<rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" xmlns:dcterms="http://purl.org/dc/terms/" xmlns:geo="http://www.w3.org/2003/01/geo/wgs84_pos#" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/" xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/" xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/" version="2.0"><channel xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/"><title><![CDATA[ तापसी पन्नू]]></title><link>https://ravivarvichar.in/tags/taapsii-pnnuu</link><description/><atom:link href="https://ravivarvichar.in/rss/tags/taapsii-pnnuu" rel="self"/><language>en-us</language><lastBuildDate>Tue, 01 Aug 2023 13:19:53 +0530</lastBuildDate><item><title><![CDATA[सोशल चेंज की बोल्ड वॉइस बन रही तापसी ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/nazariya/taapsee-pannu-the-bold-voice-of-bollywood-speaking-up-for-equality</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/xbelqRQxWCyqHtHOqNXd.jpg"><p>बॉलीवुड (Bollywood) जगत में, जहां <a href="https://ravivarvichar.in/hum-bhi-hero/14-year-old-maleesha-kharwa-from-mumbai-dharavi-now-face-of-luxury-beauty-brand-forest-essentials">अभिनेत्रियां</a> अक्सर संवेदनशील सामाजिक मुद्दों पर बात करने से कतराती हैं, वहां एक नाम निडरता से अपनी बात कहने के लिए जाना जाता है. चाहे अपने विटी रिप्लाइज़ (witty replies) से ट्रॉल्स (trolls) को चुप करना हो, ऑन स्क्रीन स्ट्रोंग फीमेल रोल्स (on-screen strong female roles) निभाना, या अन्याय के खिलाफ बोलना, तापसी पन्नू यह सब कर रही है. अपने टैलेंट, अनअपोलोजेटिक एटीट्यूड, और लैंगिक समानता के लिए एक मजबूत आवाज के साथ, वह भारतीय <a href="https://ravivarvichar.in/nazariya/female-characters-of-guru-dutt">सिनेमा</a> में स्ट्रोंग और बोल्ड वॉइस (bold voice) के रूप में उभरी है.</p>
<p>दिल्ली (Delhi) में जन्मी और पली-बढ़ी तापसी पन्नू (Taapsee Pannu) ने इंजीनियरिंग (engineering) छोड़ 2010 में फिल्म 'झुमंडी नादम' से बॉलीवुड में डेब्यू (Bollywood debut) किया. शुरुआती दौर में चुनौतियों का सामना किया, पर जल्द ही अपने टैलेंट से फिल्म निर्माताओं और दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया. 2016 में आई फिल्म 'पिंक' ने उन्हें फेम दिलवाया. फिल्म में उन्होंने न्याय के लिए लड़ने वाली एक मजबूत इरादों वाली महिला की <a href="https://ravivarvichar.in/kahaniyan/remembering-smita-patil-known-for-her-female-centric-characters-feminism-and-perfection-in-the-bollywood-industry">भूमिका</a> निभाई. यहां से महिलाओं को सशक्त और प्रेरित करने वाली भूमिकाओं के साथ उनके जुड़ाव की शुरुआत हुई.</p>
<h2>तापसी पन्नू ने निभाए आज़ाद, आत्मविश्वासी, स्ट्रोंग किरदार&nbsp;</h2>
<p>तापसी पन्नू ने लगातार ऐसे किरदारों को चुना है जो रूढ़िवादी भूमिकाओं (unconventional roles of Taapsee Pannu) से दूर हों. चाहे वह 'बदला' में एक महिला उद्यमी की भूमिका हो या 'मिशन मंगल' में वैज्ञानिक की, उन्होंने स्क्रीन पर महिलाओं के पारंपरिक चित्रण को तोड़ा है. थप्पड़, नाम शबाना, रश्मि रॉकेट जैसी फिल्मों में तापसी की भूमिकाएं <a href="https://ravivarvichar.in/atram-shatram/lady-powerstar-sai-pallavi-breaks-beauty-standards-and-acts-without-makeup">महिलाओं</a> को आज़ाद, आत्मविश्वासी और समाज में अपनी पहचान बनाने में सक्षम दिखाती हैं.</p>
