<rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" xmlns:dcterms="http://purl.org/dc/terms/" xmlns:geo="http://www.w3.org/2003/01/geo/wgs84_pos#" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/" xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/" xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/" version="2.0"><channel xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/"><title><![CDATA[ राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू]]></title><link>https://ravivarvichar.in/tags/raassttrpti-dropdii-murmuu</link><description/><atom:link href="https://ravivarvichar.in/rss/tags/raassttrpti-dropdii-murmuu" rel="self"/><language>en-us</language><lastBuildDate>Mon, 01 May 2023 17:01:01 +0530</lastBuildDate><item><title><![CDATA[मजदूर दिवस : SHG जैसे संगठन से बदलेगी तस्वीर ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/nazariya/shgs-have-the-power-to-make-women-financially-independent</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/1pLMU4H0iodc3G8VxXuv.jpg"><p>हमारे देश में चाहे हरे-भरे लहलहाते खेत हों या बड़े बड़े भवन या मल्टीज़ हों या कोई और बड़े इंफ्रास्ट्रक्स्चर.... गांव की सड़कों से महानगरों पर गर्म सड़कों पर डामर बिछा रहे हों, या और जो भी आप आधुनिकता के पैमाने पर सोच सकें. सभी की नींव में यदि कोई है तो वह एक ही शक्ल हमारे मन और मस्तिष्क पर अंकित होती है.... वह है फटे से चीथड़ों और सिर पर गमछा बांधे लोग...चाहे कोई भी मौसम हो बरसात ,भीषण लू से तपती गर्मी या कड़ाके ठंड सब मौसम में ये दिख जाएंगे. इनकी हाड़तोड़ मेहनत और पसीना बहाते लोगों की बदौलत इंडिया एक नई तस्वीर के रूप में उभर रहा है. इन श्रमिकों लेकर चाहे हमारी सरकारों ने पूरा एक दिन समर्पित कर दिया लेकिन कई इलाकों में लोग अब भी इस खास दिन श्रमिक या "मजदूर दिवस " से बेखबर हैं. हर साल की तरह 1 मई को मजूदर दिवस मनाया जाता है. पर मजदूरों का अब तक असंघठित श्रेणी में रखा गया. अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग तरह के मजदूर जी-जान से जुटे हैं.</p>
<p>सरकारों ने समय -समय पर चाहे कई योजनाएं बनाई बावजूद उसका लाभ पूरी तरह नहीं मिल सका. आज भी कई मजदूर गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे हैं. इन मजदूरों में महिला श्रमिकों की हालत और अधिक दयनीय है. आज भी असंगठित श्रेणी में मजदूरी कर रहे लोगों में बराबरी की मेहनत के बाद भी पैसों के बंटवारे में बहुत अंतर है. किसी खेत में फसल कटाई हो या मकान बनाने पर मिलने वाली मजदूरी किसी पुरुष को तीन सौ रुपए मिलेगी तो किसी महिला को आज भी डेढ़ सौ रुपए दिए जा रहे. इस भुगतान और कमाई को महिला मजदूरों ने अपनी नियति मान लिया. इसका फायदा ठेकेदार और दूसरे मालिक जम कर उठा रहे हैं.यही वजह कई परिवार रात-दिन पसीना बहाने के बावजूद कर्ज में डूबे हैं. </p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/lcJFyQnR7iLEPRa8IOVZ.jpg" alt="Dewas SHG women left labour"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>देवास जिले के SHG से जुड़ी महिला जो मजदूरी छोड़ अब खुद मालकिन बन गई  (इमेज क्रेडिट-रविवार विचार)</em></span> </p>
