<rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" xmlns:dcterms="http://purl.org/dc/terms/" xmlns:geo="http://www.w3.org/2003/01/geo/wgs84_pos#" xmlns:georss="http://www.georss.org/georss" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/" xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/" xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/" version="2.0"><channel xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/"><title><![CDATA[ वन विभाग]]></title><link>https://ravivarvichar.in/tags/vn-vibhaag</link><description/><atom:link href="https://ravivarvichar.in/rss/tags/vn-vibhaag" rel="self"/><language>en-us</language><lastBuildDate>Sat, 15 Jul 2023 12:39:15 +0530</lastBuildDate><item><title><![CDATA[जंगल बचाती 'लेडी टार्ज़न' जमुना टुडू ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/kahaniyan/lady-tarzan-jamuna-tudu-rescuing-forests-of-jharkhand-with-her-rescue-army</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/Jx9qLmcj9hqCrTZeRBCe.jpg"><h1 dir="ltr"><span>'लेडी टार्ज़न' जमुना टुडू</span></h1>
<p dir="ltr"><span>एक लेडी, जो अपनी पूरी फ़ौज तैयार कर चुकी है और ठान चुकी है कि अब अपने आस पास के जंगलों को काटने नहीं देगी. अपनी पूरी टीम के साथ, तीर धनुष, और डंडों से लैस इस महिला को आज लोग <strong>लेडी टार्ज़</strong></span><span><strong>न</strong> </span>कहकर बुलाते है. सुनकर लगता है न कि किसी फिल्म का कैरेक्टर है. लेकिन इस महिला का नाम है <strong>जमुना टुडू</strong>, और <a href="https://ravivarvichar.in/search?title=%E0%A4%9D%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%96%E0%A4%82%E0%A4%A1+%E0%A4%95%E0%A5%87+%E0%A4%9C%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A4%B2" rel="dofollow">झारखंड के जंगलों</a> को यह महिला करीब 25 साल से बचा रही है. शुरुआत की थी अकेले, <strong>वन वुमन आर्मी बनकर</strong>, लेकिन आज पूरी की पूरी आर्मी तैयार कर चुकी है जमुना.</p>
<p dir="ltr"><img alt="Women Protecting forest news" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/566x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/f6G98EZ9t30SgXg69Fmp.jpg" style="width: 566px;" class="center"></p>
<p dir="ltr"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: The Week</em></span></p>
<h2><span>जमुना टुडू के बुलंद हौलसों से वन माफिया भी घबराते है</span></h2>
<p dir="ltr"><span>करीब 25 साल पहले छह महिलाओं से जंगल बचाने की शुरुआत करने वाली जमुना टुडू ने <strong>आज छह हजार महिलाओं की एक बड़ी फ़ौज तैयार </strong>कर दी है, जो आज भी सुबह-शाम अपने आसपास के जंगलों की देखरेख करने जाती हैं.</span></p>
<p dir="ltr"><span><img alt="Women Saving Forest News" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/532x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/uoHBBepLZqOuzKJUSNWn.jpg" style="width: 532px;" class="center"></span></p>
<p dir="ltr"><em><span style="font-size: 8pt;">Image Credits: Sakshi Post</span></em></p>
