<rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" xmlns:dcterms="http://purl.org/dc/terms/" xmlns:geo="http://www.w3.org/2003/01/geo/wgs84_pos#" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/" xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/" xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/" version="2.0"><channel xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/"><title><![CDATA[ PRADAN]]></title><link>https://ravivarvichar.in/tags/pradan</link><description/><atom:link href="https://ravivarvichar.in/rss/tags/pradan" rel="self"/><language>en-us</language><lastBuildDate>Thu, 28 Dec 2023 10:30:38 +0530</lastBuildDate><item><title><![CDATA[रुक्मणी देवी: PRADAN से मिला मुश्किलों से जीतना का हौसला ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/kahaniyan/shg-success-story-rural-woman-becoming-agripreneur-with-the-help-of-government-schemes-2045448</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/2Pl42604YimG9bkbll4f.jpg"><p style="text-align: justify;">मुश्किल. गरीबी. परेशानी. ज़िम्मेदारी. ये सिर्फ शब्द नहीं, कई लोगों के जीवन का सच है. चुनौतियों के दौर में जब दिमाग हार मानना चाहता है, तब दिल कोशिश करने का रास्ता अपनाता है. कुछ ऐसी ही कहानी है झारखंड की रुक्मणी देवी की, जो किसान से शादी के बाद <strong>गुमला जिले</strong> के अलंकेरा गांव में आ गईं.</p>
<h2 style="text-align: justify;">घरेलू सहायिका और मजदूर के रूप में काम करने पर हुई मजबूर</h2>
<p style="text-align: justify;">कम उम्र में शादी हो जाने के बाद <strong>रुक्मणी देवी</strong> (<a href="https://www.femina.in/trending/achievers/from-silence-to-strength-an-angripreneurs-inspiring-journey-280563.html">Agripreneur Rukmani Devi's success story</a>) ने अपने जीवन में काफी कठिनाइयां देखीं. इसी बीच तीन बेटियों और एक बेटे की ज़िम्मेदारी भी बढ़ गई. उस दौरान, उसका पति शराब की ओर मुड़ गया और ये समस्या जल्द ही परिवार के लिए संघर्ष की वजह बन गई. पारिवारिक संसाधन ख़त्म हो चुके थे. कृषि भूमि बिक गई. महुआ की खेती के लिए अब कोई जगह न थी.</p>
<p><img alt="Agripreneur&rsquo;s success story" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/600x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/mUjTVjeXbLpakJ4VWMv6.jpg" style="width: 600px;" class="center"></p>
<p class="center"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: femina.in</em></span></p>
<p style="text-align: justify;">इन मुसीबतों को हल करने का रास्ता तो अभी मिला भी नहीं था कि वह विधवा हो गईं. परिवार की जीविका चलाने के लिए घरेलू सहायिका और मजदूर के रूप में काम करना शुरू कर दिया. उसने अपनी छोटी बेटी को घर से दूर रांची शहर में काम करने के लिए भेज दिया, इस आस में कि वह भी परिवार की आय में योगदान देगी.</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="color: rgb(230, 126, 35);">यह भी पढ़ें : </span><a href="https://ravivarvichar.in/kahaniyan">जैविक खेती से बदला SHG महिला का जीवन&nbsp;</a></p>
<h2 style="text-align: justify;">PRADAN से मिली मदद</h2>
<p style="text-align: justify;">एक मां के लिए ये फैसला आसान न था. बेटी की याद, समाज के ताने, आर्थिक परेशानियां- सबके बावजूद, रुक्मणी ने हार न मानने, उम्मीद न होने, और लगातार कोशिश करते रहने का फैसला किया. उसका एक ही लक्ष्य था - बच्चों का पालन-पोषण करना और उन्हें बेहतर भविष्य देना.</p>