<h3>ऑफ रील भी कर रही लैंगिक समानता और वीमेंस राइट्स की वकालत&nbsp;</h3>
<p>ऑफ रील भी तापसी पन्नू लगातार लैंगिक समानता (gender equality) और महिलाओं के अधिकारों की वकालत करती हैं. वह निडरता से फिल्म इंडस्ट्री (film industry) में पे गैप (pay gap) और महिलाओं के लिए सेफ स्पेस (safe space) की ज़रुरत पर खुलकर बोलती हैं. उनके सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म (social media platforms) सोशल स्टैंडर्ड्स (social standards) को तोड़ने और महिला सशक्तिकरण (women empowerment) को बढ़ावा देने के लिए आवाज़ का ज़रिया बन गए हैं.&nbsp;</p>
<p>तापसी द्वारा पर्दे पर निभाई जाने वाली भूमिकाएं (strong roles played by Taapsee) अक्सर महिलाओं द्वारा सामना की जाने वाली वास्तविक दुनिया की चुनौतियों को दिखाती हैं. अपनी फिल्मों के ज़रिये, वह घरेलू हिंसा, लिंग भेदभाव और महिलाओं की सुरक्षा और अधिकार से जुड़ी सच्चाई को सिल्वर स्क्रीन के ज़रिये सामने लाती है. ये फ़िल्में समाज को आइना दिखाती हैं, इन मुद्दों पर बात करने और विचार करने की जगह बनाती हैं, जिससे बदलाव को बढ़ावा मिल सके.</p>
<p>सिनेमा में तापसी पन्नू का काम मनोरंजन से परे है, जिसका समाज पर गहरा असर पड़ता है. उनकी फिल्मों ने अनगिनत महिलाओं को अपने अधिकारों के लिए खड़े होने और अन्याय के खिलाफ लड़ने के लिए प्रेरित किया है. युवा लड़कियों के पास अब एक भरोसेमंद रोल मॉडल है जो साहस और दृढ़ता का उदाहरण है.&nbsp;</p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मिस्बाह</dc:creator><pubDate>Tue, 01 Aug 2023 13:19:53 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/nazariya/taapsee-pannu-the-bold-voice-of-bollywood-speaking-up-for-equality]]></guid><category><![CDATA[नज़रिया]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/xbelqRQxWCyqHtHOqNXd.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/xbelqRQxWCyqHtHOqNXd.jpg"/></item><item><title><![CDATA[जेंडर नही टैलेंट से तय होनी चाहिए पे स्केल ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/nazariya/gender-should-not-be-the-deciding-factor-of-the-pay-scales-in-bollywood-industry</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/67LpHligpYcKyHSvdTKP.jpg"><h1>पे पैरिटी इन बॉलीवुड</h1>
<p>फिल्मी जगत, एक सपना जहां <strong>लाइट्स, कैमरा, एक्शन</strong>, पर हर इंसान की ज़िंदगी चलने और रुकने लगती है इस दुनिया में. बड़े परदे के वो एक्टर्स जिनकी पूरी दुनिया दीवानी है, वो जब सामने आए तो सपना पूरा होने जैसा लगता है. एक कलाकार को जब हम उस बड़ी सी स्क्रीन पर देखते है, तो लगता है इनकी ज़िंदगी कितनी अलग होगी. लेकिन अलसियत में ऐसा कुछ नहीं है. आम लोगों जैसी लाइफ स्टाइलहै इनकी. हां थोड़े प्रिविलाजेस तो होते है, लेकिन इसके अलावा ऐसा कुछ नहीं है जो हमसे अलग हो.</p>
