<rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" xmlns:dcterms="http://purl.org/dc/terms/" xmlns:geo="http://www.w3.org/2003/01/geo/wgs84_pos#" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/" xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/" xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/" version="2.0"><channel xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/"><title><![CDATA[ नर्मदा]]></title><link>https://ravivarvichar.in/tags/nrmdaa</link><description/><atom:link href="https://ravivarvichar.in/rss/tags/nrmdaa" rel="self"/><language>en-us</language><lastBuildDate>Mon, 21 Aug 2023 13:25:44 +0530</lastBuildDate><item><title><![CDATA[नाग पंचमी पर महिला श्रद्धालु में आस्था का सैलाब ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/kahaniyan/shivling-manufacturing-in-khargone</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/DKO9s3jMex9GDInZ36Ts.jpeg"><h1>नाग पंचमी पर महिला श्रद्धालु में आस्था का सैलाब&nbsp;</h1>
<p>मध्यप्रदेश के निमाड़ में नागपंचमी की धूम है. खासकर महिलाएं सावन के महीने में नागपंचमी का भी बेसब्री से इंतज़ार करती हैं. पूरे निमाड़ भगवान भोलेनाथ के श्रृंगार माने जाने वाले नाग को देवता का अवतार माना. महिलाएं इस इलाके में शिवलिंग के साथ नागपंचमी पर नागदेवता को अवतार भीलट देवता के रूप में पूजती हैं. यहां सैकड़ों की संख्या में भीलट यानी नागदेवता के मंदिर हैं. &nbsp;</p>
<p>जीवनदायिनी नदी मां नर्मदा का उल्लेख पुराणों में तो है ही साथ ही रेवा को गंगा से भी पुरानी माना गया है. ऐसी मान्यता है कि गंगा नदी में स्नान से जो पुण्य लाभ मिलता है वही लाभ मां नर्मदा नदी के दर्शन मात्र से मिल जाता है. यह भी मान्यता है कि नर्मदा नदी के कंकर-कंकर में शंकर का स्वरूप है और इस मान्यता का साक्षात रूप देखने को मिलता है खरगोन जिले बकावां गांव में. वैसे भी सनातन परंपरा में माना गया है कि नर्मदा के कंकर और पत्थर निकाल कर सीधे स्थापित करते हैं और उनकी प्राण प्रतिष्ठा की जरूरत नहीं पड़ती. वह वैसे ही पूजनीय होते है.नदी की गहराई से इन पत्थरों को निकाल तराश कर इसे शिवलिंग का स्वरूप दिया जाता है.यह तराशे हुए शिवलिंग, &nbsp;भारत सहित दुनियाभर में स्थापित होते है और इन नर्मदेश्वर शिवलिंगों का महत्व सबसे ज्यादा है. घरों से लेकर मंदिरों तक हर जगह नर्मदेश्वर शिवलिंग पूजे जातें है. लेकिन इन्हें तराशना और सही शिवलिंग का रूप देना आसान काम नहीं है. इस काम में बकावां के सैकड़ों लोग जुटे हैं. सम्भवतः यह एक मात्र गांव है जहां साढ़े पांच हजार की आबादी में अधिकांश परिवारों की जीविका का साधन शिवलिंग तैयार करना ही है.यह गांव देश-विदेश में इन पत्थरों और शिवलिंग निर्माण के लिए प्रसिद्ध है.श्रावण महीने और महाशिवरात्रि जैसे विशेष दिनों में शिवलिंग और भगवान भोलेनाथ के इस निराकार स्वरूप का महत्व और बढ़ जाता है.यहां के पत्थरों में प्राकृतिक कलाकृतियां उभरी हुई दिखती है तराशे जाने के बाद इन पर तिलक,ॐ व अन्य आकृति दिखती हैं. जो धार्मिक भावनाओं को और आस्थावान बना देती है.</p>