<p>मजदूरों के भविष्य सुरक्षित करने के लिए सरकारों ने कई योजनाएं बनाई. उनका फायदा पहुंचाने का प्रयास भी किया.अलग श्रम विभाग खोले. बावजूद अलग-अलग श्रेणी और असंगठित मजदूरों की संख्या अधिक होने से मजदूरों तक  इन योजनाओं का लाभ नहीं मिल सका. आइए हम कुछ योजनाओं की बात करते हैं. केंद्र सरकार ने नरेगा जो बाद में मनरेगा योजना के नाम से हो गई ,को लागू किया. इस योजना में फैलाव अधिक होने से जॉब कार्ड में विसंगतियां सामने आ गई. मजदूरों की सूची में तत्कालीन केंद्रीय मंत्री अरुण यादव और उनके परिवार के नाम शामिल हो गए. जॉब कार्ड बन गए. यह सिर्फ एक उदाहरण है. उधर इससे से भी अधिक दुर्भाग्यपूर्ण  इस जॉब कार्ड और जॉब ग्यारंटी योजना में मृतकों के नाम तक नाम ही शामिल  ही नहीं किए बल्कि उनके खातों से पैसा तक निकाल लिया गया. विसंगति यहीं खत्म नहीं हुई. मजदूरों के हक़ की जगह कई पंचायतों में मशीनों से नियम के विरुद्ध काम करवा कर ख़ास लोगों को लाभ पहुंचाया. यहां तक कि महिला मजदूरों को सौ-पचास रुपए का लालच देकर जॉब कार्ड भी ठेकेदारों ने हजारों  की संख्या में अपने कब्जे में कर लिए. </p>
<p>इन सब विसंगतियों के बाद भी सरकार के प्रयासों में कहीं-कहीं उम्मीद नज़र आती है. हाल के वर्षों में महिलाओं के हित में स्वयं सहायता समूह गठित किए. बाकायदा इनमें महिलाओं को जोड़ा. सरकार ने पूरे प्रदेशों में जिला पंचायत अंतर्गत आजीविका मिशन का स्ट्रक्चर तैयार किया. पिछले डेढ़ दशकों में महिला स्वयं सहायता समूह ने काफी हद तक महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाया. उन्हें स्वाभिमान से जीना सिखाया. वे परिवार में सहयोगी के तौर पहचाने जाने लगीं हैं. यदि हम महिला स्वयं सहायता समूह के स्ट्रक्चर और कामकाज पर निगाह डालें तो समझ सकते हैं कि इस योजना के पीछे महिला मजदूरों को संगठित कर लाभ देना है. </p>
<p>केवल मप्र में ही लगभग चार लाख महिला समूहों में 60 लाख से ज्यादा श्रमिक महिलाओं को एकजुट कर नए रोजगार से जोड़ दिया गया.वोकल फॉर लोकल आधार पर स्थानीय थीम पर इन महिलाओं को जोड़ा. चाहे डिंडोरी कि महिलाएं गौंडी आर्ट से जुड़ीं हों या महुआ और मोटे अनाज के उत्पादन से जुड़ीं हो या देवास में मजूदर महिलाओं को जमीन मुहैया कर मालिक बनाया हो या नीमच में टेक्स सखियों ने नल-जल योजना से प्रबंधन सीखा हो या बुरहानपुर में मशरूम की खेती तो कभी नल जल योजना में देश में नंबर एक बनाया हो या उज्जैन का मछली पालन तो रतलाम में अचार-पापड़ निर्माण उद्योग हो या उमरिया में टाइगर नेशनल पार्क की लेडी गाइड...ये सब कुछ बानगी है जहां महिलाओं ने देश में खुद की पहचान बनाई. राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू हों या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ही क्यों न हों इन आत्मनिर्भर महिलाओं से मिले और हौसला बढ़ाया.</p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/Nbp9mjvwM0P9Rq1ZPjtw.jpeg" alt="labour day"></p>
