<rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" xmlns:dcterms="http://purl.org/dc/terms/" xmlns:geo="http://www.w3.org/2003/01/geo/wgs84_pos#" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/" xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/" xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/" version="2.0"><channel xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/"><title><![CDATA[ कश्मीर]]></title><link>https://ravivarvichar.in/tags/kshmiir</link><description/><atom:link href="https://ravivarvichar.in/rss/tags/kshmiir" rel="self"/><language>en-us</language><lastBuildDate>Thu, 17 Aug 2023 15:20:27 +0530</lastBuildDate><item><title><![CDATA[फलों की मिठास लोगों तक पहुंचाकर फातिमा बनी लखपति ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/kahaniyan/fatima-from-kargil-started-her-business-with-the-help-of-shgs</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/q7A11Q4MqK6RoExXNcZL.jpg"><p dir="ltr"><span>सेल्फ हेल्प ग्रुप्स से जुड़ी महिलाएं आत्मनिर्भरता की नई उचाईयों को छू कर, समाज में खुद की पहचान बना कर अपनी अलग छवि को दर्शा रहीं है.<strong> <a href="SHG Women">SHG Women</a> </strong>साहस, संघर्ष और समर्पण से भरी है. ऐसी ही कहानी है स्वयं सहायता समूह से जुड़ी <strong>लद्दाख (<a href="https://ravivarvichar.in/khabar/women-self-help-group-of-ladakh-to-be-trained-as-entrepreneurs">Ladakh</a>) कारगिल (Kargil)</strong> जिले के <strong>लाटू गांव (Latoo Village)</strong> में रहने वाली <strong>फातिमा बानू (<a href="https://ravivarvichar.in/photovideo/shg-women-to-get-benefit-from-lakhpati-didi-yojana-2023">Fatima Banu</a>)</strong> की. उन्हें&nbsp; उनके सफल उद्यम के लिए<strong> "लखपति दीदी" (<a href="https://ravivarvichar.in/khabar/shg-women-will-make-and-operate-drone">Lakhpati didi</a>)</strong> के ख़िताब से नवाजा गया.&nbsp;</span></p>
<h2 dir="ltr"><span>&nbsp;समूह से जुड़कर शुरू किया व्यवसाय</span></h2>
<p dir="ltr"><span>समूह में जुड़ने से पहले फातिमा और अन्य महिलाओं पशु पालन और खुद के इस्तेमाल के लिए सब्जियां उगाना जैसे काम कर रहीं थी, पर इससे उन्हें कोई आर्थिक लाभ नहीं हो रहा था. वह अपनी आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए वह अपने परिवार पर निर्भर थी. इसी निर्भता को दूर करने के लिए समूह की महिलाओं ने <strong>self help group</strong> बनाया. पहले हर महीने सौ रूपए जमा करना शुरू किया. कुछ समय बाद <strong>राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन</strong> <strong>(National Rural Livelihood Mission, NRLM)</strong> से उन्हें पंद्रह हज़ार रूपए का <strong>CLF लोन</strong> मिला. लोन की मदद से समूह की महिलाओं ने मुर्गे पालन का व्यवसाय शरू किया. मुर्गे पालन में आ रहीं दिकत्तों के कारण, उन्होंने व्यवसाय को कृषि में बदल दिया. समूह को दो भागों में बांटा गया, कुछ महिलाएं कृषि गतिविधियां संभालने लगी और कुछ दुकान चलाने लगी.&nbsp;&nbsp;</span></p>
<p dir="ltr"><span>फमिता रोज सुबह जल्दी उठकर घर के काम और खेतों से उपज इकठ्ठा कर, 8 बजे तक शहर पहुंच जाती और शाम 6 बजे तक उन्हें बेचतीं थी. फातिमा को कृषि कार्य करने से उन्हें आर्थिक स्वतंत्रता मिली, और यह सब मुमकिन हुआ उनके लगातार प्रयास करने के कारण. अब वह अपनी जरूरतों पर खर्च खुद करती है. फातिमा को परिवार का साथ मिला जिससे वह बिना पीछे मुड़े अपने लक्ष्य को पाने के लिए आगे बढ़ती गई.&nbsp;</span></p>