<p style="text-align: justify;">जब रुक्मणी चुनौतियों का समाधान खोज रही थी, तब उसे एक प्रमुख ग्रामीण विकास कार्यक्रम के बारे में पता चला. वह सामाजिक संगठन था<strong> PRADAN</strong>, जो सरकारी कार्यक्रम<strong> NRLM</strong> (राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका कार्यक्रम) का समर्थन करता है.</p>
<h2 style="text-align: justify;">कल्याणकारी योजनाओं से जुड़ बनी आत्मनिर्भर</h2>
<p style="text-align: justify;"><strong>PRADAN</strong> ने उसकी दुर्दशा को पहचाना और ग्राम पंचायत के सामने ये मामला पेश किया. इन संस्थाओं के साझा प्रयासों से, रुक्मणी को विधवा पेंशन योजना सहित दूसरी कल्याणकारी योजनाओं से जोड़ा गया. परिवर्तन के पहिये गतिमान हुए! अगले कदम में राशन कार्ड उसके नाम पर ट्रांसफर करवाया गया - जिससे उसे यह महसूस हुआ कि वह &nbsp;स्वतंत्र और सक्षम महिला हैं.</p>
<p><img alt="angripreneurs success story" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/600x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/P7EH0qQ9ZDu7EhOWh18j.jpg" style="width: 600px;" class="center"></p>
<p class="center"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: femina.in</em></span></p>
<blockquote>
<p><em>&ldquo;PRADAN के मार्गदर्शन के ज़रिये, मैंने सफलतापूर्वक राशन कार्ड हासिल किया, जिसका अर्थ था मेरी ज़रूरतें पूरी होना,&rdquo;</em> वह कहती हैं.</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;"><span style="color: rgb(230, 126, 35);">यह भी पढ़ें :</span><a href="https://ravivarvichar.in/kahaniyan/85-year-old-instagram-influencer-vijay-nischal-is-winning-hearts-on-the-internet-through-dadiji-ki-rasoi-2035375">'Dadi Ki Rasoi' से Internet को महका रहीं Vijay Nischal</a></p>
<h2 style="text-align: justify;">Self Help Group से जुड़ मिली ताकत</h2>
<p style="text-align: justify;">धीरे-धीरे, वह महिला स्वयं सहायता समूह से जुड़ गईं और सकारात्मक सामाजिक परिवर्तन का हिस्सा बनी. ग्राम संगठन की महिलाओं और <strong>स्वयं सहायता समूह</strong> (self help group) की महिलाओं की ताकत से जुड़कर, रुक्मणी ने उन लोगों का सामना किया, जिन्होंने अनौपचारिक रूप से उसकी जमीन पर कब्जा कर लिया था. समूहों के अटूट समर्थन के कारण वह गुमला के पालकोट पुलिस स्टेशन में कब्जा करने वालों के खिलाफ शिकायत दर्ज करने में सक्षम हुई. जिसके बाद उन्हें अपनी ज़मीन का स्वामित्त्व वापिस मिल गया.</p>
<p style="text-align: justify;">अपनी नई हासिल आज़ादी और साहस से लैस होकर, उसने पंचायत और ग्राम सभा के सहयोग से, प्रधान मंत्री आवास योजना के तहत अपने लिए घर बनवाया. वर्ष 2022 में जब उसके गांव में सौर लिफ्ट आई, तो सिंचाई की सुविधा हासिल कर उसने अपनी बंजर भूमि को फिर से लहलहाती फसलों से भर दिया.</p>
<p><img alt="DAY NRLM 2023 data on SHG" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/640x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/lIAJhcTehP9rehsDLRR1.jpg" style="width: 640px;" class="center"></p>
<p class="center"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: Google Images</em></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="color: rgb(230, 126, 35);">यह भी पढ़ें :</span><a href="https://ravivarvichar.in/kahaniyan/tribal-women-lahari-bai-and-raimati-ghiuria-conserving-millets-2033258">Millet Conservation में सबसे आगे दो tribal महिलाएं<span>&nbsp;</span></a></p>
<h3 style="text-align: justify;">संघर्षशील व्यक्ति से बनी आत्मविश्वासी किसान</h3>