<p>अगर देखा जाए तो सेलेब्रिटीज़ की लाइफ में भी आम लोगों जैसी इशूज़ और कंसर्नस है. सबसे बड़ा कंसर्न जो रिसेंटली और भी ज़्यादा डिस्कशन में आया है वो है <a href="https://ravivarvichar.in/khabar/tata-technologies-limited-going-to-start-rainbow-program-for-women-workforce-to-enhance-gender-diversity" rel="dofollow"><strong>जेंडर पे गैप</strong></a>. सोच के लगता ही नहीं कि ये कॉर्पोरेट वाला टर्म बॉलीवुड में भी फैला हुआ है. लेकिन सच ये है कि एक एक्ट्रेस को आज भी मूवीज़ करने के लिए एक एक्टर से कम पे किया जाता है.</p>
<h2>जेंडर पे गैप फेस करती बॉलीवुड एक्ट्रेसेस</h2>
<p>महिलाओं को हर जगह ही कम समझना और उनको पुरुषों से कम ऐडवानटेजेस देना, ये एक ट्रेंड सा बन गया है दुनिया में. बॉलीवुड में आज जो एक्ट्रेस आ चुकी है वो इतनी बेहतरीन कलाकार है कि फिल्मों को उनके होते हुए किसी हीरो की ज़रूरत ही नहीं होती. लेकिन आज भी <a href="https://ravivarvichar.in/nazariya/gender-pay-gap-in-india">पे पैरिटी</a> जैसे इशूज़ इंडस्ट्री में आए दिन की बात हो गयी है.</p>
<p><strong>अमीषा पटेल</strong> ने हाल ही में अपनी नयी फिल्म 'ग़दर 2' की रिलीज़ के बाद इंटरव्यू में कहा कि- "<em>मेल एक्टर्स हायर पे डिसर्व करते है, क्यूंकि एक फिल्म उन्ही के कारण चलती है, पे पैरिटी जैसा कुछ नहीं होता.</em>" सवाल ये है ही नहीं कि फिल्म किसके कारण चल रही है, सवाल ये है कि किसी भी कलाकार को उसकी स्क्रीन टाइम और टैलेंट के बेसिस पर क्यों नहीं जज किया जाता?</p>
<h3> बॉलीवुड की फीमेल सेंट्रिक फिल्म्स </h3>
<p><em>राज़ी में आलिया भट्ट, नाम शबाना में तापसी पन्नू, <a href="https://ravivarvichar.in/hum-bhi-hero/indian-female-ips-officers">मर्दानी </a>में रानी मुखर्जी, हाईवे और परी में अनुष्का शर्मा, कहानी में विद्या बालन, बाजीराव मस्तानी और पीकू में दीपिका पादुकोण, द स्काए इज़ पिंक और सात खून माफ़ में प्रियंका चोपड़ा, क्वीन में कंगना रनौत</em>... इन सबने साबित कर दिया है कि फिल्म सिर्फ एक फीमेल एक्ट्रेस चला भी सकती है और उससे करोड़ों की दिलों पर राज भी कर सकती है.</p>
<p><strong>अमीषा पटेल</strong> ने उसी इंटरव्यू में यह भी कहा था कि एक <a href="https://ravivarvichar.in/kahaniyan/remembering-smita-patil-known-for-her-female-centric-characters-feminism-and-perfection-in-the-bollywood-industry">लीड फीमेल एक्टर </a>की मूवी परफॉरमेंस देखे तो हमेशा एक मेल एक्टर से कम ही मिलेगी. इस तरह के थॉट प्रोसेस सोचने पर मजबूर कर देती है कि एक फीमेल एक्टर इस तरह की बात कैसे बोल रही है? यह सोच इतनी रिग्रेसिव है कि आज महिलाओं की प्रोग्रेस के साथ मैच ही नहीं कर सकती.</p>
<p>और बात आज की नहीं है, 80s और 90s के टाइम पर भी कुछ फिल्में जैसे <strong>मदर इंडिया, चालबाज़, बेटा, कहानी, दामिनी, अर्थ, पिंजर</strong>, कुछ ऐसी मूवीज़ जो अपने वक़्त में चली ही फीमेल लीडस् के कारण थी.</p>
<p><img alt="Equal pay scale for all genders" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/507x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/hyapeT7ZHKeZxCfOpxh7.jpg" class="center" style="width: 507px;"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: Parity Consulting</em></span></p>
<h3>जेंडर बेस्ड पे पर सोच बदलना ज़रूरी</h3>
