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हक़ मूवी का टाइटल सीन
फ़िल्म "हक़" शाहबानों के जीवन पर आधारित है. सुपर्ण वर्मा ने इसका फिल्मांकन बहुत अच्छा किया है, हर एक सीन पर बहुत मेहनत दिखाई देती है.
यह समय 1067 से 1985 तक का ऐरा दिखाया गया है. जिसमें प्रोडक्शन डिज़ाइन बहुत बारीकी से किया गया है.उस समय जैसा बाज़ार होता था, वो संकरी-संकरी सड़कों में भीड़-भाड़, वहीं किसी एक कोने में बंधा हुआ घोड़ा, वो तांगा गाड़ी, साइकल रिक्शा, सब्जियों के ठेले, मोलभाव करतीं हुई औरतें और उस समय की कार, सब कुछ हमें उस दौर में ले जानें में कामयाब रहा.
हौसलों से न्याय की दहलीज़
कहानी बहुत अच्छी है और एकदम कसी हुई है. स्क्रिप्ट भी बहुत अच्छी लिखी गई.
जिस तरह घर में रेडियो की जगह टी.वी. ने ले ली थी, सोफों पर नए कवर लगाए जा रहे थे, और अब्बास मियां की ज़िंदगी में भी शाज़िया बानो की जगह सायरा ने ले ली थी।बानों का दिल कई हिस्सों में चूर-चूर हुआ था।
जिस प्यार और मोहब्बत से बानो ने अपने घर में गुलाब की बगिया लगाई थी, उन्हीं गुलज़ार फूलों के सामनें अब्बास मियां के तलाक़ के तीन लफ़्ज़ों ने उसका फूलों से भरा हुआ संसार उजाड़ कर रख दिया था.
हाई कोर्ट के प्रांगण में बैठे बच्चों को बानो का पेंसिल पकड़ाना, दर्शकों के मन को बहुत द्रवित कर देता है. बच्चों की ज़िंदगी पर मां के हक़ की लड़ाई किस हद तक असर करती है.
पिता की मौत के बाद क़ुरान में रखी हुई उनकी चिट्ठी जिसमें लिखा होता “बेटी तुम सही हो”, बानो को यह हौसला देता है कि खुदा तुम्हारे साथ है, यह लड़ाई तुम्हें अंत तक लड़ना है.
फ़िल्म में दो बार बानो को क़ुरान पढ़ते हुए दिखाया गया. जिस एक शब्द “इक्रा” को वो बहुत प्रभावी तरीक़े से अंत में बोलती हैं, उसका मतलब..पहले क़ुरान अच्छे से पढ़, समझ, फिर मज़हब को बचाने की बात कर.
कहानी को बहुत अच्छे तरीक़े से सिलसिले-वार पिरोया गया है. हर एक संवाद बहुत गहराई से असर डालता है. जिसमें आखरी में सुप्रीम कोर्ट में बानो का केस में ख़ुद ही पैरवी करना....
सच में औरत को सिर्फ़ औरत से जोड़कर क्यों नहीं देखा जाता है? समाज क्यों “हिंदुस्तानी हो या तुम मुसलमान हो” जैसे सवाल पूछता है?
"मुझे भी एक आम हिंदुस्तानी औरत के जैसे इंसाफ़ मिले.”
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फ़िल्म में संगीत विशाल मिश्रा ने दिया है, जो मन को मोह लेता है वहीं अरमान ख़ान ने उतनीं ही ख़ूबसूरती के साथ सुरों को दिया.बिलकुल कर्णप्रिय...
मुख्य भूमिका में हैं यामी गौतम और इमरान हाश्मी.यामी ने फ़िल्म में औरत के उस दर्द को आत्मा के भीतर तक महसूस कराया है जो हमारे समाज की अनगिनत औरतों को हर रोज़ उस दर्द से जूझना पड़ता है या जूझ रहीं हैं. साथ ही चेहरे की भावभंगिमा से बताने में कामयाब रही. जब उनकी वक़ील, बेला जैन, उन्हें यह विश्वास दिलाती है कि तुम सही हो,और वो उस वक्त आत्मविश्वास से भर जाती है.
वही इमरान ने भी अपने किरदार को बहुत जीवंत बनाकर पर्दे पर उतारा है. चाहे मोहब्बत हो या अहंकार से भरा हुआ आदमी, वह बिना शब्दों के सिर्फ चेहरे के हावभाव से ही महसूस करवाने में कामयाब रहे हैं.
सिनेमाटोग्राफ़ी और कलर ग्रेड भी बहुत अच्छा था, जो दर्शकों को उस माहौल में ले जाने में सफल रहा.
