<rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" xmlns:dcterms="http://purl.org/dc/terms/" xmlns:geo="http://www.w3.org/2003/01/geo/wgs84_pos#" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/" xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/" xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/" version="2.0"><channel xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/"><title><![CDATA[ Self help groups-SHG]]></title><link>https://ravivarvichar.in/tags/self-help-groups-shg</link><description/><atom:link href="https://ravivarvichar.in/rss/tags/self-help-groups-shg" rel="self"/><language>en-us</language><lastBuildDate>Mon, 22 May 2023 14:40:10 +0530</lastBuildDate><item><title><![CDATA[स्त्री निधि से हर छत पर सोलर पैनल ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/khabar/stree-nidhi-helpn-to-install-pv-solar-panels-in-rural-telangana</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/xhLSXHF9qiveAJZjhxcn.jpg"><p>ग्रिड से जुड़े <strong>रूफटॉप सोलर पैनल</strong> (Rooftop Solar Panel), जिन्हें आमतौर पर एक शहरी चीज़ माना जाता है, <strong>ग्रामीण तेलंगाना</strong> (Rural Telangana) की छतों पर दिखाई देने लगे हैं. यह मुमकिन हो पाया है <strong>स्त्री निधि</strong> की वजह से. स्त्री निधि (Stree Nidhi) एक <strong>सहकारी ऋण सुविधा</strong> यही जिसे <strong>स्वयं सहायता समूहों </strong>(Self Help Groups-SHG) और राज्य सरकार द्वारा बढ़ावा दिया गया है. अपनी<strong> क्लाइमेट फाइनेंसिंग इनीशियेटिव्स </strong>(Climate Financing Initiatives) पहल के तहत, <strong>क्रेडिट कोऑपरेटिव फेडरेशन</strong> ने राज्य में 1<strong>0 जिलों </strong>के <strong>49 गांवों</strong> में<strong> 205 घरों </strong>की छतों पर <strong>ग्रिड से जुड़े फोटोवोल्टिक सिस्टम </strong>लगवाने के लिए आर्थिक सहायता की है. <strong>कामारेड्डी, जगतियाल, संगारेड्डी, मेडक, निर्मल, निजामाबाद, जनगांव, करीमनगर, सूर्यापेट और आदिलाबाद </strong>जिले में सफलतापूर्वक ये काम हुआ है.</p>
<p>इसकी वजह से हर महीने हर घर में कम से कम<strong> 150 यूनिट बिजली की बचत हुई</strong> है, जो हर साल कम से कम<strong> 3.7 लाख यूनिट</strong> हो जाती है. बचत के इन आंकड़ों को देखते हुए, स्त्री निधि अधिकारियों ने साल ख़त्म होने तक 1<strong>0 हज़ार फोटोवोल्टिक सिस्टम लगाने का लक्ष्य तय किया</strong> है. यह योजना ग्रिड से जुड़े रूफटॉप सोलर सिस्टम के लिए <strong>मिनिस्ट्री ऑफ़ न्यू एंड रिन्यूएबल एनर्जी</strong> (Ministry of New and Renewable Energy)  द्वारा दी जाने वाली <strong>सब्सिडी</strong> पर निर्भर है, जिसे <strong>तेलंगाना स्टेट रिन्यूएबल एनर्जी डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन</strong> (TSREDCO) और <strong>बिजली वितरण कंपनियों का सहयोग</strong> भी मिला है.</p>
<p>स्थापना की कुल लागत का लगभग <strong>20% योजना के तहत सब्सिडी </strong>के रूप में दिया जाएगा, और बचा हुआ भुगतान लाभार्थी द्वारा किया जाएगा. जिसके लिए स्त्री निधि सहायता करती है, और लोन देती है. लोन<strong> 60 महीनों में चुकाया जायेगा</strong> जिस पर <strong>हर साल 11% की ब्याज दर </strong>देनी होगी. यह योजना केवल <strong>स्वयं सहायता समूह के सदस्यों</strong> को दी जाती है, जिनके पास स्वयं का आरसीसी भवन है या राज्य सरकार द्वारा 160 से 200 वर्ग फुट की छत के साथ दिया गया डबल बेडरूम का घर है.</p>
<p><em>“हमारा बिजली बिल बहुत कम हो गया है, और हम हर महीने ग्रिड में बड़ी संख्या में यूनिट्स का योगदान कर रहे हैं, जिसके लिए डिस्कॉम हमें ₹ 4.5 प्रति यूनिट के हिसाब से भुगतान कर देता है. लोन का भुगतान पांच वर्षों में किया जाएगा, लेकिन इसका लाभ अगले 25 वर्षों तक मिलता रहेगा. बिजली शुल्क लगातार बढ़ रहा है, मुझे खुशी है कि मैंने ये विकल्प चुना है</em>," कामारेड्डी जिले के थिम्मापुर गांव के स्वयं सहायता समूह की एक दर्जी और ग्राम संगठन सहायक दुर्गा भवानी ने बताया, जहां 15 सोलर पैनल लगाए जा चुके हैं.</p>
<p>हमने इस साल में <strong>10 हज़ार एसएचजी सदस्यों</strong> तक पहुंचने का लक्ष्य तय किया है. यह पहल न केवल ऊर्जा आपूर्ति के समय में मदद करेगी बल्कि अगले 25 सालों में बिजली पर होने वाले खर्च को भी काफी कम कर देगी.' स्त्री निधि के मैनेजिंग डायरेक्टर जी विद्यासागर रेड्डी ने कहा. </p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मिस्बाह</dc:creator><pubDate>Mon, 22 May 2023 14:40:10 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/khabar/stree-nidhi-helpn-to-install-pv-solar-panels-in-rural-telangana]]></guid><category><![CDATA[ख़बर]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/xhLSXHF9qiveAJZjhxcn.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/xhLSXHF9qiveAJZjhxcn.jpg"/></item><item><title><![CDATA[गांव में CSC से बैंकिंग हुई आसान ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/kahaniyan/couple-brings-banking-in-sukhpuri-village-through-csc</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/dKcO0HxM0lua5yKsyCK0.jpg"><p>भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. देशभर में, स्वयं सहायता समूहों (Self Help Groups-SHG) से जुड़कर महिलाएं आर्थिक क्रांति (financial revolution) ला रही हैं. पर, आज भी कई गांवों में बैंक तक पहुंच नहीं है. आंकड़ों के हिसाब से करीब  5.96 लाख गांव बैंक (bank) जैसी ज़रूरी सुविधा से वंचित हैं. कई ग्रामीण जागरूक बन फाइनेंशियल मैनेजमेंट (financial management) में बैंक की अहमियत को समझ रहे हैं. मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) के खरगोन (Khargone) के सुखपुरी गांव के एक दंपति ने इस ज़रुरत को ग्रामीणों तक पहुंचाने की ठानी. </p>
<p>रीना ब्रम्हाणे और उनके पति मुकेश ब्रम्हाणे गांव में एक कॉमन सर्विस सेंटर (Common Service Center-CSC) चला रहे हैं जो न केवल ग्रामीणों की मदद करता है बल्कि उनकी बैंकिंग जरूरतों को भी पूरा कर रहा है. सुखपुरी खरगोन के भगवानपुरा प्रखंड का एक छोटा सा गांव है. ज्यादातर ग्रामीण किसान या मजदूर हैं. बैंकिंग या किसी दूसरे वित्तीय लेनदेन से जुड़ी परेशानी को हल करने के लिए ग्रामीणों को अपने गांव से लगभग 10 किलोमीटर दूर धुलकोट जाना पड़ता था. बैंकों में ग्रामीणों को अपनी मजदूरी निकालने या अपना आयुष्मान कार्ड बनवाने के लिए घंटों कतार में खड़ा होना पड़ता है. </p>
<p>रीना और उनके पति की वजह से चीजें बदल गई हैं. ये लगभग 300 परिवारों के गांव में पिछले एक साल से सीएससी चला रहे हैं. किसीका भी  बैंक से जुड़ा कोई काम या कोई वित्तीय लेन-देन होता है तो वह सीएससी के ज़रिये तुरंत हो जाता है. साथ ही गांवों में सरकारी योजनाओं के लिए ऑनलाइन आवेदन करने जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध कराई गई हैं. मुकेश और रीना दोनों ने करीब एक साल पहले सीएससी सेंटर शुरू किया था और अब यह मिनी बैंक की तरह काम कर रहा है.</p>
<p>मुकेश बारहवीं कक्षा पास है और आजीविका कमाने के लिए खेती और मजदूरी का काम करते थे. शादी के बाद, उनकी ग्रेजुएट पत्नी रीना ब्रम्हाणे ने मुकेश की मदद करने का फैसला किया. उसने गांव के दुर्गा स्वयं सहायता समूह से एक लाख रुपये का कर्ज लिया. वह कंप्यूटर के काम के बारे में थोड़ा बहुत जानती थी. मुकेश ने उसे आगे की पढ़ाई के लिए MSW कोर्स में दाखिला दिलाने के लिए प्रोत्साहित किया.</p>
<p>2020-21 में, ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान (RSETI), बैंक ऑफ इंडिया के प्रशिक्षण संस्थान से प्रशिक्षण के बाद, दंपति ने ऋण लिया और एक लैपटॉप, एक स्मार्ट मोबाइल, दो प्रिंटर-फोटोकॉपी मशीन और एक लेमिनेशन मशीन खरीदी. इस राशि से गांव में काम शुरू किया. शुरुआत में, उन्हें ज़्यादा अच्छा रिस्पॉन्स नहीं मिला क्योंकि ग्रामीणों को पैसे खोने का डर था. हालांकि, अब स्थिति बदल गई है. अब सीएससी के ज़रिये वृद्धावस्था पेंशन के अलावा मजदूरी, पेंशन, पीएम आवास योजना, पीएम किसान और बैंक खाते खुलवाने का काम किया जा रहा है.</p>
<p>रीना अभी एमएसडब्ल्यू के अंतिम वर्ष में है. मुकेश ने भी काम में उसकी मदद करनी शुरू कर दी है. रीना हर महीने 200 से 250 ट्रांसैक्शंस कर लेती है. फिलहाल कमाई कम है, पर दंपत्ति संतुष्ट और खुश हैं. दोनों पति-पत्नी मिलकर हर महीने लगभग 8,000 से 10,000 रुपये कमा रहे हैं. </p>
<p>इस काम की बदौलत ग्रामीणों को अब डिजिटल लेनदेन के लिए कहीं दूर नहीं जाना पड़ता. इस दंपति ने खुद जिस तरह से पूरे गांव की इतनी बाई समस्या का हल निकाला, दूसरों के लिए उदाहरण बन गये. आज देशभर में कई महिलाएं स्वयं सहायता से लोन लेकर अपने रोज़गार शुरू कर रही हैं. शिक्षा और समूह की मदद ने रीना को अपने गांव सुखपुरी में बैंक की सुविधा पहुंचाने में मदद की. </p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मिस्बाह</dc:creator><pubDate>Sat, 20 May 2023 15:43:58 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/kahaniyan/couple-brings-banking-in-sukhpuri-village-through-csc]]></guid><category><![CDATA[कहानियां]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/dKcO0HxM0lua5yKsyCK0.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/dKcO0HxM0lua5yKsyCK0.jpg"/></item><item><title><![CDATA[गोधन से कमाया धन ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/khabar/cm-baghel-will-release-rs-13-crore-57-lakh-to-the-beneficiaries-of-godhan-nyaya-yojana</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/AQbxHpEIMXqGlnktryeC.png"><p>छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) सरकार की गोधन न्याय योजना (Godhan Nyay Yojana) से छत्तीसगढ़ में कई वर्गाें को सहयोग मिल रहा है. इस योजना से 3 लाख 41 हजार 713 पशुपालकों को फायदा पहुंच रहा है. ख़ास बात ये है कि इनमें 46 % से ज़्यादा महिलाएं शामिल हैं. महिलाएं गोबर बेचकर आमदनी कमा रही हैं.  इस आय से वे अपने परिवार को सहारा दे रही हैं. कहीं उन्होंने गोबर बेचकर दो पहिया वाहन खरीद लिये, तो कहीं उन्होंने अपने परिवार के लिए मकान बना लिया. इस योजना से लाभ लेकर, महिलाओं ने अपने सपने पूरे किये और उनमें आत्मविश्वास जागा है. वे गौठानों में संचालित होने वाली गतिविधियों में भी काम कर रही हैं. प्रदेश में 10 हजार 426 गौठान स्वीकृत हैं, जिसमें से 10 हजार 206 गौठान बनाये जा चुके हैं. </p>
