<rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" xmlns:dcterms="http://purl.org/dc/terms/" xmlns:geo="http://www.w3.org/2003/01/geo/wgs84_pos#" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/" xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/" xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/" version="2.0"><channel xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/"><title><![CDATA[ NCRB]]></title><link>https://ravivarvichar.in/tags/ncrb</link><description/><atom:link href="https://ravivarvichar.in/rss/tags/ncrb" rel="self"/><language>en-us</language><lastBuildDate>Sat, 29 Jul 2023 13:38:04 +0530</lastBuildDate><item><title><![CDATA['2021 में 375,058 महिलाएं, 90,113 लड़कियां हुईं लापता' -NCRB ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/sharminda/ncrb-releases-shocking-data-on-missing-women</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/eRSqgKofq6jMI2bnJRwd.jpg"><p>राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में लापता होने वाली महिलाओं और लड़कियों की सबसे ज्यादा संख्या मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) और महाराष्ट्र (Maharashtra) से है.</p>
<p>NCRB के अनुसार, दोनों राज्यों में वर्ष 2019, 2020 और 2021 में दूसरे सभी राज्यों की तुलना में लड़कियों और महिलाओं के लापता होने के सबसे ज़्यादा मामले दर्ज किए गए (<a href="https://ravivarvichar.in/nazariya/gender-based-violence-against-women">NCRB </a>releases data on missing women).</p>
<p>गृह मंत्रालय (MHA) ने एक बयान में कहा, अकेले 2021 में, देश भर में 18 साल से ज़्यादा उम्र की 375,058 महिलाओं के लापता होने की सूचना मिली, साथ ही 18 साल से कम उम्र की करीब 90,113<a href="https://ravivarvichar.in/sharminda/domestic-violence-in-india-is-increasing-rapidly"> लड़कियां </a>&nbsp;भी लापता थीं.</p>
<h2>सरकार ने महिला सुरक्षा के लिए उठाये कईं कदम&nbsp;</h2>
<p>महाराष्ट्र सरकार ने <a href="https://ravivarvichar.in/sharminda/womens-safety-a-matter-of-concern">महिला सुरक्षा</a> (women safety) के लिए कदम उठाते हुए महिला सेल, महिला पुलिस कक्ष (महिला हेल्प डेस्क पुलिस स्टेशन स्तर), महिला सुरक्षा समिति, मानव तस्करी विरोधी इकाई और महिलाओं के खिलाफ अपराध की जांच इकाइयों की शुरुआत की.</p>
<p>केंद्र ने यौन अपराधों (sexual assault) के खिलाफ प्रभावी रोकथाम के लिए आपराधिक कानून (संशोधन), अधिनियम 2013 को लागू करने सहित देश भर में महिलाओं की सुरक्षा के लिए कई पहल की हैं.&nbsp;</p>
<p>आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2018 में 12 साल से कम उम्र की लड़कियों के बलात्कार के लिए मौत की सजा सहित सख्त दंडात्मक प्रावधान पेश किए गए. स्मार्ट पुलिसिंग और सुरक्षा प्रबंधन के लिए तकनीक का इस्तेमाल करते हुए आठ शहरों में सुरक्षित शहर परियोजनाएं स्वीकृत की गईं. गृह मंत्रालय (एमएचए) ने देश भर में यौन अपराधियों पर नज़र रखने के लिए एक साइबर-अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (Cyber-crime Reporting Portal) और 'यौन अपराधियों पर राष्ट्रीय डेटाबेस' (NDSO) लॉन्च किया.&nbsp;</p>
<p>गृह मंत्रालय ने देश के सभी जिलों में <a href="https://ravivarvichar.in/sharminda/female-artists-in-cafes-and-pubs-in-delhi-fights-with-safety-issues">महिला</a> सहायता डेस्क और मानव तस्करी विरोधी इकाइयों की स्थापना के लिए परियोजनाओं को मंजूरी दी. इसके अलावा, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने हिंसा और संकट से जूझ रही महिलाओं को सहायता देने के लिए 733 वन-स्टॉप सेंटर (One Stop Center) शुरू किए.&nbsp;</p>
<h3>पर क्या ये कानून काफी हैं?</h3>
