<rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" xmlns:dcterms="http://purl.org/dc/terms/" xmlns:geo="http://www.w3.org/2003/01/geo/wgs84_pos#" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/" xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/" xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/" version="2.0"><channel xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/"><title><![CDATA[ महिलाओं]]></title><link>https://ravivarvichar.in/tags/mhilaaon</link><description/><atom:link href="https://ravivarvichar.in/rss/tags/mhilaaon" rel="self"/><language>en-us</language><lastBuildDate>Thu, 31 Aug 2023 14:57:04 +0530</lastBuildDate><item><title><![CDATA[महिला नज़रिए को रोशनी देता सितारा... अमृता प्रीतम ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/nazariya/amrita-pritam-paved-way-to-modern-day-feminism-through-her-writings</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/rPRcuzp8kVdWIFuYv7Fe.jpg"><p class="center"><span style="color: rgb(126, 140, 141);"><em>"इस जन्म में कई बार लगा कि</em></span><br><span style="color: rgb(126, 140, 141);"><em>औरत होना गुनाह है</em></span><br><span style="color: rgb(126, 140, 141);"><em>लेकिन यही गुनाह</em></span><br><span style="color: rgb(126, 140, 141);"><em>मैं फिर से करना चाहूंगी</em></span><br><span style="color: rgb(126, 140, 141);"><em>एक शर्त के साथ,</em></span><br><span style="color: rgb(126, 140, 141);"><em>कि ख़ुदा को अगले जन्म में भी,</em></span><br><span style="color: rgb(126, 140, 141);"><em>मेरे हाथ में क़लम देनी होगी."</em></span></p>
<p><strong>अमृता प्रीतम</strong> (Amrita Pritam) <strong>साहित्य </strong>के आकाश में वह चमकता सितारा है जिसकी रोशनी ने<a href="https://ravivarvichar.in/nazariya/ismat-chughtai-gave-feminine-perspective-to-patriarchal-literature"> महिलाओं </a>&nbsp;(Amrita Pritam on women) के उन <strong>मुद्दों </strong>पर प्रकाश डाला जिन्हें अंधेरे में धकेल दिया जाता था. उनकी&nbsp;<a href="https://ravivarvichar.in/nazariya/sudha-murthy-championing-equality-through-literature-and-infosys-foundation"> कलम </a>(Amrita Pritam poems) अपने समय की चश्मदीद गवाह है, जो सदियों तक गवाही देती रहेगी.<strong> </strong></p>
<h2><img alt="amrita pritam" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/502x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/GVZNbToJUyXRhmtHK7Y8.jpg" style="width: 502px;" class="center"></h2>
<p class="center"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: The Seer</em></span></p>
<h2>पंजाबी भाषा की पहली कवयित्री थी अमृता प्रीतम&nbsp;</h2>
<p><strong>31 अगस्त 1919</strong> को <strong>अविभाजित भारत</strong> के <strong>गुजरांवाला में जन्मीं</strong> (Amrita Pritam biography) अमृता प्रीतम को <strong>पंजाबी भाषा</strong> की <strong>पहली कवयित्री</strong> माना जाता है (first Punjabi female writer). <strong>भारत-पाक विभाजन</strong> (Amrita Pritam on India-Pakistan partition) पर लिखी उनकी लंबी पंक्ति <span style="color: rgb(126, 140, 141);"><em>"अज्ज आखाँ वारिस शाह नूं कित्थों क़बरां विच्चों बोल ते अज्ज किताब-ए-इश्क़ दा कोई अगला वरका फोल"</em></span> भारत और पाकिस्तान दोनों में काफी लोकप्रिय हुई (amrita pritam waris shah).</p>
<p class="center"><span style="color: rgb(126, 140, 141);"><em>स्त्रियां उतारी गई सिर्फ़ कागज़ और केनवास पर</em></span><br><span style="color: rgb(126, 140, 141);"><em>नहीं उतारी गई तो बस रूह में.</em></span></p>
<p class="center"><span style="color: rgb(126, 140, 141);"><em><img alt="amrita pritam" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/502x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/40eFp6lNbeZb63lTP4ZT.jpg" style="width: 502px;"></em></span></p>
<p class="center"><span style="color: rgb(0, 0, 0);"><em><span style="font-size: 8pt;">Image Credits: </span></em><span style="font-size: 8pt;"><em><span class="oJRuee cS4Vcb-pGL6qe-lfQAOe">Cultural India</span></em></span></span></p>
<h2>कैसे थे अमृता प्रीतम के महिला किरदार ?</h2>
<p>कविता, कहानी, उपन्यास, निबंध, जीवनी, संस्मरण, पंजाबी लोक गीत और आत्मकथा- अमृता ने&nbsp;<strong>सौ से ज़्यादा लेख लिखे</strong>. <a href="https://ravivarvichar.in/nazariya/sahitya-akademi-award-winner-anamika-reshaping-contemporary-hindi-poetry">महिलाओं के मन</a>&nbsp;में उलझे ख्यालों और बाहरी कैद की परेशानियां, लगभग सभी लेखों में दिखाई देती (Amrit Pritam books).<strong> अमृता प्रीतम </strong>के सभी उपन्यास समाज में <strong>स्त्री की गरिमा</strong> को समझने और उसकी <strong>चुनौतियों के पक्ष में </strong>बोलने के लिए मजबूर करते.<strong>&nbsp;उपन्यासों</strong> जैसे<strong> 'एक थी सारा', 'कुटकी सड़क', 'उंचास दिन', 'पिंजर'</strong> में अमृता की कलम ने मानों <strong>महिला किरदारों</strong> (Amrita Pritam female characters) से बात कर, बड़े सलीके से उनकी आवाज़ को जगह दी.</p>
