लाया गया    और  इसलिए ही कोदो  को भारत का एक प्राचीन और ऋषि अन्न माना जाता था. कोदो-कुटकी मधुमेह नियंत्रण, गुर्दो और मूत्राशय के लिए लाभकारी  भी माना जाता है. यह रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक के प्रभावों से भी मुक्त है. कोदो-कुटकी हाई ब्लड प्रेशर के रोगियों के लिए रामबाण बताया जाता है.  इसमें चावल के मुकाबले कैल्शियम भी 12 गुना अधिक होता है. शरीर में आयरन की कमी को भी यह पूरा करता है. इसके उपयोग से कई पौष्टिक तत्वों की पूर्ति होती है.</p>
<p dir="ltr">वर्ष 2009 में जर्नल ऑफ एथनोफार्माकोलोजी में प्रकाशित एक शोध कोदो को मधुमेह के रोगियों के लिए स्वास्थ्यकर पाता है.  वहीँ वर्ष 2014 में प्रकाशित पुस्तक हीलिंग ट्रडिशंस ऑफ द नॉर्थवेस्टर्न हिमालयाज के अनुसार कोदो बुरे कोलेस्ट्रोल घटाने में भी मददगार साबित होता है.</p>
<p dir="ltr">अब और क्या चाहिए. देखते ही  देखते इसकी ख्याति भारत की मेट्रो सिटीज और अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों में फ़ैल गयी.आदिवासियों को अपने उत्पादन का अच्छे दाम मिलने लगे.  </p>
<p> </p>
<p><img style="width: 464px; height: 348px;" src="https://d2vbj8g7upsspg.cloudfront.net/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/0lfY6m8AuJVIRasec5fv.jpeg" alt="kodo"></p>
<p><em>कोदो (Image Credits: Ravivar vichar)</em></p>
<p> <img src="https://d2vbj8g7upsspg.cloudfront.net/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/NGoFFPsWOtIAhepik28h.jpeg" alt="kodo kutki"></p>
<p><em>कुटकी (Image Credits: Ravivar vichar)</em></p>
<p dir="ltr">चंदा महिला स्वसहायता समूह की अंजना मरावी बताती हैं कि- " जितने भी परिवार इसकी खेती कर रहे हैं वह अपना उत्पादन घर पर ही  स्टोर करते हैं. फिर समूहों  के फेडरेशन की मदद  से इससे बाजार में बेच दिया जाता है.हम बाजार में अच्छे रेट का इंतज़ार करते हैं जो समूह   बनने क पहले संभव नहीं था". </p>
<p dir="ltr">समूह की महिलाएं अपने उत्पादन का कुछ अंश साल भर अपने इस्तेमाल के लिए भी रख लेती हैं. ज्यादातर आदिवासी परिवारों क पास  पांच   एकड़ या उससे कम जमीन ही है.</p>
<p dir="ltr">समूह की अन्य  महिला कार्यकर्ता फूलवती बताती हैं, " कोदो  थोड़ा बड़ा होता है और  उसका रंग भूरा  होता है वहीं कुटकी छोटा और काले रंग का होता है.पहले हमें इसका रेट 7-8 रूपए प्रति किलो मिलता था और इसलिए किसान इसका उत्पादन खत्म करते जा रहे थे."</p>
<p dir="ltr">"लेकिन स्वसहायता समूह बनने के बाद जैसे चमत्कार हो गया.अब कोदो की कीमत 30 -35 रूपए प्रति किलो कुटकी 40 -45  प्रति किलो  के  दाम मिल जाते हैं."</p>
<p dir="ltr">कोदो-कुटकी के उत्पादन के बाद आदिवासी  परिवार आर्थिक रूप से मजबूत भी हुए हैं. " एक समय था जब हम स्थानीय सूदखोरों के चंगुल में फंसे रहते थे. कई लोग अपने गहने भी  सूदखोरों के चक्कर में गंवा देते थे. लेकिन यहां अब कोई उधार नहीं लेता. कोदो-कुटकी से हमारी  आय में खासी वृद्धि हो गयी है", समलिया,गोंड आदिवासी  महिला ,रानी दुर्गावती स्वसहायता समूह की सुनीता और बजरंग महिला समूह की तेजस्वनी कहती है," डिंडोरी की कोदो-कुटकी देश भर में हमारी दीदियों  स्वसहायता समूहों  की पहचान बन चुकी है. हमें गर्व है की हम लोग     देश में  पोषक आहार सप्लाई कर देश निर्माण का काम कर रहे हैं."</p>
<p><img src="https://d2vbj8g7upsspg.cloudfront.net/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/vQYzTwiTsa1o3GDCzu7i.jpeg" alt="kodo"></p>
<p><em>कोदो कुटकी की प्रोसेसिंग यूनिट (Image Credits: Ravivar vichar)</em></p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">देशदीप सक्सेना </dc:creator><pubDate>Sat, 25 Feb 2023 15:42:25 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/khabar/dindori-shg-cultivating-kodo-kutki]]></guid><category><![CDATA[ख़बर]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/D0iEgBNakeRSFdSqXeli.jpeg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/D0iEgBNakeRSFdSqXeli.jpeg"/></item></channel></rss>