<rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" xmlns:dcterms="http://purl.org/dc/terms/" xmlns:geo="http://www.w3.org/2003/01/geo/wgs84_pos#" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/" xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/" xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/" version="2.0"><channel xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/"><title><![CDATA[ नेचर फ्रेंडली]]></title><link>https://ravivarvichar.in/tags/necr-phrenddlii</link><description/><atom:link href="https://ravivarvichar.in/rss/tags/necr-phrenddlii" rel="self"/><language>en-us</language><lastBuildDate>Thu, 10 Aug 2023 17:08:08 +0530</lastBuildDate><item><title><![CDATA[महिलाएं बाँध रहीं पर्यावरण संरक्षण की डोर ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/khabar/jaunpur-shg-females-making-ecofriendly-rakhis-from-pine-leaves</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/tuEBqpiw3q5dl77ZnhnR.jpg"><h2 dir="ltr"><span><strong>जौनपुर की SHG महिलाएं बना रहीं इकोफ्रेंडली राखियां</strong></span></h2>
<p dir="ltr"><span><strong>अगस्त का महिना</strong> आते ही त्योहारों और उमंग की लहर बढ़ जाती है हर व्यक्ति में. <strong>रक्षाबंधन</strong> हो या <strong>सावन</strong>, महिलाओं के लिए अगस्त का पूरा महिना कुछ ना कुछ ख़ुशी लेकर आता है. ऐसे ही कुछ महिलाओं ने अपने रक्षाबंधन को और <a href="https://ravivarvichar.in/kahaniyan/lady-tarzan-jamuna-tudu-rescuing-forests-of-jharkhand-with-her-rescue-army" rel="dofollow"><strong>नेचर फ्रेंडली</strong></a> और खुशहाल बनाने के लिए नए प्रकार की राखी बनाना शुरू की है. <strong><a href="https://ravivarvichar.in/khabar/prayagraj-shg-women-are-making-moong-products-which-are-in-high-demand" rel="dofollow">उत्तरप्रदेश</a> के जौनपुर ब्लॉक के टिकरी गांव में राधा रानी स्वयं सहायता समूह (SHG) से जुड़ी महिलाएं चीड़ की पत्तियों से ईको फ्रेंडली राखियां बना रही हैं, जिन्हे ग्राहक काफी पसंद कर रहे है. जो ग्राहकों को काफी पसंद आ रही हैं.</strong></span></p>
<h2 dir="ltr"><span><strong>वन विभाग दे रहा महिलाओं को ट्रेनिंग&nbsp;</strong></span><b></b></h2>
<p dir="ltr"><span>जंगलों के दुश्मन माने जाने वाले चीड़ के पत्तों को एकत्र कर उसके इस्तेमाल से न केवल पर्यावरण संरक्षण हो रहा है, बल्कि जंगल में आग का खतरा भी कम हो रहा है. इससे महिलाओं को आमदनी बढ़ाने का मौका भी मिल गया है. <strong><a href="https://ravivarvichar.in/khabar/gujarat-shg-women-making-cocopeat-from-coconut-waste-with-the-help-of-forest-department-and-mahakali-temple-trust" rel="dofollow">वन विभाग</a> की ओर से राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन </strong>के तहत महिलाओं को चीड़ की पत्तियों से <strong>राखी समेत अन्य सामान बनाने का प्रशिक्षण</strong> दिया गया जा रहा है.</span><b></b></p>
<p dir="ltr"><span>सोनम देवी, जो कि एक राखी मेकर है, बताती हैं- "<em>राखी बनाने के लिए हम चीड़ की पत्तियों के साथ रेशम के धागे का उपयोग कर रहे हैं. इसमें प्लास्टिक या उससे जुड़ी किसी भी तरह की सामग्री नहीं लगाई जा रही है, इसलिए यह पूरी तरह ईको फ्रेंडली राखी है.</em>"</span><b></b></p>
