<rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" xmlns:dcterms="http://purl.org/dc/terms/" xmlns:geo="http://www.w3.org/2003/01/geo/wgs84_pos#" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/" xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/" xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/" version="2.0"><channel xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/"><title><![CDATA[ प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन]]></title><link>https://ravivarvichar.in/tags/praakrtik-snsaadhn-prbndhn</link><description/><atom:link href="https://ravivarvichar.in/rss/tags/praakrtik-snsaadhn-prbndhn" rel="self"/><language>en-us</language><lastBuildDate>Thu, 27 Apr 2023 18:11:27 +0530</lastBuildDate><item><title><![CDATA[खाद्य सुरक्षा के लिए महिला किसान ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/nazariya/female-farmers-for-food-security-in-india</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/atwyEiOh9m78bzBiZggd.jpg"><p class="MsoNormal"><span lang="HI">मां </span>, <span lang="HI">यह शब्द सुनते ही प्रेम</span>, <span lang="HI">ममता</span>, <span lang="HI">करुणा के साथ पालन</span>, <span lang="HI">पोषण और देखभाल की एक मूर्ति सामने खड़ी हो जाती है. महिलाएं अगर बच्चों की देखभाल इतनी अच्छी तरह कर सकती है तो सोचिये वो अपने खेत खलिहान को कैसा संभालेंगी. ग्रामीण महिलाएं बुवाई से लेकर कटाई और कटाई के बाद भी फसल के रख रखाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं. महिला किसान कृषि उत्पादन</span>, <span lang="HI">खाद्य सुरक्षा </span>, <span lang="HI">फसल पोषण</span>, <span lang="HI">भूमि और प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन में खासतौर पर योगदान देती हैं. इस तरह वे कृषि में बहुआयामी होती है और भारत की दूसरी हरित क्रांति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं.</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="HI">सरकार की विभिन्न योजनाओं जैसे जैविक खेती</span>, <span lang="HI">स्वरोजगार योजना</span>, <span lang="HI">प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना आदि के तहत ग्रामीण महिलाओं को वरीयता मिलती है. हालांकि भारत में विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति हुई है लेकिन फिर भी लिंग असमानता (जेंडर पेरिटी) हर जगह मौजूद है. विश्व के कृषि क्षेत्र में महिलाओं की हिस्सेदारी 43 % है जो भारत में 70-80 प्रतिशत तक बढ़ जाती है. भारत में ग्रामीण महिलाएं कृषि उत्पादन बढ़ा रही हैं</span>, <span lang="HI">खाद्य सुरक्षा में सुधार कर रही है.  इस तरह गरीबी उन्मूलन की तरफ भारत के हाथ मजबूत कर रही हैं.</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="HI">इस सबके बावजूद महिलाओं को खेतों में भी शोषण का सामना करना पड़ता है. पुरुषों की तुलना में अधिक कृषि काम करने के बाद भी अधिकार और आय दोनों नहीं मिलते. यूएन की फ़ूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइज़ेशन (</span>FAO) <span lang="HI">की रिपोर्ट के अनुसार</span>, <span lang="HI">यदि महिलाओं को पुरुषों के समान संसाधनों तक समान पहुंच दी जाए तो विकसित देशों में कृषि उपज में 2.5 से 4 प्रतिशत की वृद्धि की जा सकती है</span>, <span lang="HI">जो कम से कम 100 मिलियन अधिक कुपोषित लोगों को अच्छा खाना खिलाने के लिए पर्याप्त है. इसी तरह यदि ग्रामीण महिलाओं को अवसर और सुविधाएं मिले तो वे देश को दूसरी हरित क्रांति की ओर ले