<p style="text-align: justify;">संघर्षशील व्यक्ति से आत्मविश्वासी किसान के रूप में रुक्मणी देवी का ये बदलाव उनकी दृढ़ता का प्रमाण है. ज़मीन सुरक्षित होने के बाद, रुक्मणी ने अपनी कृषि यात्रा को आगे बढ़ाते हुए महुआ के पौधों और सब्जियों की खेती से <strong>आजीविका</strong> को स्थायी बना लिया.</p>
<p style="text-align: justify;">उनकी लगभग <strong>50 हज़ार रुपये</strong> की वार्षिक कमाई ने उन्हें स्थिरता प्रदान की और अपने बच्चों की शिक्षा में निवेश करने का अवसर दिया. उनका बेटा, जो एक बार स्कूल छोड़ने पर मजबूर हुआ था, अब वापस स्कूल जा रहा है. बेटियों ने भी मामूली काम छोड़ कृषि में योगदान देना शुरू कर दिया.</p>
<p style="text-align: justify;">रुक्मणी धीरे-धीरे <strong>किसान उत्पादक संगठन</strong> (FPO) का हिस्सा बन गईं और जिला अभिसरण कार्यक्रम का फायदा उठा रही है. अब उसने बुनाई सीख ली है, जिससे उसकी आय और बढ़ गई है. रुक्मणी देवी की कहानी इस बात का उदाहरण है कि कैसे एक सही योजना या <strong>स्वयं सहायता समूह</strong> के रूप में मिली शक्ति चुनौतियों को पार करने में कारगर साबित हो सकती है.</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="color: rgb(230, 126, 35);">यह भी पढ़ें :</span> <a href="https://ravivarvichar.in/kahaniyan/self-help-group-women-from-seoni-selling-custard-apple-2033526">Seoni के सीताफल से बनी SHG की पहचान</a></p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मिस्बाह</dc:creator><pubDate>Thu, 28 Dec 2023 10:30:38 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/kahaniyan/shg-success-story-rural-woman-becoming-agripreneur-with-the-help-of-government-schemes-2045448]]></guid><category><![CDATA[कहानियां]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/2Pl42604YimG9bkbll4f.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/2Pl42604YimG9bkbll4f.jpg"/></item><item><title><![CDATA[पथरीली ज़मीन पर बिछी हरियाली की चादर ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/kahaniyan/ajeevika-mission-and-pradan-helping-singroli-farmers-reap-benefits</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/2PvfulNwGzoHG4Qg2t4M.jpg"><h1><strong>पथरीली ज़मीन पर बिछी हरियाली की चादर&nbsp;</strong></h1>
<p><strong>सिंगरौली</strong> <strong>(Singarauli)</strong> के <strong>आदिवासी</strong> <strong>(Tribal)</strong> बहुल इलाकों में तस्वीर बदली-बदली सी है. कुछ साल पहले तक जिस ज़मीन को पथरीली मान कर अपनी किस्मत समझ लिया. उन बंज़र ज़मीनों में हरियाली छाई हुई है. यह कहानी है&nbsp;<strong>देवसर (Deosar)</strong> ब्लॉक के <strong>सरौंधा (Saraundha)&nbsp;</strong>की. इस इलाके में डेढ़ हजार से ज्यादा <a href="https://ravivarvichar.in/nazariya/widowed-at-20-village-woman-started-organic-farming-which-helps-500-farmers">किसान</a> दीदियों की चर्चा देश में हो रही. जिन्होंने <a href="https://ravivarvichar.in/kahaniyan/sangeeta-sawalakhe-is-helping-farmers-to-switch-on-to-bio-alternatives-for-chemical-fertilizers-and-pesticides">मेहनत</a> कर अपनी ज़मीन को संवार दिया.</p>
<h2><strong>किसान दीदियों की बनी नई पहचान &nbsp;</strong></h2>
<p><strong>सरौंधा&nbsp;(Saraundha)&nbsp;</strong>की रहने वाली <strong>किसान दीदी</strong> <strong>रामकली</strong> बताती है- <em>"मेरे पास तीन एकड़ ज़मीन थी. आधे में पथरीली हिस्सा. एक बार जैसे-तैसे फसल मिलती. कमाई तो थी ही नहीं. घर चलाना तक मुश्किल था. गांव में समूह से जुड़ी.अफसरों ने साथ दिया. आज मेरा खेत देखने सब आते हैं. मैं हर सीज़न में 20 हजार का मुनाफा कमा रही. बच्चे भी अब अच्छे स्कूल-कॉलेज में पढ़ रहे.मैं शान से परिवार के साथ जीती हूं."</em><br>इसी गांव की <strong>धनोवा</strong> दीदी कहती है-<em> " हमारे परिवार ने तो आस ही छोड़ दी थी. मन में आता था ज़मीन गिरवीं रख दें. कोई कमाई नहीं होती.अब एकदम बदल गया. खेत में काम मेहनत के बाद भी अच्छी फसल हो रही."</em></p>
