<rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" xmlns:dcterms="http://purl.org/dc/terms/" xmlns:geo="http://www.w3.org/2003/01/geo/wgs84_pos#" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/" xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/" xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/" version="2.0"><channel xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/"><title><![CDATA[ UNESCO]]></title><link>https://ravivarvichar.in/tags/unesco</link><description/><atom:link href="https://ravivarvichar.in/rss/tags/unesco" rel="self"/><language>en-us</language><lastBuildDate>Thu, 22 Jun 2023 15:58:05 +0530</lastBuildDate><item><title><![CDATA["मन्नार खाड़ी संरक्षण में महिलाओं की अहम भूमिका" UNESCO अवॉर्डी जगदीश ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/khabar/women-integral-to-protecting-gulf-of-mannar-says-awardwinning-officer-jagadish</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/LKUCNnV22JNKKBtlbSro.jpg"><p><strong>प्रकृति का संरक्षण </strong>(environment conservation) और उसके साथ ताल मेल मिलाकर चलना भारतीय संस्कृति (Indian culture) का हिस्सा है. इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए कई भारतीय पर्यावरण सुरक्षा में अहम भूमिका निभा रहे हैं. ये देश के लिए गर्व की बात थी जब यूनेस्को (UNESCO) ने <strong>विश्व पर्यावरण दिवस </strong>पर <strong>जगदीश एस बाकन</strong> (<span>Jagdish S Bakan</span>) को <strong>बायोस्फीयर रिजर्व प्रबंधन</strong> (<span> Biosphere Reserve Management</span>) के लिए <strong>2023 मिशेल बैटिस पुरस्कार </strong>की घोषणा की. जगदीश, <strong>वाइल्डलाइफ वार्डन एंड डायरेक्टर ऑफ़ द गल्फ ऑफ़ मन्नार बायोस्फियर रिज़र्व ट्रस्ट ऑफ़ रामनाथपुरम</strong>, (Jagdish, Wildlife Warden and Director of the Gulf of Mannar Biosphere Reserve Trust of Ramanathapuram) यह पुरस्कार जीतने वाले पहले भारतीय बने. उन्होंने <strong>पुरस्कार समारोह</strong> में अपनी <strong>केस स्टडी</strong> प्रस्तुत की. जगदीश को बायोस्फीयर रिजर्व प्रबंधन में उनकी उपलब्धियों के लिए <strong>12 हज़ार अमेरिकी डॉलर</strong> भी मिले.</p>
<p><img alt="JagdishSBakan" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/iffKDdwR6OAhWOrIMaUl.jpg"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: The News Minute</em></span></p>
<p><strong>मरीन बायोडायवर्सिटी</strong> (Marine biodiversity) का खनन, <strong>इकोसिस्टम </strong>(ecosystem) क्वालिटी में गिरावट, <strong>समुद्री प्लास्टिक प्रदूषण</strong> (plastic pollution), <strong>अवैध वन्यजीव व्यापार </strong>और <strong>इकोसिस्टम की कमी </strong>से राज्य के कई हिस्सों में <strong>समुद्री सेहत </strong>के लिए गंभीर खतरे हैं. इन मुद्दों पर काम करने के लिए, <strong>मन्नार खाड़ी रिजर्व</strong> की जैव विविधता की ज़रुरत पर जागरूकता पैदा करने, <strong>समुदाय-आधारित प्लास्टिक नियंत्रण अभियान </strong>चलाने, <strong>प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन</strong> के साथ सामुदायिक विकास के प्रयासों और <strong>मैंग्रोव, मूंगा चट्टानों के रेस्टोरेशन</strong> के लिए कई पहल कीं. <strong>जगदीश एस बाकन</strong> का मानना है कि <strong>मन्नार की खाड़ी को बचाने में महिलाएं अहम भूमिका निभा रही</strong> हैं.   </p>