<h3 dir="ltr"><span>शुरू की अंजीर और चिनार की खेती&nbsp;</span></h3>
<p dir="ltr"><span>फातिमा कृषि खेती के साथ-साथ गार्डन का काम भी देख रहीं है. उन्होंने कारगिल में प्राकृतिक रूप से न उगने वाले फलों को भी लगा रहीं, जो म<strong>ध्य प्रदेश (<a href="https://ravivarvichar.in/khabar/women-self-help-group-of-ladakh-to-be-trained-as-entrepreneurs">Madhya Pradesh</a>) के ग्वालियर (Gwalior) और कश्मीर (Kashmir)</strong> से लेकर आई है. जिसमें <strong>फूल, अंजीर (Fig) के पौधे, चिनार (Poplar)</strong> के पेड़ शामिल है. उन्हें लद्दाख के मौसमी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा, पर उन्होंने हार नहीं मानी. लद्दाख में पानी की कमी के कारण फलों की खेती करना चुनौती का काम है, फातिमा नदी से पानी का टैंक भरकर खेतों में हाथ से लेकर जाती थी. जल की कमी और सूखे के समय, कम पानी की आवश्यकता वाले फलों की खेती करती थी.&nbsp;</span></p>
<p dir="ltr"><span>फातिमा के अलावा भी कुछ महिलाएं खुबानी बेचकर या तो सीमेंट की दुकान चलाकर "लखपति दीदी " बन चुकी है. कार्गिल ब्लॉक में कुल 68 सेल्फ हेल्प ग्रुप कम कर रहे है. कार्गिल के पांच ब्लॉक में 443 पंजीकृत SHG है , जो अलग-अलग व्यापर जैसे <strong>सेब उत्पादन, खुबानी संसाधन, बेकरी उत्पाद, रेशम बनान, अचार बनाना, सेनेटरी पैड उत्पादन </strong>जैसे कार्यो में लगकर अपनी एक अलग पहचान बना रहीं है.&nbsp;&nbsp;</span></p>
<h3 dir="ltr"><span>समूह से मिल रहा फंड</span></h3>
<p dir="ltr"><span><strong>खारिजी ग्रामीण आजीविका मिशन (Khariji Rural Livelihood Mission) SHGs</strong> को&nbsp; वित्तीय सहायता देता है. मिशन द्वारा उन्हें रेकरिंग फंड के तौर पर चालिश हज़ार रूपए और 1,40,000 रूपए का सामुदायिक निवेश फंड मिलता है. कुछ Self Help Groups अपनी व्यावसायिक जरूरतों को पूरा करने के लिए हर महीने 100 रूपए जमा करते है.&nbsp;</span></p>
<p dir="ltr"><span><strong>लद्दाख ग्रामीण आजीविका मिशन (Ladakh Rural Livelihood Mission, LRLM )</strong> ने महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाने, आत्मविश्वास बढ़ाने और कम्युनिकेशन स्किल को बढ़ाने के निरंतर प्रयास कर रही है. सेल्फ हेल्प ग्रुप्स की क्षमता को बढ़ाने के लिए लद्दाख ग्रामीण आजीविका मिशन ने गांव में मोबलाइजर्स भी बनाया, जो समूह के लोगों को सही समय पर सलाह और सहायता देंगे और साथ ही कैसे समूह को बनाना और कोर्डिनेट करना है इसकी जानकारी भी देंगे. समूह से जुडी महिलाओं को ट्रेनिंग भी दी जाती है.</span></p>
<h3 dir="ltr"><span>लेटेस्ट टेक्नोलॉजीज का उपयोग </span></h3>
<p dir="ltr"><span>SHG वीमेन अलग-अलग उत्पाद बनाकर, अपने जीवन में बदलाव ला रही है. ACD के उभरते बाजार के बाहर इन उत्पादों की पैकेजिंग, लेबलिंग, ब्रांडिंग को और बेहतर बनाने की आवश्यकता है. स्थानीय स्तर पर स्वयं सहायता समूहों (Swayam Sahayata Samuh) की महिलाएं अलग कच्चे माल और उत्पादों के साथ काम करती है, जैसे अ<strong>मलताश, मशरुम (Mushroom), रेशमी सामग्री,</strong> इन्ही उत्पादों की मांग राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर है, पर अच्छी पैकेजिंग और विपणन में कमी होने के कारण, इन उत्पादों को अड़चनों का सामान करना पड़ता है. साथ ही मशीनरी की कमी के कारण भी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. SHGs को <strong>उत्पादन प्रक्रिया को मॉडर्नाइज करने और लेटेस्ट टेक्नोलॉजीज </strong>का उपयोग करने के लिए और फाइनेंसियल सहायता की जरुरत है.&nbsp;</span></p>