<p>इतना सब होने के बावजूद कुछ साल पहले तक यहां की महिलाएं खेतिहर मजदूर थी.जब खेतों में काम नहीं मिलता तब शिवलिंग निर्माण कर रहे लोगों के लिए मजदूरी कर शिवलिंग बनाती थी. यहां की महिलाएं अपने भविष्य को लेकर हमेशा चिंतित थी. मजदूरी में उतनी कमाई नहीं थी कि परिवार की ठीक से देखभाल कर सकें. इस समस्या से निकलने के लिए गांव की ही महिलाओं ने नए कदम उठाया और &nbsp;जिला प्रशासन के मार्गदर्शन में SHG तैयार किया. 10 महिलाओं ने कुछ नया करने के लिए हिम्मत दिखाई और फिर पिछले 3 वर्षों से पलट कर पीछे नहीं देखा. अब यही महिलाएं अपनी नई पहचान बना रहीं हैं.नर्मदा नदी की गहराइयों से निकलने वाले शंकर स्वरूप पत्थरों को तराश कर खुद की तकदीर को तराशने में जुड़ गई हैं .</p>
<h2><strong>महिलाओं को मिला रोजगार का सहारा&nbsp;</strong></h2>
<p>इस SHG की अध्यक्ष योगिता केवट ने बताया - " पहले हम सभी समूह सदस्य मजदूरी करती थी. फिर हम 10 दीदीयों ने मिलकर शिवलिंग स्व सहायता समूह बनाया. &nbsp;नदी से निकाले गए पत्थरों को तराशना शुरू किया" . शुरुआत में पत्थरों को ये महिलाएं परम्परागत छैनी और हथौड़ी से पत्थर तराश शिवलिंग बनाती थी. रात दिन की मेहनत की और धीरे-धीरे इस काम ने रफ्तार पकड़ ली. &nbsp;साप्ताहिक कुछ रुपए जुटाकर उन्होंने यह काम शुरू किया. जब कुछ पैसा इकट्ठा हो गया तब नर्मदा से निकले पत्थर को तराशने के लिए कटर मशीन खरीदी. आज इन मशीनों के साथ वे बेहतर तरीके से शिवलिंग बना रहीं हैं. इस समूह को आजीविका मिशन से भी सहायता मिली. आजीविका मिशन के तहत उन्होंने अलग अलग कुल 12 लाख रुपए का लोन लिया. जिसे पूरे अनुशासन के साथ किस्तों के रूप में समय पर उतार भी दिया. समूह की दीदियां गर्व से बताती हैं- "फिलहाल हमारे पास आठ लाख रुपए की जमा पूंजी है". &nbsp;समूह की सदस्य पहले कभी खेत में मिर्ची तोड़ने तो कभी खेतों में दूसरे कामों के लिए जाती थी. इससे बड़ी मुश्किल से 4 से पांच हजार रुपए महीने भी कमाई नहीं होती थी.इस संस्था में उनके साथ रमाबाई नारायण, संध्या भाई हरेराम, सीमा राकेश, संगीता राधेश्याम,सुशीलाबाई गणेश,राधाबाई मिश्रीलाल, बसंतीबाई केसरीलाल हैं, जो पूरी श्रद्धा से शिवलिंग का निर्माण कर रही हैं. यह शिवलिंग सुपारी आकार से 51 फीट तक के बनाए जाते हैं. वे रोज 15 से 20 शिवलिंग का कच्चा माल तैयार कर लेती हैं. &nbsp;बड़ा शिवलिंग तैयार करने में 7 से 8 दिन लग जातें है . समूह की सफलता उस मुकाम पर है कि अब परिवार के सदस्य और खासकर पति भी काम में साथ दे रहे हैं.&nbsp;</p>