<blockquote>
<p class="center">महिला और पुरुष के रिश्ते पर अमृता ने बेबाक लिखा,<span style="color: rgb(126, 140, 141);"><em> "मर्द ने औरत के साथ अभी तक सोना ही सीखा है, जागना नहीं. इसीलिए मर्द और औरत का रिश्ता उलझन का शिकार रहता है."</em></span></p>
</blockquote>
<p>अमृता प्रीतम ने देश को दो हिस्सों में बंटते देखा. <strong>बंटवारे</strong> की आग में <strong>महिलाओं को जलते देखा</strong> (Amrita Pritam female characters). इंसानों को हैवान बनते देखा. इसे न रोक पाने का दुख और <strong>महिलाओं की मजबूरियों</strong> को कलम के ज़रिये बांटा, खासकर<strong> 'पिंजर' उपन्यास</strong> (Pinjar novel) में.&nbsp;</p>
<p><img alt="amrita pritam" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/500x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/jrgvN8Pdy0xi4AAiLdEF.PNG" style="width: 500px;" class="center"></p>
<p class="center"><span style="color: rgb(0, 0, 0);"><em><span style="font-size: 8pt;">Image Credits: </span></em><span style="font-size: 8pt;"><em><span class="oJRuee cS4Vcb-pGL6qe-lfQAOe">Outlook</span></em></span></span></p>
<h3>नारीवादी लेखिका के रूप में बनाई पहचान&nbsp;</h3>
<p>अमृता <strong>पहली पंजाबी महिला</strong> (Punjabi writer) <strong>लेखिका</strong> बनीं, जिन्होंने अपने समय के <strong>पुरुष लेखकों की छाया</strong> से बाहर निकलकर <strong>पंजाबी साहित्य</strong> (Punjabi Literature) में अपनी अलग जगह बनाई. उनकी कलम सिर्फ<strong> कविताओं</strong> को नहीं<a href="https://ravivarvichar.in/nazariya/remembering-mahasweta-devi-the-feminist-icon-on-her-death-anniversary"> क्रान्ति </a>&nbsp;को जन्म देती थी. <strong>क्रांतिकारी विचारों</strong> और <strong>अभिव्यक्ति की ताकत</strong> ने उन्हें <strong>नारीवाद</strong> (feminism) से बहुत पहले, <strong>नारीवादी</strong> (feminist) के रूप में देखने पर मजबूर किया.&nbsp;</p>
<p><strong>1956 में साहित्य अकादमी पुरस्कार</strong> (Sahitya Akademi Award) जीतने वाली वह <strong>पहली महिला बनीं अमृता प्रीतम.</strong> उनके गुज़र जाने के बाद भी, किसी महान लेखक की तरह, उनकी <strong>विरासत, विचार </strong>और <strong>आवाज़</strong> जीवित हैं, जो आज के फेमिनिस्ट लेखकों (feminist writer Amrita Pritam) के लिए प्रेरणा बने हुए हैं.</p>
<p class="center"><span style="color: rgb(126, 140, 141);"><em>कहानी लिखने वाला बड़ा नहीं होता,</em></span><br><span style="color: rgb(126, 140, 141);"><em>बड़ा वह है जिसने कहानी अपने जिस्म पर झेली है.</em></span></p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मिस्बाह</dc:creator><pubDate>Thu, 31 Aug 2023 14:57:04 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/nazariya/amrita-pritam-paved-way-to-modern-day-feminism-through-her-writings]]></guid><category><![CDATA[नज़रिया]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/rPRcuzp8kVdWIFuYv7Fe.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/rPRcuzp8kVdWIFuYv7Fe.jpg"/></item><item><title><![CDATA[नाग पंचमी पर महिला श्रद्धालु में आस्था का सैलाब ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/kahaniyan/shivling-manufacturing-in-khargone</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/DKO9s3jMex9GDInZ36Ts.jpeg"><h1>नाग पंचमी पर महिला श्रद्धालु में आस्था का सैलाब&nbsp;</h1>
<p>मध्यप्रदेश के निमाड़ में नागपंचमी की धूम है. खासकर महिलाएं सावन के महीने में नागपंचमी का भी बेसब्री से इंतज़ार करती हैं. पूरे निमाड़ भगवान भोलेनाथ के श्रृंगार माने जाने वाले नाग को देवता का अवतार माना. महिलाएं इस इलाके में शिवलिंग के साथ नागपंचमी पर नागदेवता को अवतार भीलट देवता के रूप में पूजती हैं. यहां सैकड़ों की संख्या में भीलट यानी नागदेवता के मंदिर हैं. &nbsp;</p>
<p>जीवनदायिनी नदी मां नर्मदा का उल्लेख पुराणों में तो है ही साथ ही रेवा को गंगा से भी पुरानी माना गया है. ऐसी मान्यता है कि गंगा नदी में स्नान से जो पुण्य लाभ मिलता है वही लाभ मां नर्मदा नदी के दर्शन मात्र से मिल जाता है. यह भी मान्यता है कि नर्मदा नदी के कंकर-कंकर में शंकर का स्वरूप है और इस मान्यता का साक्षात रूप देखने को मिलता है खरगोन जिले बकावां गांव में. वैसे भी सनातन परंपरा में माना गया है कि नर्मदा के कंकर और पत्थर निकाल कर सीधे स्थापित करते हैं और उनकी प्राण प्रतिष्ठा की जरूरत नहीं पड़ती. वह वैसे ही पूजनीय होते है.नदी की गहराई से इन पत्थरों को निकाल तराश कर इसे शिवलिंग का स्वरूप दिया जाता है.