<p><img alt="pradan singarauli" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/406x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/eyq2PAJbLlnNLSoO1ga7.jpg" style="width: 406px;"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>सरौंधा गांव की रामकली जिनके चेहरे पर मुस्कान बिखर गई (Image Credit: Ravivar Vichar)</em></span></p>
<h3><strong>ट्रेनिंग से ट्रेन हुई किसान दीदियां &nbsp;</strong><em><strong> &nbsp; &nbsp; &nbsp;&nbsp;</strong></em></h3>
<p><strong>मध्य प्रदेश (MP)</strong> के सिंगरौली जिले के सरौंधा में <strong>आजीविका मिशन</strong> <strong>(Ajeevika Mission)</strong> के<strong> समूह (SHG) </strong>से जुड़ी महिलाओं को गैर सरकारी <strong>सामाजिक संस्था</strong> <strong>(NGO) 'प्रदान' (Pradan) </strong>का साथ मिला. देखते ही देखते यहां किसान दीदियों और उनके परिवार की आर्थिक आर्थिक स्थिति में बदलाव आ गया. 'प्रदान' संस्था के अनुसार-&nbsp;<em>"इस इलाके में हमारे लिए बड़ी चुनौती थी. <strong>देवसर</strong> ब्लॉक के <strong>सरौंधा</strong> में दो <strong>संकुल ग्राम संगठन (CLF)</strong> हैं. इसमें <strong>चेतना संकुल संगठन </strong>और<strong> तिनगुड़ी</strong> शामिल हैं. हमने किसान दीदियों और उनके परिवार को खेती करने के लिए संतोष सिन्हा जैसे एग्रीकल्चर एक्सपर्ट से ट्रेनिंग दिलवाई."&nbsp;</em></p>
<h3><strong>थ्री लेयर खेती से चमकी किस्मत&nbsp;</strong></h3>
<p><strong>सरौंधा</strong>&nbsp;<strong>(Saraundha) </strong>में जहां एक सीज़न में भी<a href="https://ravivarvichar.in/kahaniyan/housewifes-startup-seedbasket-selling-local-seeds-to-urban-gardeners"> फसल </a>&nbsp;लेना मुश्किल था,वहां एडवांस खेती से मुनाफा लगातार मिलने लगा.<strong>&nbsp;</strong>किसान परिवारों को&nbsp;<strong>थ्री लेयर</strong>&nbsp;<strong>फार्मिंग (Three Layer Farming)&nbsp;</strong>खेती का मतलब सिखाया. ज़मीन के पथरीले हिस्से में बेल वाली लौकी, गिलकी, करेला जैसी सब्जियां लगवाईं. सेकेंड लेयर में गोभी, पालक, मैथी &nbsp;जैसे काम हाइट की सब्जियों को बोने की सलाह दी. एक हिस्से में <a href="https://ravivarvichar.in/kahaniyan/stevia-replaces-artificial-sweetener-proves-helpful-for-farmers">ज़मीन</a> के अंदर से मिलने वाली सब्जियां हल्दी, आलू और अदरक को बोना सिखाया. इस थ्री लेयर मेथड से किसान दीदियों की ज़िंदगी ही बदल गई.&nbsp;</p>
<p><img alt="pradan singrauli" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/536x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/3fRrE0HwB0MNzqcO3vFv.jpg" style="width: 536px;"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>सरौंधा गांव में रामकली का खेत जहां थ्री लेयर फसल दिखाई दे रही (Image Credit: Ravivar Vichar) &nbsp;</em></span> &nbsp; &nbsp; &nbsp;&nbsp;</p>
<h3><strong>क्वालिटी सीड का कमाल</strong></h3>