<p>इस परियोजना ने <strong>7,788 सदस्यों</strong> के लिए नौकरियां पैदा की <img alt="gulf of mannar" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/olz4iKqaJLElMJoeGu03.jpg" style="width: 0px; height: 0px;">हैं जिनमें <strong>7,243 महिलाएं</strong> हैं. <strong>स्थानीय समुदायों </strong>को सशक्त बनाने के लिए <strong>लगभग 26.4 करोड़ रुपये का माइक्रोक्रेडिट </strong>प्रदान किया गया. इस परियोजना के तहत <strong>चार इकोटूरिज्म</strong> और <strong>दो प्लास्टिक-मुक्त क्षेत्र</strong> बनाये गए. सभी चार इकोटूरिज्म स्थलों पर, <strong>स्वयं सहायता समूहों</strong> (Self Help Group) की महिला सदस्य पर्यटकों के लिए <strong>कैंटीन सेवाएं</strong> चलाती हैं. </p>
<p><img alt="gulf of mannar" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/olz4iKqaJLElMJoeGu03.jpg"></p>
<p><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: The New Indian Express</em></span></p>
<p><strong>संरक्षण परियोजनाओं</strong> को और अधिक कुशल बनाने के लिए, <strong>स्वयं सहायता समूहों</strong> (SHG) के <strong>लगभग 36 हज़ार सदस्य</strong> और <strong>252 इको विकास समितियों</strong> के सदस्य <strong>मन्नार की खाड़ी बायोस्फीयर रिजर्व ट्रस्ट </strong>के साथ मिलकर काम कर रहे हैं. अब तक, <strong>SHG महिलाओं</strong> और<strong> स्थानीय लोगों</strong> ने वन कर्मियों के साथ मिलकर<strong> 70 हेक्टेयर बंजर भूमि </strong>पर <strong>70 हज़ार मैंग्रोव पौधे</strong> लगाए हैं. उन्होंने समुद्र के <strong>600 वर्ग मीटर</strong> में <strong>मूंगा चट्टानों </strong>और <strong>1,000 वर्ग मीटर</strong> में <strong>समुद्री घास को पुनर्जीवित </strong>करने में भी मदद की.</p>
<p><strong>वन कर्मचारियों </strong>और <strong>मछुआरों</strong> द्वारा बहुत सारे <strong>समुद्री वन्यजीवों</strong> को बचाया जा रहा है और ऐसे <strong>मछुआरों</strong> को <strong>नकद पुरस्कार </strong>दिए जाते हैं. <strong>प्रकृति संरक्षण</strong> के लिए मछुआरे आगे आ रहे हैं. इसके अलावा, <strong>मछुआरों</strong> के समुदायों के पास <strong>संरक्षण का पारंपरिक ज्ञान </strong>है. वे जानते हैं कि मछली की अच्छी पकड़ तभी होगी जब <strong>समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र स्वस्थ औ</strong>र विविध होगा. इस तरह की पहलों से न केवल पर्यावरण को बचाया जा रहा है, बल्कि <strong>SHG महिलाओं</strong>, स्थानीय समुदायों, और मछुआरों को भी रोज़गार मिल रहा है. <strong>रविवार विचार</strong> का मानना है कि देशभर में <strong>पर्यावरण संरक्षण</strong> के कामों में SHG महिलाओं का योगदान लिया जाना चाहिए.  </p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">मिस्बाह</dc:creator><pubDate>Thu, 22 Jun 2023 15:58:05 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/khabar/women-integral-to-protecting-gulf-of-mannar-says-awardwinning-officer-jagadish]]></guid><category><![CDATA[ख़बर]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/LKUCNnV22JNKKBtlbSro.