<p>समूह ने बकावां गांव में चार दुकानें खोल रखी हैं. यहीं इंदौर, जयपुर,वाराणसी, दिल्ली, हैदराबाद जैसे शहरों से लोग शिवलिंग खरीदने आते हैं.कई बार विदेशी लोग भी सीधे &nbsp;यहां आ जाते हैं. दुकान पर ये शिवलिंग 15 रुपए से लगाकर लगभग डेढ़ लाख रुपए तक की कीमत के होते हैं. समूह की महिलाओं को यह अफसोस है कि शिवलिंग उन्हें स्थानीय दुकानों से ही बेचना पड़ता है. केवल राष्ट्रीय आजीविका मिशन के तहत ही &nbsp;फिलहाल ऑनलाइन शिवलिंग के लिए आर्डर ले पाती हैं.वे चाहती हैं कि जिला प्रशासन और सरकार बड़ा मार्केट उपलब्ध कराए. अगर इस समूह को ऑनलाइन बिज़नेस की व्यवस्था के साथ मार्गदर्शन मिल जाए तो उनकी कमाई कई गुना बढ़ हो सकती है. फिलहाल उन्हें व्यापारियों की शर्तों पर ही शिवलिंग बेचने पड़ते है. &nbsp;इसके अलावा कुछ बिचौलिए भी यहां से ओने पौने-दामों पर शिवलिंग खरीद कर महंगे दामों पर बड़े शहरों में बेच देते हैं.यही बिचौलिए हैं ,जो विदेशों में भी शिवलिंग निर्यात कर देते हैं. स्थानीय समूह फिलहाल इस ऑनलाइन पहुंच से दूर है.&nbsp;</p>
<p>एक समय खेती मजदूरी करती इस समूह की महिलाओं को आज सुकून और सुरक्षा है कि प्रति सदस्य लगभग 10 से 12 हजार रुपए प्रतिमाह कमा रहीं हैं. प्रशासन ने उनकी मेहनत और लगन को देखकर कियोस्क सेंटर चलाने की अनुमति दे दी और यह समूह बकावां में कियोस्क सेंटर चला रहा हैं. सदस्यों के अलावा अन्य ग्राहकों के माध्यम से वे अब तक तीन करोड़ रुपए का ट्रांजैक्शन कर चुकी हैं.</p>
<p>जिला पंचायत में परियोजना प्रबंधक सीमा निगवाल ने बताया कि - "समूह को लगातार प्रोत्साहित किया जा रहा है. साथ ही सारी जानकारी और मदद समूह तक पहुंचाई जा रही है". समूह की सदस्य भी जिला प्रशासन का सहयोग और समर्थन के लिए धन्यवाद करती है. जिला पंचायत खरगोन की सीईओ ज्योति शर्मा ने कहा कि इस कला को संरक्षित किया जाएगा.ऑनलाइन और सोशल मीडिया के जरिए मार्केटिंग करने के लिए ट्रेंनिग दिलवाने की योजना बनाई जा रही है.सांस्कृतिक,परम्परागत प्रदर्शनियों में &nbsp;शामिल होने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाएगा.</p>
<p>यह शिवलिंग बनाने की परंपरा ग्रामीणों को विरासत में मिली है . रियासत काल और देवी अहिल्याबाई होल्कर के शासनकाल में यह बहुत समृद्ध थी.आज समूह सदस्यों के साथ गांव के बुजुर्ग चिंता में हैं कि यह गांव और नर्मदा का किनारा महेश्वर बांध परियोजना अंतर्गत डूब प्रभावित है. यदि बांध परियोजना अपना मूर्त रूप लेती है तो इस गांव के किनारे के साथ गांव भी डूब जाएगा. गांव के मिश्रीलाल,दीपक नामदेव ने बताया-" इस विरासत और कला को बचाने के लिए ग्रामीण लगातार मांग कर रहे हैं". यदि नर्मदा का जलस्तर बढ़ा और किनारे डूब गए तो यह अनूठे पत्थरों को ढूंढना और निकालना मुश्किल हो जाएगा. साथ ही SHG महिलाओं की इस अनूठी पहल पर भी पानी फिर जाएगा.</p>
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</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">विवेक वर्द्धन श्रीवास्तव </dc:creator><pubDate>Mon, 21 Aug 2023 13:25:44 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/kahaniyan/shivling-manufacturing-in-khargone]]></guid><category><![CDATA[कहानियां]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/DKO9s3jMex9GDInZ36Ts.jpeg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/DKO9s3jMex9GDInZ36Ts.jpeg"/></item><item><title><![CDATA[ऐसी