<p>इस योजना में जहां ट्रेनिंग काम आई वहीं क्वालिटी सीड का कमाल भी देखने को मिला.&nbsp;'प्रदान' संस्था&nbsp;सिंगरौली में किसान बहनों के खेत में बुआई के समय क्वालिटी सीड उपलब्ध करवाए. आदिवासी ब्लॉक को मिले फंड का सही उपयोग किया. 30 हजार रुपए के फंड में अब तक 20 हजार रुपए खर्च किए. शेष रुपए की मदद और की जाएगी. जिले में छह एक्ज़ीक्युटिव मॉनिटरिंग कर रहे.&nbsp;<br>जिले के ब्लॉक में कोर्डिनेशन से योजना का लाभ किसान दीदियों को मिला.<strong> आजीविका मिशन</strong> के<strong> जिला परियोजना प्रबंधक</strong> <strong>(DPM) मगलेश्वर सिंह </strong>का कहना है- <strong>"सिंगरौली में किसान परिवारों ख़ास कर महिला किसानो को ख़ास प्रोत्साहित किया. ट्राइबल योजना के लाभ ने महिलाओं की पारिवारिक स्थिति को पूरी तरह बदल दिया."</strong></p>
<h3><strong>किसानी पर ख़ास फ़ोकस</strong></h3>
<p>आदिवासी जिलों में पिछड़े और गरीब किसानों को शासन ने ख़ास फोकस किया.इसमें खेतों में ही मजदूरी करने वाली महिलाओं को आत्म सम्मान की जिंदगी &nbsp;जी सकें, इसके प्रयास किए जा रहे.यहां सात जिलों के आठ आदिवासी ब्लॉक में उन्नत किसानी और महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए संस्था काम कर रही है. स्वयं सहायता समूह से जुड़ी दीदियों में बहुत उत्साह है<em>. </em><strong>राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन (SRLM) </strong>के&nbsp;<strong>स्टेट प्रोजेक्ट मैंनेजर</strong> <strong>(SPM) मनीष पंवार&nbsp;</strong>कहते है-<em> "आजीविका मिशन के समूहों में महिलाओं को खास ट्रेनिंग देकर सक्षम बनाया जा रहा.इस समय सात जिलों के आठ ब्लॉक में विशेष ट्रेनिंग से सैकड़ों किसान दीदियों के आर्थिक हालत बदल गए."</em></p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">विवेक वर्द्धन श्रीवास्तव </dc:creator><pubDate>Sat, 05 Aug 2023 12:07:01 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/kahaniyan/ajeevika-mission-and-pradan-helping-singroli-farmers-reap-benefits]]></guid><category><![CDATA[कहानियां]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/2PvfulNwGzoHG4Qg2t4M.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/2PvfulNwGzoHG4Qg2t4M.jpg"/></item><item><title><![CDATA[मोबाइल दीदी बोल रहीं है , फोन तो उठाओ ! ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/nazariya/digital-technology-can-reach-women-through-selfhep-groups</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/fJwmHWd1x2vHLAZqPbg3.jpg"><p>भारत में डिजिटल क्रांति की शुरुआत हो चुकी है. लेकिन भारत में डिजिटल लिट्रेसी को लेकर जेंडर डिवाइड अभी भी बड़ा है. खासकर ग्रामीण भारत में महिलाओं की डिजिटल डिवाइस तक पहुंच बहुत सिमित है. अगर है भी तो वह उतना समय नहीं दे पाती.  </p>
<p>इन सबको लेकर ही बीबीसी मीडिया एक्शन ने स्वयं सहायता समूहों (SHGs) के माध्यम से महिलाओं को डिजिटल दुनिया तक पहुंचाने की पहल करी. इस पहल में चैतन्य वाइस (Chaitanya WISE) और प्रदान (PRADAN) ने बिल और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन (Bill & Melinda Gates Foundation) ने साथ दिया.</p>
<p>भारत में, पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की मोबाइल इंटरनेट उपयोग करने की संभावना 41% कम है. इस तरह डिजिटल और टेक्नोलॉजी के फायदे उन तक नहीं पहुंच पा रहे हैं. 8.5 करोड़ से अधिक महिला सदस्यों के साथ, सेल्फ हेल्प ग्रुप (Self Help Group) बड़े पैमाने पर महिलाओं तक डिजिटल क्रांति को पहुंचा सकते हैं.      </p>
<p>फोन तो उठाओ ! ऐसा ही एक प्रोजेक्ट है जिसमें डिजिटल साक्षरता को ऑडियो वीडियो के माध्यम से SHG की मीटिंग में सिखाया जाता है. साथ ही इसमें समूहों को प्रशिक्षण और डेमो दिए जाते हैं. स्वयं सहायता समूह की महिलाओं के लिए डिजिटल कौशल प्रशिक्षण वो शुरुआत है जिससे उनके सशक्तिकरण की राह मजबूत होगी. फोन तो उठाओ ! जैसे प्रोजेक्ट, महिलाओं में मोबाइल फोन के उपयोग और उसको अपने पास रखने को ज़रूरी बताता है. साथ ही इस तर्क का मुकाबला भी करता है कि महिलाओं को मोबाइल फोन (विशेष रूप से स्मार्टफोन) की आवश्यकता नहीं है और यह महिलाओं के समय की बर्बादी है.  </p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/qdrzMHU6d85MshADfDC4.jpg" alt="digital divide"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits:Telegraph India</em></span></p>