<p dir="ltr"><span>फातिमा और कारगिल के सफल SHGs की महिलाओं की कहानी हमारे लिए उदाहरण है, जो महिलाओं को स्वावलंबी बनाने, आर्थिक सहायता देने और सामाजिक स्थिति को सुधारने में उद्यमिता की महत्वपूर्ण भूमिका रही है.&nbsp; ये सफलता की कहानियां महिलाओं की शक्ति और संघर्ष को दर्शाती है. SHG महिलाओं के सामूहिक विकास और उद्यमिता की प्रेरणा देते है. समूह की महिलाएं सामूहिक नेतृत्व, वित्तीय योग्यता, बाजार ज्ञान और पेशेवर नेटवर्किंग के जरिए आपस में सहयोग कर, प्रगति की ओर बढ़ रहीं है.&nbsp;</span><b id="docs-internal-guid-b22e13cb-7fff-60b5-e45c-6cae3cca7063"></b></p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">हेमा वाजपेयी</dc:creator><pubDate>Thu, 17 Aug 2023 15:20:27 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/kahaniyan/fatima-from-kargil-started-her-business-with-the-help-of-shgs]]></guid><category><![CDATA[कहानियां]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/q7A11Q4MqK6RoExXNcZL.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/q7A11Q4MqK6RoExXNcZL.jpg"/></item><item><title><![CDATA[आरिफ़ा जान दे रही नमदा गलीचों को पहचान ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/photovideo/arifa-from-kashmir-revives-namda-rugs</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/j12pm5c6YLOJP5E67R1R.jpg"><p><iframe width="781" height="438" src="https://www.youtube.com/embed/BpkwCtzV2wQ" allowfullscreen="allowfullscreen"></iframe></p>
<p><span>आरिफ़ा जान भी ऐसा ही एक नाम है.आरिफ़ा कश्मीर में रहती है. कश्मीर के मशहूर नमदा गलीचे बनाने की पारंपरिक कला को वे पुनर्जीवित कर रही है.आरिफ़ा जान कॉमर्स ग्रेजुएट है। उन्होंने जॉब करने की जगह, कश्मीरी हस्तशिल्प, ख़ासकर नमदा गलीचा बनाने की कला को संरक्षित करने और बढ़ावा देने के अपने जुनून को आगे बढ़ाने का फैसला किया.</span></p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">रविवार ब्यूरो </dc:creator><pubDate>Sat, 01 Jul 2023 13:05:12 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/photovideo/arifa-from-kashmir-revives-namda-rugs]]></guid><category><![CDATA[वीडियो]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/j12pm5c6YLOJP5E67R1R.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/j12pm5c6YLOJP5E67R1R.jpg"/></item><item><title><![CDATA[G20 डेलीगेट्स को भाये SHG के अनोखे प्रोडक्ट्स ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/khabar/women-entrepreneurs-impressed-the-g20-delegates-with-their-crafts-on-the-first-day-of-the-summit</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/lsgQ5vGMozePAlYpkS7i.jpg"><p><strong>श्रीनगर</strong> (Srinagar) में हुई <strong>G20 समिट</strong> (G20 Summit) ने पहले ही दिन<strong> डेलीगेट्स </strong>(delegates) को इम्प्रेस कर दिया. कहते है न कला से बेहतर कोई भाषा नहीं. तो बस, <strong>जम्मू और कश्मीर ग्रामीण आजीविका मिशन </strong>(JKRLM) से जुड़ी <strong>महिला उद्यमियों</strong> की कला से भरपूर <strong>हस्तशिल्प</strong>, <strong>बागवानी</strong> और <strong>कृषि उत्पादों के स्टॉलों </strong>ने खूब वाहवाही बटोरी. जेकेआरएलएम महिलाओं के रोजगार और उनकी लीडरशिप को बढ़ावा देता है. महिलाओं ने स्टॉल में क्रिकेट के बल्ले, हस्तशिल्प, शंख टोकरियां, सेब और कृषि उपज जैसे केसर और लैवेंडर के नमूने प्रदर्शित किए. कश्मीरी महिलाओं के <strong>स्वयं सहायता समूहों</strong> (Self Help Groups-SHG) की कलाकारी की खूब सराहना हुई. </p>