जा सकती हैं और तस्वीर बदल सकती हैं. आज ग्रामीण महिलाएं मजदूरी और कटाई के बाद के कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं. महिला किसान अपने पुरुष समकक्षों की तरह उत्पादक और उद्यमी दोनों हो सकती हैं</span>, <span lang="HI">लेकिन जमीन जायदाद में हिस्सा </span>, <span lang="HI">लोन सुविधा </span>, <span lang="HI">कृषि खरीदी </span>, <span lang="HI">मंडी पहुंच की काम जानकारी से पीछे रह जाती है. यह देखा गया है कि ग्रामीण महिलाओं को ग्रामीण पुरुषों और शहरी महिलाओं की तुलना में अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है.</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="HI">महिलाओं को भारतीय अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा माना जाता है. भारतीय कृषि में महिला किसानों का बहुत बड़ा योगदान है. महिलाएं कृषि क्षेत्र में कार्यबल का सबसे बड़ा प्रतिशत हैं</span>, <span lang="HI">लेकिन उनका ज़मीन और उत्पादक संसाधनों पर नियंत्रण नहीं है. महिला कृषकों के ज्ञान</span>, <span lang="HI">दृष्टिकोण और कौशल में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए प्रशिक्षण और तकनीकी सलाह प्रदान करने की ज़रुरत है. साथ ही नए शोध और अनुसंधानों के बारे में भी उन्हें जानकारी देने की ज़रुरत है. आम तौर पर कृषि में महिलाओं की भूमिका को हाशिए पर रखा जाता है और उनके योगदान को कम करके आंका जाता है. </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="HI">सरकार हो या </span>NGO <span lang="HI">दोनों ने ही कृषि में महिलाओं की भूमिका पर कम ध्यान दिया है. इसका परिणाम यह हुआ की जिस प्रकार और जिस स्तर पर कृषि क्षेत्र में महिलाओं का काम होना चाहिए था वह नहीं हो पाया. कृषि से जुड़ी ग्रामीण महिलाओं की वास्तविकताओं से शासन</span>, <span lang="HI">प्रशासन</span>, <span lang="HI">समाज और हम सब को संवेदनशील होने की आवश्यकता है. इस से उन्हें पुरुषों के समान कृषि और ग्रामीण विकास के अवसर मिलेंगे. महिला किसानों को ऋण</span>, <span lang="HI">मार्केट और नई कृषि तकनीक प्रदान की जा सकती हैं. यह सुविधाएं उन्हें एकमुश्त </span>SHG <span lang="HI">के तौर पर मिल सकती है. इसलिए महिला स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) पर जोर दिया जाना चाहिए ताकि उन्हें माइक्रो-क्रेडिट से जोड़ा जा सके. महिला किसानों को सशक्त बनाने</span>, <span lang="HI">उनकी क्षमताओं को बढ़ाने और नई कृषि प्रौद्योगिकियों तक उनकी पहुंच बढ़ाने के लिए </span>SHG <span lang="HI">बहुत मददगार साबित होंगे.  </span></p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">रोहन शर्मा</dc:creator><pubDate>Thu, 27 Apr 2023 18:11:27 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/nazariya/female-farmers-for-food-security-in-india]]></guid><category><![CDATA[नज़रिया]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/atwyEiOh9m78bzBiZggd.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/atwyEiOh9m78bzBiZggd.jpg"/></item><item><title><![CDATA[धरती मां को संभालती धरती दीदियां ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/nazariya/dharti-didis-of-shgs-working-towards-environmnt-conservation</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/GmVbZGvWv6aoIBqb29UB.jpg"><p>महिलाएं समाज का स्तंभ हैं. हालांकि सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक जगत में कभी भी उनके योगदान का ज़िक्र नहीं हुआ. हमारी सामाजिक संरचना ने उन्हें बस घरेलू गतिविधियों में बांध के रखा. महिलाओं से हमेशा अपेक्षा की जाती है की अपने घरों की चार दीवारों के भीतर रहे. दुनिया, देश और सभी महत्वपूर्ण मुद्दों से उन्हें दूर रखने की कोशिश की गयी. ऐसा ही एक मुद्दा है पर्यावरण. ग्रामीण महिलाएं तो अपने घरेलू कामों के लिए भी पर्यावरण पर निर्भर रहती है.  