यह तराशे हुए शिवलिंग, &nbsp;भारत सहित दुनियाभर में स्थापित होते है और इन नर्मदेश्वर शिवलिंगों का महत्व सबसे ज्यादा है. घरों से लेकर मंदिरों तक हर जगह नर्मदेश्वर शिवलिंग पूजे जातें है. लेकिन इन्हें तराशना और सही शिवलिंग का रूप देना आसान काम नहीं है. इस काम में बकावां के सैकड़ों लोग जुटे हैं. सम्भवतः यह एक मात्र गांव है जहां साढ़े पांच हजार की आबादी में अधिकांश परिवारों की जीविका का साधन शिवलिंग तैयार करना ही है.यह गांव देश-विदेश में इन पत्थरों और शिवलिंग निर्माण के लिए प्रसिद्ध है.श्रावण महीने और महाशिवरात्रि जैसे विशेष दिनों में शिवलिंग और भगवान भोलेनाथ के इस निराकार स्वरूप का महत्व और बढ़ जाता है.यहां के पत्थरों में प्राकृतिक कलाकृतियां उभरी हुई दिखती है तराशे जाने के बाद इन पर तिलक,ॐ व अन्य आकृति दिखती हैं. जो धार्मिक भावनाओं को और आस्थावान बना देती है.</p>
<p>इतना सब होने के बावजूद कुछ साल पहले तक यहां की महिलाएं खेतिहर मजदूर थी.जब खेतों में काम नहीं मिलता तब शिवलिंग निर्माण कर रहे लोगों के लिए मजदूरी कर शिवलिंग बनाती थी. यहां की महिलाएं अपने भविष्य को लेकर हमेशा चिंतित थी. मजदूरी में उतनी कमाई नहीं थी कि परिवार की ठीक से देखभाल कर सकें. इस समस्या से निकलने के लिए गांव की ही महिलाओं ने नए कदम उठाया और &nbsp;जिला प्रशासन के मार्गदर्शन में SHG तैयार किया. 10 महिलाओं ने कुछ नया करने के लिए हिम्मत दिखाई और फिर पिछले 3 वर्षों से पलट कर पीछे नहीं देखा. अब यही महिलाएं अपनी नई पहचान बना रहीं हैं.नर्मदा नदी की गहराइयों से निकलने वाले शंकर स्वरूप पत्थरों को तराश कर खुद की तकदीर को तराशने में जुड़ गई हैं .</p>
<h2><strong>महिलाओं को मिला रोजगार का सहारा&nbsp;</strong></h2>
<p>इस SHG की अध्यक्ष योगिता केवट ने बताया - " पहले हम सभी समूह सदस्य मजदूरी करती थी. फिर हम 10 दीदीयों ने मिलकर शिवलिंग स्व सहायता समूह बनाया. &nbsp;नदी से निकाले गए पत्थरों को तराशना शुरू किया" . शुरुआत में पत्थरों को ये महिलाएं परम्परागत छैनी और हथौड़ी से पत्थर तराश शिवलिंग बनाती थी. रात दिन की मेहनत की और धीरे-धीरे इस काम ने रफ्तार पकड़ ली. &nbsp;साप्ताहिक कुछ रुपए जुटाकर उन्होंने यह काम शुरू किया. जब कुछ पैसा इकट्ठा हो गया तब नर्मदा से निकले पत्थर को तराशने के लिए कटर मशीन खरीदी. आज इन मशीनों के साथ वे बेहतर तरीके से शिवलिंग बना रहीं हैं. इस समूह को आजीविका मिशन से भी सहायता मिली. आजीविका मिशन के तहत उन्होंने अलग अलग कुल 12 लाख रुपए का लोन लिया. जिसे पूरे अनुशासन के साथ किस्तों के रूप में समय पर उतार भी दिया. समूह की दीदियां गर्व से बताती हैं- "फिलहाल हमारे पास आठ लाख रुपए की जमा पूंजी है". &nbsp;समूह की सदस्य पहले कभी खेत में मिर्ची तोड़ने तो कभी खेतों में दूसरे कामों के लिए जाती थी. इससे बड़ी मुश्किल से 4 से पांच हजार रुपए महीने भी कमाई नहीं होती थी.इस संस्था में उनके साथ रमाबाई नारायण, संध्या भाई हरेराम, सीमा राकेश, संगीता राधेश्याम,सुशीलाबाई गणेश,राधाबाई मिश्रीलाल, बसंतीबाई केसरीलाल हैं, जो पूरी श्रद्धा से शिवलिंग का निर्माण कर रही हैं. यह शिवलिंग सुपारी आकार से 51 फीट तक के बनाए जाते हैं. वे रोज 15 से 20 शिवलिंग का कच्चा माल तैयार कर लेती हैं. &nbsp;बड़ा शिवलिंग तैयार करने में 7 से 8 दिन लग जातें है . समूह की सफलता उस मुकाम पर है कि अब परिवार के सदस्य और खासकर पति भी काम में साथ दे रहे हैं.&nbsp;</p>
<p>समूह ने बकावां गांव में चार दुकानें खोल रखी हैं. यहीं इंदौर, जयपुर,वाराणसी, दिल्ली, हैदराबाद जैसे शहरों से लोग शिवलिंग खरीदने आते हैं.कई बार विदेशी लोग भी सीधे &nbsp;यहां आ जाते हैं. दुकान पर ये शिवलिंग 15 रुपए से लगाकर लगभग डेढ़ लाख रुपए तक की कीमत के होते हैं. समूह की महिलाओं को यह अफसोस है कि शिवलिंग उन्हें स्थानीय दुकानों से ही बेचना पड़ता है. केवल राष्ट्रीय आजीविका मिशन के तहत ही &nbsp;फिलहाल ऑनलाइन शिवलिंग के लिए आर्डर ले पाती हैं.वे चाहती हैं कि जिला प्रशासन और सरकार बड़ा मार्केट उपलब्ध कराए. अगर इस समूह को ऑनलाइन बिज़नेस की व्यवस्था के साथ मार्गदर्शन मिल जाए तो उनकी कमाई कई गुना बढ़ हो सकती है. फिलहाल उन्हें व्यापारियों की शर्तों पर ही शिवलिंग बेचने पड़ते है. &nbsp;इसके अलावा कुछ बिचौलिए भी यहां से ओने पौने-दामों पर शिवलिंग खरीद कर महंगे दामों पर बड़े शहरों में बेच देते हैं.यही बिचौलिए हैं ,जो विदेशों में भी शिवलिंग निर्यात कर देते हैं. स्थानीय समूह फिलहाल इस ऑनलाइन पहुंच से दूर है.&nbsp;</p>
<p>एक समय खेती मजदूरी करती इस समूह की महिलाओं को आज सुकून और सुरक्षा है कि प्रति सदस्य लगभग 10 से 12 हजार रुपए प्रतिमाह कमा रहीं हैं. प्रशासन ने उनकी मेहनत और लगन को देखकर कियोस्क सेंटर चलाने की अनुमति दे दी और यह समूह बकावां में कियोस्क सेंटर चला रहा हैं. सदस्यों के अलावा अन्य ग्राहकों के माध्यम से वे अब तक तीन करोड़ रुपए का ट्रांजैक्शन कर चुकी हैं.</p>
<p>जिला पंचायत में परियोजना प्रबंधक सीमा निगवाल ने बताया कि - "समूह को लगातार प्रोत्साहित किया जा रहा है. साथ ही सारी जानकारी और मदद समूह तक पहुंचाई जा रही है". समूह की सदस्य भी जिला प्रशासन का सहयोग और समर्थन के लिए धन्यवाद करती है. जिला पंचायत खरगोन की सीईओ ज्योति शर्मा ने कहा कि इस कला को संरक्षित किया जाएगा.ऑनलाइन और सोशल मीडिया के जरिए मार्केटिंग करने के लिए ट्रेंनिग दिलवाने की योजना बनाई जा रही है.सांस्कृतिक,परम्परागत प्रदर्शनियों में &nbsp;शामिल होने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाएगा.</p>