<p>विभाग ने महिलाओं की <strong>कला को प्रदर्शित</strong> कर उन्हें संबंधित क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाने और <strong>उपलब्धियां हासिल</strong> करने के लिए <strong>प्रोत्साहित किया</strong> है. महिलाओं द्वारा बनाये हर आर्ट के पीछे एक कहानी, एक प्रेरणा छुपी है. हाथ से बुने हुए नाज़ुक सींक टोकरियों से लेकर कांगड़ी तक, हर प्रोडक्ट देश की <strong>समृद्ध सांस्कृतिक विरासत</strong> को दर्शाती है.</p>
<p>जेकेआरएलएम से जुड़कर छह लाख से ज़्यादा ग्रामीण महिलाएं जम्मू-कश्मीर में सफलतापूर्वक अपना व्यवसाय चला रही हैं. जम्मू और कश्मीर में कम से कम <strong>79 हज़ार स्वयं सहायता समूह</strong> काम कर रहे हैं, जो महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनने के लिए मार्गदर्शन देते है और ज़रूरी सहायता करते हैं.<strong> 6.36 लाख</strong> महिलाओं में से कम से कम 50,000 करोड़पति बन चुकी हैं. </p>
<p>तीन दिवसीय <strong>G20 टूरिज्म वर्किंग ग्रुप </strong>(G20 Tourism Working Group) की बैठक<strong> शेर-ए-कश्मीर इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस सेंटर</strong> (SKICC) में शुरू हुई. वर्किंग ग्रुप की पहली बैठक फरवरी में गुजरात के कच्छ के रण में हुई थी. दूसरी बैठक सिलीगुड़ी, पश्चिम बंगाल में हुई.</p>
<p>G20 में अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, कनाडा, चीन, फ्रांस, जर्मनी, भारत, इंडोनेशिया, इटली, जापान, कोरिया गणराज्य, मैक्सिको, रूस, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका, तुर्की, यूनाइटेड किंगडम, और संयुक्त राज्य अमेरिका शामिल हैं. </p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">रविवार ब्यूरो </dc:creator><pubDate>Tue, 23 May 2023 16:23:49 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/khabar/women-entrepreneurs-impressed-the-g20-delegates-with-their-crafts-on-the-first-day-of-the-summit]]></guid><category><![CDATA[ख़बर]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/lsgQ5vGMozePAlYpkS7i.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/lsgQ5vGMozePAlYpkS7i.jpg"/></item><item><title><![CDATA[कशीदाकारी से अपनी कहानियां बुनती गुमनाम महिलाएं ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/nazariya/women-embroidered-their-sufferings-in-punjab-kashmir-kutch-gujarat-and-other-places</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/2yxDP67FeXyAL0A2jQmg.jpg"><p>कला हमेशा से ही अपनी छुपी-दबी भावनाओं को साझा करने का एक ख़ूबसूरत ज़रिया रहा है. कला के कई रंग,रूप, और आकार हैं. इसका एक ख़ूबसूरत रूप कशीदाकारी है. कशीदाकारी से सिर्फ फूलों पत्तियों को ही नहीं, पर अपने अनुभवों, भावों, और विचारों को भी सुंदर आकार और रंग दिये जाते हैं. पूरे भारत में कई महिलाओं ने ऐतिहासिक सुईवर्क के ज़रिये अपनी स्वतंत्रता, पहचान और प्रतिरोध को दर्शाया है. पहले के समय में लैंगिक भूमिकाओं और सामाजिक अपेक्षाओं ने कढ़ाई को सिर्फ स्त्रीत्व के रूप में देखा.</p>