<p>मुख्यमंत्री भूपेश बघेल (CM Bhupesh Baghel ) दुर्ग जिले के सांकरा पाटन में आयोजित होने वाले 'भरोसे के सम्मेलन' में गोधन न्याय योजना के लाभार्थियों को 13 करोड़ 57 लाख रूपए की राशि का ऑनलाईन ट्रांसफरकरेंगे. जिसमें गौठानों में खरीदे गए 1.98 लाख क्विंटल गोबर के लिये ग्रामीण पशुपालकों को 3.95 करोड़ रूपए, गौठान समितियों को 5.66 करोड़, और स्वयं सहायता समूहों को 3.96 करोड़ रूपए की राशि शामिल है जिससे इन्हें फायदा मिलेगा. गोधन न्याय योजना के तहत गोबर विक्रेताओं, गौठान समितियों और महिला स्वयं सहायता समूहों (Self Help Groups-SHG) को पिछले महीने 445 करोड़ 14 लाख रूपए का भुगतान किया जा चुका है.</p>
<p>इस योजना से उन ग्रामीणों को भी फायदा मिला है, जिनके पास खुदकी ज़मीन नहीं है. लगभग 2 लाख ऐसे परिवारों को भी गौठानों में गोबर की बिक्री करने और रोजगार हासिल करने के अवसर मिले हैं. गोधन न्याय योजना के तहत, गोबर से वर्मी कम्पोस्ट और सूपर कम्पोस्ट खाद बनाने के साथ दूसरी सामग्री भी तैयार की जा रही है. </p>
<p>गौठान और गोधन न्याय योजना ने गांवों में रोजगार के अवसर बढ़ाये हैं. आज गौठान ग्रामीण अंचल में आजीविका के एक मजबूत ज़रिये के रूप में उभर रहे हैं. गोधन न्याय योजना के ज़रिये स्वावलंबी गौठानों की गिनती तेज़ी से बढ़ती जा रही है. स्वावलंबी गौठान अब अपनी स्वयं की जमा पूंजी से गोबर खरीदने के साथ-साथ गौठान की दूसरी ज़रूरतों को भी पूरा कर रहे हैं. राज्य में 5709 गौठान स्वावलंबी बन चुके हैं. गौठानों में गौमूत्र खरीद स्वयं सहायता समूह के महिलाएं उससे जैविक कीटनाशक और फसल को बढ़ाने वाला जीवामृत बनाकर बेच रही हैं. अब तक 74401 लीटर कीटनाशक और 31478 लीटर जीवामृत की बिक्री जो चुकी है, जिससे 48.50 लाख रूपए की कमाई हुई है.</p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">रविवार ब्यूरो </dc:creator><pubDate>Sat, 20 May 2023 15:33:18 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/khabar/cm-baghel-will-release-rs-13-crore-57-lakh-to-the-beneficiaries-of-godhan-nyaya-yojana]]></guid><category><![CDATA[ख़बर]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/AQbxHpEIMXqGlnktryeC.png" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/AQbxHpEIMXqGlnktryeC.png"/></item><item><title><![CDATA[कलारी का स्वाद G20 समिट में ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/khabar/kalari-will-be-served-at-g20-summit-in-srinagar-as-special-dogra-culinary-item</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/7iTK0Qq63RIrKPhLKzky.jpg"><p>दूध से बनी कलादी/ कलारी जम्मू कश्मीर (Kashmir) के कई जिलों में बड़े चाव से खाई जाती है. यह कश्मीर का एक पारंपिक पकवान है, जो हर समारोह में ज़रूर परोसा जाता है. उधमपुर जिले की प्रसिद्ध कलारी को अगले सप्ताह श्रीनगर (Srinagar) में आयोजित होने वाले G20 शिखर सम्मेलन में एक विशेष डोगरा व्यंजन के रूप में परोसा जाएगा.&nbsp;</p><p>वैश्विक स्तर पर कलारी को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार और जम्मू-कश्मीर द्वारा यह पहल की गई है. उधमपुर जिले की महिलाएं दशकों से कलारी बना रही हैं. इसे बाजार में बेचकर अपना जीवनयापन कर रही हैं. लेकिन उन्होंने अभी तक राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्धि हासिल नहीं की है.&nbsp;</p><p>जम्मू और कश्मीर ग्रामीण आजीविका मिशन (उम्मीद) (Kashmir Grameen Ajeevika Mission) ने कलारी को फेमस बनाने की लिए यह फैसला लिया. आजीविका मिशन से जुड़ने के बाद, महिलाएं ज़्यादा पैसा कमाती हैं. कई महिलाएं, उधमपुर जिले के धीरन गांव में, स्वयं सहायता समूह (Self Help Groups-SHG) से जुड़ कर, घर पर बड़ी मात्रा में कलारी तैयार करती हैं. उन्हें अपनी मेहनत का अच्छा मूल्य मिल रहा है.&nbsp;</p><p>स्वयं सहायता समूह की सदस्य और कलारी बनाने वाली सोनिया राजपूत ने कहा कि वे सभी बहुत रोमांचित हैं कि उनकी कलारी अब तेजी से अंतरराष्ट्रीय लोकप्रियता प्राप्त कर रही है. ये महिलाएं फिलहाल, श्रीनगर में होने वाली G20 बैठक के लिए बड़ी संख्या में कलारी तैयार कर रहे हैं.&nbsp;</p><p>स्वयं सहायता समूह से जुड़कर ये महिलाएं ज़्यादा मुनाफ़ा कमा पाएंगी, घर बैठे, अपने कौशल के हिसाब से, रोज़गार शुरू कर सकेंगी. पारंपरिक खान-पान को बढ़ावा देने वाली पहलों से स्थानीय लोगों को लाभ मिलेगा. &nbsp; &nbsp; &nbsp;</p><p><br data-mce-bogus="1"></p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">रविवार ब्यूरो </dc:creator><pubDate>Thu, 18 May 2023 14:21:37 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/khabar/kalari-will-be-served-at-g20-summit-in-srinagar-as-special-dogra-culinary-item]]></guid><category><![CDATA[ख़बर]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/7iTK0Qq63RIrKPhLKzky.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/7iTK0Qq63RIrKPhLKzky.jpg"/></item><item><title><![CDATA[ज़िम्बाब्वे में बदलाव की कहानी लिखते SHG ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/duniyadari/self-help-groups-in-zimbabwe-help-women-overcome-financial-struggles</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/KbkGiLaKdNwgsXegZPDb.jpg"><p>सबसे अधिक अधिकारिक भाषाओँ वाला देश ज़िम्बाब्वे (Zimabwe) अफ्रीकी महाद्वीप के दक्षिणी भाग में जाम्बेजी और लिम्पोपो नदियों के बीच स्थित एक लैंडलॉक (LandLock) देश है. यहाँ 16 अधिकारिक भाषाएं हैं. ज़िम्बाब्वे एक युवा राष्ट्र (young nation) है, क्योंकि आधी आबादी 21 साल से कम उम्र की है. ज़िम्बाब्वे को 18 अप्रैल, 1980 को यूनाइटेड किंगडम (United Kingdom) से आज़ादी मिली थी. पर आज भी यहां गरीबी, भुखमरी, लैंगिक असमानता, कुपोषण वर्तमान की कुछ बड़ी समस्याएं हैं. समस्या से निपटने के लिए सरकार कई कदम उठा रही है. महिलाएं स्वयं सहायता समूह (Self Help Groups-SHG) से जुड़कर अपनी आमदनी बढ़ाने का प्रयास करती हैं.&nbsp;</p><p>2012 में, मिनिस्ट्री ऑफ़ वीमेन अफेयर्स (Ministry of Women Affairs) ने सरकारी विभागों, जिला विकास अधिकारीयों, समुदाय विकास अधिकारीयों, और वॉर्ड कोऑर्डिनेटर्स के साथ मिलकर स्वयं सहायता समूह परियोजना की शुरुआत की. स्वयं सहायता समूह आमतौर पर अपने सदस्यों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लक्ष्य के साथ बनाए जाते हैं. इसमें बचत करना, साथ काम शुरू करना, और छोटे लोन लेना भी शामिल है. इसके साथ ही, महिलाएं &nbsp;स्वयं सहायता समूह से जुड़कर सामाजिक चुनौतियों को दूर करने की भी कोशिश करती हैं.&nbsp;</p><p>बुलिलिमा और मंगवे जिलों में महिलाओं ने गरीबी, लिंग आधारित हिंसा, किशोर गर्भधारण और शराब के दुरुपयोग से निपटने के लिए एक मिलिकानी फेडरेशन (Milikani Federation) की शुरुआत की. मिलिकानी फेडरेशन की अध्यक्ष सामरिया नकोमो ने बताती है कि संगठन महिलाओं और बच्चों दोनों के जीवन में सुधार लाने के लिए काम करता है. समाज में महिलाओं और बच्चों के साथ कई तरह का दुर्व्यवहार हो रहा है. नकोमो की संगठन की तीन स्ट्रक्चर हैं - 10 से 20 महिलाओं का स्वयं सहायता समूह (SHG), क्लस्टर समूह और सबसे ऊपर मिलिकानी फेडरेशन है.</p><p>हर हफ्ते महिलाएं कुछ धन की बचत करती हैं, ताकि अपनी ज़रूरतों की लिए पति पर निर्भर न रहना पड़े. यह राशि महिलाओं को किराने का सामान खरीदने, स्कूलों में ट्यूशन फीस देने और बच्चों की किताबें खरीदने जैसी छोटी-छोटी चीजों में मदद करत है. फेडरेशन के ज़रिये महिलाएं सरकारी और स्थानीय अधिकारियों से सहायता लेती हैं, ताकि नशीले पदार्थों और किशोर गर्भधारण जैसी समस्याओं से निपटा जा सके. &nbsp;</p><p>SHG के राष्ट्रीय कोऑर्डिनेटर, मथोकोज़िसी एनडेबेले ने स्वयं सहायता समूह को दूसरे जिलों में भी शुरू करने का प्रयास किया है. यह कार्यक्रम देश भर के 13 जिलों में सात संगठनों द्वारा चलाया जा रहा है. SHG से जुड़कर महिलाएं अपनी ज़रूरतों को पूरा कर रही हैं. समूह में साथ आने से सामाजिक बुराइयों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना आसान हुआ है, और बदलाव धीरे-धीरे महसूस किया जा सकता है. दुनियाभर के विकासशील देश SHG को बढ़ावा देकर महिलाओं की आर्थिक आज़ादी और सामाजिक बदलाव के सपने को पूरा कर सकते है. &nbsp; &nbsp;&nbsp;<br></p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मिस्बाह</dc:creator><pubDate>Thu, 18 May 2023 12:01:59 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/duniyadari/self-help-groups-in-zimbabwe-help-women-overcome-financial-struggles]]></guid><category><![CDATA[दुनियादारी]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/KbkGiLaKdNwgsXegZPDb.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/KbkGiLaKdNwgsXegZPDb.jpg"/></item><item><title><![CDATA[SHG को मिला फ्लिपकार्ट और सिंपली देसी का साथ ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/khabar/flipkart-and-simplydesi-host-orientation-workshop-for-over-1000-rural-women-artisans-and-shgs-in-nagpur</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/5LgSOzJ2a81YCYFeevOX.jpg"><p>भारत का ई-कॉमर्स मार्केटप्लेस फ्लिपकार्ट (E- Commerce Marketplace Flipkart) लोकल कलाकारों को देश विदेश में पहुंच दे रहा है. फ्लिपकार्ट ने नागपुर, महाराष्ट्र में फ्लिपकार्ट समर्थ पार्टनर सिंपली देसी (Simplydesi) के साथ मिलकर एक ओरिएंटेशन वर्कशॉप (Orientation workshop) का आयोजन किया. इस कार्यशाला का लक्ष्य स्थानीय कारीगरों और स्वयं सहायता समूहों (Self Help Groups-SHG) को कौशल विकास के बारे में बताना और ज्ञान साझा करना था, जो उन्हें अपने व्यवसाय को आगे बढ़ाने के लिए  फ्लिपकार्ट मार्केटप्लेस का फायदा उठाने में सक्षम बनाएगा. इस कार्यक्रम में  मधुबाला, सह-संस्थापक, सिंपलीदेसी, श्री दीनानाथ ठाकुर, अध्यक्ष, सहरकर भारती, श्री स्वप्निल जोशी, टेलीविजन कलाकार और श्री रजनीश कुमार, एसवीपी और चीफ कॉर्पोरेट ऑफिसर, फ्लिपकार्ट मौजूद रहे.</p>