<p>यह शिवलिंग बनाने की परंपरा ग्रामीणों को विरासत में मिली है . रियासत काल और देवी अहिल्याबाई होल्कर के शासनकाल में यह बहुत समृद्ध थी.आज समूह सदस्यों के साथ गांव के बुजुर्ग चिंता में हैं कि यह गांव और नर्मदा का किनारा महेश्वर बांध परियोजना अंतर्गत डूब प्रभावित है. यदि बांध परियोजना अपना मूर्त रूप लेती है तो इस गांव के किनारे के साथ गांव भी डूब जाएगा. गांव के मिश्रीलाल,दीपक नामदेव ने बताया-" इस विरासत और कला को बचाने के लिए ग्रामीण लगातार मांग कर रहे हैं". यदि नर्मदा का जलस्तर बढ़ा और किनारे डूब गए तो यह अनूठे पत्थरों को ढूंढना और निकालना मुश्किल हो जाएगा. साथ ही SHG महिलाओं की इस अनूठी पहल पर भी पानी फिर जाएगा.</p>
<p><iframe width="560" height="314" src="https://www.youtube.com/embed/inGE7jFtHG8" allowfullscreen="allowfullscreen"></iframe></p>
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</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">विवेक वर्द्धन श्रीवास्तव </dc:creator><pubDate>Mon, 21 Aug 2023 13:25:44 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/kahaniyan/shivling-manufacturing-in-khargone]]></guid><category><![CDATA[कहानियां]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/DKO9s3jMex9GDInZ36Ts.jpeg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/DKO9s3jMex9GDInZ36Ts.jpeg"/></item><item><title><![CDATA[अगरबत्तियों की सुगंध से महकी SHG महिलाओं की ज़िंदगी ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/photovideo/ujjain-shg-women-making-eco-friendly-incense-sticks-from-flower-waste</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/mQI1H9Q0Sj7kIjN2XsMi.jpeg"><p><iframe width="701" height="393" src="https://www.youtube.com/embed/d3W5GM1p9kY" allowfullscreen="allowfullscreen"></iframe></p>
<p>भारत की सामाजिक और धार्मिक रीतियों में सुगंध का अपना अलग महत्व है . किसी भी पूजा,अनुष्ठान, समारोह या आयोजन में इस सुगंध को लेकर आती है अगरबत्ती. हमारी भौतिकता और आध्यात्मिकता के बीच में ब्रिज का काम करती है अगरबत्ती, जिनकी महक से पवित्र वातावरण बनाता हैं. अगरबत्तियाँ आध्यात्मिक उपयोग &nbsp;के साथ योग, ध्यान या सिर्फ अच्छे माहौल में भी काम ली जाती है .</p>
<p>अब ऐसी सात्विक महकदार और खुशनुमा चीज़ से देश की महिलाओं को कैसे अलग रखा जा सकता था . इसलिए महिलाओं के स्वयं सहायता समूह की मदद से ऐसी ही एक पहल उज्जैन जिले में स्थित कुंगारा में की गयी . यहां के धनलक्ष्मी स्वयं सहायता समूह में, सहायक मार्गदर्शक संतोष अलावा और अध्यक्ष उषा दीदी के नेतृत्व में अगरबत्तियाँ बनाने का काम शुरू हुआ. इस समूह में <a href="https://ravivarvichar.in/khabar/ujjain-shg-making-incense-sticks">अगरबत्तियाँ</a> विभिन्न सुगंधों वाले पदार्थ &nbsp;जैसे चंदन, गुलाब , मोगरा, पाइनएप्पल आदि से बनाई जाती हैं. इस समूह की शुरआत 2021 में हुई. समूह में १२ महिलाएं हैं जो अलग अलग कार्यभार संभाल रही है . कुछ महिलाएं अगरबत्ती प्रोडक्शन में , कुछ मार्केटिंग , पैकेजिंग तथा कुछ डिस्ट्रीब्यूशन में अपनी पूरी लगन से काम कर रही है और महिला सशक्तिकरण का उदाहरण पेश कर रही है .</p>
<p>यह समूह उदाहरण है की कैसे सफल,सशक्त और सेल्फ डिपेंडेंट महिला, &nbsp;परिवार समाज और देश की स्थिति को &nbsp;बदलने में बड़ा योगदान कर सकती हैं. या यूँ कहें की कैसे धनलक्ष्मी स्वयं सहायता समूह की महिलाएं अपने आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता और आत्मबल की सुगंध हर जगह फैला रही है .</p>
<div itemprop="video" class="structured_video_d3W5GM1p9kY" itemscope="" itemtype="https://schema.org/VideoObject"><meta itemprop="uploadDate" content="2023-07-18T11:57:41+05:30"><meta itemprop="name" content="SHG women of Ujjain are making eco-friendly incense sticks from flower waste">
<div itemprop="interactionStatistic" itemtype="https://schema.org/InteractionCounter" itemscope=""><meta itemprop="interactionType" itemtype="https://schema.org/WatchAction"></div>