<p dir="ltr"><span>हालांकि सब कुछ इतना आसान नहीं था जितना अब दिखता है. परेशानियां बहुत आई जमुना को, जब उन्होंने यह तय किया कि वे जंगलों को नहीं कटने देंगी. कभी इन्हें वन माफियाओं ने जान से मारने की धमकी दी तो कभी जानलेवा हमला किया, लेकिन जमुना ने आजतक अपने कर्त्तव्य से पीछे मुड़कर नहीं देखा.</span></p>
<h2 dir="ltr"><span>ऐसे की शुरुआत</span></h2>
<p dir="ltr"><span>लेकिन आज एक छोटे से गाँव से जंगल बचाने का शुरू हुआ जमुना का कारवाँ आज पूरे देश के लिए उदाहरण बना हुआ है. वर्ष 1998 से लेकर 2002 तक जमुना खामोशी से जंगल बचाने का काम गिनी चुनी कुछ महिलाओं के साथ अपने गाँव में करती रहीं. जब इनके काम के बारे में <strong>2003 में वन विभाग के उस समय के रेंजर एके सिंह को लगी तो उन्होंने इन्हें पूरा सहयोग किया.</strong></span></p>
<p dir="ltr"><span><strong><img alt="Jamuna Tudu" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/525x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/DoRoGm9ioIRYQJmgfu9o.jpg" style="width: 525px;" class="center"></strong></span></p>
<p dir="ltr"><span style="font-size: 8pt;"><em>Image Credits: Karmactive</em></span></p>
<p dir="ltr"><span><strong>जमुना को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिले इसके लिए रेंजर ने '<a href="https://ravivarvichar.in/khabar/gujarat-shg-women-making-cocopeat-from-coconut-waste-with-the-help-of-forest-department-and-mahakali-temple-trust" rel="dofollow">वन सुरक्षा समिति</a>' का रजिस्ट्रेशन कराकर इन महिलाओं की एक समिति तैयार कर दी. </strong>15 महिला और 15 पुरुषों से बनी इस पहली समिति की जमुना अध्यक्ष बनी. समिति बनने के बाद जमुना अपने गाँव से बाहर दूसरे गाँव में जाने लगी. धीरे-धीरे इन्होने <strong>पूर्वी सिंहभूम जिले</strong> में 400 समितियाँ वन सुरक्षा समिति के नाम से बनाकर तैयार कर दीं. आज भी हर समिति से हर दिन चार पाँच महिलाएँ अपने आसपास के जंगल की निगरानी करने जाती हैं.</span><span></span><span></span></p>
<h3 dir="ltr"><span>स्वयं सहायता समूह कर रहे वन सुरक्षा</span></h3>
<p><span><img alt="Jamuna Tudu Padmshree" src="https://img-cdn.thepublive.com/fit-in/422x0/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/Kfuty1B973ukaoM0jrQz.jpg" style="width: 422px;" class="center"></span></p>
<p><em><span style="font-size: 8pt;">Image Credits: Rise Ranchi</span></em></p>
<p dir="ltr"><span>इनके निर्भीक और अथक प्रयासों से जंगल बचाने की इस मुहिम के लिए <a href="https://ravivarvichar.in/hum-bhi-hero/jaipur-railway-station-lady-coolie">राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद</a><strong>&nbsp;ने साल 2019 में इन्हें '<a href="https://ravivarvichar.in/hum-bhi-hero/bachendri-pal-first-indian-woman-to-climb-the-mount-everest" rel="dofollow">पद्मश्री</a>' से भी सम्मानित किया</strong> और साल 2016 में इन्हें देश की 100 प्रतिभाशाली महिलाओं में शामिल किया गया. जमुना टुडू प्रेरणा है हर उस Self Help Group की महिला के लिए जो नेचर को बचाने के लिए हर प्रयास कर रही है. भारत में स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाएं भी नेचर फ्रेंडली काम कर एक मिसाल कायम कर रही है. इन महिलाओं से हर देशवासी को सीखना चाहिए और याद रखना चाहिए- "<em>अगर पर्यावरण सुरक्षित रहेगा तो सब खुश रहेंगे.