<p>इतिहास बताता है कि महिलाओं ने इस सुई धागे से जुड़ी लैंगिक भूमिकाओं को त्याग, इसे क़लम की तरह इस्तेमाल किया और अपनी कहानी बुनदी. पंजाब की फुलकारी एम्ब्रॉइडरी से बनी लताओं और शानदार रंगों के चमकीले पैटर्न उल्लास की भावना को दर्शाते थे. लेकिन,1947 के विभाजन ने इसके पैटर्न को धुंदला और रंगों के फीका कर दिया. बड़ी सहजता से अशांति, विस्थापन और हिंसा से पनपी व्यथा को कशीदाकारी के ज़रिये कपड़े पर उकेरा गया. फूलों और ज्योमेट्रिकल पैटर्न से ऊपर उठकर, कढ़ाई महिलाओं के लिए चुप रहकर अपनी कहानी सुनाने का एक रंगबिरंगा ज़रिया बन गई. उन्होंने अपने जीवन के क्षणों,अनुभवों, विचारों और विश्वासों को सुई धागे कि ज़रिये एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाया. महिलाओं की इस कला के पीछे एक छिपी हुई अनूठी कहानी थी जो उसकी भावनाओं के साथ-साथ उसकी यादों का भी चित्रण थीं. </p>
<p>पंजाब की महिलाओं ने अपने विभाजन के दर्द को दूर करने के लिए कढ़ाई का सहारा लिया. उनकी टेपेस्ट्री कलाकृतियों ने क्रोध के दृश्यों, शरणार्थियों से भरी ट्रेनों, जबरन पलायन, पीछे छूटे घरों और पुरानी यादों का दस्तावेजीकरण किया. परिवार बिखर गए, महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार हुआ, उनका अपहरण कर लिया गया, और ग़रीबी ज़िंदगी छीन रही थी- ये कहानियां उन्होंने कपड़े पर बुनी. पितृसत्ता में गड़ी बाल विवाह, पर्दा प्रथा और दहेज़ की पीड़ा भी बांटी. ये वो कहानियां थी जो वे सुना नहीं सकती थी, शायद उनका सुनने वाला भी कोई न था. </p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/lG4bPG1xppYAnh0TAAFM.jpg" alt="embroidery and politics"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: Tribune India</em></span></p>
<p>कश्मीर घाटी लंबे समय से हिंसा और विरोध से जूझ रही है. राजनीतिक संघर्ष, इंटरनेट बैन और कर्फ्यू के दौरान, कशीदा ने महिलाओं को अपनी व्यथा बांटने और मुश्किल समय का मुकाबला करने का होंसला दिया. सदियों से चली आ रही यह पारंपरिक कश्मीरी कशीदाकारी धरती की जन्नत कहे जाने वाले कश्मीर की ख़ूबसूरती को दर्शाती है. इसे ज़्यादातर पुरुषों द्वारा किया जाता था. लेकिन वहां चल रहे टकराव और रोज़गार की खोज में महिलाओं ने पुरुष-प्रधान नौकरियों में अपनी पकड़ बनाई. कशीदा को कश्मीरी महिलाओं ने अभिव्यक्ति और सशक्तिकरण का साधन बनाया. </p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/cBOLVlsOJSpukDREAq62.jpg" alt="embroidery and politics"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: <span class="cS4Vcb-pGL6qe-lfQAOe">Daily Sabah</span></em></span></p>
<p>ब्रिटिश राज में, सरकार ने भारतीय टेक्सटाइल पर कई तरह की पाबंदियां लगाईं, और कशीदकारों की वस्तुओं पर टैक्स लगाया, जो टेक्सटाइल इंडस्ट्री के लिए ख़ासकर बंगाल के लिए एक कठिन लड़ाई साबित हुई. गरीबी और भुखमरी से बचने के लिए बंगाल के लोगों ने कांथा कढ़ाई का सहारा लिया हुआ था जिसपर लगी बंदिशों ने मुसीबत और बढ़ादी. स्वदेशी आंदोलन के दौरान, कांथा कढ़ाई ब्रिटिश  शासन के ख़िलाफ़ विरोध का प्रतीक बनी.  ब्रिटिश वस्तुओं का बहिष्कार कर भारतीय उत्पादों को बढ़ावा देने और लोगों को आत्मनिर्भर बनने में कांथा कढ़ाई ने सहायता की. विभाजन ने लोगों को पड़ोसी देशों में पलायन करने पर मजबूर कर दिया, जिसके साथ कांथा की संस्कृति दम तोड़ने लगी. एक प्रमुख बंगाली कशीदाकार प्रतिमा देवी ने ग्रामीण महिलाओं को कांथा की कला सिखाकर उन्हें सशक्त बनाया, और साथ ही, वर्षों पुरानी संस्कृति को फिर से जीवित किया. </p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/aribsMSX1ct5NZmfP9F8.jpg" alt="kantha and politics"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: Pinterest</em></span></p>