<meta itemprop="contentUrl" content="https://www.youtube.com/watch?v=d3W5GM1p9kY"><meta itemprop="thumbnailUrl" content="https://img.youtube.com/vi/d3W5GM1p9kY/0.jpg;"></div>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">रविवार ब्यूरो </dc:creator><pubDate>Tue, 18 Jul 2023 18:01:27 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/photovideo/ujjain-shg-women-making-eco-friendly-incense-sticks-from-flower-waste]]></guid><category><![CDATA[वीडियो]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/mQI1H9Q0Sj7kIjN2XsMi.jpeg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/mQI1H9Q0Sj7kIjN2XsMi.jpeg"/></item><item><title><![CDATA[श्रीलंका की SHG मुहीम ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/duniyadari/sri-lanka-empowering-women-through-shgs</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/b3h3E0d6ktCW0hRUJ7UQ.jpg"><p dir="ltr">सिर्फ एक देश आगे नहीं बढ़ता या घटता.  एक बार में पूरा इलाका एक जैसे हालातों से गुज़रता है. चाहे मिडल ईस्ट हो..... साउथ अमेरिका हो.....  ईस्टर्न यूरोप हो....या साउथ ईस्ट एशिया. पूरा इलाका एक जैसी स्थिति में होता है. भारतीय उपमहाद्वीप का भी कुछ ऐसा हाल है. भारत ज़रूर आगे बढ़ गया लेकिन हमारे पड़ोसी देश भी क्या उसी रफ़्तार से आगे बढ़ रहें है ? जब भी समाज में महिलाओं के दर्जे पर प्रश्न उठता है , तो हम टटोलने लगते है हमारे पड़ोसी देशों में क्या हाल है? तो आज बात निकली महिलाओं की आर्थिक आज़ादी की तो ध्यान श्रीलंका की ओर गया. श्रीलंका दक्षिण में हमारा पड़ोसी देश है. यह द्वीप राष्ट्र अपने विविध लैंडस्केप, हरे-भरे जंगलों, ख़ूबसूरत समुद्र तटों, प्राचीन शहरों और बौद्ध मंदिरों के लिए जाना जाता है. यह एक 3,000 वर्षों से अधिक पुरानी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है. </p>
<p dir="ltr">श्रीलंका में महिलाओं ने अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा के मामले में महत्वपूर्ण प्रगति की है, लेकिन अभी भी कुछ चुनौतियाँ हैं जिनका वे सामना करती हैं. श्रीलंका में उच्च महिला साक्षरता दर है और महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल और रोज़गार के अवसरों तक पहुंच है. श्रीलंका 1960 में राज्य की महिला प्रमुख का चुनाव करने वाला दुनिया का पहला देश भी था. हालाँकि, अभी भी लिंग आधारित हिंसा, भेदभाव और महिलाओं के लिए असमान वेतन से संबंधित मुद्दे हैं. राजनीति और नेतृत्व के पदों पर भी महिलाओं का प्रतिनिधित्व कम है. फिर भी, श्रीलंका में इन मुद्दों को हल करने और लैंगिक समानता को बढ़ावा देने के प्रयास किए जा रहे हैं. </p>
<p dir="ltr">अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के अनुसार, 2021 में श्रीलंका में महिलाओं के लिए श्रम बल की भागीदारी दर 36.4% रही. यह ध्यान देने योग्य है कि श्रीलंका में महिलाओं के लिए श्रम बल की भागीदारी दर हाल के वर्षों में बढ़ रही है, जो लैंगिक समानता और महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के प्रयासों को दर्शाती है. अपने पैरों पर खड़े होने के सपने को पूरा करने में स्वसहायता समूह काफ़ी मदद कर रहे है.  SHG जिसे महिला मंडल भी कहा जाता है, उसके ज़रिये महिलाएं छोटे पैमाने पर, समूह बचत और ऋण खाता खोलने की शुरुआत करती हैं. SHG न केवल अपने सदस्यों को एक-दूसरे की वित्तीय ज़रूरतों को पूरा करते हैं, बल्कि उन्हें वित्तीय प्रबंधन, टीम मैनेजमेंट और बात-चीत के अपने कौशल को सीखने और लागू करने में भी मदद करते हैं. श्रीलंका में SHG ने महिलाओं को संगठित करने और फाइनेंशियल लिट्रेसी की ज़रुरत को समझने में काफ़ी अच्छा काम किया है.  चलिए, ऐसे ही कुछ SHG के बारे में जानते है और सीखते है.  </p>
<p dir="ltr">सर्वोदय श्रमदान आंदोलन 15,000 से अधिक गांवों के नेटवर्क के साथ श्रीलंका में सबसे बड़े स्वसहायता समूहों में से एक है. समूह की स्थापना 1958 में हुई थी और इसने ग्रामीण समुदायों में सकारात्मक सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन लाने में मदद की. इसके सबसे सफ़ल कार्यक्रमों में से एक "ग्राम शक्ति" कार्यक्रम है, जिसने महिलाओं और वंचित समूहों को प्रशिक्षण, संसाधन और सहायता प्रदान करके उन्हें सशक्त बनाया है.</p>
<p dir="ltr">इसी तरह महिला विकास संघ का गठन 1981 में किया गया और श्रीलंका में महिलाओं को सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. यह आय सृजन, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में महिलाओं को प्रशिक्षण और सहायता प्रदान करता है. इसके सबसे सफल कार्यक्रमों में से एक "ग्राम सुवासरिया" कार्यक्रम है, जो ग्रामीण समुदायों को मोबाइल स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करता है.</p>
<p dir="ltr">नवजीवन पुनर्वास केंद्र का गठन 1998 में मादक पदार्थों की लत से उबरने वाले व्यक्तियों को सहायता प्रदान करने के लिए किया गया था. केंद्र लोगों को समाज में फिर से जोड़ने में मदद करने के लिए परामर्श, व्यावसायिक प्रशिक्षण और अन्य सहायता सेवाएं प्रदान करता है. इसने हजारों लोगों को व्यसन से उबरने और उत्पादक जीवन जीने में मदद की है.</p>
<p dir="ltr">सरला डेवलपमेंट फाउंडेशन की स्थापना 1997 में गरीबी और सामाजिक मुद्दों से प्रभावित बच्चों और परिवारों को सहायता प्रदान करने के लिए की गई थी. समूह कमजोर समुदायों को शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और अन्य सहायता सेवाएं प्रदान करता है. इसके "नेना गुना" कार्यक्रम ने विकलांग बच्चों को शिक्षा और अन्य सहायता सेवाएं प्रदान करके उनके जीवन को बेहतर बनाने में मदद की है.</p>
