<rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" xmlns:dcterms="http://purl.org/dc/terms/" xmlns:geo="http://www.w3.org/2003/01/geo/wgs84_pos#" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/" xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/" xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/" version="2.0"><channel xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/"><title><![CDATA[ मालवा उत्सव]]></title><link>https://ravivarvichar.in/tags/maalvaa-utsv</link><description/><atom:link href="https://ravivarvichar.in/rss/tags/maalvaa-utsv" rel="self"/><language>en-us</language><lastBuildDate>Sun, 21 May 2023 13:20:38 +0530</lastBuildDate><item><title><![CDATA[गुजरात की फेब्रिक आर्ट बनी पहली पसंद ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/kahaniyan/dharmishta-training-women-to-become-independent</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/mKUyyeM9zyFjduX1QjY2.jpg"><p>गुजरात में एक घरेलु महिला ने न केवल मेहनत कर आत्मनिर्भर बनी बल्कि अलग-अलग समूह की जरूरतमंद महिलाओं को रोजगार देकर उन्हें भी आत्मनिर्भर बना दिया. इस महिला धर्मिष्ठा ने अलग-अलग जगह जाकर चार हजार से ज्यादा महिलाओं को ट्रेनिंग भी दी. ऐसी ट्रेंड महिलाएं अब अपना रोजगार चला रहीं हैं. ऐसी महिलाएं भी जुड़ीं जो बेसहारा,अकेली या तलाकशुदा हैं. अहमदाबाद की धर्मिष्ठा अशोक भाई चुड़ासमा गुजरात सरकार के कहने पर कई संस्थाओं में ट्रेनिंग देने जाती हैं.</p>
<p>इंदौर में आयोजित मालवा उत्सव में शामिल हुई धर्मिष्ठा कहती हैं -“ मैं ट्रेडिशनल आर्ट और हैंडीक्रॉफ्ट को बचाने में लगी हूं. इस काम से जहां संस्कृति को अगली पीढ़ी तक पहुंचा रहे वहीं जरूरतमंद महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत भी कर पा रहे. मैंने महिलाओं को मदद करने के लिए सिद्धि विनायक संस्था बनाई. 11 सदस्य बने. मैं फैब्रिक जूलरी, मिरर फेब्रिक वर्क, एम्ब्रॉयडरी सहित कई प्रोजेक्ट से जुड़ गए. मुझे ख़ुशी है की इंदौर मालवा उत्सव में हमें लगभग 50 हजार रुपए का वर्क ऑर्डर मिला."</p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/GxNfaxq7UQDWYlWmTSwm.jpg" alt="Gujarat Malwa Utsav"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>फेब्रिक को जमाते हुई धर्मिष्ठा (फोटो क्रेडिट :रविवार विचार) </em></span></p>
<p>अहमदाबाद सेंटर से धर्मिष्ठा अभी 300 महिलाओं के साथ काम करती है. कोरोना काल से  पति अशोक भाई अब मार्केटिंग संभालते हैं. महिलाओं को दिक्क्त न हो इसलिए उनको घर जा कर कच्चा माल दे दिया जाता है. वे घर से ही सामान तैयार कर सेंटर पर भेज देती है. इस संस्था से जुड़ी पायल परमार कहती है -" हैंडीक्रॉफ्ट आइटम और फेब्रिक हैंडवर्क से मैं आत्मनिर्भर हो गई. मेरे आर्थिक हालात सुधर गए. मैं 12 से 15 हजार रुपए महीने कमा लेती हूं." इस संस्था से 60 अधिक महिलाएं सखी मंडल ( SELF HELP GROUP -SHG )  की सदस्य हैं जिन्हें रोज काम मिल जाता है. इस संस्था की एक और महिला धर्मिष्ठा भी जुड़ गई. धर्मिष्ठा कहती है -" मेरी आर्थिक हालत अच्छी नहीं थी. जब से इस काम में जुटी हर महीने दस हजार रुपए महीने से ज्यादा कमा लेती हूं."</p>