<h2 dir="ltr"><span>चीड़ की पत्तियों से बनाती है कई उत्पाद</span></h2>
<p dir="ltr"><span><strong>राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन</strong> के <strong>ब्लॉक मैनेजर दीपक बहुगुणा </strong>बताते हैं- "<em>प्रधानमंत्री मोदी के वोकल फॉर लोकल योजना को प्रोत्साहित करने की दिशा में इस योजना का संचालन किया जा रहा है. इसके साथ ही महिलाओं को लगातार पत्ती से आवश्यक सामग्री बनाने का प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है.</em>" रक्षाबंधन का त्योहार करीब होने के कारण इन दिनों महिलाएं राखियां बनाने में जुटी हैं. हालांकि अन्य दिनों में वे <a href="https://ravivarvichar.in/khabar/shg-women-from-himachal-pradesh-earns-by-making-handicraft-with-pine-leaves">चीड़ की पत्तियों</a><strong>&nbsp;से टोकरी, मोबाइल स्टैंड, पेन स्टैंड, गुलदान </strong>आदि भी बनाती हैं. यह महिलाएं राखियां बनाकर अपने लिए जीविका का स्त्रोत तैयार कर रहीं है. सरकार को इन महिलाओं के बिज़नेस को आगे बढ़ाने के लिए और भी प्रयास करते रहने चाहिए. उत्तरप्रदेश के साथ बाकी प्रदेशों की महिलाओं को भी इस राखी के सीज़न में अपना बिज़नेस तैयार कर स्वावलंबी बनाने के तरफ कदम बढ़ाने चाहिए.</span></p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">रिसिका जोशी</dc:creator><pubDate>Thu, 10 Aug 2023 17:08:08 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/khabar/jaunpur-shg-females-making-ecofriendly-rakhis-from-pine-leaves]]></guid><category><![CDATA[ख़बर]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/tuEBqpiw3q5dl77ZnhnR.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/tuEBqpiw3q5dl77ZnhnR.jpg"/></item><item><title><![CDATA[लाख की गुड़िया बनेगी लाखों कि फेवरेट ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/kahaniyan/shg-women-making-lac-dolls-in-balasore-kala-kendra-odisha</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/09wLUUKcp4MZHHVVlLNC.jpg"><p dir="ltr">गुड़िया देखते ही बचपन को याद करने लगता है व्यक्ति. कोई परेशानी नहीं, कोई टेंशन नहीं, बस हम और हमारे खिलौने. माँ-पापा या दादी दादा से पूछेंगे तो वो भी यही बताएंगे. बस अंतर होगा तो हमारे और उनके खिलौनों में. वे लोग <strong>मिट्टी और लाख के गुड्डे गुड़ियों</strong> से खेला करते थे और आज के बच्चों के पास हर खिलौना प्लास्टिक के बने होते है. अब तो बच्चों को पता ही नहीं कि <strong>लाख के खिलौने</strong> भी होते है. <strong>ओडिशा के बालासोर शहर</strong> के बाहरी इलाके <strong>कोशाम्बा नगर गाँव</strong> में भी <strong>लाख के गुड्डा गुड़िया</strong> बनाने वाली कारीगर महिलाएं रहती है. अपना स्वयं सहायता समूह (SHG) बनाकर यह महिलाएं लाख के गुड़ियाँ बना रहीं है. देश में जब से प्लास्टिक के खिलौनों का चलन बढ़ा, इन महिलाओं के व्यवसाय पर काफी नकारात्मक असर हुआ है लेकिन फिर भी ये महिलाएं अपने पारम्परिक काम और शिल्पकारी को छोड़ना नहीं चाहतीं.<strong> </strong></p>