<p> <span style="font-size: 8pt;"><em>निमाड़ के इलाके में तेज़ दोपहरी में गड्ढे खोदती महिला ,पास में बेखबर बैठा मासूम बच्चा (इमेज क्रेडिट-रविवार विचार )</em></span> </p>
<p>इससे साबित होता है कि यदि महिलाओं की तर्ज पर श्रमिकों को और अधिक संगठित किया जाए और SHG की तरह योजनाओं की मॉनिटरिंग की जाए तो मजदूर दिवस की सार्थता बढ़ जाएगी. आदिवासी इलाकों में आज भी हजारों की संख्या में मजदूर गुजरात और महाराष्ट्र राज्यों में मजदूरी के लिए पलायन कर जाते हैं. इनको अपने ही गांव में काम दिलाने और आत्मनिर्भर बनाने के लिए स्वयं सहायता समूह जैसी योजना को लागू करना चाहिए. रविवार विचार ऐसी सफल होती योजनाओं को समाज के सामने लाता रहेगा, जिसमें मजदूरों को आर्थिक आत्मनिर्भर और स्वाभिमान की कहानी छुपी हो. </p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">विवेक वर्द्धन श्रीवास्तव </dc:creator><pubDate>Mon, 01 May 2023 17:01:01 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/nazariya/shgs-have-the-power-to-make-women-financially-independent]]></guid><category><![CDATA[नज़रिया]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/1pLMU4H0iodc3G8VxXuv.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/1pLMU4H0iodc3G8VxXuv.jpg"/></item><item><title><![CDATA[बाग़ प्रिंट से दिल गार्डन गार्डन ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/kahaniyan/baag-print-of-dhar-mp</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/C3pqFkoHFvKEfU6lZMvb.jpg"><p>"अरे वाह, ये कमाल कैसे करती हो ? इतनी सुन्दर डिज़ाइन और सॉफ्ट कपड़ा. कितने दिन में बना लेती हो ये साड़ी और सूट. आपके स्टॉल पर सबसे ज्यादा देर रुकने का मन हो रहा है." राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू जी ने जब यह बातें सरमी बाई से कही तो यह जीत थी धार अंचल के जनजातीय  समूहों की. बरसों तक रंगों में हाथ और हूनर होने के बावजूद मजदूरी करने वाली सरमी बाई पहले तो सोच ही नहीं पा रही थी कि उसके सामने राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू खड़ी हैं. राष्ट्रपति के सवालों पर वो बस इतना बोल सकी- " मुझे मजदूरी में घर चलाना मुश्किल हो रहा था. मेरी साथी महिलाओं की  भी यही हालत थी. हम सब मिले और अब अपने पैरों पर खड़े हैं. एक दिन में चार साड़ी, चार बेड शीट या तीन सूट बना लेते हैं." राष्ट्रपति मुर्मू ने कहा 'शाबाश'. आप जैसी महिलाएं ही देश की असली पहचान है. पिछले दिनों भोपाल दौरे पर राष्ट्रपति मुर्मू ने स्वसहायता समूह से जुड़ी महिलाओं से मुलाकात की और उनके कारोबार के साथ उनके स्टॉल को भी देखा. </p>
<p><img style="width: 274px; height: 615px;" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/IzlGN6BsfSuhJCGWA3Q6.jpg" alt="Baag Print"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>मृगनयनी शो रूम पर ग्राहकों की पसंद बनी बाग़ प्रिंट साड़ियां (Image Credits: Ravivar Vichar)</em></span></p>