<p>फ्लिपकार्ट मार्केटप्लेस के फायदें बताने के साथ, वर्कशॉप में कई अहम पहलुओं को शामिल किया गया, जिसमें प्रोडक्ट लिस्टिंग और प्रभावी ढंग से ऑनलाइन बिज़नेस करने के तरीकों पर बात हुई. वर्कशॉप में 1000 से ज़्यादा ग्रामीण महिला कारीगरों और स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं ने भाग लिया. आज तक, फ्लिपकार्ट ने राज्य के 50,000 से अधिक विक्रेताओं और फ्लिपकार्ट समर्थ कार्यक्रम के तहत 100 से ज़्यादा विक्रेताओं को ट्रेनिंग (training) दी है. उन्हें नेशनल मार्केट तक पहुंच दी है, जिसमें राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन (National Urban Livelihood Mission) से जुड़े कारीगर और गैर सरकारी संगठन शामिल थे. इस पहल से लोकल कारीगरों और ग्रामीण महिलाओं के नेतृत्व वाले बिज़नेस (business) को मदद मिली है, जो अपने व्यवसायों की पहुंच बढ़ाने के लिए ई-कॉमर्स मार्केटप्लेस का लाभ लेना चाहते थे.</p>
<p>फ्लिपकार्ट समर्थ का उद्देश्य 28 राज्यों में लाखों कारीगरों, बुनकरों और छोटे व्यपारियों को सशक्त बनाने और उन्हें आर्थिक आज़ादी (financial freedom) हासिल करने के अवसर प्रदान करना है. यह प्रोजेक्ट समाज के वंचित वर्गों और सहायक संगठनों की मदद करने के लिए काम करता है. 2019 में लॉन्च होने के बाद से, फ्लिपकार्ट समर्थ ने लाखों उद्यमियों के लिए भारतीय बाजार में पहुंचाया है. आज यह कार्यक्रम देश भर में 15 लाख से ज़्यादा लोगों को रोज़गार दे रहा है. समर्थ ने अकेले पिछले वर्ष की तुलना में अपने विक्रेता संख्या को 300% बढ़ाया है और समर्थ लाभार्थियों को अपने व्यवसाय को 300% तक बढ़ाने में मदद की है. </p>
<p>यह पूरे भारत में राज्य और केंद्रीय मंत्रालयों, विभागों और संस्थाओं जैसे ग्रामीण विकास मंत्रालय; एमएसएमई (MSME) उत्तर प्रदेश विभाग; उद्योग विभाग झारखंड, उत्तराखंड; वाणिज्य विभाग, असम का उद्योग; तमिलनाडु एमएसएमई विभाग; और जम्मू और कश्मीर व्यापार संवर्धन संगठन के साथ मिलकर काम कर रहा है. अधिक एमएसएमई को ई-कॉमर्स के दायरे में लाने वाली फ्लिपकार्ट की लगातार कोशिशों को भारत सरकार के "आत्मनिर्भर भारत" (Atmanirbhar BHarat) विजन के साथ जोड़ा गया है. फ्लिपकार्ट का उद्देश्य अपने प्लेटफॉर्म पर देश भर में 450 मिलियन से अधिक ग्राहकों तक पहुंच प्रदान करके स्थानीय विक्रेता समुदायों की आजीविका को बढ़ाना है. </p>
<p>इंटरनेट (Internet) के इस दौर में यदि ई-कॉमर्स  को नहीं समझा और इसे इस्तेमाल न किया गया तो विकास नामुमकिन हो जाता है. और भी ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म को लोकल आर्टिस्ट, छोटे व्यपारियों, और स्वयं सहायता समूह की महिलाओं की पहुंच बढ़ाने के लिए आगे आना होगा. स्वयं सहायता समूह की महिलाओं को ट्रेनिंग देकर प्रोडक्ट बनाने, मैनेजमेंट करने, लोजिस्टिक्स संभालने, और सामान को ग्राहक तक पहुंचाने में भी मदद मिल सकती है.   </p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मिस्बाह</dc:creator><pubDate>Tue, 16 May 2023 17:54:20 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/khabar/flipkart-and-simplydesi-host-orientation-workshop-for-over-1000-rural-women-artisans-and-shgs-in-nagpur]]></guid><category><![CDATA[ख़बर]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/5LgSOzJ2a81YCYFeevOX.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/5LgSOzJ2a81YCYFeevOX.jpg"/></item><item><title><![CDATA[SHG और FPO से मिलेगी आर्थिक आज़ादी ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/khabar/empowering-ultra-poor-women-through-shgs-and-fpos</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/DNxLVeY2Qe6RlJWyzIJp.jpg"><p>भारत में गरीबी विकास की सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है. इससे निपटने में स्वयं सहायता समूह (Self Help Groups-SHG) कारगर साबित हो रहे हैं. स्वयं सहायता समूहों (SHG) और किसान उत्पादक संगठनों (Farmer Producer Organizations-FPO) में गरीब महिलाओं को शामिल करना उन्हें सशक्त बनाने और स्थायी आजीविका को बढ़ावा देने की दिशा में एक ज़रूरी कदम है. हालाँकि, इसमें कई तरह की चुनौतियां शामिल हैं जिन्हें दूर करना ज़रूरी है. </p>
<p>सबसे बड़ी चुनौती बाजार और संसाधनों तक पहुंचना है, जो अत्यंत गरीब महिलाओं के लिए अपनी आय बढ़ाने और अपने जीवन स्तर में सुधार करने के लिए ज़रूरी है. अंतरराष्ट्रीय गैर-लाभकारी संगठन ट्रिकल अप ने अल्ट्रा पुअर मार्केट एक्सेस प्रोजेक्ट (UPMA) को वॉलमार्ट फाउंडेशन (Walmart Foundation) के सहयोग से ओडिशा के बलांगीर में सफलतापूर्वक लागू किया है. इस पहल ने बताया कि कैसे गरीबी में रहने वाले परिवार सामूहिक रूप से काम कर, इनपुट्स को इकट्ठा कर एक साथ बाजार तक पहुंच कर मुनाफ़ा कमा सकते हैं.  </p>
<p>स्वयं सहायता समूहों और एफपीओ में अत्यंत गरीब महिलाओं को शामिल करने से संबंधित प्रूवन मॉडल और कारगर प्रथाओं को साझा करने के लिए, ट्रिकल अप ने भुवनेश्वर में "इन्क्लुशन ऑफ़ अल्ट्रा पुअर वीमेन इन SHGs एंड FPOs – चैलेंजेज एंड सक्सेस स्टोरीज" (Inclusion of Ultra Poor Women in SHGs and FPOs – Challenges and Success Stories) विषय पर वर्कशॉप का आयोजन किया. कार्यशाला में  सरकारी एजेंसियों, गैर सरकारी संगठनों, शिक्षाविदों, चिकित्सकों सहित विभिन्न संगठनों को साथ लाया गया. नेटवर्क बनाये, नै चीज़े सीखी और विचारों को साझा किया.</p>
<p>सभा को अपने संबोधन में, राज्य मंत्री, ओडिशा सरकार, प्रीतिरंजन घराई ने बताया कि बुनियादी ढांचों के विकास, ग्रामीण आवास परियोजनाओं और सरकारी योजनाओं में नामांकन जैसी पहलों से काफी फायदा पहुंचा है. स्वयं सहायता समूहों (SHG) और किसान उत्पादक संगठनों (FPO) में अति गरीब महिलाओं को शामिल करने की गति बढ़ रही है. महिलाओं को ज़रूरी कौशल सिखाकर SHG और FPO से जोड़कर उन्हें आजीवा का ज़रिया दिया जा सकता है, जिससे उन्हें आर्थिक आज़ादी हासिल हो सकेगी.    </p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">रविवार ब्यूरो </dc:creator><pubDate>Tue, 16 May 2023 16:55:58 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/khabar/empowering-ultra-poor-women-through-shgs-and-fpos]]></guid><category><![CDATA[ख़बर]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/DNxLVeY2Qe6RlJWyzIJp.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/DNxLVeY2Qe6RlJWyzIJp.jpg"/></item><item><title><![CDATA[सोशल मोबेलाइजेशन कैंपेन से महिलाएं होंगी SHG में शामिल ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/khabar/10-crore-rural-deprived-families-will-be-included-in-self-help-groups</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/B0rOGCYFOnUgtPq8ElMG.jpg"><p>आज देशभर में 8.9 करोड़ से ज़्यादा महिलाएं स्वयं सहायता समूहों (Self Help Groups-SHG) से जुड़कर आर्थिक क्रांति (financial revolution) की अगुवाई कर रही हैं. ये महिलाएं कई क्षेत्रों में रोज़गार (employment) शुरू कर देश की अर्थव्यवस्था (economy) को बढ़ाने में मदद कर रही हैं. इनकी सफलता और विकास में योगदान को देखते हुए राज्य और केंद्र सरकार इन्हें अलग-अलग तरह से बढ़ावा दे रही हैं. हर तबके की महिलाओं के सशक्तिकरण (women empowerment) के लक्ष्य को पूरा करने के लिए ज़्यादा से ज़्यादा महिलाओं को समूहों से जोड़ा जा रहा है. प्रधानमंत्री कार्यालय ने देश के 10 करोड़ ग्रामीण वंचित परिवार की महिलाओं को स्वयं सहायता समूह में शामिल करने का लक्ष्य तय किया है. </p>
<p>ग्रामीण विकास मंत्रालय ने सभी राज्यों को स्वयं सहायता समूह गठन से सेचुरेशन प्राप्त करने के लिए सोशल मोबेलाइजेशन कैंपेन आयोजन करने के निर्देश दिए. ये कैंपेन सभी राज्यों में 18 अप्रैल से 30 जून तक चलाया जायेगा. जिले को निर्धारित समय में समूह गठन से सेचुरेट करना है. इसके लिए सघन तौर पर सीआरपी ड्राइव का आयोजन कर स्वयं सहायता समूह में वंचित परिवारों का समावेशन किया जाएगा. इस काम में सहयोग के लिए बड़वानी की सक्रिय समूह दीदियां भी सीआरपी ड्राइव में शामिल होगी. </p>