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/LKUCNnV22JNKKBtlbSro.jpg"/></item><item><title><![CDATA[कर्रम कुर्रम...  लिज्जत पापड़ ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/kahaniyan/lijjat-papad</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/NLJZd4NBUxUyhwCShqwF.jpg"><p dir="ltr">गर्मी की धुप में जब हम घर की ओर रुख़ करते हैं, तब पापड़ आपकी और हमारी छतों पर उस धुप को सोख रहे होते हैं. ज़िंदगी में कई तरह के पापड़ बेलने पढ़ते है और जब ये पापड़ महिलाओं के समूह ने मिलके बेले, तो वो लिज्जत पापड़ कहलाये. चाय कॉफी या भोजन के साथ लिज्जत पापड़ की कर्रम कुर्रम न हो तो कइयों के मुंह बन जाते हैं. इसीलिए हर महीने की राशन की लिस्ट में पापड़ ज़रूर होता है. पिछले 60 सालों में लिज्जत पापड़ ने घरों की छत और आंगन से लेकर विदेश तक का सफ़र तय किया. पापड़ को विदेश का टीकट दिलवाने की ये पहल की जसवंतीबेन जमनादास पोपट ने.  </p>
<p dir="ltr"><img style="width: 0px; height: 0px;" src="https://d2vbj8g7upsspg.cloudfront.net/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/jcmS2P8BijepZqiSaC0L.webp" alt="lijjat papad SHg"><img src="https://d2vbj8g7upsspg.cloudfront.net/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/jcmS2P8BijepZqiSaC0L.webp" alt="lijjat papad SHg"></p>
<p dir="ltr"><span style="font-size: 8pt;"><em>(Image Credits: Google Images)</em></span></p>
<p dir="ltr">हाथों में भले ही इन्होंने कभी कलम न पकड़ी हो लेकिन एक बेलन से इन्होंने अपनी सफ़लता की कहानी बेली. साइड डिश से सेंटर ऑफ़ अट्रैक्शन बनी इस लिज्जत पापड़ की कहानी शुरी हुई साल 1959 में. मुंबई के गिरगांव में घर के बरामदे में 6 सहेलियां गप्पे मार रहीं थी. पापड़ बनाने का ख़याल आया. फिर सोचा, क्यों न इस ख़याल को रोज़गार में बदल दिया जाये. पैसों की तंगी से जूझती महिलाओं को पापड़ में उम्मीद नज़र आई.   </p>
<p dir="ltr">जसवंतीबेन के साथ शामिल हुईं पार्वतीबेन रामदास ठोदानी, उजमबेन नरानदास कुण्डलिया, बानुबेन तन्ना, लागुबेन अमृतलाल गोकानी, जयाबेन विठलानी पापड़ बनाने का काम शुरू करेंगी. उनकी एक और सहेली ने पापड़ों को बेचने का ज़िम्मा लिया. अब ज़रुरत थी 80 रुपयों की. इंतज़ाम न हो पाने पर सहेलियां सामाजिक कार्यकर्ता छगनलाल पारेख के पास पहुंचीं. उन्होंने 80 रुपये उधार दे दिए. पापड़ बनाने की एक मशीन और कुछ सामान खरीद शुरू किया श्री महिला गृह उद्योग लिज्जत पापड़. </p>
<p dir="ltr">शुरुआत में चार पैकेट पापड़ बनाये. कुछ समय बाद ही बड़े व्यापारी के पास किस्मत आज़माने का सोचा. व्यापारी ने और पापड़ की मांग की. धीरे-धीरे इनकी बिक्री दिन दुगनी रात चौगुनी बढ़ने लगी. छगनलाल ने इन्हे खाता संभालना, मार्केटिंग आदि के बारे में ट्रेनिंग लेने में भी मदद की. इन सात महिलाओं का यह समूह एक कोआपरेटिव सिस्टम बन गया. फिर इसमें 18 साल से ज़्यादा उम्र वाली ज़रूरतमंद महिलाओं के जुड़ने का सिलसिला शुरू हुआ. और आज 60 से ज़्यादा शाखाओं में करीब 4500 महिलाएं लिज्जत पापड़ बना रहीं हैं.  </p>