<p>इस संस्था के सदस्यों के साथ संस्था अध्यक्ष धर्मिष्ठा अब तक अहमदाबाद के अलावा सूरत ,बड़ौदा ,गांधीनगर ,इंदौर ,सौराष्ट्र और दिल्ली के मेले में अपनी प्रदर्शनी लगा चुकीं  हैं. धर्मिष्ठा आगे बताती है -" सबस ज्यादा फायदा हमें कच्चा माल लेने में होता है. हम कॉटन और दूसरा फेब्रिक अहमदाबाद से ही ले लेते हैं. इस पर डिमांड के अनुसार तैयार करते हैं. मिरर वर्क ब्लाउस की कीमत 2 हजार रुपए तक होती है और महिलाएं मेले में बड़े शौक से खरीदती हैं. हम इस आर्ट को और राज्यों तक ले जाएंगें. "</p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">विवेक वर्द्धन श्रीवास्तव </dc:creator><pubDate>Sun, 21 May 2023 13:20:38 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/kahaniyan/dharmishta-training-women-to-become-independent]]></guid><category><![CDATA[कहानियां]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/mKUyyeM9zyFjduX1QjY2.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/mKUyyeM9zyFjduX1QjY2.jpg"/></item><item><title><![CDATA[हुनर के दम बोल रहे मूक-बधिर ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/hum-bhi-hero/deaf-and-dumb-people-at-malwa-utsav-indore-sell-handicraft-items</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/LasECIIiGkrspgeWv1ze.jpg"><p>इंदौर के लालबाग पैलेस में आयोजित मालवा उत्सव के एक स्टॉल में भीका भाई के पास कुछ लोग आ कर हाथों से बनी सुंदर-सुंदर बांस की टोकनियों का भाव पूछ रहे. कुछ महिलाएं वंदनवार  के भाव पूछ रहीं थी. भीका भाई ने किसी को इशारे में तो किसी को आइटम पर लिखे भाव बताए. भीका भाई मुस्कुराते हुए इशारा करते हैं - मैं बोल और सुन नहीं सकता. आप चीज़ पसंद कीजिए और भाव लिखे हुए हैं. " लोगों ने पैसे दिए और चीज़ खरीद कर चले गए. कुछ सालों से भीका भाई ऐसे ही हस्तशिल्प मेले में स्टॉल संभालते हैं. गुजरात के भीका भाई जैसे कई डेफ एंड डम (मूक-बधिर) लोगों के जीवन में एक ऐसी महिला आई जिसने जरुरतमंदों को आत्मनिर्भर बना और गुजरात में मिसाल कायम कर दी. जाग्रति बेन मेहता पूरा जीवन जरूरतमंद लोगों को आत्मनिर्भर बनाने में लगा रही. भारत के ट्रेडिशनल कल्चर को फोकस कर हस्तशिल्प मेले में शामिल होने वाली जाग्रति के साथ दिव्यांग, तलाकशुदा महिलाओं की टीम है जो आत्मनिर्भर भारत का चेहरा बन गए. ये चाहे लोग चाहे बोल-सुन नहीं सकते लेकिन आज मूक-बधिर कलाकारों का हूनर देशभर में बोल रहा है.  </p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/lqYX2yBgqW0R7ET9zBB7.jpg" alt="malwa utsav deaf and dumb people"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>संस्था लीडर जाग्रति बेन ने भी अपने स्टॉल को संभाला और लोगों के बीच जगह बनाई (फोटो क्रेडिट : रविवार विचार)</em></span></p>