</em>"</span></p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">रिसिका जोशी</dc:creator><pubDate>Sat, 15 Jul 2023 12:39:15 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/kahaniyan/lady-tarzan-jamuna-tudu-rescuing-forests-of-jharkhand-with-her-rescue-army]]></guid><category><![CDATA[कहानियां]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/Jx9qLmcj9hqCrTZeRBCe.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/Jx9qLmcj9hqCrTZeRBCe.jpg"/></item><item><title><![CDATA[जंगल जंगल बात चली है, पता चला है... ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/kahaniyan/shg-contributes-in-nature-conservation</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/otoimf3sstUJy34ai3tG.jpg"><p>बंजर इलाका और गर्म हवाएं, बस ऐसा ही कुछ हाल था पुंजापुरा पहाड़ी का. देवास जिले के गांव पानकुआं के लोग बस अपनी पहाड़ी और इलाके का हाल देख खून के आंसू बहाते थे. फिर पिछले 3 साल में बदलाव की हवाएं चली और  नज़ारा कुछ ऐसा बदला कि बंजर पहाड़ी पर अब घने जंगल है और ठंडी हवाएं गांव वालों को राहत दे रही है . बड़ी बात यह की पुंजापुरा पहाड़ी अब "जंगल बैंक" साबित हो रही है. यह कमाल कर दिखाया SHG महिलाओं ने. अब यहां के ग्रामवासी विशेषकर SHG महिलाएं इस "जंगल बैंक " को संवारने और बढ़ाने में दिन-रात एक कर रहीं हैं.    </p>
<p>सिर्फ जंगल ही नहीं यहां पनपी घास भी दोहरा फायदा करा रही है. इस घास से SHG महिलाओं के पशुधन की दूध मात्रा बढ़ गई है. और चारे के लिए भी अब उन्हें दूर नही जाना पड़ता. </p>
<p>SHG महिलाओं ने अपने प्रयासों को आगे बढ़ाते हुए बांस के पेड़ लगाना शुरू किए .अब जहां तक नज़र जाती है वहां तक बांस ही बांस के घने पेड़ वाला जंगल नज़र आता है. प्राकृतिक खूबसूरती से इस इलाके को नई पहचान मिल रही है.  बांस के इस जंगल ने स्वसहायता समूह SHG की उम्मीदें भी बढ़ गई.  विकास महिला स्वसहायता समूह की अध्यक्ष किरण सौलंकी बताती हैं -" हमारे इंतज़ार के दिन ख़त्म हुए. तीन साल की कड़ी मेहनत से बांस के ये पौधे अब बड़े होंगे है . यह हमारे समूह के लिए कमाई का जरिया बन जायेंगे. समूह की महिलाओं को अभी आठ हजार रुपए महीने मिलता है.कुछ ही दिनों में बांस की कटाई शुरू हो जाएगी. हमें इसका सीधा फायदा मिलेगा."</p>
<p>वन विभाग की कोशिशों और सहयोग से ही पुंजापुरा तालाब के किनारे बांस के पौधे रोपे गए . डिप्टी रेंजर मूलचंद भार्गव कहते हैं- "यह खास तरह के बांस वैसे नार्थ-ईस्ट इलाके में पाए जाते हैं. यह नमी और ठंडे प्रदेशों में पनपते हैं. यह मालवा इलाके में नया प्रयोग है. वन समिति और स्वसहायता समूह की महिलाओं ने ताकत झोंकी और तीन साल में जंगल खड़ा कर दिया."</p>