<p dir="ltr"><img style="width: 465px; height: 348px;" src="https://d2vbj8g7upsspg.cloudfront.net/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/yhEW0TuLa2Z4qGa9c1iQ.jpg" alt="lijjat papad SHg"></p>
<p dir="ltr"><span style="font-size: 8pt;"><em>(Image Credits: Google Images)</em></span></p>
<p dir="ltr">जैसे-जैसे समूह में और महिलाएं जुड़ती गईं, वैसे-वैसे महिलाओं को मज़बूत बनाने का सफ़र आगे बढ़ता चला गया. नए सदस्यों और उनके परिवारों के लिए साक्षरता और कंप्यूटर शिक्षा को बढ़ावा दिया. जून,1999 को गिरगांव में साक्षरता अभियान शुरू हुआ. 1980 के बाद से, लिज्जत ने सदस्यों की बेटियों को छगनबापा स्मृति छात्रवृत्ति देना शुरू की.वलोद में ग्रामीण महिलाओं के लिए एक शैक्षिक और शौक सेंटर शुरू किया. टाइपिंग, खाना पकाने, सिलाई, बुनाई और खिलौना बनाने के साथ-साथ बाल कल्याण, प्राथमिक चिकित्सा और स्वच्छता के बारे में भी जागरूक किया. </p>
<p dir="ltr">लिज्जत की वालोद शाखा की मदद से वालोद में पहली पक्की सड़क का निर्माण और उद्घाटन 1979 में किया गया. 1979 में, लिज्जत ने UNICEF  के साथ "बाल देखभाल और माँ कल्याण" पर मुंबई में एक सेमीनार आयोजित किया. अक्टूबर 1984 में NITIE, पवई में आयोजित UNESCO की अंतर्राष्ट्रीय वर्कशॉप में भद्राबेन भट्ट ने लिज्जत का प्रतिनिधित्व किया. मदर टेरेसा के कहने पर, सदस्य-बहनों ने बेसहारा महिलाओं की देखभाल करने वाली संस्था आशा धन की गतिविधियों में भी भाग लिया. लिज्जत पत्रिका, लिज्जत की गतिविधियों में रुचि रखने वालों के लिए मामूली रेट पर प्रकाशित और प्रसारित की गईं. यह हिंदी,अंग्रेजी, मराठी, और गुजराती में प्रकाशित होती है. लिज्जत की सभी शाखाओं की सदस्य बहनें अपने काम शुरू करने से पहले सर्वधर्म प्रार्थना करती हैं. और लिज्जत में रिटायरमेंट की कोई तय उम्र नहीं. </p>
<p dir="ltr"><img src="https://d2vbj8g7upsspg.cloudfront.net/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/pOPRmsXsLWx7j28rrRPh.jpg" alt="lijjat papad SHg"></p>
<p dir="ltr"><span style="font-size: 8pt;"><em>(Image Credits: Google Images)</em></span></p>
<p dir="ltr">लिज्जत पापड़ को साल 2002 में इकोनॉमिक टाइम्स 'बिजनेस वुमन ऑफ द ईयर' अवार्ड, 2003 में देश के 'सर्वोत्तम कुटीर उद्योग' सम्मान और 2005 में पूर्व राष्ट्रपति डॉ एपीजे अब्दुल कलाम द्वारा ब्रांड इक्विटी अवॉर्ड और 2021 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया. और ये समूह देश की हज़ारों महिलाओं के लिए मिसाल बना. ये महज़ एक कहानी नहीं पर उन महिलाओं का हौसला है जिन्हे लगता है कि औरतें क्या ही कर सकती हैं. ये कहानी जानकार शायद लिज्जत पापड़ का स्वाद और बढ़ जायेगा , अगली बार जब पापड़ खाये तो इन सहेलियों के साहस और उड़ान भरने के होंसले को भी याद करें.... </p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">रविवार ब्यूरो </dc:creator><pubDate>Sat, 04 Mar 2023 14:39:22 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/kahaniyan/lijjat-papad]]></guid><category><![CDATA[कहानियां]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/NLJZd4NBUxUyhwCShqwF.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/NLJZd4NBUxUyhwCShqwF.jpg"/></item></channel></rss>