<p>भारत के ट्रेडिशनल कल्चर को बढ़ावा देने वाली जाग्रति बेन गुजरात के पालनपुर से यहां हस्तशिल्प मेले में आईं. जाग्रति कहती हैं -" मैं सिर्फ 12 वीं पास हुई. मेरी शादी कर दी गई. घर की आर्थिक हालत  इतनी अच्छी नहीं थी कि माता-पिता मुझे आगे पढ़ा पाते. पिता महेश भाई ड्राइवर और मां दक्षा बेन छोटा-मोटा काम करती थी. ससुराल में मुझे पति पति विजय भाई मेहता ने हौसला दिया. मैंने ग्रेजुएशन की. मैं एक स्कूल में टीचर बन गई. फिर भी घर की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी. मुझे लगा कि मुझ जैसे जाने कितने लोग होंगें जो ऐसे हालातों से जूझ रहे होंगें. मैंने ज़िंदगी में कुछ अलग करने कि ठानी. वक़्त बदला और आज न केवल मैं आर्थिक रूप से निर्भर बनी बल्कि कई लोगों को रोजगार दे सकी.साथ ही मैं विलुप्त होती हमारे भारतीय कलाओं को बचाने की कोशिश कर रहीं हूं। " </p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/kYnYKftIg7akRMvh3sLs.jpg" alt="malwa utsav deaf and dumb people"></p>
<p><em><span style="font-size: 8pt;">गुजरात के पालनपुर से आए मूक-बधिर भीका भाई ने अपना स्टॉल संभाला (फोटो क्रेडिट : रविवार विचार)</span></em></p>
<p>देश में बढ़ते स्टार्टअप का बढ़िया उदाहरण वात्सल्य चैरिटेबल संस्था है. रोजगार के लिए यहां हमेशा अवसर तैयार रहते हैं. गुजरात के पालनपुर की जाग्रति आगे बताती है -" निजी स्कूल में जॉब करते हुए मैनें पोस्ट ग्रेजुएट किया. कम्प्यूटर में आगे पढाई की. लगा कि संस्था के बिना मैं लोगों की मदद नहीं कर पाउंगी. वात्सल्य संस्था बनाई. इस समय 20 लोग सक्रिय रूप से जुड़े हैं  हैं. इसमें महिलाएं भी हैं. संस्था में छह से ज्यादा दिव्यांग साथी और डेफ एंड डम लोगों को जोड़ा. और वे स्वाभिमान से जिंदगी जी रहे हैं.'</p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/fCExuDsibwwixRlGCkpP.jpg" alt="malwa utsav deaf and dumb people"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>इंदौर के लालबाग पैलेस में आयोजित मालवा उत्सव (फोटो क्रेडिट : रविवार विचार)</em></span></p>
<p>देश के बड़े-बड़े शहरों में आयोजित हस्तशिल्प मेले में जाग्रति टीम के साथ शामिल होती है. अब तक उनको कई पुरस्कार मिल चुके हैं. जाग्रति के साथ आए भीका भाई अपनी लीडर जाग्रति की ओर इशारा कर बताते हैं -" जाग्रति ने कई लोगों को की जिंदगी में खुशियां दी. उनको सम्मान से जीना सिखाया. शॉप पर रखा सामान बेचना सिखाया. " पालनपुर में ही संस्था ने अपनी यूनिट डाली. इस यूनिट की कमान भी एक महिला को दी.संस्था मैनेजर अर्चना बेन कहती है-" इस संस्था में महिलाएं और दिव्यांगों को खास जगह दी जाती है. यहां तक कि जाग्रति बेन सभी को पार्टनर की तरह रखती है.कोई भी व्यक्ति कर्मचारी की तरह संस्था में नहीं रहता. संस्था का मकसद जो काम में समर्थ नहीं है,उनको पहले रोजगार का मौका देना है. इस संस्था में कोकोनट फाइबर्स से कई आइटम तैयार किए जाते हैं. घर कि सजावट के परंपरागत आइटम तैयार किए जाते हैं." अभी तक 60 लोग लगातार इससे जुड़े हैं और कई लोगों को ट्रेनिंग दे चुकीं हैं. गुजरात सरकार और कई संगठन इस संस्था को सम्मानित कर चुकी है. </p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">विवेक वर्द्धन श्रीवास्तव </dc:creator><pubDate>Wed, 17 May 2023 14:42:02 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/hum-bhi-hero/deaf-and-dumb-people-at-malwa-utsav-indore-sell-handicraft-items]]></guid><category><![CDATA[हम में है हीरो]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/LasECIIiGkrspgeWv1ze.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/LasECIIiGkrspgeWv1ze.jpg"/></item></channel></rss>