<p dir="ltr">श्रीलका के स्वसहायता समूहों ने मानों एक ऐसी मुहीम छेड़ दी जो दिन-ब-दिन उनकी आर्थिक स्थिति को सुधार रहा है और लैंगिक भेदभाव के खिलाफ जागरूकता बढ़ा रहा है.  ये SHG आगे चलकर महिलाओं की श्रम बल भागीदारी बढ़ाएगा और उनके बेहतर भविष्य का सपना पूरा कर सकेगा.  </p>
<p><strong id="docs-internal-guid-6d42436a-7fff-3df7-d34e-ba5068ac4836"><br><br></strong></p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मिस्बाह</dc:creator><pubDate>Wed, 01 Mar 2023 15:19:57 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/duniyadari/sri-lanka-empowering-women-through-shgs]]></guid><category><![CDATA[दुनियादारी]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/b3h3E0d6ktCW0hRUJ7UQ.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/b3h3E0d6ktCW0hRUJ7UQ.jpg"/></item><item><title><![CDATA[जब आएंगे हम साथ.... देंगे कोरोना को मात ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/nazariya/role-played-by-shg-women-during-covid-19</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/Q317LfowNASEwLb1HSMF.jpg"><p>कोविड-19 जैसी महामारी के बीच अपनों को टिकटोक वीडियोस और रंगबिरंगे फ्लायर्स के ज़रिये हौंसला देती SHG की महिलाओं ने सबका दिल जीता. कोविड में अपनों को खोने, पाबंदियों और अनसुनी मदद की गुहारों की कहानियां तो सबने कई बार सुनी. पर याद करिये, एक दुसरे के साथ ने कांपती उम्मीद को थामे रखा था. आज हम बात करने वाले है स्वसहायता समूहों की,  जिन्होंने ग्रामीण और दूरदराज़ के क्षेत्रों में काम किया,  जहां सरकार और मीडिया की पहुँच मुश्किल थी. SHG के योगदान केवल मास्क और सैनिटाइज़र बनाने तक ही सीमित नहीं थे. </p>
<p>कुछ इलाकों में कोरोना वाइरस को लेकर कई तरह के भ्रम थे जिसकी वजह से सही जानकारी जैसे कहीं दब गई थी. स्वसहायता समूहों ने अफवाहों और ग़लत सूचनओं पे रोक लगाने के लिए अपने व्हाट्सप्प ग्रुप के नेटवर्क का यूस किया. मोबाइल फोन, पोस्टर और साप्ताहिक बैठकों के माध्यम से हाथों की स्वच्छता और सामाजिक दूरी के बारे में जागरूकता बढ़ाकर सरकार के 'ब्रेक द चेन' अभियान की अगुवाई करी. कोविड वेक्सीनेशन के नाम से डरते लोगों को सही जानकारी दी , लोगों को स्लॉट बुक करने में मदद की और अपने समुदाय के लोगों के वेक्सीनेशन का ज़िम्मा ख़ुद लिया. उस वक़्त लोगों ने सरकार से ज़्यादा अपने समुदाय की इन महिलाओं की बात समझी. </p>
<p>ग्रामीण विकास मंत्रालय के अनुसार, करीब 68 हज़ार स्वसहायता समूहों ने 2 करोड़ से अधिक मास्क बनाकर मुफ्त बांटें . उत्तर प्रदेश में, खादी ग्रामोद्योग की मदद से, SHG सदस्यों ने 6 लाख मीटर खादी कपड़े के मास्क बनाये. SHG ने तीन लाख लीटर से अधिक सैनिटाइज़र और लगभग 50 हज़ार लीटर हैंडवॉश बनाया. खीरी जिले में, स्वसहायता समूहों ने फ्रंटलाइन स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और पुलिस कर्मियों के लिए पीपीई किट बनाने के लिए चौबीसों घंटे काम किया. इसके अलावा, हाथ धोने और सामाजिक दूरी के बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए रंगोली, टिकटॉक वीडियो और गाने जैसे तरीकों से स्थानीय भाषा में जागरूकता फैलाई. झारखंड में, SHG ने सब्जियां बेचने के लिए आजीविका फ़ार्म फ्रेश मोबाइल ऐप का उपयोग किया और सामाजिक दूरी का पालन करवाया. </p>
<p>महामारी के दौरान स्वसहायता समूहों के सबसे बड़े योगदानों में से एक जरूरतमंद लोगों को भोजन और रोज़मर्रा की ज़रूरी चीज़ों में मदद  करना रहा.  झारखंड के दीदी किचन की 4,185 सामुदायिक रसोइयों को SHG महिलाओं ने संचालित की. लोगों और परिवारों को हेल्पलाइन्स और काउंसलिंग डेस्क के ज़रिये इमोशनल सपोर्ट दिया. कई स्वसहायता समूहों ने फ़्लायर्स के ज़रिये जागरूकता अभियान चलाए और सूचना सत्र आयोजित किए. ऐसी कोशिशें ग्रामीण इलाकों में कारगर साबित हुए जहा विश्वसनीय जानकारी तक पहुंच सीमित थी.</p>
<p>SHG की इन महिलाओं ने ज़रुरत के वक़्त आगे आना और साथ देना सिखाया. ये SHG केवल अपनी आर्थिक आज़ादी के लिए ही नहीं काम करते पर वक़्त आने पर सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर ज़मीनी स्तर पर सहारा बनने का होंसला भी रखते है. ये SHG उन जगहों पर पहुंचे जहां आप और हम तो क्या, सरकार और मीडिया भी नहीं पहुंच पा रही थी.  रविवार विचार का मानना है, सही ट्रेनिंग और जानकारी लेकर ये समूह ज़मीनी स्तर पर बदलाव का ज़रिया बनेंगे. वक़्त-वक़्त पे इन स्वसहायता समूहों ने साबित किया है 'जब आएंगे हम साथ.. देंगे कोरोना को मात ' केवल कोरोना काल का एक स्लोगन नहीं पर एक दुसरे का सहारा बन बदलाव लाने की पुकार है...</p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मिस्बाह</dc:creator><pubDate>Mon, 27 Feb 2023 17:53:23 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/nazariya/role-played-by-shg-women-during-covid-19]]></guid><category><![CDATA[नज़रिया]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/Q317LfowNASEwLb1HSMF.