<p>गुजरात 2002 के दंगों के दौरान, कच्छ में पीड़ित महिलाओं ने अपने दर्द को कलात्मकता में ढाला. घरों और रोज़गारों का बिखर जाना, अपनों की मृत्यु और विस्थापन के दृश्य, सब कुछ कपड़े, फ्रेम और धागों में सिमट गया. </p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/PKHtdr7zYdGO4wqBFOFZ.jpg" alt="embroidery and politics"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: Your Libaas</em></span></p>
<p>ये कहानी सुनाती महिलाएं तो कहीं खो गई, पर उनकी कला अमर है. इंटरनेट पर इनकी कला की तस्वीरें मिल जाएंगी, पर इनके कलाकारों का कुछ पता नहीं. भारत में ऐसे कई कलाकारों को वो पहचान नहीं मिल पाती जिनकी वो हक़दार हैं, सिर्फ इसीलिए क्योकि ये कलाकार चूड़ियां पहनती हैं. आपके घरों में भी दादी-नानी ने कशीदाकारी कर आपके लिए कुछ ख़ास बनाया होगा, माँ ने कभी तोहफ़े में एम्ब्रॉयडरी कर कुछ दिया होगा. इस तरह वो शायद सिर्फ डिज़ाइन नहीं बनतीं, पर सुई धागे से प्रेम बुनती हैं. अगली बार कशीदाकारी की तारीफ करें, तो भूले न कि ये महज़ धागा, रंग, और डिज़ाइन नहीं, एक कशीदाकार की कहानी है.   </p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मिस्बाह</dc:creator><pubDate>Sun, 14 May 2023 11:20:37 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/nazariya/women-embroidered-their-sufferings-in-punjab-kashmir-kutch-gujarat-and-other-places]]></guid><category><![CDATA[नज़रिया]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/2yxDP67FeXyAL0A2jQmg.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/2yxDP67FeXyAL0A2jQmg.jpg"/></item><item><title><![CDATA[स्पेशल हैंड्स ऑफ़ कश्मीर दे रहे है सोज़नी कढ़ाई को ख़ूबसूरती ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/kahaniyan/special-hands-of-kashmir-keeping-sozni-kadhaai-alive</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/lb6u2W6yn5PeLCkggvVr.jpg"><p dir="ltr">'कला व्यक्ति के दिल ओ दिमाग से निकलकर हाथों के ज़रिये दुनिया के सामने आती है. दिल से निकली हुई हर बात कला का रूप ले लेती है. चाहे वो व्यक्ति आम हो या ख़ास. कला और कारीगरी ऐसा वरदान है जो किसी भी व्यक्ति में कोई अंतर नहीं करता. हर कलाकार एक अलग और अनोखी कला का मालिक होता है. शायरी हो, शिल्पकारी हो, कढ़ाई बुनाई हो, या फिर कुछ और. जब भी ऐसी किसी अनोखी कला आँखों के सामने से गुज़रती है तो सोचने में आता है की, जिसने भी इसे बनाया है कितना दिल से बनाया है और अगर उस कलाकार से मिलने का मौका मिल जाए तो बात ही कुछ अलग हो. वैसे तो हर कलाकार विशेष होता है लेकिन उन विशेष में भी अगर विशेष रूप से सक्षम कलाकार मिल जाए तो कहना ही क्या.</p>
<p dir="ltr"><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/DReDrwoM5q5u4T8rsCfk.jpg" alt="kashmir"></p>
<p dir="ltr"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits:  Kashmir Observer</em></span></p>
<p dir="ltr">कश्मीर की पारंपरिक कला सोज़नी (सुई) कढ़ाई के काम को भी कुछ ऐसी ही हाथों ने सहेज के रखा है. तारिक अहमद मीर, कश्मीर के एक व्यक्ति जिन्होंने अपने हालत और शारीरिक स्थिति को मजबूरी नहीं बल्कि हथियार बनाया. हर परेशानी का सामना करके अपने जैसे और भी लोगो को साथ जोड़कर, सोज़नी की पारम्परिक कला को कश्मीर के दिलों में ज़िंदा रखा है. तारिक अहमद मीर जन्म से ही मस्कुलर डिस्ट्रॉफी से पीड़ित है, यह एक दुर्लभ न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर है. लेकिन हिम्मत हौसला और जज़्बा ऐसा की उन्हें यह  बिमारी भी किसी भी काम को करने से रोक नहीं पायी.  </p>