कुल मिलाकर एक अच्छी कहानी के साथ फ़िल्म को पेश किया गया है जो कहीं से भी कमजोर नहीं दिखाई देती है, और दर्शकों को अंत तक बांधे रखती है.
हकीकत का वही हक़ तहरीर लाया..
यह फ़िल्म इंदौर शहर की आम मुस्लिम औरत शाहबानो के जीवन पर आधारित है.
शाहबानो का नाम बदलकर शाज़िया बानो कर दिया गया है.
शाज़िया बानो अपने शौहर, जो पेशे से वक़ील रहते हैं, उनके साथ बेहद मोहब्बत और ईमानदारी से शादी-शुदा जीवन व्यतीत करती है।
अचानक एक दिन अब्बास मियां ने प्रेशर कुकर की तरह अपनी बेगम को भी बदल दिया।
शाज़िया बानो को घर, परिवार, और बच्चों की परवरिश करते-करते यह पता ही नहीं चला की कब उनका शौहर उनसें इतनी दूर चला गया,और वो बेगम से “पहली बेगम” बन गई थी। बच्चों की खातिर शाज़िया ने ये भी बर्दाश्त कर लिया था पर वो भीतर ही भीतर कहीं टूट रही थी. जब बात इज़्ज़त और आत्म सम्मान की आई तो उसने अब्बास का घर छोड़ दिया.
कभी कभी सिर्फ़ मोहब्बत काफ़ी नहीं होती है.
फिर शुरू हुई एक लंबी लड़ाई बच्चों के खाना, खर्च और मेंटेनेंस की. शुरू में कुछ महीनों तक तो अब्बास ने दिया, लेकिन बाद में अचानक एक दिन वो भी बंद कर दिया.
तब शाज़िया पहले मुस्लिम लॉ बोर्ड और बाद में अदालत जाती है.
एक लड़ाई जो एक कमरे से निकलकर मोहल्ले की, फिर मुल्क की, और ना जाने कब मज़हब की लड़ाई बन जाती है.
जहां टूटी थी कसमें
और बिखरे थे कई वादे
उन्हीं किरचों से एक
मुकम्मल तामीर लाया है.
जहां सच क़ैद था
चुप्पियों की एक अदालत में
हकीकत का वही हक़
तहरीर लाया है…
पद्मा सिंह
एक औरत जो सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने शौहर और बच्चों के साथ अपनी जिंदगी जीना चाहती है। जब शौहर झूठ, फ़रेब, और दग़ाबाज़ी करे, तो वह अपने हक़ के लिए लड़ना भी जानती हैं।
किसी भी मज़हब में दूसरी बीबी को लाना सही नहीं बताया गया है, अगर कोई ऐसा करता है तो यदि कोई विशेष परिस्थिति हो या फिर बीबी की पूरी रजामंदी हो. तब ही संभव होगा.
लेकिन रिश्तों में बेईमानी फरेब के साथ नहीं.
शाज़िया बानो की लड़ाई इन सभी बातों को उजागर करती है, एक औरत कितना सहती है उसमें बच्चों का जीवन तहस नहस हो जाता है, साथ में सामाजिक और मज़हबी दबाव.
पर जब आप सही होते हो और आपके साथ पिता का साया होता है, तो देर से ही सही लेकिन इंसाफ़ ज़रूर मिलता है.
शाज़िया ने यह केस 15 सालों तक कोर्ट में लड़ा.उनके शौहर ने शरीयत को बचाने की ज़िम्मेदारी अपने उपर ली थी, लेकिन ख़ुदा का इंसाफ़ भी यही चाहता था, कि जो इंसान अपनी बेगम और बच्चों की जिम्मेदारी नहीं उठा सकता, वो मज़हब को क्या बचाएगा।
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यह केस आज भी यू.पी.एस.सी. की परीक्षा के लिए पढ़ाया जाता है. इसको लीगल लेंग्वेज में “लैंडमार्क केस” का दर्जा दिया गया है.यह भारत का एक बहुत ही महत्वपूर्ण केस है जिसके परिणाम में यह पाया गया की शरीयत, धर्म-ग्रंथ और कंस्टीट्यूशन, सब के हिसाब से तलाक़ का मतलब एक जैसा ही है.
यह कहानी से भरी हुई है, जिसमें तमाम दूसरी औरतों के लिए एक मिसाल बनी है और एक नया रास्ता बनाया। वरना भारतीय समाजों में औरतों को सिर्फ़ चुप रहना सिखाया जाता है. लेकिन शाज़िया के पिता ने अपने हक़ के लिए लड़ना सिखाया. और यही इस मूवी का मकसद है.
आप सब यह फ़िल्म ज़रूर देखियेगा.
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