<p dir="ltr">कनकलता इस समूह की प्रमुख है, वे बताती है- "<em>हमने 2005 में 15 महिलाओं के साथ बिनापानी self help group का गठन किया और तब से हम विभिन्न आकारों की लाख मूर्तियां जौकंधेई बना रहे हैं.</em>" यह <strong>ओडिशा की एक पारंपरिक लोक कला</strong> है. कनकलता और अन्य महिलाएं जो गुड़िया बना रही थीं, उन्हें <strong>बालेश्वरी जौकंधेई</strong> कहा जाता है. इन गुड़ियों के ढांचे मिट्टी से बने होते हैं जिनपर चमकदार लाख पेंट लगाकर तैयार किया जाता है. <strong>जौकंधेई गुड़िया</strong> आमतौर पर एक पुरुष और एक महिला के जोड़े में होती हैं, और इन्हें वैवाहिक सुख का शुभ प्रतीक माना जाता है. वे साबित्री व्रत जैसे त्योहारों का एक अभिन्न अंग भी हैं. </p>
<p dir="ltr">एक कारीगर इस शिल्प से प्रति माह 10,000 रुपये से 30,000 रुपये के बीच कमाता है. हां यह सच है कि प्लास्टिक ने इस मार्केट को बहुत नुकसान पहुंचाया है, लेकिन जब से 'नेचर फ्रेंडली' चीज़ों का प्रचलन शुरू हुआ है, तब से इन गुड़ियों की मांग बढ़ी है. ओडिशा और देश की सरकार इन पारंपरिक कलाओं को बढ़ावा दे रही है, जिससे इन कारीगरों को अपना कौशल दिखाने का मौका मिल रहा है. <strong>रविवार विचार</strong> का मानना है कि हमारी संस्कृति के ज़रूरी हिस्से है ये कलाएं. इन्हे खो देना किसी भी नज़रिये से फायदेमंद नहीं होगा. सरकार को इन कौशलों को आगे बढ़ाने के लिए शिल्प मेले और प्रदर्शियां का आयोजन करना चाहिए ताकि महिला SHGs को एक स्टेज मिल पाए. हलाकि, यह महिलाएं अब खुश है कि इन्हें अपने प्रदर्शनियों से काफी फायदा हो रहा है. इसी तरह से महिलाओं का कौशल भी दुइनया के सामने आगे और वे अपना जीवन भी खुशहाल बना पाएंगी.</p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">रिसिका जोशी</dc:creator><pubDate>Sat, 10 Jun 2023 18:00:09 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/kahaniyan/shg-women-making-lac-dolls-in-balasore-kala-kendra-odisha]]></guid><category><![CDATA[कहानियां]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/09wLUUKcp4MZHHVVlLNC.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/09wLUUKcp4MZHHVVlLNC.jpg"/></item><item><title><![CDATA[गोबर पेंट से रंगीन होगी प्राकृति ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/khabar/shg-women-make-natural-paint-from-cow-dung</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/DfmDcxDSsyLJ0fVuhSGk.PNG"><p dir="ltr">आज चारों तरफ़ नेचर को बचाने की चर्चा है. हर वो चीज़ जो हमारे पर्यावरण को नुक्सान पहुंचाए, उसके विकल्प ढूंढे जा रहे हैं. प्लास्टिक, फैक्ट्री, वाहन सब पर्यावरण को नुक्सान पहुंचा रहे हैं. इस लिस्ट में वॉल पेंट भी शामिल है. पेंट हमारे घर, फर्नीचर, और सामान को रंग देकर उनकी खूबसूरती में चार चांद लगाते हैं. लेकिन ये रंगबिरंगे पेंट जिन केमिकल से बनाये जाते हैं वह ओज़ोन को नुक्सान पहुंचाकर ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ाते हैं. इस पेंट का नेचुरल विकल्प निकाला है स्वसहायता समूहों ने. इन महिलाओं ने गोबर से जैविक पेंट बनाकर तैयार किया. ये गोबर पेंट पानी और प्राकृतिक रंग जैसे हल्दी, इंडिगो और मेंहदी को मिलाकर बनाये जाते हैं. मिश्रण को फिर दीवारों, फर्श और अन्य सतहों पर लगाते हैं. गाय के गोबर में प्राकृतिक एंटीसेप्टिक गुण होते हैं, और इस पेंट का इस्तेमाल कीड़ों, बैक्टीरिया और फंगस को हटाने में भी मदद करता है.</p>