<p>धार जिले के बाग़ प्रिंट के नाम से प्रसिद्ध कपड़े को देश -विदेश में पहचान दिलाने वाली महिलाओं ने आत्मनिर्भरता की नई सोच बना ली. बाग़ नगर में प्रिंट होने वाली प्रिंट बाग़ प्रिंट के नाम से पहचान बना चुकी है. इस बाग़ प्रिंट से जुड़े मटेरियल प्राकृतिक रंग के उपयोग के कारण बढ़ती लोकप्रियता से असली हुनरमंद इसके कारखानों में मजदूर बन कर रह गए. एजेंटो ने इन से सस्ते दामों पर मटेरियल ख़रीदा और खुद के टैग लगा कर बाजारों में बेच दिए. इन्होंने फायदा उठाया और अवार्ड तक अपने नाम कर लिए. पिछले कुछ सालों ये महिलाएं साहूकारों और एजेंटों के चंगुल से निकली और खुद के समूह बना कर कारोबार कर रहीं हैं. अब यहां ऐसे कई समूह हैं जो बाग़ प्रिंट कर रहीं हैं.          </p>
<p>सरमी आगे कहती हैं - "बरसों से वह साड़ी,सूट सहित अन्य कपड़ों पर बाग़ प्रिंट कर रही है. कारखानों मजदूरी करते रहे. ये साड़ियां और कपड़े नदी में सिर्फ धुलवाते. वहां से निकले तो एजेंटों ने हमारी गरीबी का फायदा उठाया. गरीबी के हालातों से निकल नहीं पा रहे थे." सरमी के "वनवासी स्वसहायता महिला समूह" में दस दीदियां जुड़ी हुईं हैं. जो इस प्रक्रिया में अलग-अलग रोल निभाती हैं.इस समूह की महिलाएं निर्मला बाई, शैल बाई, इंदिरा बाई आदि पूर्व राज्यपाल आनंदी बेन पटेल, वर्तमान राज्यपाल मंगू भाई पटेल सहित कई लोगों से मिल चुकी हैं.</p>
<p>बाग़ नगर में ऐसे ही कई महिलाएं अब प्रिंट कारोबार से जुड़ अपनी ज़िंदगी को बढ़िया तरीके जीने लगीं हैं. इस नगर की "परी सहायता समूह" की अनिता सोलंकी कहती है -" हम जो प्राकृतिक तरीके से रंग बनाते हैं वही इस प्रिंट की खूबी है. हम कॉटन के सूट ,साड़ी ,बेड शीट आदि को पानी में भिगो देते हैं. इमली की चियें को पीसकर पॉवडर बनाते हैं. लोहे की जंग ,कशिश फिटकरी मिला कर काला रंग तैयार करते हैं. अरंडी (कैस्टर ऑइल )के तेल से पीला कलर बन जाता है. इन रंगो को उबाल कर पक्का कर लेते हैं.इसमें केमिकल की मिलावट नहीं होती." ग्राम महिला संगठन में बीस से ज्यादा समूह जुड़े जो अलग-अलग काम कर रहीं हैं.</p>
<p><img style="width: 531px; height: 398px;" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/eFQorHOcwGhCp0cRfrqW.jpg" alt="Baag Print"></p>
<p><em><span style="font-size: 8pt;">बाग़ प्रिंट को देखते राज्यपाल मंगू भाई पटेल (Image Credits: Ravivar Vichar)</span></em></p>
<p>शिव स्वसहायता समूह की अध्यक्ष मुस्कान सोलंकी भी इसी धंधे से जुड़ कर स्वाभिमान की जिंदगी जी रही है. मुस्कान बताती है - "मजदूरी से छुटकारा मिल गया. जब मैं अपने पैरों पर खड़ी हुई तब भोपाल,माण्डव सहित सरस मेला अहमदाबाद के हाट, प्रदर्शनी में जाने का मौका मिला. जहां राज्यपाल, मुख्यमंत्री सहित कई विदेशियों से भी मिल सके. </p>
<p><img style="width: 420px; height: 562px;" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/pFJQOgos6VStcoXs4Pna.jpg" alt="Baag Print"></p>
<p><em><span style="font-size: 8pt;">(Image Credits: Ravivar Vichar)</span></em></p>