<p>मोबाइल सखी वह पहला कदम था जिसके ज़रिये टेक्नोलॉजी को पहुंचाया गया स्वयं सहायता समूहों तक. मोबाइल सखी वो भरोसेमंद साथी बनी जो महिलाओं के उनके अपने घरों और जाने पहचाने माहौल में ट्रेनिंग दे रही है. समुदाय की महिलाओं के रूप में, मोबाइल सखियां वो  रोल मॉडल बनी जो प्रासंगिक तौर पर सुलभ मार्गदर्शन और सहायता प्रदान करने में सक्षम है. इस से SHG सदस्यों को आसानी होती है. साथ ही स्थानीय भाषा में सीखना आसान होता है.  </p>
<p>एक काल्पनिक चरित्र, 'खुशी दीदी' बनाया गया जो की डिजिटल तकनीकों का उपयोग Self Help Group की महिलाओं को समझा सके. रोचक अंदाज़ वाला यह काल्पनिक चरित्र, बहुत पसंद किया गया. 'खुशी' को एक स्वयं सहायता समूह सदस्य के रूप में डिजाइन किया गया, जो डिजिटल रूप से साक्षर है और अन्य सदस्यों को मोबाइल फोन का उपयोग करने के लाभों के बारे में सिखा रही है. इसके रिजल्ट को देखते हुए एक दूसरा काल्पनिक चरित्र विकसित किया गया, 'कमला दीदी', जो SHG में एक अनुभवी किसान और कृषि प्रशिक्षक है .</p>
<p>डिजिटल तकनीक के आसपास की बातचीत में अक्सर अंग्रेजी शब्द शामिल होते हैं. इस प्रोजेक्ट में ऐसी शब्दावली का उपयोग किया गया जिसे कम साक्षर, कम आय वाली महिलाएं आसानी से समझें. जैसे वॉयस सर्च को 'बोलकर खोज' के रूप में बेहतर समझाया गया. टेक्नोलॉजी की बहुत कम महिलओं तक पहुंच ने तकनीक के फायदों को सीमित कर दिया. ग्रामीण क्षेत्रों में, जहां कम साक्षरता या इंटरनेट-सक्षम डिवाइस तक पहुंच की कमी है. डिजिटल सामग्री को व्हाट्सएप चैटबॉट के माध्यम से साझा किया गया और इनबाउंड इंटरएक्टिव वॉयस रिस्पॉन्स सर्विस (आईवीआर) भी उपयोग में लाया गया. इन्हे मोबाइल सखियां, गरीब और ग्रामीण महिलाओं को ऑडियो वीडियो की तरह उन स्वयं सहायता समूह महिलाओं तक पहुंचा सकी, जिनके पास स्मार्टफोन नहीं है या डेटा का खर्च नहीं उठा सकते और जहां मोबाइल इंटरनेट कनेक्टिविटी खराब है.  विश्लेषण से पता चला कि मोबाइल सखियों द्वारा चैटबॉट वीडियो और आईवीआर ऑडियो सामग्री को लगभग समान मात्रा में चलाया गया  जिससे पता चलता है कि दोनों ही महत्वपूर्ण है. कार्यक्रम के डिजाइन यह सुनिश्चित किया गया की आखिरी महिला तक बात और टेक्नोलॉजी (Technology) पहुंचे.  </p>
<p>तकनीक तक पहुंचने के लिए एक बड़ी लड़ाई सामाजिक और व्यावहारिक भी थी. डिजिटल सुरक्षा और धोखाधड़ी ऐसी बाधाएं थी जिन्हें पार करना ज़रूरी था. टेक्नोलॉजी को हर महिला तक पहुंचने के लिए ट्रस्ट बिल्डिंग की गयी और डिजिटल स्पेस में SHG महिलाओं को लाया गया. टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल से स्वयं सहायता समूह की महिलाओं के लिए सशक्तिकरण के साथ आर्थिक आज़ादी के द्वार भी खोले जा सकते हैं. देश दुनिया की रफ़्तार से बराबरी करने में तकनीक की स्पीड से चलना और उसे समझना ज़रूरी है.  </p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">रोहन शर्मा</dc:creator><pubDate>Thu, 11 May 2023 17:10:37 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/nazariya/digital-technology-can-reach-women-through-selfhep-groups]]></guid><category><![CDATA[नज़रिया]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/fJwmHWd1x2vHLAZqPbg3.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/fJwmHWd1x2vHLAZqPbg3.jpg"/></item></channel></rss>