<p>पहले से SHG से जुड़ी दीदियां अपने समूहों में समुदाय की और भी महिलाओं को जोड़ेंगी. समूह से इन महिलाओं को लोन लेने, बचत करने, और अपना रोज़गार शुरू करने में मदद मिलेगी. देशभर में SHG, महिलाओं को आर्थिक आज़ादी हासिल करने में मदद कर रहे हैं, जिससे पारिवारिक, सामाजिक, और राजीतिक बदलाव भी देखने को मिल रहा है.  </p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मिस्बाह</dc:creator><pubDate>Mon, 15 May 2023 12:49:18 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/khabar/10-crore-rural-deprived-families-will-be-included-in-self-help-groups]]></guid><category><![CDATA[ख़बर]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/B0rOGCYFOnUgtPq8ElMG.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/B0rOGCYFOnUgtPq8ElMG.jpg"/></item><item><title><![CDATA[17 सहकारी बैंक करेंगे किसानों की मदद ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/khabar/17-cooperative-banks-join-farming-venture-in-kalamassery-after-palliyakkal-model</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/4P3fBBxFM8yOhN2NGinj.jpg"><p>ग्रामीण परिवेश में होने की वजह से स्वयं सहायता समूह (Self Help Groups-SHG) ग्राम आधारित रोज़गारों (employment) को बढ़ावा दे रहे हैं. कृषि क्षेत्र में ये समूह तकनीक को ला रहे हैं. स्वयं सहायता समूह से जुड़कर किसान अपनी फ़सल को देश विदेश के बाज़ारों तक पहुंचा रहे हैं. केरेला के 'कृषिकोप्पम कलामसेरी' (Krishikkoppam Kalamassery) का लक्ष्य भी स्वयं सहायता समूहों के ज़रिये  किसानों की मदद करना है. ये खेती योग्य एरिया को SHG से जोड़ता है. </p>
<p>पल्लियाक्कल सेवा सहकारी बैंक (Palliyakkal Cooperative Bank) ने आय सृजन के लिए खेती से जुड़ी गतिविधियों और पहलों को स्पॉनसर करने में अहम भूमिका निभाई. इसकी सफलता ने ऐसा उदाहरण सेट किया जिससे जिले की अन्य सहकारी समितियों का ध्यान आकर्षित होने लगा. इस कड़ी में नया यह है कि 17 सहकारी बैंकों ने 'कृशिककोप्पम कलामसेरी' उद्यम को सफल बनाने के लिए हाथ मिलाया है. कलामसेरी विधानसभा क्षेत्र (Kalamassery Assembly constituency) में कृषि उद्यम शुरू किया गया है. कार्यक्रम का उद्देश्य कृषि क्षेत्र का विस्तार करना है. उद्योग मंत्री पी. राजीव द्वारा  शुरू किये गये इस कार्यक्रम का लक्ष्य किसानों के स्वयं सहायता समूहों की मदद से निर्वाचन क्षेत्र के सभी खेती योग्य क्षेत्रों को खेती के तहत लाना है.</p>
<p>पल्लियाक्कल बैंक बोर्ड के सदस्य एम.पी. विजयन ने कहा कि निर्वाचन क्षेत्र में सभी संसाधनों का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर कृषि गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए किया जाएगा. किसानों को सिर्फ उत्पादन करना होगा, मार्केटिंग (marketing) जैसे दूसरे पहलुओं के लिए सहकारी संस्थाएं उनकी मदद करेंगी. विधानसभा क्षेत्र में चार पंचायतों और दो नगर पालिकाओं में कुल 152 वार्ड हैं, और कार्यक्रम के लिए अब तक किसानों के 159 स्वयं सहायता समूहों का गठन किया गया है.</p>
<p>कलामसेरी निर्वाचन क्षेत्र में सहकारी समितियों द्वारा सभी बुनियादी गतिविधियां की जाएंगी. प्रमुख गतिविधियों में सब्जियों और फलों की खेती, डेयरी, मुर्गीपालन और एक्वाकल्चर शामिल हैं. पल्लिक्कल बैंक ने सीजन में 250 एकड़ में पोक्कली चावल की खेती शुरू करने की भी योजना बनाई है. पोक्कली खेतों से काटे गए धान की मिलिंग के लिए विशेष रूप से एक चावल मिल की स्थापना की है. श्री विजयन ने बताया कि क्षेत्र का पोक्कली चावल 'कैथकम' ब्रांड के तहत बेचा जाता है.</p>
<p>सहकारी बैंक किसानों को सब्जी की खेती के लिए 40 एकड़ और मछली पालन के लिए लगभग सौ पिंजरे लेने में सहायता करेगा. डेयरी गतिविधियों से प्रति दिन लगभग 700 लीटर ताजा दूध की बिक्री हुई है. सहकारी बैंक डेयरी किसानों को ताजा दूध के लिए ₹55 प्रति लीटर की उच्च कीमत का भुगतान भी करता है.</p>
<p>श्री विजयन ने कहा कि पेरुम्बवूर के पास ओक्कल, कोठमंगलम के पास वरापेटी, परावुर के पास कोरमपदम और वडक्केकरा सेवा सहकारी बैंक के दिए गए उदाहरण के अनुसार काम कर रहा है. पल्लीयाक्कल सेवा सहकारी कृषि संबंधित सेमिनारों के साथ अपनी कृषि गतिविधियों में कदम रखने के 23वें वर्ष का जश्न मना रहा है. बैंक के अंतर्गत 28 स्वयं सहायता समूह हैं, जो धान और सब्जी की खेती जैसे कई  गतिविधियों में लगे हुए हैं. ये पहल देशभर में लागू होनी चाहिए, ताकि सब्जियों और फलों की खेती, डेयरी, मुर्गीपालन और एक्वाकल्चर में शामिल किसानों को लाभ मिल सके.  </p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">रविवार ब्यूरो </dc:creator><pubDate>Sat, 13 May 2023 12:01:54 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/khabar/17-cooperative-banks-join-farming-venture-in-kalamassery-after-palliyakkal-model]]></guid><category><![CDATA[ख़बर]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/4P3fBBxFM8yOhN2NGinj.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/4P3fBBxFM8yOhN2NGinj.jpg"/></item><item><title><![CDATA['एकल महिला' से होगा हर महिला का सशक्तिकरण ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/khabar/ahmednagar-identifies-divorced-single-and-abandoned-women-above-40-years</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/8YQYfxY843sueaW4U766.jpg"><p>'महिला सशक्तिकरण' (women empowerment) एक हॉट टॉपिक बना हुआ है. पर, कम ही लोगों का ध्यान इस बात पर गया कि तलाकशुदा, अकेली रह रही, और  विधवा महिलाओं की चुनौतियां और ज़रूरतें अलग हैं. आबादी के इस हिस्से के बारे में सोचते हुए महराष्ट्र (Maharashtra) के अहमद नगर जिला परिषद ने एक पहल की.अहमद नगर जिला परिषद (Ahmednagar Zilla Parishad) ने एक प्रोजेक्ट शुरू किया जिसमें वे तलाकशुदा, अकेली रह रहीं, विधवा महिलाओं के साथ-साथ 40 वर्ष से अधिक आयु की अविवाहित महिलाओं की पहचान करेंगे, ताकि उनकी चुनौतियों को दूर कर उनके विकास के लिए नीति तैयार की जा सके. </p>
<p>'एकल महिला' (Ekal Mahila) पहल के ज़रिये, अहमदनगर जिले के 16 तालुकों में एक लाख से अधिक ऐसी महिलाओं की पहचान हो चुकी है. इसमें से 1,298 महिलाएं अविवाहित, 87,287 विधवा, 5,649 तलाकशुदा,और 6,492 महिलाओं को छोड़ दिया गया है. अहमदनगर जिला परिषद के चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर आशीष येरेकर बताते है कि इस पहल का लक्ष्य इन चार श्रेणियों में महिलाओं की संख्या का पता लगाना और उनके लिए ज़रूरी योजनाएं तैयार करना था. विभाग की उनका पुनर्विवाह करवाने की भी योजना है. </p>
<p>स्क्रीनिंग कर इन महिलाओं को अपने पैरों पर खड़े होने में सहायता दी जाएगी, ताकि वे आर्थिक आज़ादी हासिल कर सकें. राज्य में चल रहे 23 हज़ार स्वयं सहायता समूहों (Self Help Groups-SHG) से जुड़कर लाखों महिलाएं लाभ उठा रहीं हैं. स्क्रीनिंग कर इन चारों श्रेणी की महिलाओं को SHG से जोड़कर रोज़गार शुरू करने में मदद की जाएगी. उन्हें व्यावसायिक प्रशिक्षण भी दिया जायेगा. जो महिलाएं आगे पढ़ना चाहती हैं, उन्हें इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय जैसे ऑपन विश्वविद्यालयों में दाखिला लेने में मदद की जाएगी. विधवाओं के लिए चल रहीं योजनाओं को और बेहतर तरीके से लागू किया जायेगा. </p>
<p>इस तरह की पहल न केवल एक जिले में पर पूरे राज्य, बल्कि हर राज्य में होना चाहिए. महिलाओं की आबादी का एक हिस्सा जो आमतौर पर दूसरी महिलाओं से ज़्यादा प्रताड़ित है और जिनकी ज़रूरतें अलग हैं, उनके विकास को प्राथमिकता मिलनी चाहिए. अहमद नगर जिला परिषद की पहल की सफलता दूसरे राज्यों के लिए उदाहरण बनने को तैयार है. </p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मिस्बाह</dc:creator><pubDate>Fri, 12 May 2023 17:55:06 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/khabar/ahmednagar-identifies-divorced-single-and-abandoned-women-above-40-years]]></guid><category><![CDATA[ख़बर]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/8YQYfxY843sueaW4U766.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/8YQYfxY843sueaW4U766.jpg"/></item><item><title><![CDATA[राजनीतिक भागीदारी से सामाजिक मज़बूती ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/khabar/participation-of-women-in-political-arena-can-lead-to-social-empowerment</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/Gc622t5LALGnexeRodac.jpg"><p>स्वयं सहायता समूहों (Self Help Groups-SHG) से जुड़कर देश की लाखों महिलाएं आर्थिक आज़ादी (Financial Freedom) हासिल कर, अपने परिवार व अपने समुदाय में बदलाव की कहानियां लिख रही हैं. महिलाओं की इस आर्थिक क्रांति (Financial Revolution) में कश्मीर (Kashmir) की महिलाएं भी पीछे नहीं हैं. महिलाएं स्वयं सहायता समूह से जुड़कर फायदा तभी ले सकेंगी जब उनमें लीडरशिप स्किल हो. लीडरशिप के कौशल को बढ़ाने के लिए उन्हें ट्रेनिंग की ज़रुरत है. इसी कड़ी में आगे बढ़ते हुए 'शी लीड्स' ने हर क्षेत्र से आने वाली महत्वाकांक्षी महिला लीडर्स के लिए स्टेट गेस्ट हाउस, श्रीनगर में 'वीमेन पायनियरिंग चेंज फॉर पीस एंड प्रॉस्पेरिटी' (Women Pioneering Change for Peace and Prosperity) विषय पर एक दिन का सेशन आयोजित किया. इसमें महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी पर चर्चा हुई. </p>
<p>इस सेशन का आयोजन शी लीड्स (She Leads), स्त्री शक्ति- द पैरेलल फ़ोर्स की संस्थापक रेखा मोदी ने न्यूज़ कश्मीर की संपादक फ़रज़ाना मुमताज़ के सहयोग से किया था, जिन्होंने पूरे कार्यक्रम की एंकरिंग भी की. सफीना बेग, अध्यक्ष डीडीसी बारामूला और हजल समिति जम्मू और कश्मीर, शोधकर्ता डॉ. ओवी थोराट, बारामूला कॉलेज के प्रोफेसर शफिया, शिक्षाविद् जावेद कमली, सोशल इंटरप्रेन्योर डॉ. रितु सिंह, राज्य आयुक्त कर डॉ. रश्मी सिंह आईएएस, शोधकर्ता मुश्ताक उल हक सिकंदर और शेख समीर, पत्रकार मीर सबीन गुलरेज़, AIWC सदस्य रोशन आरा ने सेशन में भाग लिया.</p>
