बांस की टोकरी ने कैसे बदल दी सिंगपुर स्कूल की पूरी कहानी

धमतरी के सिंगपुर गांव की खम्मन बाई ने अपनी मेहनत की कमाई से स्कूल में किताबें, कंप्यूटर और अन्य सुविधाएं प्रदान कर बच्चों की शिक्षा में महत्वपूर्ण सुधार किया.

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रिसिका जोशी
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बांस की टोकरी बनाती खम्मन बाई

बांस की टोकरी बनाती खम्मन बाई Photograph: (etv bharat)

धमतरी: जब इरादे मजबूत हों तो हालात कभी रुकावट नहीं बनते. इसी बात को सच कर दिखाया है सिंगपुर गांव की आदिवासी महिला खम्मन बाई कमार ने। खुद पढ़ाई का अवसर न मिलने के बावजूद उन्होंने गांव के बच्चों के लिए शिक्षा का रास्ता आसान बनाने की ठानी. अपनी मेहनत की कमाई से स्कूल को जरूरी संसाधन उपलब्ध कराना उनके जीवन का मकसद बन चुका है.उनकी इस पहल ने पूरे क्षेत्र में एक सकारात्मक संदेश दिया है.

किस स्कूल के लिए कर रही हैं खम्मन बाई प्रयास?

धमतरी जिले के मगरलोड ब्लॉक में स्थित सिंगपुर गांव घने जंगलों के बीच बसा है. यह गांव जिला मुख्यालय से करीब 65 किलोमीटर और ब्लॉक से लगभग 30 किलोमीटर दूर है. यहां पहुंचने के लिए कठिन रास्तों से गुजरना पड़ता है. गांव में एक ही सरकारी स्कूल है, जहां 12वीं तक पढ़ाई होती है। इसके बाद छात्रों को आगे की पढ़ाई के लिए दूर जाना पड़ता है. इसी स्कूल को बेहतर बनाने के लिए खम्मन बाई लगातार योगदान दे रही हैं.

शिक्षा को लेकर एक अलग सोच

खम्मन बाई कमार खुद अनपढ़ हैं, लेकिन उनका सपना है कि सिंगपुर गांव के बच्चे पढ़-लिख सकें और शिक्षित बनें. उनके इस प्रयास ने न सिर्फ गांव के लोगों को प्रेरित किया है, बल्कि जिला प्रशासन की भी सराहना हासिल की है. महुआ बीनना, बांस की टोकरी बनाकर बेचना और जंगल से तेंदूपत्ता लाना—इन सारी मेहनतों के बावजूद, खम्मन बाई अपनी कमाई का एक हिस्सा स्कूल में जरूरी सामान दान करने में लगाती हैं. उनका मकसद बेहद सरल लेकिन शक्तिशाली है: बच्चों और आने वाली पीढ़ी को शिक्षा का अवसर देना. खम्मन बाई कहती हैं,

 "मैं चाहती हूं कि लोग शिक्षा के महत्व को समझें, इसलिए अपनी मेहनत से स्कूल में सामान दान करती हूं, ताकि गांव की अगली पीढ़ी पढ़ाई-लिखाई करके अपना भविष्य खुद बना सके."

महुआ बीनकर और बांस की टोकरी बनाकर बच्चों के लिए स्कूल में संसाधन जुटाती खम्मन बाई
महुआ बीनकर और बांस की टोकरी बनाकर बच्चों के लिए स्कूल में संसाधन जुटाती खम्मन बाई Photograph: (etv bharat)

मदद करना अब बन गया जीवन का हिस्सा

सिंगपुर कमारपारा में रहने वाली 50 वर्षीय खम्मन बाई कमार न सिर्फ अपने जनजाति के पारंपरिक कामों में जुटी हैं, बल्कि बच्चों की शिक्षा के लिए भी प्रेरक उदाहरण हैं. झोपड़ी जैसे घर में रहने के बावजूद, दो पुत्र और एक बेटी की मां खम्मन बाई ने अपने जीवन में शिक्षा को प्राथमिकता दी. पति के 2008 में देहांत के बाद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपने घर को संभालते हुए गांव के स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को पढ़ाई के प्रति जागरूक करने का संकल्प लिया. इसके लिए वे अपनी मेहनत की कमाई से स्कूल में नए-नए सामान खरीदती हैं, ताकि बच्चों को बेहतर संसाधन मिल सकें. यह उनकी जीवनशैली का एक अहम हिस्सा बन चुका है, और उनकी यह पहल पूरे गांव के लिए प्रेरणा बन रही है.

