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Image Credits: Google
मध्य प्रदेश के सागर ज़िले से आई यह खबर सिर्फ़ एक स्थानीय घटना नहीं है. यह उस सामाजिक हताशा और साहस की कहानी है, जहाँ महिलाएँ कानून के इंतज़ार में नहीं रहीं, बल्कि खुद अवैध शराब के खिलाफ खड़ी हो गईं.
सागर के गिरवर गाँव में लगभग 50 महिलाओं ने एकजुट होकर अवैध शराब के अड्डों पर छापा मारा. डंडों के साथ निकली इन महिलाओं का गुस्सा अचानक नहीं था, बल्कि वर्षों से झेली जा रही घरेलू हिंसा, आर्थिक तंगी और सामाजिक अस्थिरता का नतीजा था.
अवैध शराब: एक सामाजिक समस्या, सिर्फ़ कानून का मामला नहीं
अवैध शराब का असर केवल नशे तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका सीधा और गहरा प्रभाव परिवार और पूरे समाज पर पड़ता है. ग्रामीण इलाकों में अवैध शराब की उपलब्धता घरेलू हिंसा को बढ़ावा देती है, जहाँ नशे की हालत में विवाद और मारपीट आम हो जाती है. परिवार की सीमित आमदनी शराब पर खर्च हो जाने से घर की आर्थिक स्थिति कमजोर होती जाती है, जिसका सीधा असर बच्चों की पढ़ाई और उनके भविष्य पर पड़ता है.
सबसे ज़्यादा असर महिलाओं पर होता है, क्योंकि अवैध शराब के कारण उनकी सुरक्षा और सम्मान दोनों खतरे में पड़ जाते हैं और उन्हें मानसिक, सामाजिक और शारीरिक रूप से असुरक्षित माहौल में जीना पड़ता है. इन हालातों में सागर की महिलाओं का यह कदम एक सामाजिक प्रतिक्रिया बनकर सामने आया है, न कि सिर्फ़ कानून हाथ में लेने की कोशिश.
जब प्रशासन पीछे रह जाए, तो समाज आगे आता है
महिलाओं का कहना था कि उन्होंने कई बार शिकायत की, लेकिन अवैध शराब की बिक्री बंद नहीं हुई. यही वह बिंदु है जहाँ सवाल उठता है-अगर कानून समय पर काम करता, तो क्या महिलाओं को सड़कों पर उतरना पड़ता. यह घटना प्रशासन और आबकारी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करती है. कानून की मौजूदगी तभी मायने रखती है, जब उसका असर ज़मीन पर दिखे.
महिलाओं का साहस: प्रतिरोध से नेतृत्व की ओर
इस घटना की सबसे अहम बात यह है कि महिलाएँ पीड़ित की भूमिका से बाहर निकलकर नेतृत्व की भूमिका में सामने आईं. यह केवल गुस्से का तात्कालिक प्रदर्शन नहीं था, बल्कि एक स्पष्ट और मजबूत संदेश था कि अब अवैध कारोबार को चुपचाप सहन नहीं किया जाएगा. इस कदम के जरिए महिलाओं ने यह दिखा दिया कि वे अपने परिवार और समाज को बचाने की जिम्मेदारी उठाने के लिए तैयार हैं और बदलाव के लिए किसी अनुमति या इंतज़ार की ज़रूरत नहीं समझतीं.
यह कदम बताता है कि ग्रामीण महिलाएँ अब सिर्फ़ “समस्या झेलने वाली” नहीं, बल्कि समाधान गढ़ने वाली ताकत बन रही हैं.
लेकिन सवाल बाकी है: क्या यह स्थायी समाधान है?
महिलाओं का साहस सराहनीय है, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं हो सकता.
अवैध शराब की जड़ें गहरी हैं और इसके पीछे संगठित नेटवर्क काम करता है.
असल ज़रूरत है—
प्रशासनिक निगरानी की.
आबकारी व्यवस्था की जवाबदेही की.
महिलाओं को कानूनी और संस्थागत समर्थन देने की.
अगर यह समर्थन नहीं मिला, तो महिलाओं का यह संघर्ष अकेला पड़ सकता है. सागर की यह घटना सिर्फ़ यह नहीं बताती कि महिलाओं ने अवैध शराब के खिलाफ छापा मारा. यह बताती है कि जब सिस्टम चुप रहता है, तो समाज बोलने लगता है.यह महिलाओं की हिम्मत की कहानी है, लेकिन साथ ही यह शासन-प्रशासन के लिए एक चेतावनी भी है- कानून को समय पर काम करना होगा, वरना लोग खुद रास्ता बनाना शुरू कर देंगे.
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