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फूलों के खेत में खेत में खड़ी किसान दीदी-Image :Ravivar
मध्य प्रदेश की धार्मिक पर्यटन और आध्यात्मिक नगरी उज्जैन जहां प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग बाबा महाकाल स्वयं विराजित हैं,वहीं भगवान श्रीकृष्ण की अध्ययन स्थली सांदीपनि आश्रम भी यहीं है.ऐसे पवित्र और पौराणिक महत्व के शहर में इन दिनों फूलों की बहार है.इस ज़िले में बड़ी संख्या में किसान परिवार फूलों की खेती करने में जुटे हैं. खासतौर पर स्वयं सहायता समूह से जुड़ी सदस्य किसान दीदियां भी चर्चा में है. जी हां, देश के महत्वपूर्ण ज्योतिर्लिंग महाकाल की नगरी उज्जैन पिछले कुछ सालों से फूलों की महक से सराबोर है.ये काम संभाली ज़िले की किसान दीदियों ने ...
ज़िंदगी में भी अब फूलों की महक का अहसास
ज़िले के बड़नगर ब्लॉक में है छोटा सा गांव सनावदा.यहां की रहने वाली संगीता सेवाराम कहती है -"शुरुआत में मजदूरी कर भरण -पोषण करते रहे.आजीविका मिशन के अधिकारी एक दिन गांव में आए.उन्होंने हमारी परेशानी समझी और मां अंबे स्वयं सहायता समूह का गठन करवाया.बाद में उम्मीद बढ़ी और ग्राम संगठन और फिर नर्मदा संकुल संगठन (CLF) में जुड़ गए.एक एकड़ में मैंने परिवार के साथ फूलों की खेती शुरू की.उत्पादन बढ़िया होने लगा और मेरे पति सेवाराम, फूलों से भरे थैलों को उज्जैन मंडी में बेचने लगे.देखते-देखते ही हमारी इनकम 3 हज़ार रुपए महीने से बढ़कर 13 हज़ार रुपए तक पहुंच गई.हम गेंदा, सेवंती और नवरंगा जैसे फूलों की किस्में लगा रहे.अच्छा लगता जब हमारे यहां खेत के फूल भगवान के मंदिरों सहित कई जगह उपयोग में आ रहे"
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संगीता के परिवार में आर्थिक संपन्नता बढ़ने से परिवार के चारो सदस्यों का जीवन स्तर में बदलाव आ गया.सालभर में अब अच्छी कमाई हो रही है.
रजनीगंधा देख खेत में ठहर रहीं राहगीरों की नज़रें
बड़नगर ब्लॉक के इसी सनावदा गांव में सिर्फ संगीता ही नहीं आप रामकुंवर बाई से भी मिलिए.यदि आप इस तरफ से कहीं खेतों में से निकले और दूर से ही रजनीगंधा के खेत के साथ महक का अहसास हो तो समझ जाइए ये खेत रामकुंवर बाई का ही है.
रामकुंवर बाई कहती है -"हमारे परिवार ने पहले कभी सोचा भी नहीं था कि मजदूरी छोड़ फूलों की खेती करेंगे.किसान दीदी बन कर बहुत अच्छा लगता है.जय भवानी एसएचजी (self help group) बनाकर लोन लिए और 3 बीघा ज़मीन पर रजनीगंधा सहित कई तरह के फूलों के बीज लगाए.देखते ही देखते फूल उज्जैन की मंडी में बिकने लगे.पति बहादुर ने ये काम साथ संभाला.अब हमारी इनकम सालभर में 8 से 10 लाख रुपए तक हो गई.
डे ग्रामीण आजीविका मिशन की जिला प्रबंधक (मॉनिटरिंग एग्रीकल्चर) छाया भार्गव बताती हैं -"हमारा यह प्रयास सफल रहा.फूलों की खेती से किसान दीदियों के जीवन में भी खुशहाली आ गई.हम उनके लिए बीज सहित अन्य योजनाओं के लाभ का प्रबंध करते हैं." उज्जैन में फूलों की खेती लगातार चर्चा में है और लोकप्रिय हो रही है.
आजीविका मिशन के जिला परियोजना प्रबंधक अमित ब्रजवानी का बताते हैं -"स्वयं सहायता समूह की महिलाओं ने मजदूरी से निकल कर किसान दीदी के रूप में शानदार प्रदर्शन किया.तेजी से आर्थिक उन्नति होने लगी.फूलों की खेती के लिए इस जिले कई गांव में किसान दीदी और समूह सक्रीय हैं जिन्हें योजनाओं का लाभ दिया जा रहा है"
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