<p dir="ltr">छत्तीसगढ़ में गाय के गोबर से प्राकृतिक पेंट बनाने के लिए 19 इकाइयां स्थापित की गई. 13,063 SHG की 150,036 महिलाएं गोबर पेंट बना रही हैं. छत्तीसगढ़ में गाय के गोबर से बने लगभग 60 प्रतिशत प्राकृतिक पेंट महिला स्वसहायता समूहों (SHG) के ज़रिये बाज़ार में बेचे जा रहे हैं. भूपेश बघेल सरकार गौठान (पशुधन शेड) योजना के तहत पशुपालकों से 2 रुपये किलो के हिसाब से गाय का गोबर खरीदती है और इसे स्वसहायता समूहों को देती है ताकि वे इसे प्राकृतिक पेंट और वर्मीकम्पोस्ट में बदल सकें.अब तक, इन इकाइयों ने 44,160 लीटर प्राकृतिक पेंट बनाया. उन्होंने 26,292 लीटर की बिक्री से 47.71 लाख रुपये का मुनाफा कमाया है. रायपुर जिले ने सबसे अधिक पेंट (20,841 लीटर) का उत्पादन किया, इसके बाद कांकेर (7,878 लीटर) का स्थान रहा. महिला SHG ने 200 करोड़ रुपये से अधिक की कम्पोस्ट खाद बेची. गांवों में स्वसहायता समूह जैविक खाद और गाय के गोबर से बने कीटनाशकों के उत्पादन और बिक्री के साथ-साथ गो-कश्त, मिट्टी के दीये, अगरबत्ती, मूर्ति और अन्य सामग्री जैसी वस्तुओं का उत्पादन और बिक्री कर अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं.</p>
<p dir="ltr">छत्तीसगढ़ के अलावा और भी राज्यों में गोबर पेंट बनाने का काम SHG महिलाएं ज़ोरो-शोर से कर रही हैं. राजस्थान का कुम्भा महिला स्वसहायता समूह एक दशक से ज़्यादा समय से गाय के गोबर का पेंट बना रहा है. उन्होंने अपने पर्यावरण के अनुकूल पेंट के लिए पहचान हासिल की है और अपने काम के लिए कई पुरस्कार प्राप्त किए हैं.तमिलनाडु की महिला विकास स्वसहायता समूह ने गाय के गोबर का पेंट बनाना शुरू किया, ताकि उनके मवेशियों के कचरे का उपयोग किया जा सके और आय उत्पन्न की जा सके. बिहार के सनिता देवी महिला स्वसहायता समूह ने 2018 में गाय के गोबर का पेंट बनाना शुरू किया. </p>
<p dir="ltr">देशभर में और भी जगहों की SHG महिलाएं गोबर से पेंट बना कर पर्यावरण के अनुकूल प्रथाओं को भी बढ़ावा दे रही हैं. इन महिलाओं को सही ट्रेनिंग और तकनीक तक पहुंचाकर देकर पर्यावरण संरक्षण के और भी मुद्दों पर काम किया जा सकता है. इन महिलाओं के सहयोग और उनके इनोवेशन का सहयोग लेकर ज़मीने स्तर पर नेचर फ्रेंडली प्रेक्टिसेस को लागू करवाया जा सकता है.  <strong id="docs-internal-guid-39213382-7fff-fb17-b427-c03cbbb6c76c"><br><br><br><br><br></strong></p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मिस्बाह</dc:creator><pubDate>Sat, 18 Mar 2023 18:34:31 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/khabar/shg-women-make-natural-paint-from-cow-dung]]></guid><category><![CDATA[ख़बर]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/DfmDcxDSsyLJ0fVuhSGk.PNG" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/DfmDcxDSsyLJ0fVuhSGk.PNG"/></item><item><title><![CDATA[अब नहीं मिलेगा रंग में भंग ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/khabar/shg-women-making-herbal-gulal</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/HuElRJkwHr0fhxTYIqka.jpg"><p dir="ltr"><em>रंगों भरी पिचकारी, उड़ता गुलाल, गुजिये की महक, और चारों ओर बिखरी खुशियां.  लेकिन होली के रंग में भंग मिला सकते हैं सिंथेटिक गुलाल.  हर साल लगभग 1 करोड़ टन रासायनिक/सिंथेटिक रंगों का इस्तेमाल खुशियों को फीका कर देता है. हर होली पर हम स्किन इन्फेक्शन या आंख में जलन की परेशानी के बारे में सुन ही लेते है. इन सिंथेटिक रंगों का न सिर्फ त्वचा बल्कि पर्यावरण पर भी बुरा असर पड़ता है. यही वजह है कि अक्सर विशेषज्ञ लोगों को होली में कुदरती या हर्बल रंग को इस्तेमाल करने की सलाह देते हैं.</em></p>