हरियाली लहलहाई, जिंदगी मुस्कुराई ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/kahaniyan/anuppur-nursery-by-shg-women</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/moUSmC6Jgc7cpMWmHjqV.jpg"><p><em>नर्मदा नदी के उद्गम स्थल अमरकंटक के पास कटकोना से भी हरियाली की ऐसी धार निकली है जिसने पुरे इलाके को हरियाली से आच्छादित कर दिया है. यही कमाल होता है संघठन और सामूहिक प्रयास का जिसने SHG सदस्यों के सपनों को नए पंख दिए है. इस जनजातीय जिले में हुई SHG की यह शुरुआत महिलाओं के जाग्रति का काम करेगी.</em></p>
<p>अनूपपुर जिले के गांव कटकोना में बिछी जाजम पर बड़ी गहमागहमी दिख रही हैं. वहां जुटी हर महिला अपनी बात सामने लाना चाह रही है. सबके पास अपने-अपने सुझाव और वे अपना सुझाव सबसे पहले बताने को आतुर. महिला सदस्यों के बीच बैठी रेवंती तिवारी सब को चुप कराने की कोशिश करती रही.बार-बार कहती रही चुप हो जाओ. सबको मौका मिलेगा. शुरू में कोई मानने को तैयार नहीं.आखिर महिलाओं ने बात मानी लेकिन आंखों में चमक और कुछ नया करने का जज्बा सबके चेहरे पर पढ़ा जा सकता था.<br><br>कटकोना , कोतमा विकासखंड का यह छोटा सा आदिवासी बहुल गांव जहां की महिलाएं सुर्खियों में है. SHG का ही असर है कि दो साल में नर्सरी तैयार की अब बढ़ते हुए पौधों और हरियाली के साथ घरेलू महिलाओं की जिंदगी अब लहलहा रही है. समूह की अध्यक्ष रेमंती तिवारी ने बताया- " वैसे शुरुआत 2013 में की,  नाम रखा वैष्णों आजीविका स्व सहायता समूह, आदिवासी बहुल क्षेत्र और निरक्षर महिलाओं ने अपनी किस्मत में मजदूरी करना ही नियति मान लिया था. यहां तक कि कई महिलाएं तो समूह की सदस्य बनने को भी तैयार नहीं थी. लगातार समझाइश और आजीविका मिशन,SHG का महत्व उन्हें समझाया गया.धीरे-धीरे महिलाएं तैयार हुई. अध्यक्ष आगे कहती है- यह वही महिलाएं है, जो पहले साप्ताहिक बैठक में बचत राशि 20 रुपए देकर चुपचाप चली जाती थी. संकोच और अपने आप को विचारों से कमजोर मान यह महिलाएं कुछ भी कहने को तैयार नहीं होती थी" . आज बढ़ती आय और कमाई के जरिए ने इनकी जिंदगी में नए रंग भर दिए. इस वक्त इनके पास डेढ़ लाख रुपए से ज्यादा की बचत राशि है. सबने मिलकर इन नौ वर्षों में कई काम किए.इस से समूह सदस्यों का लगातार हौसला बढ़ता गया. अब सब सदस्य,  मीटिंग में समय से पहले तो आ ही जाती हैं और नए-नए आइडिया भी उनके पास होते हैं.<br><br>समूह की मेहनत को देख अनूपपुर जिला प्रशासन ने गांव में ही ढाई एकड़ जमीन शासकीय उद्यान परिसर में दे दी. इन महिलाओं ने यहीं पर नर्सरी तैयार की. दो साल में विभिन्न तरह के पौधे तैयार कर लिए. आम, जामुन, कटहल से लेकर मुनगा (सुरजना) नींबू, जामफल के पौधे लोग यहां खरीदने  आते हैं. समूह सचिव कसिया तिवारी बताती हैं- "उनके पौधे 15 से 35 रुपए और अधिक कीमत में भी जनपद और कुछ पंचायतों ने खरीदे.