<p>रेखा मोदी ने बताया कि आरक्षण (reservation) बहुत ज़रूरी मुद्दा है क्योंकि छत्तीसगढ़ में वर्तमान में भारत में महिला विधायकों की संख्या सबसे अधिक है, जबकि पिछली विधानसभा में जम्मू-कश्मीर में महज 2.2 फीसदी महिला विधायक थीं. कई वर्षों से जम्मू-कश्मीर में महिलाओं के लिए कोई स्टेट कमीशन नहीं है. भारत की आधी आबादी पिछले 30 सालों से राजनीतिक दलों में आरक्षण पाने के लिए इंतजार कर रही है. </p>
<p>आज के समय में महिलाओं की आर्थिक आज़ादी सबसे ज़रूरी मुद्दा है, लेकिन इसके साथ राजनीतिक भागीदारी (political participation) भी ज़रूरी है, जो अक्सर उनके परिवार और समाज के सहयोग पर निर्भर करती है. आर्थिक आज़ादी तक पहुंचने और राजनीति में हिस्सा लेने के लिए महिलाएं स्वयं सहायता समूहों का सहारा ले रही हैं. इस से जुड़ कर वे अपना रोज़गार शुरू करती हैं और लीडर का रोल भी अदा करती हैं. </p>
<p>मुश्ताक उल हक सिकंदर कहते है कि राजनीति के क्षेत्र में काम कर रही महिलाओं की ज़िम्मेदारी है कि वे महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को बढ़ाएं. उन्होंने राजनीतिक दलों से महिलाओं को भागीदारी देने का आग्रह किया. महिलाओं की राजनीति में भागीदारी बढ़ने से सामाजिक, आर्थिक, और शैक्षिक विकास को भी गति मिल सकेगी. </p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मिस्बाह</dc:creator><pubDate>Fri, 12 May 2023 17:43:38 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/khabar/participation-of-women-in-political-arena-can-lead-to-social-empowerment]]></guid><category><![CDATA[ख़बर]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/Gc622t5LALGnexeRodac.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/Gc622t5LALGnexeRodac.jpg"/></item><item><title><![CDATA[सोलर एनर्जी से मुनाफ़ा डबल ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/nazariya/in-rural-rajasthan-solar-energy-powers-refrigerators-change-lives-of-women</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/hUuwPPtSUfoVRxYUA3HW.jpg"><p>सुबह 9 बजे, तापमान करीब 45 डिग्री तक पहुंच चुका है. राजस्थान (Rajasthan) में दूनी डेयरी सहकारी समिति (Dooni dairy cooperative ) में लाड देवी और उनकी सहकर्मी आसपास के खेतों से आने वाले दूध को जल्दी से तौलने और रेफ्रिजरेटर (Refrigerator) में रखने का काम कर रही हैं. रेफ्रिजरेटर के बिना यह राजस्थान की भीषण गर्मी में कुछ ही घंटों में खराब हो सकता है. कुछ साल पहले की बात करें, तो इन महिलाओं का अपने घरों से बाहर निकल काम करना नामुमकिन लगता था. दशकों की प्रगति के बावजूद राजस्थान में महिला साक्षरता दर अभी भी पुरुषों की तुलना में पीछे है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, केवल 65 % महिलाएं ही पढ़ और लिख पाती हैं. राज्य में चार में से एक लड़की की शादी 18 साल की कानूनी उम्र से पहले हो जाती है. अपने रूढ़िवादी समाज के नियमों को मानते हुए, ये महिलाएं सर ढांकके और चेहरा छुपा कर बाहर निकलती थी. अब तो काम करते वक़्त इनकी आवाज़ में जोश और चेहरे पर आत्मविश्वास झलकता है. </p>
<p>इन महिलाओं के जीवन में साल 2014 के बाद से ये बदलाव आया, जब वे सहकारी डेयरी बनाने के लिए एक साथ आईं. स्थानीय परंपरा के अनुसार हर महिला के पास शादी के समय दहेज में मिली गाय और भैंसें थी. बचा हुआ दूध जो उनका परिवार इस्तेमाल नहीं करता, उसे बेच कर वे पैसे कमा लिया करती. पैसे कमाने की चाह उन्हें साथ लाई. सबसे बड़ी चुनौती थी- मेहेंगी बिजली, जिससे उनके मुनाफे में कटौती हो रही थी और दूध को ठंडा रखना मुश्किल हो रहा था. बार-बार बिजली गुल होने से दूध खराब हो जाता और उसे फेंकना पड़ता. 2021 में सौर ऊर्जा (Solar energy) से चलने वाले रेफ्रिजरेटर मिलने से ये परेशानी दूर हुई और आमदनी बढ़ने लगी. </p>
<p>सौर ऊर्जा की वजह से डेयरी का मासिक बिजली बिल (electricity bill) घटकर 5,000 रुपये रह गया, जो पहले के मुकाबले काफी कम था. इसका मतलब था कि महिलाएं अब ज़्यादा दूध बेचकर अपनी आय दोगुनी कर सकती हैं क्योंकि वे अब बचे हुए दूध को रेफ्रिजरेटर में रख सकती हैं. हर महिला  एक दिन में लगभग 400 रुपये कमाने लगी. खुद के पैसे कमाने से महिलाओं की सामाजिक स्थिति में भी बदलाव आया और आर्थिक आज़ादी ने उनके कई रुके हुए काम और सपने पूरे करवाये. </p>
<p>“इससे पहले, अगर मुझे बाहर जाना होता, तो मुझे अपने पति के पैसे देने का इंतज़ार करना पड़ता. अब मेरे पास मेरे पैसे है,” तीन बच्चों की 45 वर्षीय मां देवी ने बताया. "मैं अनपढ़ हूं, लेकिन आज मुझमें इतना आत्मविश्वास है कि मैं किसी भी आदमी से बेझिझक बात कर सकती हूं और जो लोग बाहर से मेरे गांव में आते हैं, उनसे भी बात कर सकती हूं." </p>
<p>इन महिलाओं से प्रेरित होकर, कई ग्रामीणों ने लगभग 1,500 रुपये की लागत से सोलर लैंप खरीदना और सोलर पैनल लगवाना शुरू कर दिया है जिससे एक पंखा चलाने, मोबाइल फोन चार्ज करने और बल्ब चलाने के लिए पर्याप्त मजबूत सौर पैनल स्थापित कर रहे हैं. कई महिलाओं का कहना है कि वे अपने बच्चों को स्कूल भेजने के लिए डेयरी की आय का इस्तेमाल कर रही हैं.</p>
<p>भारत पहले से ही सौर ऊर्जा क्षमता के मामले में दुनिया में चौथे स्थान पर है, और पर्यावरण और आर्थिक वजहों से कोयले जैसे फॉसिल फ्यूल  पर लंबे समय से निर्भरता को दूर करने के लिए सौर ऊर्जा तक पहुंच बढ़ा रहा है. 2030 तक, भारत का लक्ष्य सौर ऊर्जा जैसे नये स्रोतों से अपनी 50% ऊर्जा संबंधित ज़रूरतों को पूरा करना है, जिनमें से ज़्यादातर ज़रूरतें सौर ऊर्जा से पूरी करने का लक्ष्य है. सरकार सौर-संचालित जल पंपों के लिए सब्सिडी और प्रोत्साहन भी दे रही है और छोटे उद्यमों के लिए रेफ्रिजरेटर सहित ऑफ-ग्रिड सौर उपकरणों के इस्तेमाल  को बढ़ावा दे रही है. हाल के वर्षों में, 7 लाख से ज़्यादा सौर ऊर्जा संचालित वॉटर पंप की शुरुआत की है, जिसका अर्थ है कि महिलाओं को अब पानी लाने के लिए लंबी दूरी तय नहीं करनी पड़ेगी. सौर प्रकाश से मोमबत्तियों और मिट्टी के तेल के लालटेन को खत्म करना संभव हो सका  है, जिनके जहरीले धुएं का महिलाओं और बच्चों पर गलत प्रभाव पड़ता था. बिजली से चलने वाली रोटी बनाने वाली मशीन से लेकर सौर ऊर्जा से चलने वाले रेफ्रिजरेटर तक श्रम बचाने वाले उपकरणों ने घर के कामकाज को आसान बना दिया है और साथ ही रोज़गार शुरू करने वाले कामों की नई संभावनाएं खोल दी हैं.</p>
<p>देशभर में चलने वाले स्वयं सहायता समूहों (Self Help Groups-SHG) ने सोलर एनर्जी की मांग को बढ़ाया है. ये महिलाएं अपने छोटे बिज़नेस को सपोर्ट करने के लिए सस्ते विकल्पों की ओर कदम बढ़ा रही हैं. इन महिलाओं को सोलर एनर्जी से फायदा मिलता देख गांव के और लोग भी इसे अपनाने के लिए प्रेरित हो रहे हैं. सरकार सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए स्वयं सहायता समूहों को ज़रिया बना सकती है.  इससे इन महिलाओं की आमदनी बढ़ सकेगी और, ग्रीन एनर्जी का इस्तेमाल बढ़ा कर प्राकृतिक संरक्षण में मदद मिलेगी. </p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मिस्बाह</dc:creator><pubDate>Fri, 12 May 2023 17:04:29 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/nazariya/in-rural-rajasthan-solar-energy-powers-refrigerators-change-lives-of-women]]></guid><category><![CDATA[नज़रिया]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/hUuwPPtSUfoVRxYUA3HW.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/hUuwPPtSUfoVRxYUA3HW.jpg"/></item><item><title><![CDATA[ग़ाज़ियाबाद स्कैम: 81 SHG के 8.10 लाख का घोटाला ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/khabar/ghaziabad-scam-81-self-help-groups-embezzled-8-lakh</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/N95R3RxV8CayxgQoAyXB.jpg"><p>ग़ाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश (Ghaziabad, Uttar Pradesh) के डूडा में महिला सशक्तिकरण के लक्ष्य से गठित स्वयं सहायता समूहों (Self Help Groups-SHG) के घोटाले की ख़बर सामने आई है. मामले में नीरज शर्मा नाम का शख्स आरोपी है. आरोप है कि नीरज ने फर्जी तरीके से 81 ग्रुप के 8.10 लाख रुपए अपने खाते में ट्रांसफर कर लिए. तीन महीने पहले हुई बैठक में इसका खुलासा हुआ तो विभाग की  रिव्यू ऑफिसर बीना गुप्ता ने पुलिस आयुक्त से शिकायत कर विजयनगर थाने में मामला दर्ज कराया.</p>
<p>बीना गुप्ता ने बताया कि महिलाओं को रोजगार उपलब्ध कराने के लिए डूडा में स्वयं सहायता समूह के तहत 10 हजार रुपये दिए जाते हैं, जिससे महिलाएं रोजगार शुरू करती हैं. इस योजना में नीरज शर्मा ने 10-10 महिलाओं को जोड़कर 81 समूह बनाए. जिसकी राशि महिलाओं के खाते में आने वाली थी. बताया जा रहा है कि नीरज ने उनका पैसा निजी खाते में ट्रांसफर करा लिया. यह फर्जीवाड़ा कुछ समय पहले हुआ था. योजना को लेकर विजयनगर में हुई एक बैठक में करीब तीन महीने पहले यह जानकारी सामने आई थी. नीरज ने 8.10 लाख की ठगी की है. विभाग भी अपने स्तर पर मामले की जांच कर रहा है. एसीपी सुजीत राय का कहना है कि मामले की जांच की जा रही है. विभाग से जानकारी मांगी गई है. उसी के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी. </p>
