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Election Fever -Image: Ravivar
आगामी दिनों में देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित है. पुड्डुचेरी,केरल,असम, तमिलनाडू और पश्चिम बंगाल. इन राज्यों की अपनी राजनीति है. मुद्दे है. कुछ स्थानीय, कुछ राष्ट्रीय मुद्दे. केंद्र की राजनीति से दूर स्थानीय राज्य के नेताओं की अपनी पकड़ और प्रभाव जनता और वोटर्स पर है. इन सब से अलग पश्चिम बंगाल हमेशा राजनितिक चर्चाओं और मुद्दों में छाया रहा. हाल ही में बिहार चुनाव में भी महिलाएं वोट बैंक और महिलाओं से जुड़ी योजनाओं ने नितीश कुमार को सत्ता की पक्की राह दिखाई. यही दांव पश्चिम बंगाल में भी चला जा रहा. पर यहां महिलाओं का मूड स्विंग होने के खतरे भी कम नहीं.
बिहार :11% वोटिंग उछाल से लहराया जीत का परचम
पश्चिम बंगाल के हालात और संभावनाओं के पहले हाल ही में हुए बिहार चुनाव पर एक नज़र डाल ली जाए. बिहार में वोट बैंक यानी self help groupकी महिला सदस्यों की योजनाएं और सुविधाओं की झड़ी ने देखते ही देखते NDA सहित नितीश कुमार की जीत को पक्का कर दिया और रिज़ल्ट भी वही आए. इसका सबसे बड़ा कारण सन 2020 के बिहार चुनाव में महिलाओं की वोटिंग प्रतिशत लगभग 60% था जो 2025 में बढ़कर लगभग 71% हो गया. इतना बड़ा वोट पर्सेंटेज का उछाल यूहीं नहीं है.टोटल वोट पर्सेंटेज भी देखे तो पुरुषों के मुकाबले 62.8 % और 71.6 % रहा.
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अब इस केलकुलेशन को समझिए. BIHAR में SHG की संख्या लगभग 10 लाख है यानी एक करोड़ से ज्यादा महिला सदस्य इस बिहार ग्रामीण आजीविका मिशन की सदस्य हैं. इधर सरकार की नगद सहायता ,साइकल योजना ,सुरक्षा कल्याण योजना चुनाव कैम्पेनिंग को और मजबूत बना दिया. JEEViKA सरकार के लिए वरदान साबित हो गया. इन योजनाओं का असर जीविका मिशन की महिलाओं और उनके परिवार में सीधा आर्थिक बदलाव पर दिखा. या यूं कह सकते इसके पहले NDA और BJP शासित प्रदेश में State Rural Livelihood Missionवरदान साबित हुआ. चाहे MP हो, छत्तीसगढ़ हो या राजस्थान SHG की महिलाएं "मास्टर की" साबित हुईं.
माइक्रो फाइनेंस बन सकती बंगाल में गले (जीत) की फांस!
इस बार पश्चिम बंगाल में हालात पहले जैसे नहीं है. SIR,कोर्ट में उलझे प्रकरण और महिला वोट बैंक में सेंध के बीच ये चुनाव आर-पार के दिखाई दे रहे हैं.इन सबके बीच SELF HELP GROUP गतिविधियों में हुईं विसंगतियां और कतिथ माइक्रो फाइनेंस शोषण बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी की TMC के लिए गले की फांस बन सकती है. पश्चिम बंगाल के स्थानीय अखबार और सोशल मिडिया चैनल में कुछ केस उजागर हुए. आपको जानकर आश्चर्य होगा कि पश्चिम बंगाल में देश के सबसे अधिक स्वयं सहायता समूह गठित है और इसी हिसाब से महिला सदस्यों की संख्या है. यहां 11 लाख समूह में सवा करोड़ महिला सदस्य सक्रीय हैं. जो बंगाल की योजनाएं लक्ष्मी भंडार स्वरोजगार योजना के अलावा कई सुविधाओं का लाभ ले रहीं हैं.
यहां तक तो सब ठीक है परंतु यहां महिलाएं माइक्रो फाइनेंस के मकड़ जाल में उलझ गई. 12 लाख स्वयं सहायता समूहों से जुडी 24 लाख महिलओं के माथे 4 करोड़ रुपए से कहीं अधिक का क़र्ज़ है. सालाना ब्याज दर 60 से 70 % अलग से. इन सबसे भी बड़ी चौंकाने वाली बात यह है कि कई महिलाओं और समूह को पता ही नहीं जिन पर क़र्ज़ चढ़ा दिए गए. अब हालात यह बन रहें हैं कि महिलाएं क़र्ज़ उतारने की स्थिति में नहीं और Recovery Agents (बाउंसर्स) की धमकियों की शिकायतें बढ़ती जा रही. मुर्शिदाबाद हो या बैंकुरा की महिलाएं सभी उलझ गई. महिलाओं का ये आक्रोश तृणमूल कांग्रेस (TMC) वाली ममता सरकार पर भारी पड़ सकता है.
'महिला हितेषी' का तमगा और "ममता मैजिक"
बावजूद इसके पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी का व्यक्तिगत प्रभाव और 'महिला हितेषी' का तमगा उन्हें हमेशा सरकार में काबिज़ कर देता है. सुविधाओं की बाढ़ और चुनाव के ऐनवक्त पहले घोषणाओं ने ममता के कॉन्फिडेंस को बढ़ाया. यही कारण भाजपा ने पिछले चुनाव में पूरी ताकत झोंकने के बाद भी उनकी रणनीति "ममता मैजिक" के जागे टिक न सकी. इस बार भी ममता हमेशा की तरह चुनावी प्रचार का किला अकेले ही लड़ा रहीं.
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इधर कटते वोटर्स के नाम, घुसपैठ, इंटरनेशनल इज़राइल,ईरान और अमेरिका के बीच वार के हालात में ममता और उनकी टीम को भाजपा के रणनीतिकार अमित शाह एंड टीम घेरने में लगी हुई है. भाजपा की चाल और ममता के मोहरों में शह-मात की बाजी को देखना इस बार बड़ा दिलचस्प होगा.
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