इसलिए पर्यावरण की हानि का महिलाओं के जीवन पर सीधा प्रभाव पड़ता है.<br><br>महिलाएं पर्यावरण के संरक्षण और उद्धार में हमेशा से सक्रीय रहीं है. विश्व स्तर पर यह शोध चल रहा है की कैसे हर स्तर पर पर्यावरण संवर्धन में पुरुषों-महिलाओं के बीच के अंतर की भूमिका रहती है. इसका उदहारण है वह देश जहां की संसद में अधिक महिलाएं होती है वहां धरती के संरक्षण और पर्यावरण संधियों पर ज़्यादा काम होता है. संतुलित और सतत पर्यावरण विकास में महिलाएं अधिक जुड़ती है. इसके पीछे मुख्य कारण है, महिलाओं (खासकर ग्रामीण) का अपनी दिनचर्या में पर्यावरण से सीधा जुड़ाव और उनकी मेटरलनल इंस्टिंक्टस.  <br><br>प्रकृति के साथ महिलाओं का सम्बन्ध इसीलिए होता है क्योंकि उनके पास प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन का आधार और कौशल है. साथ ही महिलाएं अपने घर के साथ प्राकृतिक संसाधनों की भी बेहतर प्रबंधक होती है. मूलतः महिलाओं में पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता होती है. इसीलिए महिलाएं पर्यावरण आंदोलनों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती रही है.  अप्पिको आंदोलन, बिश्नोई आंदोलन, साइलेंट वैली मूवमेंट, चिपको आंदोलन, नर्मदा बचाओ आंदोलन, जंगल बचाओ आंदोलन जैसे आंदोलनों में महिलायें आगे रहीं. साथ ही सरकारी और गैर सरकारी कार्यक्रम जैसे एसएचजी संरक्षण कार्यक्रम, सामुदायिक वानिकी कार्यक्रम, सामाजिक वानिकी कार्यक्रम, व्यक्तिगत संरक्षण कार्यक्रम, हरित पट्टी आंदोलन, हरित भारत स्वच्छ भारत कार्यक्रम आदि में भी महिलाओं की अपनी अलग भूमिका रही है.<br><br>इन्ही कार्यक्रमों में कुछ प्रयास ऐसे है जो महिलाओं की धरती और पर्यावरण संरक्षण में भूमिका के बारे में बहुत कुछ कहते है. जैसे जनजातीय इलाकों के 12500 गांवों में 25000 SHGs को जंगल संरक्षण में लगाना. स्वयं सहायता समूहों (SHG) के सदस्यों ने भारत भर में अवैध कटाई, चराई और अन्य प्राकृतिक संसाधनों के क्षरण की प्रक्रिया को रोकने में कई कदम उठाये. ओडीएफ या फिर पर्यावरण संरक्षण स्वयं सहायता समूह महिलाओं ने हर मोर्चा संभाला. संरक्षित वन्य सम्पदा हो या फिर वन विहार हर तरफ SHG महिलाओं को लगाया जा सकता है और इससे उनकी आजीविका के साथ पर्यावरण को बढ़ावा मिलेगा. ग्रामीण क्षेत्रों में स्वयं सहायता समूहों की एक बड़ी भूमिका है. यह गांवो में लोगों को स्वरोजगार के साथ आत्मनिर्भर बनाने के साथ-साथ सामाजिक कार्यों में भी आगे बढ़ाने के लिए प्रेरणास्रोत बनते हैं. अब स्वयं सहायता समूह  पर्यावरण संरक्षण व जल संरक्षण की जिम्मेदारी भी संभाल रहे है. पौधों की नर्सरी से लेकर मिट्टी कटाव रोकने में भी समूहों की महती भूमिका है. साथ ही पर्यावरण संरक्षण के महत्त्व को देश के कोने कोने तक पहुंचा रही है. पराली जलने से रोकना हो या कारखानों से हो रहा वायु प्रदूषण हर जगह खड़ी दिखती है स्वयं सहायता समूह की दीदियां.  </p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">रविवार ब्यूरो </dc:creator><pubDate>Sat, 22 Apr 2023 13:00:37 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/nazariya/dharti-didis-of-shgs-working-towards-environmnt-conservation]]></guid><category><![CDATA[नज़रिया]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/GmVbZGvWv6aoIBqb29UB.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/GmVbZGvWv6aoIBqb29UB.jpg"/></item></channel></rss>