<p>इस तरह के घोटाले महिलाओं में स्वयं सहायता समूह के प्रति विश्वास को तोड़ेगा और समूह से जुड़ने के लिए उन्हें हतोत्साहित करेगा. इस तरह के मामलों में प्रशासन को सख़्त कार्यवाही कर महिलाओं के पैसों को लौटाना चाहिए, ताकि उन्हें इंसाफ़ मिले और स्वयं सहायता समूह के प्रति उनका विश्वास मज़बूत हो सके. </p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">रविवार ब्यूरो </dc:creator><pubDate>Thu, 11 May 2023 12:54:56 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/khabar/ghaziabad-scam-81-self-help-groups-embezzled-8-lakh]]></guid><category><![CDATA[ख़बर]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/N95R3RxV8CayxgQoAyXB.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/N95R3RxV8CayxgQoAyXB.jpg"/></item><item><title><![CDATA[भारतीय वर्कफॉर्स में समानता की ज़रूरत ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/nazariya/ndia-must-advance-through-an-equitable-workforce</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/MmoWJU0EnRihdZxNsZUj.jpg"><p>विश्व जीडीपी रैंकिंग (World GDP Ranking) 2023 सूची के अनुसार, भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि भारत,आने वाले 10 सालों में दुनिया की तीन बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक बनने की ताकत रखता है. McKinsey & Co. के ग्लोबल मैनेजिंग पार्टनर बॉब स्टर्नफेल्स ने कहा, "मुझे पूरा विश्वास है कि यह सिर्फ भारत का दशक ही नहीं, बल्कि भारत की सदी भी हो सकता है." मॉर्गन स्टेनली जैसे निवेश बैंक अनुमान लगा रहे हैं कि भारत तेज़ी से विकास कर 2027 तक दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा. इस तर्क की वजह भारत को मिलने वाले ऐसे अवसर है जो पहले कभी नहीं मिले. भारत चीन को पछाड़कर सबसे अधिक आबादी वाला देश बन गया है और अंतरराष्ट्रीय कंपनियां चीन से बाहर अपनी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट ले जाना चाह रही हैं. ऐसे में, भारत के पास आर्थिक विकास की बागडोर आ जाती है.</p>
<p>अगला दशक भारत का तभी हो सकता है, जब कार्यबल (Workforce) में समानता आएगी. इसके बिना, अभूतपूर्व अवसर जल्द ही अभूतपूर्व अवसर लागत में बदल सकते हैं.</p>
<p>2022 में, कार्यबल में महिलाओं की संख्या केवल 13% थी, जबकि चीन में 61% और अमेरिका में 56% थी. यह समस्या अवसरों की कमी से  नहीं बल्कि शिक्षा, जागरूकता और सामाजिक समर्थन की कमी की वजह से है. एफएसजी द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार, रोजगार योग्य आयु की 85% से अधिक महिलाएं कॉलेज नहीं गई हैं, और 50% से अधिक ने 10वीं कक्षा पूरी नहीं की है. इसके अलावा, 84% ने कहा कि उन्हें काम शुरू करने के लिए अपने परिवार से अनुमति की आवश्यकता होती है, और एक बार जब उन्हें काम मिल जाता है और किसी कारण से इसे छोड़ देती हैं, तो उनके कार्यबल में लौटने की संभावना 20% कम हो जाती है.</p>
<p>इस असमानता की वजह से भारत में श्रम उत्पादकता (labour productivity) में कमी आई है. एशियाई विकास बैंक (ADB) के अनुसार, भारत की श्रम उत्पादकता $5.45 प्रति व्यक्ति प्रति घंटा है. इसकी तुलना में, मेक्सिको की श्रम उत्पादकता चार गुना अधिक $20.51 प्रति व्यक्ति प्रति घंटे है. कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी बढ़ने से उपभोक्ता खर्च पर सीधा असर पड़ता है. महिलाएं अपने वेतन का 42% घरेलू खर्च के लिए इस्तेमाल करती हैं, जिसमें बच्चों की शिक्षा भी शामिल है, जबकि पुरुष घरेलु ज़रूरतों पर केवल 28% खर्च करते हैं. सेल्स प्रोफेशनल्स की एक स्टडी में, महिला सेल्सपर्सन ने अपने सेल्स टारगेट का 86% हासिल किया, जबकि पुरुष सेल्सपर्सन ने केवल 78%. कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी न बढ़ाकर, भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में 27% की ग्रोथ खो रहा है. </p>
<p>भारत में फ्रंटलाइन कार्यबल में असमानता की वजह सूचना की कमी है. इस समस्या को हल करने के लिए, बाज़ार में कई उत्पाद उतारे गये, जो मार्केटप्लेस  मॉडल फॉलो करते हैं. बाज़ार में सूचना विषमता को दूर करने और सूचना प्रवाह में आने वाली बाधाओं को हटाने के लिए  बाज़ार मॉडल का आविष्कार किया गया था. इस मॉडल से निजी फाइनेंस, खरीदारी, और मार्केटप्लेस इनोवेशन जैसे क्षेत्रों में सफलता हासिल की, पर फ्रंटलाइन वर्कफोर्स में मौजूद सूचना विषमताओं को दूर नहीं कर पाया.</p>
<p>इसके मुख्यतः तीन कारण थे. पहला, जब ये मार्केटप्लेस सॉल्यूशंस (Marketplace Solutions) लॉन्च किए गए थे, तो भारत के पास ऐसे मॉडल को सपोर्ट करने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं था. इंटरनेट की पहुंच कम थी, और डिजिटल मार्केटप्लेस मॉडल भारत में शुरू ही हो रहे थे. दूसरा, इंटरनेट के कम इस्तेमाल की वजह से उद्यमों के साथ-साथ श्रमिकों के बीच भी डिजिटल स्वीकृति नहीं थी, जिसके कारण नौकरियों और आवेदकों की संख्या बहुत कम हो गई थी. अंत में, आवेदक बड़े पैमाने पर अकुशल होत थे इसलिए, उद्यमों को ये प्लेटफ़ॉर्म उपयोगी नहीं लगे, और श्रमिकों को इन प्लेटफ़ॉर्मों का उपयोग करने से हतोत्साहित किया गया क्योंकि उन्हें अपनी ज़रूरत की नौकरियां नहीं मिलीं.</p>
<p>अब भारत में 70% से अधिक स्मार्टफोन प्रवेश दर है और तेजी से डिजिटल अडॉप्शन रेट भी बढ़ रहा है. मार्केटप्लेस बाज़ार में वापसी कर सकते हैं, लेकिन ये महिला कर्मियों के बिना नहीं हो सकेगा. इसलिए, वर्कफोर्स मार्केटप्लेस 2.0 को इक्विटी हासिल करने के लिए तीन दिशा में ध्यान देने वाली एप्रोच का इस्तेमाल करना पड़ेगा -</p>
<h2>मौजूदा महिला कार्यबल को औपचारिक और डिजिटाइज़ करना </h2>
<p>अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की एक रिपोर्ट के अनुसार, उद्योगों में काम करने वाली 88% और सेवा के क्षेत्र में 71% महिलाएं अनौपचारिक हैं.पहला कदम, इस बड़े इनफॉर्मल वर्कफोर्स को फॉर्मल बनाना होगा. ऐसा करने के लिए, हमें ऐसे केंद्रों तक पहुंचना होगा जिसमें है जिनमें महिला श्रमिकों की भागीदारी और योगदान हो. ऐसा ही एक केंद्र स्वयं सहायता समूह (Self Help Groups-SHG) है. भारत में 1.2 करोड़ स्वयं सहायता समूह हैं, और उनमें से 88% महिलाएं हैं. फाइनेंशियल इन्क्लुशन (Financial Inclusion) को बढ़ावा देने के लिए एसएचजी के ज़रिये काफी सफलता मिली है. एसएचजी बैंक लिंकेज प्रोजेक्ट 1992 में शुरू किया गया जिसने 119 लाख एसएचजी के माध्यम से 14.2 करोड़ परिवारों को कवर किया, जिसमें 47,240 करोड़ रुपये की बचत जमा और 1.5 लाख करोड़ रुपये का बकाया ऋण था. इन एसएचजी का हिस्सा रहे कार्यबल को औपचारिक बनाने और फिर डिजिटाइज़ करने के लिए उसी मॉडल का उपयोग करने से हमें भारत में कम से कम 10-20% महिला कार्यबल को औपचारिक रूप देने में मदद मिल सकती है.</p>
<h2>स्किलिंग</h2>
<p>एक बार जब ये महिलाएं प्लेटफॉर्म पर आ जाती हैं, तो हम स्किलिंग के अगले स्टेप पर जा सकते हैं. ज़्यादातर ज़रूरी कौशल किसी के मोबाइल फोन पर इंटरनेट के ज़रिये सीखे जा सकते हैं. हालांकि, महिला कर्मियों के लिए पाठ्यक्रम को आसान बनाना ज़रूरी है. स्पोकन इंग्लिश, टेलीकॉलिंग और सेल्स जैसे कोर्सों को इन कौशल पाठ्यक्रमों में शामिल कर महिलाओं के रोज़गार का जरिया बनाया जा सकता है. </p>
<h2>उद्यमों की शुरुआत करना </h2>
<p>एक बार कौशल से भरपूर वकर्स रोजगार योग्य बन जाए, तो उद्यमों की शुरुआत की जा सकती है. भारत में उद्यम पहले से ही 10% कार्यबल कमी से जूझ रहे हैं. महिला श्रमिकों की उत्पादकता ज़्यादा होने की वजह से ज़्यादा से ज़्यादा बिस्नेज महिला कर्मियों को अपॉइंट करने का सोच रहे है.  इससे कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी बढ़ सकेगी.</p>
<p>इस अप्रोच से उत्पादक चक्र बनेगा. क्योंकि इस क्षेत्र में ज्यादातर नई भर्तियां रेफरल के माध्यम से की जाती हैं, पहले से कुशल महिलाएं और ज़्यादा महिलाओं को बढ़ावा देने के लिए अपने स्वयं सहायता समूहों में वापस जा सकती हैं. इससे उद्यमों के लिए श्रमिकों का एक बड़ा पूल तैयार होगा जो एक्वेटिबिलिटी को बढ़ायेगा. इस प्रोडक्टिव साइकिल पर बना बाज़ार प्रभावी और टिकाऊ होता है.</p>
<p>(साभार : <a href="https://www.hindustantimes.com/ht-insight/gender-equality/india-must-advance-through-an-equitable-workforce-101683610023743.html">Hindustan Times</a>)</p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">रविवार ब्यूरो </dc:creator><pubDate>Wed, 10 May 2023 16:29:56 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/nazariya/ndia-must-advance-through-an-equitable-workforce]]></guid><category><![CDATA[नज़रिया]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/MmoWJU0EnRihdZxNsZUj.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/MmoWJU0EnRihdZxNsZUj.jpg"/></item><item><title><![CDATA['हरामबी' से विकास का सफर आसान ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/duniyadari/self-help-groups-in-kenya-empower-women-and-needy</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/m9nKEULMk7UCxARXlFjm.jpg"><p>दुनिया के सबसे हरे-भरे देशों में शामिल केन्या अफ्रीकी महाद्वीप (African continent) में बसा देश है. केन्या (Kenya) में 70 से अधिक विभिन्न जातीय समूह रहते हैं. यहां 99% आबादी अश्वेत है. वैज्ञानिकों का मानना है कि इंसानों की उत्पत्ति केन्या में हुई क्योंकि इंसानों के सबसे पुराने अवशेष केन्या के टुगेन हिल्स (Tugen Hills) में मिले, जो 70 लाख साल पुराने हैं. भारत की तरह केन्या का इतिहास भी गुलामी से भरा है. 100 साल गुलाम रहने के बाद 12 दिसंबर 1963 को केन्या ब्रिटेन से आज़ाद हुआ और 1964 में अपना संविधान लागू कर खुद को गणतंत्र घोषित किया. पर, आज भी केन्या कई तरह की सामाजिक चुनौतियों से जूझ रहा है. गरीबी, बाल मज़दूरी, एड्स, दहेज़, लैंगिक असमानता यहां के कुछ गंभीर मुद्दे हैं. </p>