बच्चों के चेहरे पर आई मुस्कान

स्वामी आत्मानंद उत्कृष्ट हिंदी विद्यालय में खम्मन बाई कमार की पहल से बच्चों को नया कंप्यूटर मिला है. अब स्कूली बच्चे कंप्यूटर पर पढ़ाई कर हाई एजुकेशन की बेसिक जानकारी सीख रहे हैं. बच्चों और शिक्षकों का मानना है कि यह कदम गांव की शिक्षा में नई क्रांति लेकर आएगा। खम्मन बाई बताती हैं, "मैं पढ़ी-लिखी नहीं हूं, लेकिन मेरा मकसद है कि मेरा स्कूल और गांव के लोग शिक्षा के प्रति जागरूक हों. 2 साल बाद मैं फिर एक बड़ा गिफ्ट दूंगी, लेकिन वह मैं अभी नहीं बताऊंगी."

खम्मन बाई ने सिंगपुर स्कूल में बच्चों के लिए कंप्यूटर दान किया
खम्मन बाई ने सिंगपुर स्कूल में बच्चों के लिए कंप्यूटर दान किया Photograph: (etv bharat)

आने वाली पीढ़ी को बेहतर भविष्य देने की कोशिश

खम्मन बाई कमार ने कई वर्षों से अपने गांव के स्कूलों में बच्चों के लिए जरूरी सामान दान किया है. उन्होंने बाल्टी, किताबें, टीवी और कंप्यूटर जैसी चीजें स्कूल में उपलब्ध कराई हैं. खुद पढ़ी-लिखी न होने के बावजूद, और बाल विवाह का अनुभव होने के बावजूद, उनका उद्देश्य गांव के बच्चों को शिक्षित और जागरूक बनाना है, ताकि आने वाली पीढ़ी पढ़ाई और सीखने के महत्व को समझ सके. वर्तमान में वे महुआ बीनने, तेंदूपत्ता और टोकरी बनाने का काम करती हैं और अपनी मेहनत की कमाई का हर बचा-पचा हिस्सा बच्चों की पढ़ाई पर खर्च करती हैं. खम्मन बाई कहती हैं कि बच्चों को पढ़ते हुए देखकर उन्हें बहुत खुशी मिलती है, और गांव के लोग उन्हें सम्मान से “स्कूल में सामान दान देने वाली खम्मन बाई कमार” के रूप में जानते हैं.

गांव में कॉलेज की मांग

खम्मन बाई की सबसे बड़ी इच्छा है कि उनके गांव में ही कॉलेज खुले, ताकि खासकर लड़कियों को दूर जाकर पढ़ाई न करनी पड़े. उनका कहना है कि लड़कियों के लिए बाहर जाना मुश्किल होता है, इसलिए गांव में ही उच्च शिक्षा की सुविधा होना जरूरी है. उन्होंने सरकार से इस दिशा में कदम उठाने की अपील की है.

प्रशासन ने की सराहना

धमतरी के कलेक्टर अबिनाश मिश्रा ने खम्मन बाई कमार के योगदान की सराहना की है और इसे महिला सशक्तिकरण का प्रेरक उदाहरण बताया. पढ़ी-लिखी न होने के बावजूद, खम्मन बाई ने बच्चों के लिए स्मार्ट टीवी, कंप्यूटर और लाइब्रेरी के लिए किताबें दान की हैं. ट्राइबल हॉस्टल में भी उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई है. कमार जनजाति को आम तौर पर पिछड़ा माना जाता है, लेकिन खम्मन बाई ने शिक्षा के क्षेत्र में अपनी पहल से यह साबित कर दिया कि कठिन परिस्थितियों में भी बदलाव लाया जा सकता है.

सिंगपुर गांव में आईटीआई और कॉलेज खोलने का प्रस्ताव राज्य शासन को भेजा गया है और जल्द ही यहां उच्च शिक्षा के नए अवसर उपलब्ध होंगे. कलेक्टर मिश्रा ने बताया कि गांव शहर से लगभग 30 किलोमीटर दूर है और यहां हाई एजुकेशन की सुविधा कम है, इसलिए इस दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं. उन्होंने कहा कि जो महिलाएं शिक्षा और समाज में नवाचार कर रही हैं, उन्हें जिला प्रशासन की तरफ से पूरे समर्थन और शुभकामनाएं मिलती रहेंगी.

जिला प्रशासन बाल विवाह कलेक्टर