<p>सोच ये है की स्क्रीन टाइम के हिसाब से एक्टर्स को पे किया जाना चाहिए, लेकिन सच तो ये है की किसी के स्क्रीन टाइम का उनके टैलेंट से कोई रिलेशन नहीं है. पीकू मूवी में दीपिका को अमिताभ बच्चन और इरफ़ान खान से ज़्यादा पे किया गया था. और वह एक सुपरहिट फिल्म रही है. अमिताभ बच्चन को तो शायद ही कोई नहीं जनता होगा. इरफ़ान खान भी उस मूवी के लीड और भारत में बहुत फेमस एक्टर थे. लेकिन बैरियर तोड़ा गया और दीपिका को ज़्यादा पे किया गया.</p>
<p>तो यह कहना कि कोई भी फिल्म एक फीमेल के कारण कभी नहीं चलती, यह कितना सही है? इंडस्ट्री में इतने साल से काम करने वाले लोग ही अगर इस तरह की सोच रखेंगे तो बाहर वालो से क्या ही उम्मीद कर सकते है? यह बात किसी से नहीं छुपी है की महिलाएं और लड़कियां कितनी तेजी से आगे बढ़ रही है. कुछ फ़ील्ड्स में तो हाल ये है कि लड़कियों की रफ़्तार को मैच ही नहीं कर पा रहे लड़के. चाहे बॉलीवुड की चमक हो या ऑफिस की भागदौड़, सोच बदलनी ज़रूरी है. महिलाओं को अगर <strong>इक्वल राइट्स</strong> देने की बात की जाती है तो, शुरुआत <strong>पे पैरिटी और जेंडर पे गैप को खत्म करने से होनी चाहिए</strong>.</p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">रिसिका जोशी</dc:creator><pubDate>Tue, 11 Jul 2023 17:26:34 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/nazariya/gender-should-not-be-the-deciding-factor-of-the-pay-scales-in-bollywood-industry]]></guid><category><![CDATA[नज़रिया]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/67LpHligpYcKyHSvdTKP.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/67LpHligpYcKyHSvdTKP.jpg"/></item><item><title><![CDATA[मै चाहे ये पहनू , मै चाहे वो पहनू , मेरी मर्ज़ी… ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/nazariya/history-of-bikini</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/WHykIQCbOFxuFDvlepbm.jpg"><p>लड़कियों को पढ़ाओ उनको बढ़ाओ, उनकी इज़्ज़त करो, वो किसी से कम नहीं है, लड़कियां जो चाहे वो कर सकती हैं, उन्हें हर तरह की आज़ादी है, .ऐसी कितनी बातें हम सब हर दिन सुनते होंगे. कितने ही लोग अपने आप को सबसे बड़ा 'फेमिनिस्ट' बताते हैं. लेकिन आज भी जब एक लड़की स्कर्ट या शॉर्ट्स पहन कर बाहर निकलती है, तो ज़्यादातर निगाहें उसका पीछा करने लगती हैं, मन ही मन सवाल उठाये जाते हैं और कहीं न कहीं चरित्र परिभाषित कर दिया जाता है. यह तो तथाकथित शहरी हालात है गावों की बात तो छोड़ ही दें.  </p>
<p>किसी भी लोकतांत्रिक आज़ाद देश में सोचने, बोलने, खाने पीने, पहनावे की आज़ादी होनी चाहिए. जब आज़ादी हमारे देश के हर इंसान को बराबर मिली है तो लड़कियों को अपने पसंद के कपड़े पहनने से पहले क्यों सोचना पड़ता है ? घर से शॉर्ट ड्रेसेस पहन के निकलने से पहले ही घर वाले बोल देते हैं, 'ये पहन कर मत जाओ '. बंदिश घर से ही शुरू होती है और बाहर उस बंदिश पर मुहर लग जाती है.  </p>
<p>अनचाहे ही लड़की खुद से ये सावल पूछने पर मजबूर हो जाती है -  ' कही गलती मेरी ही तो नहीं ? ' लेकिन हर वो नज़र जो उसे मुड़ के देख रही है वो खुद से ये सवाल क्यों नहीं कर रही? समाज के ठेकेदारों ने तय कर लिया कि लड़कियां क्या पहनेंगी. अगर आज एक लड़का शॉर्ट्स पहन कर बाहर निकले तो कहा जाएगा कि, ' यार शॉर्ट्स कम्फर्टेबल होते हैं, और गर्मी भी तो कितनी है. 'और वही शॉर्ट्स अगर एक लड़की पहन के निकले तो ?</p>