<p>विदेशों तक अपनी पहुंच और पसंद बन जाने वाली बाग प्रिंट का शुरुआती इतिहास के कोई ठोस प्रमाण तो नहीं हैं,लेकिन यहां के क्षेत्र की गुफाओं पर अंकित शैल चित्र लगभग एक हजार साल पुराने हैं. जिससे इतिहासकार अनुमान लगाते हैं कि यह हस्तशिल्प कला बहुत पुरानी और  कला संस्कृति का हिस्सा रहा होगा. आजीविका मिशन की जिला परियोजना प्रबंधक अपर्णा पांडेय कहती हैं -" लगभग तीन सौ साल पहले यहां हस्तशिल्प और इससे जुड़े लोग बाग प्रिंट को कमाई का जरिया बनाने लगे. बाघिनी नदी में ये कपड़ों को धोने का काम करते आ रहे हैं. छपाई के लिए वूड हस्तशिल्प की डाई  का उपयोग किया जाता है. वक़्त के साथ अब ये समूहों गठन और खुद के पैरों पर खड़ी हो रहीं हैं. इन्हे सरकार प्रदर्शनी ,हाट बाजारों में भेज कर और अधिक मौका दे रही है."</p>
<p>सरमी बाई ,अनीता सोलंकी ,मुस्कान बाई बड़े गर्व से बताती हैं की अब उनके पति भी मजदूरी पर जाने का काम छोड़ कर पत्नियों और परिवार का साथ दे रहें हैं. सरकार हस्तशिल्प निगम द्वारा क्वालिटी मैंटेन भी करवा रही है. मप्र हस्तशिल्प एवं हाथकरघा विकास निगम लिमिटेड, इंदौर के प्रबंधक डीकेशर्मा और मृगनयनी प्रभारी सहायक प्रबंधक दिलीप सोनी कहते हैं-" ग्रामीण क्षेत्रों में से एक बाग़ प्रिंट बहुत प्राचीन कला का नमूना है. उनकी कला को लगातार प्रोत्साहन दिया जा रहा है. बड़े शहरों के साथ विदेशों में भी यह कला पसंद बना चुकी है.</p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">विवेक वर्द्धन श्रीवास्तव </dc:creator><pubDate>Mon, 17 Apr 2023 13:22:00 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/kahaniyan/baag-print-of-dhar-mp]]></guid><category><![CDATA[कहानियां]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/C3pqFkoHFvKEfU6lZMvb.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/C3pqFkoHFvKEfU6lZMvb.jpg"/></item><item><title><![CDATA[पति, पत्नी और SHG ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/kahaniyan/husbands-work-with-shg-women-to-come-out-of-poverty</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/Pg3QDFgf1eHiwtt2gocv.jpg"><p>बड़वानी जिले के आदिवासी ब्लॉक ठीकरी के जय भवानी स्वयं सहायता समूह की हर्षा धर्माल और दीपाली केंगडे ने अपनी मेहनत और रात-दिन एक कर ऐसी पहचान बनाई कि उनके हाथों से तैयार मसाला,पापड़ और सेवइयां का स्वाद निमाड़ और मालवा तक पहुंच गया. हर्षा कहती है -" हमारे जय भवानी समूह की दीदियां छोटे-छोटे समूह के काम कर रहीं थी. तभी पापड़ बनाने की मशीन ली और काम शुरू किया.देखते ही देखते हमारी पहचान बनने लगी.अब एक मशीन और लगाएंगे." धीरे -धीरे दिन फिरने लगे. श्री गणेश स्वयं सहायता समूह की अध्यक्ष वैशाली चौधरी बताती हैं - " हमारे साथ हर्षा और दीपाली ने काम शुरू किया. हमारे साथ अब कई दीदियां इसी तरह जुड़ीं और आत्मनिर्भर हो गई." हर्षा की पापड़ यूनिट में मिलेट्स को भी महत्व दिया गया. यहां रागी मोटे अनाज के भी पापड़ बन रहे,जिसे पसंद किया जा रहा है. हर्षा के पति गिरिधर कहते हैं-" जब फैक्ट्री बंद हुई. लगा जीवन ख़त्म हो गया. लेकिन मुझे ख़ुशी है कि अपनी पत्नी हर्षा की  यूनिट में काम कर रहा हूं ."</p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/oRCMe33qUmn6s5eVxJLs.jpg" alt="SHG"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>यूनिट में सिवइयां सुखाते हुए दीपाली (Image Credits: Ravivar vichar)</em></span></p>