<p>विकास समूह की सदस्य रेखा तंवर कहती हैं -" मेरी जिंदगी तो मजदूरी और गरीबी में निकल रही थी. बंजर पहाड़ी पर जब पौधे लगाए ,तो सोचा नहीं था कि ये जंगल जिंदगी को पटरी पर ला देंगे. मेरे मवेशी एक या डेढ़ लीटर से ज्यादा दूध नहीं देते थे. जंगल से घास मिलने लगा. अब मवेशी चार लीटर से ज्यादा दूध देने लगे. धंधे में फायदा हुआ तो गाय ,भैंस और खरीद ली. बच्चे स्कूल जाने लगे."</p>
<p>इस जंगल की देख-रख करने वाले  जय लक्ष्मी समूह की सचिव कहती हैं -"हमारे पास काम नहीं था. यह बंजर पहाड़ी पर जब बांस लगाए  तब भी भरोसा नहीं था कि यह हमारे सपनों को हकीकत में बदल देगा. हमको अभी मुफ्त में घास मिल रही. मवेशी तंदरुस्त हो गए."    </p>
<p>अध्यक्ष सपना निगम भी बहुत खुश है. वह बताती है -" मेरे मवेशी ही नहीं बल्कि समूह के सभी सदस्यों को ये फायदा हुआ. जब बांस काट के बिकेंगे तब हमारी कमाई और बढ़ जाएगी." इस इलाके में साढ़े बारह हजार से ज्यादा बांस के पेड़ लहलहा रहें हैं. रेंजर नाहर सिंह भूरिया कहते हैं -" ये जंगल खड़ा करना हमारे लिए बड़ी चुनौती था. गांव की वन समिति के अलावा दो स्वसहायता समूह की दीदियों से यह अनुबंध किया. अभी आठ हजार रुपए महीने दे रहे है." </p>
<p>जिला पंचायत की परियोजना प्रबंधक शीला शुक्ला कहती हैं -"जिले के दो स्वसहायता समूह की बाइस महिलाओं को सीधा लाभ मिला. ये बांस  कटाई और बेचने से बड़ी कमाई कर सकेंगी. अभी घास मुफ्त में मिल रही है. गरीबी झेल रही महिलाओं और ग्रामीणों के जीवन स्तर सुधारने के लिए ये जंगल वरदान साबित हुआ." जिले के सहायक परियोजना प्रबंधक रामसिंह ने बताया -"तीन साल पहले 2022 में 25 हजार घास  के पुले महिलाओं को मिले, जबकि 2022 तक बत्तीस हजार पुलों को काटा. लगभग बीस हजार पुले विभाग के पास स्टॉक में हैं. ये बीस हैक्टेयर जमीन पर जबरदस्त ग्रोथ ले रहें हैं.</p>
<p>प्रकृति को सहेजना संभालने के साथ संसाधनों से कमाई करने की यह अनूठी कहानी है. आर्थिक आज़ादी की तरफ बढ़ते कदमों के साथ SHG महिलाएं जीवन के अलग अलग क्षेत्रों में अपने निशान छोड़ रही हैं और देश समाज के लिए कितना कुछ कर रही है.</p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">विवेक वर्द्धन श्रीवास्तव </dc:creator><pubDate>Tue, 21 Mar 2023 14:04:23 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/kahaniyan/shg-contributes-in-nature-conservation]]></guid><category><![CDATA[कहानियां]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/otoimf3sstUJy34ai3tG.jpg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/otoimf3sstUJy34ai3tG.jpg"/></item><item><title><![CDATA[बसंत की आग ... ये पलाश ]]></title><link>https://ravivarvichar.in/khabar/yellow-palash-fenced-for-security</link><description><![CDATA[<img src="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/c9G0vmCj158nlbqZUOOO.jpeg"><p>सड़क किनारे लाल नारंगी रंग की छठा बिखरी हुई है. साल के इस वक़्त जैसे दुनिया में चेरी ब्लॉसम होता है, वैसे ही मध्य भारत को पलाश रंगीन कर देता. होली के रंगीन कैनवास को प्रकृति भी पलाश के लाल नारंगी पीले रंग इस रंग देती है. पलाश को लोकल बोली में टेसू भी  कहते हैं. फायर ऑफ़ फारेस्ट कहे जाने वाले पलाश या टेसू के पेड़ों इस मौसम को और खुशनुमा बनाते है. इनमें एक ख़ास तरह के सफ़ेद कलर के होते हैं, जिन्हे महादेव को चढाने  की प्रथा है .