<p>केन्या में सरकार इन चुनौतियों से निपटने के लिए कई तरह की योजनाएं चला रही है. किसी भी योजना की सफलता समुदाय की भागीदारी पर टिकी है. केन्या के गैर सरकारी संगठन और चेंज एजेंसियां स्वयं सहायता समूहों (Self Help Groups-SHG) की मदद से समुदाय के लोगों तक पहुंचते हैं. ये एजेंसियां स्वयं सहायता समूह के ज़रिये कम्युनिटी डेवलपमेंट (Community Development) का काम करते हैं. कम्युनिटी डेवलपमेंट अप्रोच समुदायों के सदस्यों के जीवन को बेहतर बनाने और सामाजिक बदलाव लाने के लिए विकासशील गतिविधियों का सहारा लेता है. </p>
<p>केन्या में, <a href="https://www.researchgate.net/publication/327334676_Self-help_Groups_as_a_Means_for_Development_and_Welfare_Their_Characteristics_Membership_and_Performance_in_Kenya">स्वयं सहायता समूह</a> पारंपरिक अफ्रीकी समाज का हिस्सा है जिसकी शुरुआत ब्रिटिश शासन काल में हो चुकी थी. तब, समुदाय के लोग झाड़ियों की सफाई, निराई, घर बनाने और पशुओं को चराने जैसे कामों में एक-दूसरे की सहायता करने के लिए समूह बनाते थे. 1963 में केन्या को ब्रिटिश शासन से आज़ादी मिलने के बाद, स्वयं सहायता कार्य को "हरामबी" के रूप में जाना जाने लगा. तत्कालीन केन्याई राष्ट्रपति, मज़ी जोमो केन्याटा और उनकी सरकार ने SHG के विस्तार को बढ़ावा दिया. समुदाय के लोग गुलामी के दौर में हुए नुक्सान से उभरने के लिए समूह बनाकर साथ आये और समाजवाद को मज़बूत किया. </p>
<p>महिलाओं के स्वयं सहायता समूह आंदोलन ने स्वतंत्रता के बाद अपनी पकड़ मज़बूत की. इस दौर में, महिलाओं के समूहों ने क्लबों का रूप लिया और ज़्यादातर हैंडीक्राफ्ट एक्टिविटी और घर बनाने जैसे काम किये. इन्होंने राजनीतिक रैलियों में हिस्सा भी लिया, सदस्यों के लिए घर बनाने, मरम्मत करने, और ज़मीन खरीदने जैसी गतिविधियों को अंजाम दिया. महिलाओं के इस आंदोलन को 1975 में औपचारिक रूप से 'स्वयं सहायता समूह' शब्द को अपनाया और महिलाओं और मिश्रित लिंग (पुरुष और महिला दोनों) स्वयं सहायता समूह का रजिस्ट्रेशन शुरू हुआ. ये फैसला मैक्सिको में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय महिला वर्ष सम्मेलन के बाद, तत्कालीन सामाजिक सेवा विभाग (DSS) ने लिया. </p>
<p>इन समूहों की संख्या बढ़ती जा रही है. केन्या में 2019 में 1 लाख 20 हज़ार स्वयं सहायता समूहों में करीब 18 लाख सदस्य शामिल थे. ये समूह समुदाय की भलाई को ध्यान में रखते हुए डे केयर सेंटर और शिक्षा सेंटर चलाते हैं, स्वास्थ्य सुविधाएं देते हैं, मवेशी पालन, मधुमक्खी पालन, मछली पालन, बागवानी, सामुदायिक कार्यक्रमों में सेवाएं देने जैसे काम भी करते हैं. </p>
<p><a href="https://www.capitalfm.co.ke/business/2023/05/uwezo-fund-empowers-women-groups-in-kericho/">उवेज़ो फंड</a> (Uwezo fund), जो विज़न 2030 के लिए मुख्य कार्यक्रम है, वे महिलाओं, युवाओं और विकलांग व्यक्तियों को अपने व्यवसायों और उद्यमों को बढ़ावा देने के लिए सक्षम बनाता है. केरिचो ईस्ट सब-काउंटी उवेज़ो फंड के अनुसार, महिलाओं, युवाओं और विकलांग व्यक्तियों के 135 समूहों को फायदा मिला है. एमिटियट बिन्नी स्वयं सहायता समूह ने उवेज़ो फंड से जुड़कर 200 केले के बागान खरीदे. विधवा महिलाओं के समूह ने तीन टेंट, कुर्सियां और रसोई के बर्तन खरीदे जिसे वे किराय पर देकर पैसे कमा रही हैं. फंड ने आर्थिक विकास को बढ़ाया जिससे गरीबी, भुखमरी, लैंगिक असमानता जैसे सामाजिक परेशानियों में सुधार आया और महिलाओं को सशक्त बनाने के सतत विकास लक्ष्य को बढ़ावा मिला.</p>
<p>केन्या के स्वयं सहायता समूह सामाजिक बदलाव की कहानिया लिख रहे हैं, महिलाओंऔर विकलांगों को कमाई का जरिया दे रहे हैं, और विकास में समुदाय की भागीदारी बढ़ा रहे हैं. विकासशील देश भी इस तरह से स्वयं सहायता समूहों को बढ़ावा देकर प्रगति के संघर्ष में समुदाय को शामिल कर सकते हैं. </p>
<p> </p>
<p> </p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मिस्बाह</dc:creator><pubDate>Wed, 10 May 2023 13:51:41 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/duniyadari/self-help-groups-in-kenya-empower-women-and-needy]]></guid><category><![CDATA[दुनियादारी]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/m9nKEULMk7UCxARXlFjm.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/m9nKEULMk7UCxARXlFjm.jpg"/></item><item><title><![CDATA[बैम्बू राइस बना आर्थिक आज़ादी का ज़रिया ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/khabar/rare-bamboo-rice-returns-to-odisha-helping-women-shgs-in-balasore</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/BLWyx08xF0ewIrXo2QXX.png"><p>भारत चावल का एक बड़ा उत्पादक और निर्यातक है. यहां चावल की 6 हज़ार से ज़्यादा किस्मों की खेती की जाती है, जो न सिर्फ भारत में, पर विदेश में भी काफी पसंद की जाती है. इन्हीं किस्मों में शामिल है ओडिशा का बांस का चावल या बैम्बू राइस (Bamboo Rice). ये चावल की विशेष किस्म है जो सूखते हुए बांस में उगता है. बांस के पेड़ में फूल आने का मतलब होता है कि वो पेड़ मरने वाला है. बैम्बू राइस या बांस का चावल मरते बांस  की आख़िरी निशानी है. यह असल में बैंबू का बीज होता है जो चावल जैसा दीखता है, जिसे कई जनजातियों में खाया जाता है. </p>
<p>बालासोर (Balasore) सहित ओडिशा (Orissa) के कई हिस्सों में इस फ़सल से कई आदिवासियों का रोज़गार जुड़ा है. बालासोर के बरुनसिंह पंचायत के मालगांव में एक महिला स्वयं सहायता समूह (Self Help groups-SHG) ने बांस के चावल की कटाई की कला में महारत हासिल कर ली. इस अनोखे चावल को बाज़ार में बेचकर ये महिलाएं अपनी आर्थिक स्थिति में सुधार ला रही हैं. यह चावल आसानी से नहीं मिलता है क्योंकि आमतौर पर बांस के पेड़ में 50-60 साल बाद फूल निकलते हैं. ये कहना ग़लत नहीं होगा कि 100 साल में 1-2 बार ही बांस के चावल उगते हैं. साफ़-सुथरा बांस का चावल इकट्ठा करने के लिए काफी मेहनत और समय लगता है, जिससे यह दुर्लभ और बाद में महंगा हो जाता है. </p>
<p>आयुर्वेद में इसका प्रयोग फैट कम करने, पॉइजनिंग खत्म करने और वॉर्म इन्फेस्टेशन ठीक करने में किया जाता है. इसका स्वाद हल्का मीठा और कसैला होता है. बैम्बू राइस स्ट्रेंथ और इम्यूनिटी को बढ़ाने में फायदेमंद है. बैम्बू राइस को बेच स्वयं सहायता समूह की महिलाएं आमदनी को बढ़ाने के साथ इस पौष्टिक चावल के इस्तेमाल को भी बढ़ावा दे रही हैं.  </p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मिस्बाह</dc:creator><pubDate>Tue, 09 May 2023 17:26:51 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/khabar/rare-bamboo-rice-returns-to-odisha-helping-women-shgs-in-balasore]]></guid><category><![CDATA[ख़बर]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/BLWyx08xF0ewIrXo2QXX.png" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/BLWyx08xF0ewIrXo2QXX.png"/></item><item><title><![CDATA[कड़ाही, तवे से लेकर अपनी जगह बनाने तक ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/kahaniyan/women-self-help-groups-in-the-lohaghat-revived-the-traditional-occupation-of-ironworking</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/74fH5HMbRrCABx9cXa8K.jpg"><p>लोहे के बड़े, भारी, और मोटे टुकड़ों को पीटकर नारायणी देवी उसे मनचाहा आकार देने का हुनर रखती है. उत्तराखंड के चंपावत जिले की लोहाघाट तहसील की ऐसा करने वाली ये इकलौती महिला नहीं है. कुछ साल पहले तक ये लोहाघाट पुरुषों के लौहा पीटने के कौशल और ताकत के लिए जाना जाता था. पांच स्वयं सहायता समूहों (Self Help Groups- SHG) की 40 महिलाओं के प्रगति ग्राम संगठन ने लोहाघाट में अपनी जगह बनाई. ये धातु शिल्प के इतिहास में एक बदलाव को चिह्नित करता है. </p>
<p>लोहाघाट के रायकोट कुंवर गांव की निवासी और संगठन की अध्यक्ष देवी बताती है, "<em>परंपरागत रूप से, पुरुष उत्पाद बनाते थे और महिलाएं उन्हें गांव-गांव बेचने जाती थीं. स्टील, एल्युमीनियम और नॉन-स्टिक कुकवेयर की लोकप्रियता के कारण लोहे के उत्पादों की मांग में गिरावट आई. हम केवल एक या दो तवे ही बेच पाते थे.</em>" अधिकारियों ने राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत स्वयं सहायता समूहों को बढ़ावा देना शुरू किया. इस मौके का फ़ायदा उठाते हुए देवी ने छह अन्य महिलाओं के साथ पूर्णागिरी एसएचजी का गठन किया. शुरुआत में महिलाएं लोहे को गर्म करने और उसे ढालने से डरती थीं. पुरुषों से मदद मांगती. जैसे-जैसे वे हथौड़े और निहाई का इस्तेमाल करने में बेहतर होते गईं, ज़्यादा से ज़्यादा SHG महिलाएं ये कौशल सीखने में रूचि लेने लगीं.</p>
<p>पांच SHG संगठन में शामिल हो गए और कड़ाही, तवे समेत कुदाल, चाकू और त्रिशूल जैसे कृषि उपकरण बड़े पैमाने पर बनाने लगे. समूह को तब बढ़ावा मिला, जब 2020 में राज्य सरकार ने विशिष्ट ग्रामीण व्यवसायों को बढ़ावा देने के लिए चंपावत में एक विकास केंद्र शुरू किया. केंद्र में लोहे की कटाई और ढलाई के लिए मशीनें लगाई गई जिसे अब संगठन चलाता है. मार्केटिंग एक बड़ी चुनौती थी. लोग स्टील, एल्युमीनियम और नॉन-स्टिक कुकवेयर में मिले रसायनों के बारे में जागरूक हुए और वापिस लोहे की ओर लौटने लगे. लोहे के उत्पादों को सरस मेलों, व्यापार मेलों और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के ज़रिये प्रदर्शित करना और बेचना शुरू किया. </p>