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/Q317LfowNASEwLb1HSMF.jpg"/></item><item><title><![CDATA[SHG की मुश्किलें जिन्हें सुलझाना है ज़रूरी ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/nazariya/issues-of-shg-need-to-be-resolved</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/9THitQodEkWuuoBIriqm.jpeg"><p>स्वसहायता समूह (SHG) भारत का ऐसा माइक्रोफाइनेंस मॉडल हैं जिसका पूरी दुनिया के आर्थिक और सामाजिक संस्थानों ने लोहा माना. SHG क्रांति के बीज तो 80 के दशक में पड़ चुके थे और 90 का दशक आते आते  ग़ैर-सरकारी संगठनों (NGO) भी इस आर्थिक आंदोलन से पूरी तरह जुड़ गए. आज ये NGO, SHG के सबसे बड़े प्रमोटर (SHPI) बन गए. SHG भारत में स्वरोज़गार और गरीबी हटाने का एक बड़ा साधन बने. SHG ने ग्रामीण महिलाओं को अपना रोज़गार शुरू करने का ज़रिया बनाया और इसके साथ उन्होंने आर्थिक आज़ादी हासिल की. लेकिन इन बदलाव की कहानियों के बीच कुछ ऐसी महिलाएं भी हैं जिनमें SHG से जुड़ने को लेकर झिझक है या SHG से जुड़ने के कुछ समय बाद ही वो उससे अलग हो जाती हैं.</p>
<p>SHG में हर दिन जुड़ती महिलाओं की संख्या के बीच उन आंकड़ों पर ध्यान देने की भी ज़रुरत है जो बताते हैं कि अभी भी SHG कुछ महिलाओं का विश्वास नहीं जीत पाएं. महिलाओं का SHG से अलग हो जाने का बड़ा कारण उनका दूसरे गांव शिफ्ट कर जाना है. शादी हो जाने के कारण या पति की नौकरी, काम-धंधे में गांव बदलना या नौकरी की तलाश ग्रामीण महिलाओं को कस्बों व शहर की ओर खींच लाई. जिसकी वजह से SHG से उनका साथ छूटा. SHPI कुछ दिनों के लिए दूर जाने वाली SHG सदस्यों को छूट देने के लिए बैंकरों को समझाये और ई-बैंकिंग को बढ़ावा दे ताकि आसानी से उपस्थित न होने पर भी वो लोन का भुगतान कर सकेें.</p>
<p>कुछ महिलाएं बतातीं है कि वे SHG में शामिल नहीं हो पाई क्योंकि मौजूदा SHG सदस्य अपने फायदे को बांटना नहीं चाहती. समूह की लीडर्स कई बार अपने झुकावों, मान्यताओं, पूर्वाग्रह,  विचारों की वजह से नए सदस्यों को नहीं जोड़ती. ईमानदारी से सदस्यों में मुनाफ़े का बंटवारा न होने, बचत में पक्षपात करने, और बहीखातों का सही मैनेजमेंट न होने के कारण समूह में तनाव पैदा होता है. SHPI को लीडर्स और सभी सदस्यों के साथ बातचीत का नेटवर्क बनाना ज़रूरी है, ताकि सभी को अपनी बात कहने और संदेह दूर करने का प्लैटफॉर्म मिल सके. स्वसहायता समूहों के साथ सीधे काम करने वाली सरकारी और ग़ैर सरकारी संस्थाओं को एकसाथ आकर समूह की महिलाओं के भ्रम दूर करने होंगे। रविवार विचार भी ऐसा प्लेटफॉर्म है जहां सम्बंधित संस्थाओं को साथ लाकर स्वसहायता समूह की महिलाओं की शंकाओं का समाधान किया जाता है।  </p>
<p>कई महिलाएं अपने SHG  बनाकर बचत और व्यवसाय की शुरुआत करना चाहती हैं पर उन्हें नहीं पता किससे संपर्क करना है, या SHG में शामिल होने के लिए किस प्रक्रिया का पालन करना होगा. SHPI और सरकारी संस्थानों को बड़े पैमाने पर ऐसे इलाकों में जागरूकता अभियान चलाने की ज़रुरत है जहां महिलाएं कठिन ज़िन्दगी गुज़ार रहीं हैं. फाइनेंशियल अवेयरनेस प्रोग्राम यहां बहुत मददगार साबित हो सकते है.</p>
<p>अशिक्षा के कारण पैसों के लेन देन का सही हिसाब न रख पाने की वजह से बचत या लोन का फ़ायदा नज़र नहीं आता. फाइनेंशियल लिट्रेसी की ट्रेनिंग में ये मुद्दे सिखाये जाने चाहिए. SHG फेडरेशन SHG की पुस्तकों के रखरखाव के लिए बुक कीपर रखे जो समय समय पर उनका ऑडिट करे. ये प्रैक्टिस उनमे पारदर्शिता लाकर एक दूसरे के लिए विश्वास बढ़ाएगी.</p>
<p>मार्केटिंग,पैकेजिंग, सोशल मीडिया,और डिस्ट्रीब्यूशन चैनल की समझ न होने के कारण समूह अपने उत्पादों को एक दायरे के बाहर नहीं ले जा पाते. उन्हें इस दिशा में SHPI और सरकार से मिली ट्रैनिंग से राज्य, देश, यहां तक कि विदेश में प्रोडक्ट बेचने में मदद मिलेगी.</p>
<p>SHG आज पूरे देश में आर्थिक क्रांति ला रहें है, यदि उनकी समस्याओं पर ग़ौर कर उन्हें समाधान बताया जाये तो SHG महिलाओं की आर्थिक आज़ादी को और आगे ले जा पाएंगे. इसके लिए इस दिशा में काम कर रहें सरकारी और ग़ैर सरकारी संस्थानों को एक साथ आने की ज़रुरत है। और यही पहल कर रहा है रविवार …</p>
<p><img src="https://d2vbj8g7upsspg.cloudfront.net/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/7OX5sOurpZMec44avcaa.jpeg" alt="shg"></p>
<p><em>(Image Credits: Google images)</em></p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">रविवार ब्यूरो </dc:creator><pubDate>Sat, 18 Feb 2023 18:42:24 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/nazariya/issues-of-shg-need-to-be-resolved]]></guid><category><![CDATA[नज़रिया]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/9THitQodEkWuuoBIriqm.jpeg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/9THitQodEkWuuoBIriqm.jpeg"/></item><item><title><![CDATA[फसल की महक को ज़िंदा कर दिया देसी जुगाड़ ने...... ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/kahaniyan/farming-by-shg-women-in-sagar</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/s9dcNc1XAVSOj2t16vQS.jpg"><p>मेहनत हमेशा सफलता ही दिलाती है,  मेहनत को ही सब कुछ माना गया. सामाजिक व्यवस्था में कई महिलाएं  दो मोर्चों पर यह मेहनत करती देखी जा सकती हैं.पहले घर परिवार की देखरेख फिर दूसरे मोर्चे पर खेतों में  जाकर अपना खून पसीना डालती हैं. पसीना बहाने और लगातार मेहनत के बावजूद भी कई बार सफलता मिलते-मिलते पानी फिर जाता है.कुछ महिलाओं ने परिस्थियों से निपटने और असफलता को ठेंगा दिखाने की ठान ली। इन महिलाओं ने अपनी किस्मत कोसने की बजाए कुछ करने की सोची. उन्हें असफलता मंजूर नहीं थी। एक दिन समूह की महिला सदस्य आपस में मिलीं, कई तरह के विकल्पों पर विचार किया.</p>