लेकिन कटते हुए जंगलों के साथ ये पेड़ दुर्लभ हो गए. उत्सव और खुशियों का प्रतीक माने जाने वाले पलाश के पेड़ों को बचाने के लिए खास तरह के इंतजाम किए गए हैं. निमाड़ इलाके में सतपुड़ा के घने जंगलों में इन दिनों पेड़ पलाश के फूलों से लदे कुछ खास पेड़ को स्पेशल सुरक्षा दी गई. यह व्यवस्था खरगोन के वन विभाग ने की. इस पेड़ को काटने से बचने के लिए आसपास फेंसिंग कर दी गई. जिससे इसे बचाया जा सके. यहां सिर्फ लाल-नारंगी कलर के खूबसूरत दिखने वाले फूलों के पेड़ बचे हैं. सतपुड़ा और खरगोन जिले के इक्का -दुक्का जगह पर ही पीले रंग के खूबसूरत पलाश के पेड़ बचे हैं. वन माफियों से बचाने के लिए यह सब कयावद की गई है. पीला रंग दोस्ती, अपनत्व और पॉसिटिविटी का प्रतीक माना जाता है.   </p>
<p><img src="https://d2vbj8g7upsspg.cloudfront.net/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/ktY1h8v20hgp7a7MpcjB.jpeg" alt="yellow palash close up"></p>
<p>होली के पहले पलाश के पेड़ पूरी तरह से फूलों से लद जाते हैं. वनस्पति शास्त्री डॉ पुष्पा पटेल कहती हैं -"जंगल में मेडिसनल प्लांट सर्च के दौरान देखा कि सतपुड़ा के घने जंगल कम हो गए.सबसे ज्यादा पीले रंग के खिलने वाले पलाश के पेड़ लगभग पूरे कट गए. उन्होंने फारेस्ट विभाग को सूचना दी. वन विभाग ने इसे दुर्लभ श्रेणी में मान कर पेड़ के आसपास तारों कि फेंसिंग करा दी. आसपास रहने वाले ग्रामीण खुद इस पेड़ कि रखवाली कर रहे हैं. </p>
<p><img src="https://d2vbj8g7upsspg.cloudfront.net/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/ujdUvc3kv14H3sdYl0UB.jpeg" alt="yellow palash"></p>
<p>पलाश के फूल और उसकी  खूबसूरती को होली के उत्सव और रंगो के लिए जाना जाता है. इससे परंपरागत प्राकृतिक रंग तैयार किए जाते हैं. एमवाय हॉस्पिटल के डर्मेटोलॉजिस्ट और प्रोफेसर डॉ राहुल नागर ने कहा - " यह नॉन केमिकल है. इससे तैयार रंग से होली खेलना चाहिए. यह स्किन के लिए पूरी तरह सेफ है. गीतकार हरीश दुबे कहते हैं- "टेसू के फूलों और रंगो का कई गीत और रचनाओं में उपयोग कर उसे और लोकप्रिय बनाया जाता है". होली त्यौहार  के ख़त्म होने के साथ ये फूल भी पेड़ों से झड़ जाते हैं.  </p>
<p><img src="https://d2vbj8g7upsspg.cloudfront.net/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/WJGfjP6dJooTjUPUDjeo.jpeg" alt="narangi palash"></p>
<p><img src="https://d2vbj8g7upsspg.cloudfront.net/fit-in/580x348/filters:format(webp)/ravivar-vichar/media/media_files/Gxux4W0x7tH9ZD0Z7W5f.jpeg" alt="orange palash"></p>]]>
</description><dc:creator xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/">विवेक वर्द्धन श्रीवास्तव </dc:creator><pubDate>Fri, 03 Mar 2023 15:27:37 +0530</pubDate><guid isPermaLink="true"><![CDATA[ https://ravivarvichar.in/khabar/yellow-palash-fenced-for-security]]></guid><category><![CDATA[ख़बर]]></category><media:content height="960" medium="image" url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/c9G0vmCj158nlbqZUOOO.jpeg" width="1280"/><media:thumbnail url="https://img-cdn.publive.online/fit-in/1280x960/ravivar-vichar/media/media_files/c9G0vmCj158nlbqZUOOO.jpeg"/></item></channel></rss>