<p>स्वयं सहायता समूहों को राज्य के कृषि विभाग से 2-3 लाख रुपये के औज़ारों के ऑर्डर मिलने शुरू हुए. इसके अलावा, स्कूलों और आंगनवाड़ी केंद्रों में मध्याह्न भोजन के लिए स्वयं सहायता समूहों से रसोई के बर्तन खरीदे. इन प्रयासों से समूह की आय में बढ़ोतरी हुई. पूर्णागिरी एसएचजी ने 2017 में 60,000 रुपये से बढ़कर 2022 में 2 लाख रुपये कमाए, जबकि संगठन ने पिछले साल 7-8 लाख रुपये कमाए. ये महिलाएं पहले पुरुषों के बनाये उत्पादों को घर-घर जाकर बेचा करती थीं. लोहे के उत्पादों की मांग कम हो जाने पर इनकी आय का कोई ज़रिया नहीं बचा था. आजीविका मिशन की मदद और अपने प्रयासों से ये महिलाएं खुद का रोज़गार शुरू कर पाईं और पुरुषों के माने जाने वाले पेशे में अपनी जगह बनाई.   </p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मिस्बाह</dc:creator><pubDate>Tue, 09 May 2023 17:15:24 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/kahaniyan/women-self-help-groups-in-the-lohaghat-revived-the-traditional-occupation-of-ironworking]]></guid><category><![CDATA[कहानियां]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/74fH5HMbRrCABx9cXa8K.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/74fH5HMbRrCABx9cXa8K.jpg"/></item><item><title><![CDATA[SHG बना बड़ा वोट बैंक ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/khabar/funding-self-help-groups-resulted-in-more-women-voters-says-tripura-cm-manik-saha</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/sr5Hl6sgdzpB0d9ga5rf.jpg"><p>स्वयं सहायता समूहों (Self Help Groups-SHG) में दिन-ब-दिन बढ़ती महिलाओं की संख्या को वोट बैंक में बदलने की कोशिश जारी है. राज्य सरकारें अपने चुनावी फायदों के लिए इस वोट बैंक का इस्तेमाल कर रहे हैं. हाल ही में, त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक साहा ने कहा कि राज्य सरकार ने स्वयं-सहायता समूहों को भारी अनुदान दिया है जिसकी वजह से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को पिछले चुनाव में महिलाओं से ज़्यादा वोट मिले हैं. </p>
<p>रवींद्र भवन में भारतीय जनता युवा मोर्चा (भाजयुमो) के एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए साहा ने कहा कि चुनाव के दौरान पार्टी के महिला मोर्चे ने महिला मतदाताओं के वोट बढ़ाने के लिए स्वयं सहायता समूह की महिलाओं के वोट को अपने पक्ष में किया. भाजपा-आईपीएफटी सरकार ने स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) के ज़रिये महिलाओं को भारी धनराशि दी है. जिसकी वजह से पुरुष मतदाताओं की तुलना में महिला मतदाताओं ने भाजपा को 3 प्रतिशत वोट ज़्यादा डाला. </p>
<p>साहा ने पिछले विधानसभा चुनाव में भाजयुमो की भूमिका की भी तारीफ की. उन्होंने कहा, “युवा मोर्चा हमेशा पार्टी के लिए ताकत बना रहा है. चाहे वह चुनाव हो या महामारी, हम सुरक्षित महसूस करते हैं क्योंकि युवा मोर्चा हमेशा सरकार और पार्टी के पीछे खड़ा रहा है.” उन्होंने नीति निर्माताओं से एक साथ मिलकर राज्य के लिए काम करने का आग्रह किया. मुख्यमंत्री द्वारा इतने बड़े मंच पर कही गई ये बात इस बात का सबूत है कि SHG महिलाओं की ताकत को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. आज ये महिलायें, राज्य स्तर की राजनीति पर प्रभाव डालने का ज़ोर रखती हैं. </p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">रविवार ब्यूरो </dc:creator><pubDate>Mon, 08 May 2023 17:26:54 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/khabar/funding-self-help-groups-resulted-in-more-women-voters-says-tripura-cm-manik-saha]]></guid><category><![CDATA[ख़बर]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/sr5Hl6sgdzpB0d9ga5rf.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/sr5Hl6sgdzpB0d9ga5rf.jpg"/></item><item><title><![CDATA[डाक्यूमेंट्स में 7500 शौचालय, असलियत में एक नहीं ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/khabar/7500-toilets-shown-on-documents-warrant-will-be-issued-against-shg</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/mn1R4tOVj0kgVQbWLs7y.jpg"><p>स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) को गांवो को स्वच्छ बनाने का श्रेय मिलता रहा है। इस मिशन के तहत झररखण्ड के चतरा में बने शौचालयों में अनियमितता के मामले सामने आएं हैं. नियमों का उलंघन करने वाले स्वयं सहायता समूहों के अध्यक्षों, सचिवों और कोषाध्यक्षों पर केस दर्ज किये गए. मिली जानकारी के अनुसार पता चला कि जिले में डाक्यूमेंट्स के हिसाब से 7500 शौचालय बनाए गये हैं जिसमे करीब 9 करोड़ रुपयों की लागत लगी है. ऐसे कई मामले जिले की कई पंचायतों से सामने आयें हैं. </p>
<p>जिले के स्वयं सहायता समूहाें (Self Help Groups- SHG) को शौचालाय निर्माण का काम दिया गया था, जिसके लिए उन्हें जल स्वच्छता समिति से कराेड़ाें रुपयों का एडवांस मिला था. कई ग्रामीणाें ने शाैचालय न बनने की शिकायत की. पूछने पर, वे तीन साल बाद भी उपयाेगिता प्रमाण पत्र नहीं दे पाए. विभाग की जांच में पता चला कि इन शाैचालयाें का निर्माण हुआ ही नहीं. शौचालय निर्माण में हुए इस घोटाले के आरोप में स्वच्छ भारत मिशन में काम करने वाले जिला कोऑर्डिनेटर और इंजीनियरों को काम से हटा दिया गया है. जिले के 135 स्वयं सहायता समूहाें ने बिना शौचालय निर्माण किये ही पूरी राशि निकाल ली. जिला जल एवं स्वच्छता मिशन के आदेश के बाद भी 7500 शौचालय नहीं बनाए गए हैं. सरकार ने एक शौचालय बनवाने के लिए 12000 हजार रुपये दिये थे. </p>
<p>केस दर्ज होने के बाद जल्दबाज़ी में कुछ स्वयं सहायता समूहों ने शौचालय के निर्माण का काम पूरा किया और उपयोगिता प्रमाण पत्र जमा कर दिया। अभी भी 9 करोड़ से ज़्यादा राशि का उपयोगिता प्रमाण पत्र नहीं मिला है. आरोपियों के खिलाफ वारंट जारी किये जा रही हैं. लगभग 68 स्वयं सहायता समूहों और विलेज वॉटर सैनिटेशन कमिटियों (Village Water Sanitation Committee) के अध्यक्षों, सचिवों और कोषाध्यक्षों के ख़िलाफ़ गिरफ्तारी वारंट जारी किये जा रहे हैं. इसके बाद भी सरकारी राशि जमा न करने पर उनके घर कुर्क किए जाएंगे. </p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">रविवार ब्यूरो </dc:creator><pubDate>Thu, 04 May 2023 12:15:06 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/khabar/7500-toilets-shown-on-documents-warrant-will-be-issued-against-shg]]></guid><category><![CDATA[ख़बर]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/mn1R4tOVj0kgVQbWLs7y.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/mn1R4tOVj0kgVQbWLs7y.jpg"/></item><item><title><![CDATA[SHG का रागी स्नैक्स बना हार्वर्ड की केस स्टडी ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/khabar/case-study-on-raagi-snacks-to-be-used-by-harvard-business-school</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/SWPQ4JzIY7pYxcIVZ2bD.jpg"><p>गरीबी और नक्सली उग्रवाद के लिए सुर्ख़ियों में रहने वाला झारखंड (Jharkhand) का एक जिला अब, रागी से बने स्नैक्स के लिए चर्चा में है. ये चर्चा अब देश के बाहर अमेरिका की हारवर्ड यूनिवर्सिटी (Harvard University) तक पहुंच गई है. बाजरा के इर्द गिर्द एक धीमी क्रांति वहां पनप रही है, जो कुपोषण और गरीबी पर वार करती है. इस पिछड़े जिले में नए कृषि-उद्योग को लाने का काम युवा प्रशासनिक अधिकारी सुशांत गौरव ने किया जिनका सपना है की गुमला पूर्वी भारत की रागी राजधानी बनाना चाहते हैंबन जाए.&nbsp;</p><p>राज्य की राजधानी रांची (Ranchi) से लगभग 100 किलोमीटर दूर, गुमला में ये पहल की गई जिसके लिए सुशांत को प्राइम मिनिस्टर्स अवार्ड्स फॉर एक्सीलेंस से सम्मानित किया गया. पहले गुमला की अर्थव्यवस्था चावल की वर्षा पर निर्भर खेती पर टिकी थी. उपायुक्त सुशांत गौरव ने राष्ट्रीय बीज निगम की मदद से उच्च गुणवत्ता वाले बीजों को खरीद रागी की खेती शुरू की. शुरुआत में 1,600 एकड़ के ज़मीन पर रागी की खेती की, जिसे अब बढ़ाकर 3,600 एकड़ ज़मीन पर किया जा रहा है. उत्पादन में 300 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई. सखी मंडल महिला स्वयं सहायता समूह (Self help groups-SHG) द्वारा खरीद के बाद सफलता की गति बढ़ गई.&nbsp;</p><p>रागी प्रसंस्करण केंद्र स्थापित किया गया जो झारखंड में पहला है. वहां रागी लड्डू, भुजिया नमकीन और आटे का उत्पादन किया जा रहा है. &nbsp;प्रोटीन, कैल्शियम और आयरन से भरपूर होने की वजह से रागी कुपोषण और एनीमिया से लड़ने में मदद करता है. केवल महिलाओं द्वारा संचालित रागी प्रोसेसिंग केंद्र जौहर रागी ब्रांड के तहत 1 टन रागी आटा, 300 पैकेट रागी लड्डू और 200 पैकेट रागी स्नैक्स का प्रतिदिन उत्पादन कर रहे हैं. बच्चों को कुपोषण से लड़ने के लिए रागी के लड्डू और मोरिंगा पाउडर कम कीमत पर काफी ज़्यादा कारगर साबित हो रहे हैं.&nbsp;</p><p>अविनाश कुमार, महात्मा गांधी नेशनल फेलो है जिन्होंने डिप्टी कमिश्नर की ओर से हार्वर्ड बिजनेस स्कूल में गुमला मॉडल पर एक केस स्टडी प्रेजेंट की जिसे अंतरराष्ट्रीय बिजनेस स्कूल और ब्यूरोक्रेट्स की ट्रेनिंग के लिए इस्तेमाल किया जाएगा. इस पहल से महिलाओं को रोज़गार मिलेगा, कुपोषण और एनीमिया की समस्या ख़त्म होगी और 'ईयर ऑफ़ मिलेट' को ऊंचाइयों मिल सकेगी.&nbsp;</p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">रविवार ब्यूरो </dc:creator><pubDate>Wed, 03 May 2023 14:04:04 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/khabar/case-study-on-raagi-snacks-to-be-used-by-harvard-business-school]]></guid><category><![CDATA[ख़बर]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/SWPQ4JzIY7pYxcIVZ2bD.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/SWPQ4JzIY7pYxcIVZ2bD.jpg"/></item></channel></rss>