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महिलाओं से जुड़े मामलों में न्याय तक पहुंच को आसान और स्थानीय बनाने की दिशा में ओडिशा सरकार ने एक अहम कदम उठाया है. राज्य सरकार ने घोषणा की है कि पंचायत स्तर पर ‘नारी अदालतें’ (Women’s Courts) शुरू की जाएंगी, जिनका उद्देश्य महिलाओं की शिकायतों का तेज़, संवेदनशील और समुदाय-आधारित समाधान करना होगा. यह पहल खास तौर पर उन महिलाओं के लिए है जो सामाजिक दबाव, आर्थिक कमी या कानूनी जटिलताओं के कारण थाने या अदालत तक नहीं पहुंच पातीं.
पायलट प्रोजेक्ट से होगी नारी अदालत शुरुआत
नारी अदालतों की शुरुआत मलकानगिरी ज़िले की गोविंदपल्ली ग्राम पंचायत से पायलट प्रोजेक्ट के रूप में की जाएगी. इसके बाद इस मॉडल को राज्य के 10 ज़िलों की चयनित ग्राम पंचायतों में लागू किया जाएगा. ये वे ज़िले हैं जहां महिला प्रतिनिधित्व पहले से मजबूत है.
नारी अदालत क्या होगी और कैसे काम करेगी?
नारी अदालत कोई औपचारिक न्यायालय नहीं होगी, बल्कि यह एक स्थानीय महिला नेतृत्व वाला मंच होगा, जहां महिलाओं की समस्याओं को संवाद, काउंसलिंग और आपसी समझौते के ज़रिए सुलझाने की कोशिश की जाएगी.
हर नारी अदालत में:
7 से 9 स्थानीय महिलाएं होंगी, जिन्हें न्याय सखी कहा जाएगा.
इनमें से एक को मुख्य न्याय सखी के रूप में चुना जाएगा.
इन महिलाओं का चयन ग्राम सभा के माध्यम से किया जाएगा.
पूरी व्यवस्था की निगरानी ज़िला कलेक्टर करेंगे.
किस तरह के मामलों पर होगी सुनवाई
नारी अदालतें खास तौर पर उन मामलों पर ध्यान देंगी, जहां महिलाएं अक्सर अकेली और असहाय महसूस करती हैं, जैसे:
घरेलू हिंसा और पारिवारिक विवाद.
उत्पीड़न, मानसिक या सामाजिक दबाव.
संपत्ति, भरण-पोषण या अधिकारों से जुड़े मुद्दे.
सरकारी योजनाओं या कानूनी अधिकारों की जानकारी का अभाव.
इन मंचों पर महिलाओं को कानूनी जानकारी, मानसिक सहयोग और ज़रूरत पड़ने पर पुलिस या चिकित्सा सहायता तक पहुंच भी दिलाई जाएगी.
औपचारिक अदालतों का विकल्प नहीं, बल्कि पहला सहारा
सरकार का कहना है कि नारी अदालतें औपचारिक न्याय व्यवस्था का विकल्प नहीं, बल्कि एक प्रारंभिक और सहायक मंच होंगी. गंभीर मामलों में महिलाओं को कानूनी प्रक्रिया अपनाने के लिए मार्गदर्शन दिया जाएगा.
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि छोटी या शुरुआती समस्याएं बिना लंबी कानूनी लड़ाई के सुलझ सकें और महिलाएं अपने अधिकारों को लेकर जागरूक हों.
यह पहल क्यों अहम है?
ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में आज भी बड़ी संख्या में महिलाएं:
अपनी समस्या कहने से डरती हैं.
कानूनी प्रक्रिया को जटिल और महंगी मानती हैं.
सामाजिक बदनामी के डर से चुप रहती हैं.
नारी अदालतें इस खामोशी को तोड़ने की कोशिश हैं, जहां महिलाएं, महिलाओं की बात सुनेंगी और समाधान निकालेंगी. ओडिशा की नारी अदालत पहल न्याय को गांव तक ले जाने का प्रयास है. यह पहल न सिर्फ शिकायत निवारण का मंच है, बल्कि यह महिलाओं में आत्मविश्वास, जागरूकता और नेतृत्व को भी बढ़ावा दे सकती है. अगर यह मॉडल सफल होता है, तो यह देश के अन्य राज्यों के लिए भी महिला-केंद्रित न्याय व्यवस्था का उदाहरण बन सकता है.
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