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अपनी रीपर मशीन के साथ खड़ी पपीता रावत-Image :Ravivar :Ravivar
मप्र के इंदौर जिला अंतर्गत धुलेट गांव पिछले कुछ समय से चर्चा में है. चर्चा का कारण यहां की रहने वाली पपीता रावत है. पपीता, स्वयं सहायता समूह में सक्रिय अध्यक्ष होने के साथ देखते ही देखते नवाचार करने के लिए पहचान बन गई. इस पूरे इलाके में किसान परिवारों में काउंसलिंग करने पपीता रावत पहुंच रही.
600 बीघा खेत में पराली जलाने से बचाया !
जिले के धुलेट गांव के आसपास दूर-दूर तक कोई भी किसान अब अपने खेत में पराली (गेहूं कटाई के बाद बचे हुए ठूंठ,अवशेष) नहीं जलाता. इसका कारण पपीता रावत है. पपीता रावत बताती है -"शुरुआती दिनों में मैं घर ही रहती और मेरे पति महेश मजदूरी करने जाते थे. घर में तंगी बनी रहती. एक दिन गांव में आजीविका मिशन के अधिकारी आए. द्वारकाधीश सेल्फ हेल्प ग्रुप बनाया.सिलाई मशीन ली और काम शुरू किया. इसके बाद मैंने लोन लेकर 'स्ट्रा रीपर मशीन' खरीद ली. गांव सहित आसपास के किसान परिवारों को पराली जलाने नुकसान और भूसा तैयार करने के फायदे बताए. देखते ही देखते इस साल हमने 600 बीघा से ज्यादा खेत में फसल कटने के बाद पराली जलने से बचा लिया. इस बार पराली से भूसा तैयार कर किसानों को लाभ पहुंचाया. वे इसका उपयोग मवेशियों के 'केटल फीड' के रूप में कर रहे. इस साल हमने लगभग साढ़े तीन लाख रुपए का लिए."
डे आजीविका मिशन के जिला प्रबंधक गायत्री राठौड़ बताती है-"इस समूह को विलेज ऑर्गेनाइज़ेशन के साथ आस्था संकुल संगठन खुड़ैल से जोड़ा गया.किसान दीदी के रूप में पपीता रावत बेहतर काम कर रही. पशु पालन से जुड़कर भी चार मवेशियों के माध्यम से दूध उत्पादन का व्यवसाय कर रही है."
सखियां ला रहीं किसान और कृषि पद्धति में बदलाव
समाज और कृषि पद्धति में बदलाव नज़र आने लगा है. किसान दीदियां स्वयं सहायता समूह के माध्यम से किसानों की सोच के साथ पराली को जलाने से हो रहे नुकसान को समझा रहीं. इंदौर के जिला परियोजना प्रबंधक (DPM) हिमांशु शुक्ला बताते हैं-"धुलेट की पपीता रावत रीपर मशीन खरीद कर केटल फीड तैयार कर रही है. इससे स्वयं की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ साथ ही अन्य किसानों को भी प्रेरित कर रही है. अन्य समूह की सदस्यों को भी मिशन काउंसलिंग कर रहा है."
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इंदौर क्षेत्र के आसपास स्ट्रा रीपर मशीन खरीदने या किराए से लेकर भूसा तैयार करने के लिए किसान परिवारों की रूचि दिखाई देने लगी है.
सैकड़ों एकड़ खेत की उपजाऊ क्षमता दांव पर
कृषि वैज्ञानिकों का कहना है किसानों द्वारा पराली जलाने की मानसिकता बनी हुई है. प्रदेश में ही सैकड़ों एकड़ खेत में पराली जलाने से उनकी उपजाऊ क्षमता दांव पर लगी हुई है.
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वैज्ञानिकों के अनुसार "पराली जलाने से जहां अगले सीज़न में फसल उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है वहीं पराली (सूखी फसल अवशेष या STUBBLE) जलाने से CO2 (कॉर्बन डाय ऑक्साइड), नाइट्रोजन ऑक्साइड सहित हानिकारक गैस बनती है जिससे ग्लोबल वॉर्मिंग प्रभावित होती है. मिट्टी उर्वरता (सॉइल फर्टिलिटी) के साथ सूक्ष्मजीव और बैक्टीरिया नष्ट हो जाते है."
हालांकि जिला प्रशासन और कृषि विभाग पराली न जलाने के लिए किसानों को जागरूक कर रहा है. यहां तक कि पराली जलाने पर जुर्माने का भी प्रावधान है.
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" यह प्रसन्नता की बात है की ज़िले में किसान सखी ने न केवल स्वयं को आर्थिक समृद्ध बनाया, बल्कि कृषि के क्षेत्र में सबसे गंभीर समस्या पराली जलाने का विकल्प किसानों तक पहुंचाने अपनी भूमिका निभा रही हैं. ऐसी किसान दीदियों को समूह के बीच और प्रोत्साहित करने के लिए कहा गया है. आने वाले दिनों में और सकारात्मक परिणाम देखने को मिलेंगे, जिससे कृषि क्षेत्र में सुधार के साथ पर्यावरण में सहभागिता होगी."
सिद्धार्थ जैन, आयएएस
सीईओ, जिला पंचायत, इंदौर
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