<p>यह उपलब्धि यूहीं नहीं मिली.दीपाली और हर्षा पर उस वक़्त चिंताओं का पहाड़ टूट पड़ा जब उन्हें पता चला कि वो फैक्ट्री बंद हो गई है जहां उनके पति काम किया करते थे . घर चलने का साधन नहीं बचा. उनके पैरों की ज़मीन खिसक गई. बच्चों की पढ़ाई और घर चलाने की चिंता... लेकिन कुछ पल में ही उन्होंने खुद को संभाला. और फिर सोचा, नई ज़िंदगी शुरू करेंगे, नए कारोबार से. आखिर उनका स्वयं सहायता समूह ही पहचान बना. जब पति भी समूह में काम करने को तैयार हुए तब सब के चेहरे पर मुस्कान बिखर गई. </p>
<p>इसी कैंपस में आप जब जाएंगे, बाहर गैलरी में सेवइयें बड़े सुंदर तरीके से सूखते और बनाते हुए दीपाली दिख जाएंगी. इनकी संघर्ष की  कहानी ख़त्म और सफलता रफ़्तार पकड़ चुकी है. दीपाली कहती हैं - "जब मेरे पति प्रमोद बेरोजगार हो गए,सबने हंसी उड़ाई. मैंने हिम्मत नहीं हारी. उदास पति को सहारा दिया और यूनिट से जोड़ लिया. हमारा काम और अच्छे से सेट हो गया. यह सब आजीविका मिशन का ही असर था कि हम आत्मनिर्भर बन सके. "समूह में बनाई जा रही सिवईयें लोगों द्वारा बहुत पसंद की जा रही है. दीपाली के पति प्रमोद कहते हैं - "शुरू में लोग कहते थे, पत्नी की नौकरी कर रहे हैं. हमने परवाह नहीं की. अब हम अपने बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ा पा रहे हैं. " </p>
<p><img src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/G1fVHGBVlgAhjmQGyTbU.jpg" alt="papad"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>रैक में पापड़ सुखा कर पैक किए जाते हैं (Image Credits: Ravivar vichar)</em></span></p>
<p>जिले में इस यूनिट को देखने पूर्व राज्यपाल आनंदी बेन पटेल ,राज्यपाल मंगू भाई पटेल भी आ चुके हैं. इस कैंपस में लगभग साढ़े तीन सौ से ज्यादा महिलाएं रोजगार पा चुकी हैं.आजीविका मिशन के जिला परियोजना प्रबंधक योगेश तिवारी कहते हैं - "ठीकरी में संचालित सभी यूनिट मिसाल हैं. यहां सिलाई, मसाला उद्योग, पापड़ सहित कई यूनिट काम कर रहीं हैं. इस ग्राम संगठन को राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू से मिलने का भी मौका मिला है." लगभग छह हजार महिलाएं इस ब्लॉक में अपने-अपने क्षेत्रों में आत्मनिर्भर बन कर सम्मान की ज़िंदगी जी रहीं हैं. </p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">विवेक वर्द्धन श्रीवास्तव </dc:creator><pubDate>Sat, 01 Apr 2023 17:12:38 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/kahaniyan/husbands-work-with-shg-women-to-come-out-of-poverty]]></guid><category><![CDATA[कहानियां]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/Pg3QDFgf1eHiwtt2gocv.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/Pg3QDFgf1eHiwtt2gocv.jpg"/></item></channel></rss>