<p>लडकियां जब सिर्फ शॉर्ट्स या क्रॉप टॉप पहन रही है तब ये हाल है, बिकिनी पहन ले तो हंगामा ही हो जाए. सी बीच हो या स्विमिंग पूल, फिल्म की शूट हो या कोई ऐड की, लड़की बिकिनी पहन तो ले. उसका कैरक्टर असैसिनेशन करने के लिए देश की आधी जनता तैयार हो जाएगी. लोग लड़कियों के मामले में हमेशा ये भूल जाते हैं कि उन्हें भी उतनी ही आज़ादी और हक़ मिला है जितना एक लड़के को. वो जब चाहे, जहां चाहे, जो चाहे वो पहन सकती है.</p>
<p>सिर्फ आज की पीढ़ी नहीं बल्कि 1966  की फिल्म "एन इवनिंग इन पेरिस" में ऑन-स्क्रीन बिकनी पहनने वाली पहली भारतीय अभिनेत्री शर्मिला टैगोर थीं. उन्होंने भारत में सबसे पहले बिना किसी डर के कैमरा के सामने बिकिनी पहनी जो कि उस वक़्त के हिसाब से एक बहुत ही 'बोल्ड' मूव था. बिकनी में शर्मिला टैगोर जैसी कलाकार को देखकर भारत में उस समय बहुत हलचल मच गयी थी. तब से, भारतीय सिनेमा में कई दूसरी अभिनेत्रियों ने ऑन-स्क्रीन बिकनी पहनी है, जिनमें "कुर्बानी" (1980) में ज़ीनत अमान और "बॉबी" (1973) में डिंपल कपाड़िया  शामिल है. </p>
<p>फैशन डिज़ाइनर लुइस रेकर्ड सबसे पहले बिकनी क्लोथिंग स्टाइल को लाये थे. इन्होंने बिकिनी का नाम 'बिकिनी एटोल' के नाम पर रखा , जहां 4 दिन पहले ही 'नुक्लिअर बम' का परिक्षण किया गया था. भारत में पहनावा पहले से  ही मौसम और हालात पर निर्भर रहा. हमारे जनजातीय और सदियों पहले के समाज में पहनावे की आज़ादी ज़्यादा थी. विदेशों में बिकिनी पहनावा नया है और इसको फेमिनिस्ट मूवमेंट से जुड़ा हुआ माना गया. हॉलीवुड की अभिनेत्रियों को भी बिकिनी पहनने पर कई ताने नहीं मारे गए है. मैरीलीन मोनरो और मेगन फॉक्स जैसे नाम बिकिनी पहन के ही दुनिया पर छाए लेकिन वो भी लोगो कि सोच से बच नहीं पाई. और ये ही हाल है हमारे देश में जहां आए दिन कोई ना कोई अपने पहनावे को लेकर बेशरम रंग से पुता नज़र आता है.  </p>
<p>तापसी पन्नू , दीपिका पादुकोण, अनुष्का शर्मा, आलिया भट्, प्रियंका चोपड़ा जैसे कई नाम है जिन्हें आज पूरा देश जानता है. ये सब अपनी प्रतिभा देश दुनिया को कई बार साबित कर चुकी है लेकिन फिर भी बात उनके कपड़ों की होती है. विवाद सेलिब्रिटी कल्चर का हिस्सा है, लेकिन महिला सेलिब्रिटी ज़्यादातर अपने कपड़ों को लेकर ही विवादों में घिरती है. इन सेलिब्रिटी महिलाओं को आम लड़कियां अपनी प्रेरणा मानती है, और जब उनकी आइडल ऐसे विवादों में फंसती है तब आम लड़कियों की आज़ादी भी विवाद का उदाहरण देकर दबा दी जाती है. </p>
<p>आज के समय में तो भारतीय फिल्मो में ज़्यादातर एक्ट्रेस बिकिनी पहन के शूट करती है और सोशल मीडिया पर पोस्ट्स भी आते रहते है. समय तो बदल गया है और लड़कियों का आत्मविश्वास भी. नहीं बदली है तो सोच, नज़र और मानसिकता जो लड़की के छोटे कपड़ो को देखकर ज़्यादा छोटी हो जाती है. भले ही बदलाव हुए है, आज से 50 साल पहले हम जो सोच भी नहीं सकते थे, वो आज कर रहे है. लेकिन छोटी सोच छोटे कपड़ों पर अभी भी भारी है.</p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">रिसिका जोशी</dc:creator><pubDate>Thu, 30 Mar 2023 13:41:05 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/nazariya/history-of-bikini]]></guid><category><![CDATA[नज़रिया]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/WHykIQCbOFxuFDvlepbm.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/WHykIQCbOFxuFDvlepbm.jpg"/></item></channel></rss>