<p dir="ltr">मीर बताते है कि, इनका भाई भी इसी बिमारी का शिकार है और जरा भी चल नहीं सकता. लेकिन तारिक अपनी इच्छाशक्ति के दम पर थोड़ा चल लेते है. इतना सब होने के बावजूद, आज तारिक एक मिसाल है. जब मीर ने शिक्षक के पद के लिए इंटरव्यू देना चाहा तो उन्हें ये बोल के मना कर दिया गया कि, 'विकलांग लोगों के लिए कोई पद नहीं है.'</p>
<p dir="ltr">ज़ाहिर सी बात है, उन्हें बुरा लगा, कुछ करने की ठानी और समाज को जवाब देने की भी. मीर ने अपने जैसे 60 विशेष रूप से सक्षम कारीगरों को साथ लेकर एक स्वयं सहायता समूह तैयार किया. हमारे देश में ज़्यादातर स्वयं सहायता समूह महिलाओं ने बनाए है. लेकिन ये समूह उन कुछ चुनिंदा समूहों में से एक जो पुरुष चला रहे है. स्पेशल हैंड्स ऑफ़ कश्मीर SHG के ज़रिये न सिर्फ तारिक अपने पैरों पर खड़े है बल्कि एक ऐसी शिल्प कला को बचा रहे है जो एक वक़्त में खात्मे के कगार पर थी . महज़ 5000 रुपयों से शुरू हुआ यह समूह अब लगभग 500 कारीगरों कि ताकत बन चुका है. तारिक बताते है- "उनके समूह में 60 लोग ऐसे है जो एक या दोनों पैरों में लोकोमोटिव विकलांग हैं जबकि कुछ लोगों को देखने में तकलीफ है."</p>
<p dir="ltr">तारिक के काम को आज देश में ही नहीं बल्कि पुरे दुनिया में पहचान. तारिक एक मुस्कान के साथ बताते है - "उन्हें सबसे पहला आर्डर दिल्ली कि एक आर्गेनाईजेशन से 2013 में मिला था जो कि 'एम्ब्रायडरी शाल' के लिए था. " वह गर्व से बताते है - "हमे एक आर्डर यू .एस .ए से भी मिल चुका है और तब से हम में से किसी ने भी पीछे मुड़कर नहीं देखा." तारिक के स्वयं सहायता समूह में ज़्यादातर युवा है और वे सब मिल के अपनी पारम्परिक कला को पूरी दुनिया में सामने ले आये है. </p>
<p dir="ltr">'हार मानना इंसान कि मजबूरी कभी नहीं हो सकती', ये साबित कर दिया तारिक अहमद मीर ने, जिन्होंने इतनी परेशानी होने के बावजूब कभी ये नहीं सोचा कि, 'मैं किसी से कम हूं.' उन्होंने अपनी हर परिस्थिति को बहादुरी से गले लगाया और आज पूरी दुनिया उनके कदम चूम रही है.</p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">रिसिका जोशी</dc:creator><pubDate>Sat, 01 Apr 2023 16:37:34 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/kahaniyan/special-hands-of-kashmir-keeping-sozni-kadhaai-alive]]></guid><category><![CDATA[कहानियां]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/lb6u2W6yn5PeLCkggvVr.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/lb6u2W6yn5PeLCkggvVr.jpg"/></item><item><title><![CDATA[स्पेशल हैंड्स ऑफ़ कश्मीर दे रहे है सोज़नी कढ़ाई को ख़ूबसूरती ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/kahaniyan/special-hands-of-kashmir-keeping-sozni-kadhaai-alive</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/lb6u2W6yn5PeLCkggvVr.jpg"><p dir="ltr">'कला व्यक्ति के दिल ओ दिमाग से निकलकर हाथों के ज़रिये दुनिया के सामने आती है. दिल से निकली हुई हर बात कला का रूप ले लेती है. चाहे वो व्यक्ति आम हो या ख़ास. कला और कारीगरी ऐसा वरदान है जो किसी भी व्यक्ति में कोई अंतर नहीं करता. हर कलाकार एक अलग और अनोखी कला का मालिक होता है. शायरी हो, शिल्पकारी हो, कढ़ाई बुनाई हो, या फिर कुछ और. जब भी ऐसी किसी अनोखी कला आँखों के सामने से गुज़रती है तो सोचने में आता है की, जिसने भी इसे बनाया है कितना दिल से बनाया है और अगर उस कलाकार से मिलने का मौका मिल जाए तो बात ही कुछ अलग हो. वैसे तो हर कलाकार विशेष होता है लेकिन उन विशेष में भी अगर विशेष रूप से सक्षम कलाकार मिल जाए तो कहना ही क्या.</p>