<p dir="ltr"><em>पूरे भारत में कई जगहों पर स्वसहायता समूहों की महिलाएं सब्ज़ी, फूलों ओर पत्तियों से नेचुरल गुलाल बना रहीं है. अब आप इन रंगों से बिना अपनी त्वचा की चिंता किये होली पर धूम मचा सकते हैं. आइये, देखते हैं इस बार कोनसे SHG हर्बल रंगों से इस होली में रंग भर रहें हैं -</em></p>
<p dir="ltr"><span style="color: rgb(230, 126, 35);">उत्तर प्रदेश <span style="color: rgb(0, 0, 0);">के कई जिलों की महिलाएं पलाश के फूलों से हर्बल गुलाल तैयार कर रही हैं.  उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर, सोनभद्र, वाराणसी,चंदौल, और चित्रकूट जिले की SHG के 5 हज़ार किलो से ज़्यादा हर्बल गुलाल ज़ोर-शोर से बाज़ारों में बिके. पलाश के फूलों से इन महिलाओं ने लाल, हरे, बैंगनी, गुलाबी गुलाल तैयार किये. लंदन समेत भारत में मध्य प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़, बिहार और उत्तराखंड में भी ये गुलाल बेचे. </span></span></p>
<p dir="ltr"><span style="background-color: rgb(0, 0, 0);"><img class="center" style="width: 499px; height: 231px;" src="https://lh5.googleusercontent.com/w1x9lzMJuyGmPK1UauD7n0FbQ8Qt9vHHyG22tE0jSLjM2mkX_YIUZUOSPRBOln7mYLkbbhaWwzARr9H-9qhzyz8Lh7rzCJP3bRCJ2b5Oif1BJ1dKMTeoe4dAaZKO-Q6E3fm2-3g_m0ukKrnxBPoc0qo"></span></p>
<p dir="ltr"><em><span style="font-size: 8pt;">Image Credits: google Images</span></em></p>
<p class="center" dir="ltr"><span style="color: rgb(53, 152, 219);"><span style="color: rgb(0, 0, 0);"><span style="color: rgb(35, 111, 161);">ग्राम नागारास</span>, <span style="color: rgb(53, 152, 219);"><span style="color: rgb(0, 0, 0);">छत्तीसगढ़</span> </span>के मुस्कान समूह की दीदियों के लिए दोगुनी खुशी साथ लेकर आया है. उनके आस-पास उगने वाली घास ओर पौधों से ये हर्बल गुलाल तैयार किया. रोज़गार न मिल पाने की वजह से लड़कियां ओर महिलाएं आस-पास के गांवों में मिर्ची तोड़ने के लिए जाया करती थीं. पर अब नहीं जाना पड़ता. </span></span></p>
<p class="center" dir="ltr"><img src="https://lh6.googleusercontent.com/I5VaEkunOJTDMoKcJqnO5hSkoreuiluYlod_QSrnEebyy2eHs_OXG203-dKF2AdlGL5FenANkuII-NF-7S3dGQEqfUspo1hdUAO2hv1WyltsjJKPBmYnBvix0wsKUtA23_MjVRxd_Mvm1jfuI1DZn5Y" width="494" height="231"></p>
<p class="center" dir="ltr"><em><span style="font-size: 8pt;">Image Credits: google Images</span></em></p>
<p class="center" dir="ltr"><span style="color: rgb(132, 63, 161);">साहूपार <span style="color: rgb(0, 0, 0);">ग्राम पंचायत में उत्तर प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत SHG ने फूलों से केमिकल रहित गुलाल बनाये. जिलाधिकारी प्रियंका निरंजन तथा पुलिस अधीक्षक आशीष श्रीवास्तव ने ग्राम पंचायत साहूपार पहुंचकर रंगों का निरीक्षण किया ओर बस्ती महोत्सव  पर  समूह के लिए स्टॉल लगवाने का भी बोला. </span></span></p>
<p class="center" dir="ltr"><img src="https://lh5.googleusercontent.com/rTrKaq_p64STI6CrCtatfzB4qe5YxJaitVcTzQZurKVbSRA-c54h3jilduYFoXE11bf5NH-51s7LiMBW797sH0Q0b7oOkWiX7RP2D-KsiH5fnquWVu8HAVC8Dia1o27mFDvIzGZcwcs-t2jgGwuVn0U" width="299" height="227"></p>
<p class="center" dir="ltr"><em><span style="font-size: 8pt;">Image Credits: google Images</span></em></p>