यह SHG की महिलाएं सिर्फ नर्सरी पर निर्भर नहीं रही. सदस्य साथी कोई साग-भाजी तो कोई किराना दुकान गांव में ही चलाने लगा. यहां तक कि कुछ साथी ने सिलाई का धंधा भी शुरू कर दिया".<br><br>इस समूह में शामिल ज्योति महारा, पार्वती महारा, चंद्रवती महारा, गायत्री पांडे, उषा तिवारी, जलेबिया साहू, निधि तिवारी, नीरा महारा, शांति,उर्मिला जैसी महिलाएं बड़े गर्व से बताती है-"हमारी मेहनत लगातार रंग ला रही है. समूह ने आंगनबाड़ियों, स्कूलों में पौष्टिक गुड़-मूंगफली की चिक्की सप्लाई करने का काम भी लिया. खुद के द्वारा तैयार यह चिक्की बच्चों को बहुत पसंद आई."<br><br><img src="https://d2vbj8g7upsspg.cloudfront.net/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/nEEB0YrX2OEO7Y424Sf8.jpg" alt="accounting SHG"></p>
<p><em>(हर रविवार SHG की एकाउंटिंग करती महिलाएं)  </em> </p>
<p>यह सफर यहीं नहीं थमा. सफलता की नई-नई सीढ़ियों को लगातार चढ़ रही हैं. समूह सदस्यों की बढ़ती योग्यता को देख 13 स्कूलों के विद्यार्थियों के लिए 16 सौ 52 गणवेश भी तैयार कर के दी है.जिससे अलग कमाई हुई.</p>
<p>लगातार बढ़ती आमदनी से समूह की सदस्यों के सपनों को नए पंख लग गए.समूह की निधि तिवारी ने बताया "हमने भोपाल से चूड़ियों का समान मंगाकर लाख के कंगन बनाने का विचार किया." उन्होंने महसूस किया कि महिलाओं की पहली पसंद कंगन होती है. और सुहाग की यह सबसे महत्वपूर्ण निशानी उनके लिए कमाई का जरिया बन सकती है.उन्होंने काम शुरू किया और कंगन बनाए. जगह-जगह जनरल स्टोर और कंगन स्टोर पर वैष्णों आजीविका स्वयं सहायता समूह के कंगन ग्राहकों को पसंद आने लगे. यहां की महिलाएं ये ही खरीदने लगी. रेमंती और कसिया को खुशी है कि 9 साल की मेहनत अब कमाई का जरिया बन गई. खेती में सुधार और उससे भी अधिक कमाई बढ़ने से यह सदस्य अपने बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ा रहे हैं.<br><br>अध्यक्ष और सचिव ने अब तक दुर्गा ग्राम संगठन में 22 स्व सहायता समूह तैयार कर दिए.रफ्तार यही रही तो पूरा आदिवासी इलाका  SHG से पहचान बनाने में पीछे नहीं रहेगा. प्रदेश की जीवनदायिनी नर्मदा नदी के उद्गम स्थल अमरकंटक का अनूपपुर जिला ही है. मां नर्मदा जीवनदायनी है.जैसे मां नर्मदा पूरे प्रदेश की  प्यास बुझाती है...ऐसे ही इस इलाके में मेहनतकश SHG आत्म सम्मान और निर्भरता का नया प्रवाह कायम करेंगे...ये सुखद संकेत नर्मदा नदी के प्रवाह की तरह देखने को मिलने लगे है.</p>
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</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">विवेक वर्द्धन श्रीवास्तव </dc:creator><pubDate>Sat, 18 Feb 2023 11:11:47 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/kahaniyan/anuppur-nursery-by-shg-women]]></guid><category><![CDATA[कहानियां]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/moUSmC6Jgc7cpMWmHjqV.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/moUSmC6Jgc7cpMWmHjqV.jpg"/></item></channel></rss>