<p>लेकिन महंगाई हर जगह आड़े आ रही थी।बावजूद हिम्मत से इन महिलाओं ने  वह कर दिखाया जो अब खेती में दूसरे किसानों के लिए मिसाल बन गया. आर्थिक परेशानी और महंगी मशीनों को खरीदने में असमर्थ इन महिलाओं ने देसी जुगाड़ और अपनी समझ से वह सारे रास्ते खोल दिए जो फसल खराब होने से बच सकें. SHG की इन महिलाओं को आजीविका मिशन और प्रशासन का साथ मिला.आइडिया मिलते ही उन्होंने गजब कर दिया. नतीजा यह रहा कि असफलता को हराकर महिलाओं ने सफलता के नए झंडे गाड़ दिए. विकासखंड केसली के ऊंटकटा  गांव में संगीता रानी, बबीता रानी गौड़ की यह कहानी है. देसी जुगाड़ की मशीनों को बनाने के लिए दूसरे समूह भी अब यह गुर अपना रहे हैं. महिलाओं ने बड़ी मेहनत से अच्छी किस्म के चावल खेतों में रोपे. चावल की फसल पकने लगी. उसकी महक चारों ओर फैलने लगी.सामान्यतौर पर छत्तीसगढ़ क्षेत्र में उगाई जाने वाली फसल पर अपनी किस्मत आजमाई। महिलाओं को इसमें सफलता मिली भी। चावल की फसल उनके खेतों में लहलहाने लगी.अपनी फसल को और बेहतर बनाने के लिए महिलाओं ने अच्छे किस्म बीज अन्य जिलों से मंगवाए। जब फसल अपने पूरे शबाब पर आयी तो पूरे इलाके में चावल की महक थी. अब हवाओं के साथ महिलाओं की ज़िन्दगी भी खुशबूदार हो चली थी। ये खुशबू और खुशियां अभी मेड़ पर खड़ी हुई ही थी,और ये खलिहानो तक पहुंचती इसके पहले ही ये खुशियां और महक अधिक समय तक टिक न सकी.</p>
<p>यहां की महिलाओं ने खेतों में पसीना बहाया और फिर फसल लहलाई. जब फसल काटने की बारी आई तो कभी कीड़ों की मार तो कभी खर-पतवार ने तैयार फसलों को ही खत्म कर दिया. हाथ आते-आते फसलें तबाह हो गई. कई बार नुकसान झेलने के बाद भी इन महिलाओं ने हार नहीं मानी. अच्छे किस्म के चावल की खुशबू  के कारण कीड़ों,कीट-पतंगों ने फसलों पर अटैक कर दिया.उनकी आंखों के सामने देखते ही देखते फसलें नष्ट हो गई. चावल के दाने आधे-अधूरे जमीन पर बिखर गए. ऐसा हर साल हो रहा था.</p>
<p>संगीता,बबीता और अन्य महिला साथियों ने अपनी परेशानी प्रशासन और कृषि से जुड़े विशेषज्ञों को बताई. किसान दीदियों ने अपने ही बल पर ऐसा जुगाड़ लगाया कि केवल 15 रुपए में कीड़े मारने की मशीन बना ली. बबीता ने बताया कि मटका, चुंगी जिसे आम बोलचाल की भाषा में कुप्पी कहते हैं,इसके अलावा बल्ब,डोरी और पुराने पाइप का टुकड़ा लेकर इसे तैयार किया.फसलों के बीच इसे लगाया. बल्ब की तेज रोशनी से कीड़े इस यंत्र की ओर खींचे चले आए. कुप्पी से जुड़े मटके में पाइप से गिरते चले गए. मटके में पहले से भरे पानी में यह कीड़े मर गए. सदस्यों का कहना है कि इस जुगाड़ से जहां उनका खर्च बचा वही घातक केमिकल का भी उपयोग नहीं करना पड़ा.</p>
<p>संगीता ने बताया अभी समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी.फसलों के बीच उन्होंने कीड़ों पर काबू तो पाया परंतु खर-पतवार की मुसीबत अभी भी बनी हुई थी. इससे फसलों की सही ग्रोथ नहीं हो पा रही थी. जितना मूल्य फसलों का होना चाहिए था वह नहीं मिल रहा था.हार से सामना करने की यह दूसरी लड़ाई अभी बाकी थी. आखिर उन्होंने दूसरा एक और जुगाड़ लगाया. इस जुगाड़ में उन्होंने कोनोवीडर तक बना दिया. इसको फसलों के बीच कतार में चलाया.समूह ने बताया कि इससे जहां मिट्टी उलट-पुलट हुई वहीं खर-पतवार भी पूरी तरह नष्ट हो गया. फसलों को एक नई रफ्तार मिल गई. कोइवीडर में पहिया लगाकर उसे चलाया.जिससे आसानी हुई. खेती को कमाई का जरिया बनाने वाले इस समूह ने और अधिक मेहनत की.उन्होंने अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए नए प्रयोग भी करना शुरू किए. उन्होंने चावल की खेती के बीच तुअर की दाल को भी उगाने का प्रयोग किया. यह प्रयोग भी उनका बेहद सफल रहा. निर्धारित दूरी पर यह तुअर के पौधे तैयार हुए. और अच्छी फसल का दाम उन्हें मिला.आय बढ़ाने में यह मददगार साबित हो गई.उनका यह मिशन यही नहीं थमा।  यहां तक कि उन्होंने केंचुआ खाद बनाकर भी अतिरिक्त फायदा उठाया.</p>
<p>जिला प्रशासन ने SHG की इन महिलाओं को खेती के अलावा सेनेटरी नैपकिन बनाने आचार,पापड़ बनाने का भी काम दिया.बबीता और अन्य साथियों का कहना है -"मेहनत को उन्होंने बेकार नहीं जाने दिया, साबित कर दिया कि ज़िद और लक्ष्य तय हो तो देसी जुगाड़ से भी सफलता मिल सकती है।"</p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"> त्रिशा निंबालकर </dc:creator><pubDate>Sat, 18 Feb 2023 18:27:22 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/kahaniyan/farming-by-shg-women-in-sagar]]></guid><category><![CDATA[कहानियां]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/s9dcNc1XAVSOj2t16vQS.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/s9dcNc1XAVSOj2t16vQS.jpg"/></item></channel></rss>