<p dir="ltr"><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/DReDrwoM5q5u4T8rsCfk.jpg" alt="kashmir"></p>
<p dir="ltr"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits:  Kashmir Observer</em></span></p>
<p dir="ltr">कश्मीर की पारंपरिक कला सोज़नी (सुई) कढ़ाई के काम को भी कुछ ऐसी ही हाथों ने सहेज के रखा है. तारिक अहमद मीर, कश्मीर के एक व्यक्ति जिन्होंने अपने हालत और शारीरिक स्थिति को मजबूरी नहीं बल्कि हथियार बनाया. हर परेशानी का सामना करके अपने जैसे और भी लोगो को साथ जोड़कर, सोज़नी की पारम्परिक कला को कश्मीर के दिलों में ज़िंदा रखा है. तारिक अहमद मीर जन्म से ही मस्कुलर डिस्ट्रॉफी से पीड़ित है, यह एक दुर्लभ न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर है. लेकिन हिम्मत हौसला और जज़्बा ऐसा की उन्हें यह  बिमारी भी किसी भी काम को करने से रोक नहीं पायी.  </p>
<p dir="ltr">मीर बताते है कि, इनका भाई भी इसी बिमारी का शिकार है और जरा भी चल नहीं सकता. लेकिन तारिक अपनी इच्छाशक्ति के दम पर थोड़ा चल लेते है. इतना सब होने के बावजूद, आज तारिक एक मिसाल है. जब मीर ने शिक्षक के पद के लिए इंटरव्यू देना चाहा तो उन्हें ये बोल के मना कर दिया गया कि, 'विकलांग लोगों के लिए कोई पद नहीं है.'</p>
<p dir="ltr">ज़ाहिर सी बात है, उन्हें बुरा लगा, कुछ करने की ठानी और समाज को जवाब देने की भी. मीर ने अपने जैसे 60 विशेष रूप से सक्षम कारीगरों को साथ लेकर एक स्वयं सहायता समूह तैयार किया. हमारे देश में ज़्यादातर स्वयं सहायता समूह महिलाओं ने बनाए है. लेकिन ये समूह उन कुछ चुनिंदा समूहों में से एक जो पुरुष चला रहे है. स्पेशल हैंड्स ऑफ़ कश्मीर SHG के ज़रिये न सिर्फ तारिक अपने पैरों पर खड़े है बल्कि एक ऐसी शिल्प कला को बचा रहे है जो एक वक़्त में खात्मे के कगार पर थी . महज़ 5000 रुपयों से शुरू हुआ यह समूह अब लगभग 500 कारीगरों कि ताकत बन चुका है. तारिक बताते है- "उनके समूह में 60 लोग ऐसे है जो एक या दोनों पैरों में लोकोमोटिव विकलांग हैं जबकि कुछ लोगों को देखने में तकलीफ है."</p>
<p dir="ltr">तारिक के काम को आज देश में ही नहीं बल्कि पुरे दुनिया में पहचान. तारिक एक मुस्कान के साथ बताते है - "उन्हें सबसे पहला आर्डर दिल्ली कि एक आर्गेनाईजेशन से 2013 में मिला था जो कि 'एम्ब्रायडरी शाल' के लिए था. " वह गर्व से बताते है - "हमे एक आर्डर यू .एस .ए से भी मिल चुका है और तब से हम में से किसी ने भी पीछे मुड़कर नहीं देखा." तारिक के स्वयं सहायता समूह में ज़्यादातर युवा है और वे सब मिल के अपनी पारम्परिक कला को पूरी दुनिया में सामने ले आये है. </p>
<p dir="ltr">'हार मानना इंसान कि मजबूरी कभी नहीं हो सकती', ये साबित कर दिया तारिक अहमद मीर ने, जिन्होंने इतनी परेशानी होने के बावजूब कभी ये नहीं सोचा कि, 'मैं किसी से कम हूं.' उन्होंने अपनी हर परिस्थिति को बहादुरी से गले लगाया और आज पूरी दुनिया उनके कदम चूम रही है.</p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">रिसिका जोशी</dc:creator><pubDate>Sat, 01 Apr 2023 16:37:34 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/kahaniyan/special-hands-of-kashmir-keeping-sozni-kadhaai-alive]]></guid><category><![CDATA[कहानियां]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/lb6u2W6yn5PeLCkggvVr.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/lb6u2W6yn5PeLCkggvVr.jpg"/></item></channel></rss>