<p>पर क्या ये कानून काफी हैं? अधिनियमों, योजनाओं, और भाषणों के बीच मानसिकता में बदलाव लाने की बात कहीं खो जाती है. भारत से लेकर UN तक की रिपोर्ट बता रही है कि बदलाव की शुरुआत ज़मीनी स्तर से करनी होगी. और इस &nbsp;बदलाव का सफ़र न्यायालयों, सरकारी दफ्तरों, या पुलिस थानों से नहीं, बल्कि हमारे घरों से शुरू होगा. बेटा और बेटी में फर्क, घर की महिलाओं को अधिकार न मिलना, गलत होता देख चुप रह जाना, महिलाओं में जागरूकता की कमी... इन आदतों को छोड़ अपनी सोच को बदलना होगा. तभी कानून जीत सकेगा. &nbsp;</p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मिस्बाह</dc:creator><pubDate>Sat, 29 Jul 2023 13:38:04 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/sharminda/ncrb-releases-shocking-data-on-missing-women]]></guid><category><![CDATA[शर्मिन्दा]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/eRSqgKofq6jMI2bnJRwd.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/eRSqgKofq6jMI2bnJRwd.jpg"/></item><item><title><![CDATA[लिंग आधारित हिंसा किस आधार पर ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/nazariya/gender-based-violence-against-women</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/tWoFLUXoWNUFcXLKWMnV.jpg"><p dir="ltr">हिंसा शब्द सुनते ही मन डर जाता है.  मूवी हो या अखबार, सड़क हो या सोशल मीडिया, हर जगह हिंसा के बारे में सुनने या देखने को मिल जायेगा. आसान शब्दों में समझें तो किसीको शारीरिक या मानसिक चोट पहुंचाने को हिंसा कहते हैं. ये हिंसा यदि लिंग के आधार पर हो तो उसे लिंग आधारित हिंसा कहते है. लिंग आधारित हिंसा में शारीरिक, यौन, मनोवैज्ञानिक, आर्थिक और भावनात्मक शोषण शामिल हो सकते हैं. दहेज़-हत्या, यौन उत्पीड़न, महिलाओं से लूटपाट, लड़कियों या महिलाओं से छेड़-छाड़, ज़बरदस्ती विवाह, अपहरण या बहला फुसला के भगा ले जाना, शारीरिक या मानसिक शोषण, पत्नी से मारपीट, इत्यादि लिंग के आधार पर हिंसा के कुछ उदाहरण हैं.  इन्हें भारतीय दंड संहिता ने गंभीर अपराध की श्रेणी में रखा. इसके बावजूद महिला हिंसा से जुड़े केसों में लगातर बढ़ोतरी हो रही है. </p>
<p dir="ltr">NCRB (नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो) के हिसाब से महिलाओं के खिलाफ होने वाले 4,28,278 मामले दर्ज हुए.  29. 3 % भारतीय विवाहित महिलाओं ने और 3.1 % गर्भवती महिलाओं ने घरेलु हिंसा का सामना किया है. यूएन वुमेन की रिपोर्ट ने बताया साल 2021 में हर घंटे पांच लड़कियों की हत्‍या हुई. और हर केस में हत्‍या करने वाला कोई और नहीं, बल्कि उनका कोई अपना करीबी और परिवार का व्‍यक्ति था. इस रिपोर्ट के मुताबिक पूरी दुनिया में 81,100 महिलाओं की हत्‍या हुई, जिसमें से 56 % यानी 45,000 महिलाओं की हत्‍या करने वाले उनके परिवार के लोग और उनके पति, प्रेमी आदि करीबी लोग थे.</p>
<p dir="ltr">कई महिलाएं डर की वजह से शिकायत दर्ज ही नहीं करतीं, अगर उनकी संख्या मिलाये जाये तो ये आंकड़े दोगुने हो जायेंगे.अपने अधिकारों के प्रति जागरूक न होना और मदद मांगने में झिझक की वजह से ये महिलाएं शिकायत नहीं करतीं. ये आंकड़े समाज की आधी आबादी की सुरक्षा पर सवाल उठाते हैं. न्याय मिलने में देरी, पुरुषवादी मानसिकता, जागरूकता की कमी जैसी कई वजहों से इन आंकड़ों पर लगाम नहीं लग पा रही. महिलाएं तय किये गए जेंडर रोल्स और सामाजिक ढर्रे में इस क़दर धस जाती हैं कि कई बार ग़लत को ग़लत समझने से इंकार कर देती  हैं. पति की मार, सड़क पर छेड़छाड़, या दहेज़ की फरमाइश होने पर कहती हैं, "ऐसा ही तो होता हैं, समाज को कौन बदल सकता है."  </p>
<p dir="ltr">महिलाओं के साथ हो रही हिंसा से निपटना समाज सेवकों की ज़िम्मेदारी ही नहीं एक चुनौती भी है. महिलाओं को जरुरत है कि जागरूक बने की वे खुद दूसरों पर निर्भर न रह कर अपनी जिम्मेदारी खुद ले तथा अपने अधिकारों, सुविधाओं के प्रति जागरूक हो. लड़के और लड़कियों को लैंगिक बराबरी, कंसेंट, और सेक्स एजुकेशन की क्लासेस इन केसेस को रोकने में मदद कर सकती हैं. इसकी शुरुआत स्कूलों से होनी चाहिए. लड़कियां यदि सामाजिक और आर्थिक रूप से सशक्त होंगी तो अपने लिए आवाज़ उठा सकेंगी. सरकार, प्रशासन, न्यायालय, समाज और सामाजिक संस्थाओं को ज़रुरत है कि वो ज़मीने स्तर पर ऐसी हिंसा की वजहों पर काम करें.   <strong id="docs-internal-guid-74a0c403-7fff-5403-4991-0cac640e823f"></strong></p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मिस्बाह</dc:creator><pubDate>Sun, 09 Apr 2023 13:00:38 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/nazariya/gender-based-violence-against-women]]></guid><category><![CDATA[नज़रिया]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/tWoFLUXoWNUFcXLKWMnV.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/tWoFLUXoWNUFcXLKWMnV.jpg"/></item></channel></rss>