<p class="center" dir="ltr"><span style="color: rgb(22, 145, 121);">छत्तीसगढ़ <span style="color: rgb(0, 0, 0);">में स्वसहायता समूह की महिलाओं ने पालक, लालभाजी, हल्दी, जड़ी- बुटी व फूलों से हर्बल गुलाल बनाये. इसके अलावा मंदिरों एवं फूलों के बाज़ार से निकलने वाले पुराने फूलों की पत्तियों को सुखाकर फिर पीसकर गुलाल तैयार किया. फूलों के साथ ही चुकंदर, हल्दी, आम और अमरूद की हरी पत्तियों को भी प्रोसेस किया ओर मिलाया. पिछले साल की डिमांड देखते हुए इस बार भी जमकर हर्बल गुलार बेचने की  तैयारी है. </span></span></p>
<p class="center" dir="ltr"><img src="https://lh6.googleusercontent.com/JCogYHGHAQ-vJV5KPqPuiLbFhEpYcfnzJ4DcB4sroZqMGWVFsbXcs1Vz4yXAWKeyGklTddWaf3aaG7FdK8ifaefVSmhhjMxF7ruRzegydYNFjRH-HBJSQXTp-Xf0CBRuIfeWPhIIyuv0-udDViH4G_M" width="456" height="253"></p>
<p class="center" dir="ltr"><em><span style="font-size: 8pt;">Image Credits: google Images</span></em></p>
<p class="center" dir="ltr"><span style="color: rgb(241, 196, 15);">राजस्थान <span style="color: rgb(0, 0, 0);">में SHG महिला स्वरोजगार समिति ने फूलों, हल्दी और अन्य नेचुरल चीज़ों का इस्तेमाल कर हर्बल गुलाल बनाना शुरू किया. यह समूह राज्य के दूसरे समूहों को हर्बल गुलाल बनाने की ट्रैनिंग भी दे रहा है.</span></span></p>
<p class="center" dir="ltr"><img src="https://lh3.googleusercontent.com/sDwGzjvdEAcSdmVQGScb2ysrfgktSoYNCPMGWBNYvoFn0xHbx549pvk0uDHf-QL_2Sf5yHFfqwZ78-gegu57lC0ihhb6072T7Y6lkVJZkQ3Be2NBb8Fyd5B_5msNsdMLsFw65n7F1p0Q9TxDBexKHeE" width="431" height="318"></p>
<p class="center" dir="ltr"><em><span style="font-size: 8pt;">Image Credits: google Images</span></em></p>
<p class="center" dir="ltr"><span style="color: rgb(186, 55, 42);">केरल <span style="color: rgb(0, 0, 0);">में कुदुम्बश्री के एक महिला स्वसहायता समूह ने हल्दी, गुड़हल के फूल और गेंदे के फूल से इस होली के लिए हर्बल गुलाल बनाना शुरू किया ओर दुसरे समूहों को ट्रेनिंग भी दी. </span></span></p>
<p dir="ltr"><img src="https://lh6.googleusercontent.com/VZRajRpsow8bHwPZXa0Dz3PxvOe0RtY5mE3LibRRSCiTVjhZ20LtpxRB_3SneiZklk4z-Qzcsa0Bw3D5llvqfrjZd-mtlmUjqQYjVfcB1yG7dj2YyMgCrZhk_eV-hpVXTGe3bWowN3ZoIhc5N0Ril-k" width="624" height="356"></p>
<p dir="ltr"><strong><em><span style="font-size: 8pt;">Image Credits: google Images</span></em></strong></p>
<p dir="ltr">ऐसे कई स्वसहायता समूह है जो नेचुरल सामग्री से हर्बल गुलाल बना रहे हैं. ये SHG नेचर फ्रेंडली प्रैक्टिस को बढ़ावा देकर ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक मज़बूती का ठोस ज़रिया बन रहें हैं. इन हर्बल रंगों से इस बार की होली सुरक्षित और ज़्यादा रंगबिरंगी हो सकेगी. </p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">रविवार ब्यूरो </dc:creator><pubDate>Thu, 02 Mar 2023 16:42:23 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/khabar/shg-women-making-herbal-gulal]]></guid><category><![CDATA[ख़बर]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/HuElRJkwHr0fhxTYIqka.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/HuElRJkwHr0fhxTYIqka.jpg"/></item></channel></rss>